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Monday 20 Nov 2017

कस्टमर केयर उर्फ़ दूसरा झूठ


अशोक गुजराती
बी-40, एफ ़-1, दिलशाद कालोनी
दिल्ली- 110095
 मो. 9971744164
अवधेश जी स्वयं को बेहद ईमानदार नागरिक समझते हैं। वैसे उन्होंने बनती कोशिश कभी कोई बेईमानी अपने जानते की भी नहीं। हाईस्कूल में अंग्रेज़ी के छात्र और उनके अभिभावक हार गये उनकी चिरौरी करते पर उन्होंने कभी ट्यूशन नहीं ली। उनके अपने सिद्धांत थे- 'जब स्कूल में मैं संपूर्ण प्रामाणिकता से पढ़ा रहा हूं और उसके बदले में मुझे उचित पारिश्रमिक मिल रहा है, मैं अलग से लोगों को लूटने का प्रयास क्यों करूं?...Ó
   इस तस्वीर की उनके घर के आइने में अलहदा छवि थी। पत्नी महिका जी नाराज़ थीं- 'ऐसा कितना कमा लेते हैं.. कभी दाल-रोटी के सिवा कोई सुख दिया है आपने.. वही निम्न मध्यमवर्गीय जीवन- महीने के अंत में सब्ज़ी-प्याज़ खऱीदने की भी बन्दिश। मैं आपकी अर्धांगिनी बनी कुछ सपने संजोकर, उनको जलते और राख में बदलते देखते उम्र गुजऱ रही है। असल में आप हैं आलसी, ट्यूशन लेते रहते तो अपना मकान होता, बेहतर खाने-पीने की गुंजाइश होती, यदाकदा इधर-उधर घूम-घाम कर पिकनिक भी मना लेते लेकिन मैं चारदीवारी में क़ैद दो वक़्त का खाना किसी प्रकार जुटा लेने को अभिशप्त रह गयी...।Ó
   बड़ी बेटी पन्द्रह की, बेटा चौदह का। वे भी कसमसाते रहते- 'हमको पापा ने कभी कोई मन की चीज़ खऱीद कर नहीं दी... कपड़े, किताबें, स्कूल की फ़ीस के लिए भी अक्सर टालमटोल होती रहती है... खिलौने तो कभी देखे ही नहीं, अब आई-पैड, मोबाइल और एलईडी का ज़माना है। सारे दोस्तों के यहां है। हम झुंझलाते रहते हैं कि हमारे पास क्यों नहीं... पता नहीं पापा आगे क्या करेंगे... क्या हम अच्छी तरह पढ़ाई कर पायेंगे, कुछ बन सकेंगे जि़न्दगी में या वही.. पापा जैसे स्कूल के मास्टर ही।Ó
   आये दिन होती रहती इन फुसफुसाहटों से निरपेक्ष बने रहते अवधेश जी। दीगर करते भी क्या, जब उनके उसूल समझौता करने को राज़ी नहीं थे। अलबत्ता सच्चाई यह भी थी कि आदमी कितना भी दृढ़-संकल्प हो, अपनों के समस्त नतमस्तक हो ही जाता है।
   वे चाहते तो नहीं थे लेकिन परिजनों के दबाव के सम्मुख उनको झुकना पड़ा। ज्यों ही छठवें वेतन आयोग में उनकी पगार बढ़ी, उन्होंने सोचा कि जो एरियर्स मिलेंगे, उनको बेटी के विवाह हेतु एफ डी में रख देंगे। मिलने से पहले ही घर में यह मालूम हो चुका था। सभी ने आपस में गुफ़्तगू कर योजना बना ली थी कि इन पैसों का सदुपयोग किया जाये। मोबाइल और एलईडी लेना ही लेना है, पिताजी चाहे कितना विरोध करें। पुराना-सा ब्लैक एंड व्हाइट टीवी उनका मनोरंजन करने में असमर्थ था। केबल था नहीं। एक-दूसरे से जुड़े रहने के लिए मोबाइल परम आवश्यक था। पत्नी की तरफदारी और बच्चों के हठी आग्रह को भला वे कैसे ठुकराते... उनका अपना रहन-सहन तो सादगी-भरा था किन्तु वे उनकी ज़रूरतों से भी वाकिफ़  थे। तय हो गया। दो मोबाइल कम से कम लेने ही थे। एक निवास पर रहेगा और एक अवधेश जी की जेब में। उनको ये मानना ही था क्योंकि हर शिक्षक के पास मोबाइल पहले से ही था। अन्दर ही अन्दर वे ख़ुश भी हुए कि अब वे जब चाहे, जिसे चाहे फोन कर सकेंगे और अपने परिवार से तो संपर्क बना रहेगा ही।
   बच्चों ने ज़्यादा जि़द नहीं की कि उनको भी एक-एक मोबाइल दिलाया जाये। उन दिनों प्रत्येक विद्यार्थी के बस्ते में एक ठो मोबाइल होता ही था। उनको अहसास था कि अपनी वित्तीय स्थिति इतनी उम्दा भी नहीं हुई है कि यह सम्पन्नता भोग सके। यह उनकी अपने परिवार के प्रति अमूमन स्वार्थ त्याग की मिसाल ही थी, जिसे अवधेश जी ने मन-ही-मन सराहा भी।
   यहां तक ठीक था परन्तु बच्चे और उनकी मां एलईडी को लेकर प्रतिगमन के मूड में नहीं थे। वह भी डीटीएच के साथ। आखिऱ अवधेश जी ने सपरिवार जाकर एक नामी कंपनी का एलईडी सैंतीस हज़ार में खऱीद ही लिया। भैया, दीवाली तो अपनी तय तिथि पर आती है, उनके परिसर में वह अग्रिम ही आ गयी। बेटे ने डीटीएच का कनेक्शन भी करवा लिया था। जब उस दीवार पर लगे टीवी के विशाल स्क्रीन पर हर ख़बर की, हर सीरियल की, हर कार्यक्रम की वृहद एवं रंगीन तस्वीरें दिखीं तो हरसू जश्न का माहौल छा गया। अवधेश जी भी इससे अछूते नहीं रहे। उनको न्यूज़ चैनल पर अपने प्रिय प्रधानमंत्री ऐसे लगे, ज्यों उनके रूबरू खड़े होकर उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक का पुरस्कार दे रहे हों।
   सवा साल तक सब बढिय़ा चला। अवधेश जी को क्रिकेट में बला की दिलचस्पी थी नहीं, उन्होंने बॉल अथवा बल्ले को कभी छुआ तक नहीं था। वह तो कालेज के दिनों में रेडियो पर कमेन्ट्री सुन-सुनकर उन्हें क्रिकेट रोचक लगने लगा था। उस उम्र में वे गावस्कर, चेतन चौहान, कपिल देव, गायकवाड़, रवि शास्त्री, चन्द्रशेखर, प्रसन्ना इत्यादि के फ़ैन थे। घण्टों रेडियो या ट्रांजि़स्टर से चिपके रहते। दिखता कुछ ना हो, सुनने में मज़ा आता था। अब जब उन्होंने रंगीन टीवी पर नये उभरते खिलाडिय़ों को खेलते देखा, इतने दीवाने हो गये कि वन डे और ट्वेंटी-ट्वेंटी समूचा देखते। इसके अतिरिक्त उनको चौबीस घण्टे नये-नये समाचार भी मिलने लगे। पत्नी तथा बच्चों ने भी उनकी देखादेखी क्रिकेट में आनंद लेना शुरू कर दिया। अलबत्ता उनकी अनुपस्थिति में सास-बहू सीरियल भी उनको व्यस्त बनाये रखते।
   तो मुसीबत आयी अंदाजऩ सवा साल बीतने पर। टीवी से आवाज़ तो आ रही थी लेकिन पिक्चर नदारद थी। उन्होंने सम्भाल कर रखे टीवी के डाक्यूमेंट्स निकाले। वारंटी उल्लिखित थी महज़ एक वर्ष की। यानी समाप्त हो चुकी थी। बावजूद इसके उन्होंने कंपनी के टोल फ्री नंबर पर कॉल लगाया। आधे घण्टे बाद लगा। शिकायत दजऱ् की। अगले रोज़ कंपनी के मेकैनिक, जिसे वे इंजीनियर कह रहे थे, का फोन आया। उन्होंने उसे अपना पता और टीवी में आये विकार के विषय में बताया। तथाकथित इंजीनियर का कर्कश स्वर सुनायी दिया- 'कोई खऱाबी निकले, न निकले- मैं आपके घर आऊंगा तो आपको हज़ार रुपए सर्विस चाजऱ् देना पड़ेगा...Ó उनको उसकी ऐसी मुंहज़ोर भाषा पर ग़ुस्सा आ गया। उन्होंने फ़ोन काट दिया।
   बेटे ने आश्वस्त किया- 'आप चिन्ता मत करो पापा, मेरे पहचान का एक मिस्त्री है। उसे दिखा देते हैं। वारंटी तो वैसे भी ख़त्म हो चुकी है।Ó
   सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। वह मेकैनिक आया। टीवी की जांच कर उसने बताया- 'ये जो दायीं ओर इलेक्ट्रानिक बोर्ड है, इसे ले जाकर टेस्ट कराना होगा...Ó आईवी या कुछ कह रहा था कि वह बदलनी पड़ेगी। पैसा लगेगा सात हज़ार। सबके चेहरे उतर गये। उसने यह कहकर और परेशानी में डाल दिया कि इसका डिसप्ले स्क्रीन भी जल्द ही काम करना बन्द कर देगा। उन्होंने बहुत मोल-भाव किया पर वह टस से मस नहीं हुआ। अंतत: उन्होंने उसे एकाध दिन में आने की ताक़ीद देते हुए वह बोर्ड ले जाने दिया।
   अनेक फोन करने के पश्चात एक हफ़्ते बाद वह आया। ऊपर से यह फि़तूर जोड़ दिया कि आवश्यक सामान मार्केट में बड़ी मुश्किल से मिला, वह तो उसने ढूंढ-ढूंढकर इक_ा किया। स्क्रीन तो कंपनी में भी उपलब्ध नहीं है, वर्ना वह भी ले आता... ख़ैर ! टीवी पुन: जीवित हो गया। उन लोगों ने इसी में संतुष्टि मान ली।
   चला। तीन माह चला। दोबारा वही- पिक्चर ग़ायब। इस मध्य मित्रों ने सात हज़ार नाहक बरबाद करने पर उनकी जमकर भत्र्सना की। कंपनी से ही करवाना चाहिए था, यह सीख भी दी। अत: इस मर्तबा उन्होंने कंपनी के कॉल सेंटर पर शिकायत लिखवायी। कुछ ही घण्टों में उनके इंजीनियर ने विस्तार से पता पूछा। आते ही उसने अपना आई कार्ड दिखाया, जिस पर उसका नाम छपा था- विशेष शर्मा। टीवी को उतारते ही उसने तंज़-सा कसा- 'आपने इसे बाहर दिखाया है...Ó इनकी नजऱ उस स्टिकर पर गयी, जो प्राइवेट मेकैनिक ने चिपकाया होगा। इनको मालूम था कि वारंटी रहते बाहर वाले से ठीक करवाया तो वारंटी निरस्त हो जाती है। इनके मुंह से अनायास निकला- 'वारंटी पीरिएड तो केवल एक साल का था, वह तो कब का ख़त्म हो चुका...Ó
   वह मुस्कराया। तत्पश्चात बड़े एहतियात से टीवी खोलकर यहां-वहां अपने यंत्र लगाकर चेक किया। फिर सर खुजाते हुए आहिस्ता से अपना फैसला सुना दिया- 'सर, इसका डिसप्ले स्क्रीन फुंक गया है। नया लगाना होगा...Ó
   'वह कितने का आता है..?Ó इन्होंने डरते-डरते दरियाफ़्त किया।
   'वह सर, पचीस हज़ार का आयेगा।Ó
   वे सोच में पड़ गये। पचीस धन सात- बत्तीस। सैंतीस का लिया था। उन्होंने अपना हिसाब उसे बताकर इन्कार की मुद्रा में गर्दन हिलायी- 'शर्मा जी, अक्ल का काम यह होगा कि इसे मैं 'एक्सचेंजÓ में देकर नया सेट ले लूं। घड़ाई से मड़ाई ज़्यादा क्यों दूं...!Ó
   वह अपने मोबाइल के कैमरे से टीवी के अंदरूनी हिस्सों के फ़ोटो लेता रहा। चुपचाप। इनको बेचैनी हुई- 'और कोई रास्ता नहीं है...?Ó
   उसने अपना चित्रांकन का कार्य पूरा किया। टीवी को यथावत् बन्द किया। उस पर चिपका स्टिकर छुड़ाकर डस्टबिन के हवाले किया। सारा कुछ ख़ामोशी से। इनको उसकी चुप्पी रहस्यमय लगी इसलिए पुन: जानना चाहा- 'अरे शर्मा जी, अन्य कोई तरीक़ा हो तो बताओ...Ó
   वह धीरे-धीरे बोलने पर आया- 'ऐसा है अंकल जी, आपके टीवी की वारंटी मैं बढ़वा दूंगा एक वर्ष के लिए...Ó
   'वह कैसे ?Ó इन्होंने बीच में उसकी बात काटी कि इनको ज्ञात था कि वारंटी का एक्स्टेंशन मामूली रक़म भरने पर हो तो जाता है लेकिन वह पहले ही करवाना होता है।
   उसने पूरे आत्मविश्वास से इनकी ओर देखा- 'वह आप मुझ पर छोड़ दीजिए। मैं करवा लूंगा... अंकल जी, आपके लाभ की एक बात और... इस मॉडेल के स्पेयर पार्टस् मिलना मुश्किल है। मॉडेल कंपनी ने बन्द कर दिया है। होगा यह कि इसके स्क्रीन के बजाय कंपनी आपको, यह चालीस इंची था, बयालीस इंच का मॉडेल रिप्लेस कर देगी। आपका फ़ायदा ही फ़ायदा...Ó
   ये बड़े ख़ुश हुए। फिर उसकी ललचाने वाली युक्ति का प्रयोजन समझ गये। बेबाक हो पूछ ही लिया- 'तुमको कितना देना पड़ेगा ?Ó
   उसने कनखियों से निहारा- 'अधिक नहीं, आप मुझे दस हज़ार दे देना, आपको नया, इससे बड़ा टीवी मिल जायेगा। बाक़ी सारी कार्रवाई की मेरी जि़म्मेदारी...Ó
   'यह तो बहुत ज़्यादा है... बराबर बताओ...Ó वह मानने को तैयार नहीं था। पत्नी-बच्चों की तरफ़  देखा। उन्होंने आंखों ही आंखों में इशारा कर दिया। अवधेश जी ने मन को कड़ा कर उसकी अनर्गल मांग मंज़ूर कर ली।
   उसने और स्पष्ट किया- 'कंपनी से आपको फोन आयेगा। आपसे पूछेंगे- यह टीवी वारंटी में है ?... आप 'हांÓ कह देना। नये टीवी के एवज़ में वे उसकी एमआरपी का दस प्रतिशत आपसे लेंगे। आपको कंपनी के नाम से ड्राफ़्ट बना कर देना होगा।Ó
   उन्होंने जानकारी लेनी चाही कि इस कार्यवाही को कितना समय लगेगा। वह बोला, 'पन्द्रह दिन तो लग ही जायेंगे। मैंने जो फ़ोटो लिये हैं, वे वहां जमा कर मैं अपनी रिपोर्ट दाखि़ल करूंगा। उसकी ऊपर के साहब लोग पड़ताल करेंगे। सही पाने पर वे अपना आदेश जारी करेंगे।Ó वह क्षण भर रुका. उसके उपरांत उसकी मुलायम-सी दरख़्वास्त सुनायी दी- 'मेरे दस हज़ार...Ó
   बिना पलक झपकाये उन्होंने फौरन झटक दिया- 'वह नया टीवी लग जाने पर...Ó उसके 'अभी दो हज़ार ही दे दीजिएÓ निवेदन को भी उन्होंने साफ़  ठुकरा दिया।
   पन्द्रह की जगह नया टीवी आने में तकऱीबन बीस दिन जाया हो गये। इस अवधि में सबकी हालत ख़स्ता हो गयी थी, इतनी भयंकर लत उनको लग चुकी थी। टीवी लाने वाले ने कहा कि इंजीनियर चौबीस घण्टों में आकर उसको चालू कर देगा। कुछ ही देर में विशेष शर्मा का फ़ोन आया कि वह ख़ुद आ रहा है टीवी लगाने।
   वह दिन बीता। नहीं आया। अगले दिन ये फ़ोन करते रहे- स्विच ऑफ़  मिलता रहा। इन्होंने महिका जी से कहा, 'देखा, पैक टीवी दो दिनों से पड़ा है पर वह स्साला शर्मा नहीं आया। फ़ोन भी नहीं उठा रहा...Ó उन्होंने अपने तईं ज़बरन रोक रखी अपनी मन्शा को महिका जी के आगे उजागर कर ही दिया- 'वैसे भी मैं उसको दस हज़ार देने के पक्ष में नहीं हूं। यदि उसने वारंटी बढ़वायी होती तो मुझसे फार्म भरवाकर हस्ताक्षर करवाता। शायद पन्द्रह सौ के आसपास वारंटी बढ़ाने की फ़ीस भी ले जाता। उसने ऐसा कुछ किया ही नहीं। कहीं कोई फ्ऱॉड है, जो हमारी समझ में नहीं आ रहा..Ó महिका जी की सहमति मिलते देख वे बोले, 'हां, हज़ार-दो हज़ार दे देंगे, उसने काम करवा दिया है, इसलिए।Ó
   महिका जी ने हामी भरी- 'ठीक है... पर वह आ क्यों नहीं रहा जबकि उसको पैसे लेने हैं...Ó तभी उन्हें एकाएक ध्यान आया- 'आप बता रहे थे कि टीवी की दुकान वाला आपका पुराना परिचित है।Ó
   'ओह हो!.. मैं कैसे भूल गया। लोचन जी का बेटा मेरा ख़ास छात्र था। मैं उन्हीं से जाकर मिलता हूं।Ó उनको महिका जी का सुझाव यथोचित लगा।
   वे जोश-जोश में लोचन जी की दुकान पर गये और सारा कच्चा-चि_ा बयान कर दिया। पहले तो उन्होंने इनको फटकारा- 'कमाल करते हैं आप भी मास्टर जी, इतना सब हुआ और आपने मुझे इस लायक़ नहीं समझा कि मुझे आकर बताते...Ó फिर इनको याद दिलाया- 'आपको मैंने टीवी लेते समय सूचित किया था कि कंपनी ने इस मॉडेल की वारंटी एक साल से बढ़ाकर तीन साल कर दी है।Ó इनको दिग्भ्रमित-सा देख वे बोले, 'कोई मॉडेल बन्द करना हो तब प्राय: कंपनियां ऐसा क़दम उठाती हैं।Ó
   'मैंने मेरे पास के वारंटी कार्ड को चार बार पढ़ा। आपका बिल भी देखा। कहीं ऐसा जि़क्र नहीं था। आपका कहा मेरी स्मृति में नहीं रहा।Ó अवधेश जी को आक्रोश हो आया- 'इसका अर्थ है, उस शर्मा के बच्चे ने मुझे सरासर बेवक़ूफ़ बनाया...!Ó
   'बिलकुल!Ó लोचन जी ने इनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए सांत्वना दी- 'लेकिन आप चिन्ता मत कीजिए। मुझे उसका फ़ोन नंबर दीजिए।Ó
   फोन मिलते ही उन्होंने अवधेश जी का परिचय अपने दोस्त के तौर पर देते हुए उसे डांटा- 'शर्मा, तुम इनसे किस बात के दस हज़ार मांग रहे हो?Ó पता नहीं उसने क्या कहा कि उन्होंने उसे पुन: डपटा- 'नहीं, आठ हज़ार भी क्यों देंगे अवधेश जी। तुमने झूठ बोला कि वारंटी एक ही साल की है...Ó उसका जवाब सुनकर फ़ोन को अपनी जांघ के पीछे करते हुए उन्होंने इनसे धीमे से पूछा, 'आपने पहले किसी और से टीवी रिपेयर करवाया था क्या?Ó अवधेश जी की आंखों के सामने स्टिकर डस्टबिन में फेंकने का दृश्य साकार हो उठा। हड़बड़ाते हुए उन्होंने नकार में सर हिलाया- 'न... नहीं.Ó
   लोचन जी ने उसे लताडऩा जारी रखा- 'अव्वल तो इन्होंने बाहर दिखाया ही नहीं था और दिखाया भी था तो तुमको कंपनी में शिकायत करनी थी... और सुनो,Ó उनका क्रोध बेक़ाबू हो गया- 'तुमको ये नौकरी करनी है या मैं तुम्हारे बॉस मेहरा जी को तुम्हारी इस करतूत की जानकारी दूं... भला आदमी देख कर मुफ्त के दस हज़ार मांगते हो .. शर्म नहीं आती...!Ó
   फोन बन्द कर वे अवधेश जी से मुख़ातिब हुए- 'आप आराम से घर जाइए मास्टर जी। उसको एक पाई भी मत देना। ज़्यादा रंगदारी करेगा तो नौकरी से जायेगा!Ó
   घर लौटते हुए अवधेश जी को अपने जीवन में घटी ऐसी ही घटना का स्मरण हो आया। स्मरण इसलिए हो आया कि जैसे इस बार वे झूठ बोल गये थे कि टीवी को पहले कहीं ठीक करवाया नहीं था, वैसा ही झूठ उन्होंने तब भी बोला था। उनको बेईमानी, मक्कारी, असत्य से गहरी एलर्जी थी। अपनी शखि़्सयत उन्होंने ऐसे निर्मित कर ली थी कि हरदम इन तमाम व्यसनों से एक फ़ासला बनाये रखते थे। गांधी जी उनके आदर्श थे। एक सभ्य, बेलौस, सुसंस्कृत, बेलाग, सादा तथा सत्यवादी जीवन-चर्या से वे बंधे रहे थे।
   तब हुआ यह था कि उनके घर का बिजली का बिल अत्यधिक आने लगा था। उन्होंने बिजली विभाग में कई शिकवे किये, मीटर बदलने को भी कहा मगर उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। उनके एक सहकर्मी ने परामर्श दिया कि अपने भाई से, जो बिजली विभाग में है, वे उनका मीटर सही करवा देंगे। ये भोले-भाले, उसकी बातों में आ गये। उसके भाई ने अपना मेहनताना तीन हज़ार बताया। इन्होंने थोड़ी झिझक के उपरांत स्वीकार कर लिया। उसने मीटर उतारा। अंदर के कमरे में ले गया। उसकी सील तोड़ी। उसमें कोई 'रेजि़स्टंस वायरÓ डाला। सील को एम-सील से चिपका कर पूर्ववत कर दिया।
   अगले महीने बिल आया साठ रुपए। उसके अगले पचास। ये घबराए। इतना कम बिल शंका जागृत करेगा। वही हुआ। ढेरों शिकायतों की अनदेखी करता रहा बिजली विभाग इस दफा तुरंत सचेत हो गया। दो-तीन नुमाइंदे आये। इनको लगा, अब मैं फंसा। उन्होंने मीटर बारीकी से चेक किया। सील बरकऱार था। इनसे पूछा। इन्होंने मिथ्या का आश्रय लिया- 'मैं क्या जानूं , क्यों कम आ रहा है बिल। आप पता करो।Ó फिर कलीग को बताया। बिजली वाला भाई पुन: आया। मीटर की ऐसी-तैसी की। मेहरबानी कि अबकी मात्र दो हज़ार में जान छूटी। इस काण्ड का पछतावा इनको महीनों विचलित करता रहा। झूठ एवं बेईमानी का यह दंश वे एक अरसे तक झेलते रहे।
   वे इसी याद में खोये थे कि फ़ोन की घण्टी बजी। शर्मा का था। बोला कि वह अन्य कारिंदे को भेज रहा है, जो टीवी चढ़ाकर शुरू कर देगा। अवधेश जी ने सोच रखा था कि वह आयेगा तो पांचेक सौ का 'इनामÓ उसे दे ही देंगे। उन्होंने क्षण भर प्रतीक्षा की, शायद कुछ मांगे। वह चुप रहा तो इन्होंने 'धन्यवादÓ कह संवाद को विराम दे दिया।
   घर में सब प्रसन्न थे। नया और पहले से बड़ा टीवी मिल गया था। अकेले अवधेश जी गुमसुम थे। कभी इस कमरे में जाते, कभी उसमें। कभी कुर्सी पर बैठते, कभी पलंग पर जा लेटते। महिका जी ने उनकी विकलता को ताड़ लिया। उनके कऱीब बिस्तर पर जा बैठी और पूछा, Óआपकी तबीयत तो ठीक है...Ó
   'आं... हां... तबीयत ठीक है। मन अस्वस्थ है, महिका। मैंने जीवन में दूसरी बार बेईमानी का सहारा लिया है... मैंने लोचन जी से झूठ बोला कि टीवी दूसरे से रिपेयर नहीं कराया था।Ó लेटे-लेटे ही उनकी अवसन्न आवाज़ निकली।
   महिका जी ने उनका सर अपनी गोद में रखा। सहलाते हुए बोलीं, 'इसको झूठ नहीं कहते। ईंट का जवाब पत्थर से देना अपराध नहीं है। वह झांसा देकर हमसे दस हज़ार फोकट में लूट रहा था। उसका झूठ निरस्त करने के लिए आपने असत्य का औजार चलाया। यह कोई गुनाह नहीं है...Ó