Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

शायद वह औरत थी


रामनाथ शिवेन्द्र
अक्षर घर, पूरब मोहाल, राबट्र्सगंज, सोनभद्र 231216 उप्र
मो.07376900866
कुमुद जंगल से किसिम किसिम के अनुभवों का खजाना ले कर आई थी। मुश्किल से दो महीने ही वह संतोष के साथ जंगल में रही थी। इतने कम समय के भीतर ही जंगल की कई कहानियों ने उसे घेर लिया था। उसे लगा था कि जिस भद्र दुनिया को वह जानती है उस दुनिया से जंगल वाली दुनिया का कोई रिश्ता नहीं। भूख और गरीबी के बीच जीवन जीने वाले लोग जिस भद्रता से अपने को अनुकूलित किये हुए हैं, अद्भुत है, अद्भुत है उनके जीवन जीने की कला, हां उनके जीवन जीने के तरीकों को कला ही कहना चाहिए। वह जंगली लोगों को देखती रह जाती। उन लोगों को दिल में बिठा लेती किसी सधे कलाकार की तरह जो कई किस्म के चित्रों को कल्पनाओं के सहारे बना लिया करते हैं।
नक्सल क्षेत्र के लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक सोचों के बारे में जानकारियां जुटाने के लिए कुमुद पढ़ाई के समय से ही योजनाएं बनाया करती थी पर उसे इस कार्य के लिए उचित अवसर नहीं मिला, पहाडिय़ा टोला आने के बाद तो उसने निश्चित कर लिया था कि अब वह नक्सली क्षेत्र की जानकारी जुटाये बिना वापस नहीं लौटने वाली। इसलिए वह पहाडिय़ा टोला में रूक गयी थी और नक्सलियों के बारे में जानकारियां जुटाने लगी थी। सारी जानकारियां बिना किसी योजना के कहानियां बनती जा रही थीं।
संतोष के साथ जुडऩा भी एक कहानी थी। किसी के लिए भी संतोष से जुडऩा आसान नहीं था पर कुमुद तो कुमुद थी। उसने गांव वाली मीटिंग के दिन ही तय कर लिया था कि वह गांव में ही रुकेगी और जितना हो सकेगा गांव वालों के हितों की हिफाजत के लिए काम करेगी। अचानक उसके मन में आया था कि उसे गांव वालों के साथ मिलकर गांव वालों के जबरिया विस्थापन के खिलाफ जनतांत्रिक लड़ाई लडऩा चाहिए। गांव वालों के साथ जुड़ कर, वह गांव वालों की तरह हो गयी थी। इसके अलावा उसके मन में संतोष के खुरदुरे व्यक्तित्व के बारे में भी जानने की लालसा थी। आखिर वह है कौन, किस दिल दिमाग का आदमी है, खूनी रास्ते पर आखिर वह क्यों चल रहा है? उसे देखा व जाना तो जाये कि वह खुद को कैसे बदले हुए है?
किसी सधे कलाकार की तरह कुमुद ने खुद को बदल लिया था। खुद को बदल लेना उसके लिए मुश्किल था क्योंकि वह कभी सपनों में उडऩे वाली लड़की थी। उसके रंगीन सपने थे कि वह यह बनेगी वह बनेगी यानि उसे किसी न किसी दिन भद्र समाज के शिखर पर बैठना है। उसे क्या पता था कि उसे अपने सपनों को तोडऩा होगा और गांव वालों से जुडऩा होगा, गांव वालों की तरह ही रहना होगा, उनकी लड़ाई को अपनी लड़ाई बनाना होगा।
पहाडिय़ा टोला में कुमुद रुक तो गयी पर उस जैसी अजनबी लड़की का पहाडिय़ा टोला में रुकना संतोष के खेमे के लिए खोज की बात थी।
कौन है वह लड़की? यहां क्यों आई है? जैसे कई सवाल थे जिसे संतोष का हरावल दस्ता हल करना चाह रहा था। वैसे यह बात उसके हरावल दस्ते को मालूम थी कि गांव में विस्थापन के सवाल को ले कर विद्वानों तथा विचारकों की जो बैठक आयोजित की गई थी उसी दिन कुमुद भी गांव में आयी थी। बाद में मालूम हुआ था कि वह प्रोफेसर आलोकनाथ की बेटी है और जंगल की भाषा के प्रति सकारात्मक विचार रखती है, पेड़ की एक टहनी टूटने पर वह कविता बन जाती है। आलोकनाथ भी समाजबदल वाले विचार के हैं भले ही वे संसदीय व्यवस्था के जरिए समाजबदल के पक्षधर हैं।
मनीष! तू मुझे देख कर परेशान तो नहीं, अगर ऐसी कोई बात है तो मैं लौट जाती हूं। अच्छा सच, सच बताना, संतोष के साथ मेरा जुड़ाव तुझे बुरा और अनैतिक तो नहीं लगा। मुझे यकीन था कि तू दकियानूस नहीं है। तुझे बुरा नहीं लगेगा पर सच क्या है इसे तो बताओ।
जानते हो जंगल से किसिम किसिम की कहानियां मैं तेरे लिए लाई हूं। उन कहानियों को सुन कर तू उनमें गोते लगाने लगेगा और यह जो जीवन है नऽ उसके बारे में बने बनाए सारे विचारों को तोड़ भी देगा। तुझे लगेगा कि यह जो समानता, भाईचारे तथा अधिकार फधिकार की बातें है सारी की सारी कागज पर हैं। आज भी समाज का बहुलांश असमानता व शोषण का दंश झेल रहा है।
तुझे एक दिन की बात बताऊं। संतोष मुझे एक गांव में ले गया जो हम लोगों के पड़ाव से सात आठ किलोमीटर दूर था। रास्ता पहाड़ी था। पहाडिय़ां आपस में गुत्थम गुत्था थीं, उन्हें देखना अद्भुत था। जान पड़ता था कि वे एक दूसरे को चूम रही हैं। एक पहाड़ी उतरो तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती थी उससे उतरते ही तीसरी। सभी पहाडिय़ां मनोरम किस्म के संवाद भी करती। किसी कविता की तरह कविता की भाषा में ही।
हे अजनबियों तुम कहां जा रहे हो?
क्या तुम खुद को जानते हो अगर हां तो खुद को क्यों नहीं बदल लेते। खुद को बदल लोगे तो समाज बदल ही जायेगा। वैसे तुम जानते हो पहाडिय़ों को प्रकृति ने बनाया है पर हम प्रकृति का हिस्सा नहीं हैं हम खोदे और तोड़े जाने के लिए बने हैं।
सच सच बोलूं मनीष! जब हम एक पहाड़ी से समतल ढलान पर उतर जाते थे और दूसरी पहाड़ी पर चढऩे के लिए सोचते थे, तब उन दोनों पहाडिय़ों के ढलान पर क्षण भर के लिए ही सही हमें लगता कि हम किसी की गोदी में हिल डुल रहे हैं या दूसरे शब्दों में हम पहाडिय़ों के आलिंगन में हैं और तुझे तो मालूम ही है कि आलिंगन में होना कितना सुखद होता है।
तो समझ लो हम पहाडिय़ों के मनोरमों को चूमते दुलारते आगे बढ़ते जाते। करीब एक घंटे के बाद हमलोग उस गांव में पहुंचे जहां हमें संतोष ले जाना चाहता था। वह गांव भी जंगल के दूसरे गांवों की तरह ही था। फूस और खपरैल के छाजनों वाला। माटी की दिवारों पर फूस के छाजन, पुराने जमाने के गुरुकुल की याद दिलाते जिसे किताबों में पढ़ा जाता है पर उस गांव में पुराने जमाने वाले संन्यासी या गुरू नहीं थे दूसरे तरह के संन्यासी रहा करते हैं, किताबों वाले संन्यासियों से अलग। मुझे तो वहां कई तरह की समानतायें देखने में आयीं जो उस गांव वालों को किताबों वाले संन्यासियों से जोड़ती थीं। वे जीवन के बारे में सकारात्मक भाव रखने वाले लोग थे तथा खुद पर कठिन दर्जे तक का नियंत्रण भी, पर वे पहले के संन्यासियों की तरह प्रचारक नहीं थे। वे कार्मिक थे तथा जीवन जीने के लिए अलग तरीके के उत्सवों को रच भी लिया करते थे। वे बने बनाए उत्सवों से दूर रहने वाले लोग थे। उन्हें भद्रलोक के लोग नहीं जानते थे और जो जानते भी थे वे उन्हें हेय समझते थे। पर वे इसे अपना गुण समझते थे।
संतोष मुझे एक घर में ले गया वह घर भी गांव में दूसरे घरों की तरह ही था। माटी की दिवारों का एक कमरा उस पर फूस का छाजन। दिवारें लिपी पुतीं, चिकनी। घर के सामने लकड़ी की सूखी झाडिय़ों का एक घेरा जिस पर सेम की फलियां और लहराती इठलाती हरी हरी पत्तियां। सेम ने सूखी झाडिय़ों को अपनी गोदी में छिपा लिया था और सेम की फलियां तो किसी सिद्ध कवि की गुत्थम गुत्था कविताओं की तरह जान पड़ रही थीं।
सच बताऊं मनीष! उन्हें देखना उनमें डूब जाने जैसा था। मैं तो उनमें डूब ही गयी थी, अद्भुत थी उनकी संयुक्तता। घर के सामने टटरेनुमा एक दरवाजा था जो बांस की फराटियों से बनाया गया था। उसके आर पार देखना मुश्किल था। टटरे वाले दरवाजे से ही संतोष ने गोहार लगाया। फिर पैंतीस साल की एक औरत टटरे के पास आयी और उसने टटरा खोला।
अरे आप लोगन! एतना सबेरे काहे बदे अइली जाए हमके बुलाय लिये होते। आइए आइए कहते हुए वह घर में चली गयी। घर भी कितना, बाहर एक कमरा और भीतर उसी से जुड़ा एक दूसरा बरामदा।
हम लोग बरामदे में बैठे, हम लोगों के बैठने के लिए उसने खाद वाली एक बोरी झाड़ फूंक कर बिछा दी। बैठिए उसने धीरे से कहा। उसकी बोली बहुत मीठी थी।
के के खोजत हई आप लोग। उसने पूछा उसे अनुमान हुआ होगा कि हम लोग कोई अधिकारी वगैरह हैं जो जांच के सिलसिले में आये होंगे।
मैंने देखा कि वह औरत देखने में तो स्वस्थ और आकर्षक दीख रही है पर है नहीं। उसके चेहरे पर आकर्षक होने के चिन्ह नहीं थे। वहां उदासी थी तथा निराशा भी। वह थकी थकी जान पड़ रही थी।
हम लोग ऐसे ही चले आये कोई काम नहीं है, हम लोग एक संस्था से हैं। ई शंकर का घर है नऽ, पूछा संतोष ने।
हं हं ई ओन्हई कऽ घर हैऽ, हम ओनकर मेहरारू हई, का कउनो काम बा ओनसे, महिला ने संतोष से पूछा।
नाही कउनो काम नाही है, हमलोग आपै से मिलने आये हैं फिर संतोष ने अपना तथा मेरा परिचय उस महिला से कराया और उससे पूछा-
आप थाने गयीं थीं नऽ
हां गयी थी, दारोगा बोल रहा था कि वह ओनकर चालान करेगा, थाने से नाहीं छोड़ेगा, उसने ओनकर काल्हु चालान भी कर दिया होगा।
महिला इतना बता कर रुआंसी हो गयी। उसके रुआंसा होने का कारण हमलोगों का उससे परिचय न होना भी हो सकता है। हो सकता है उसे हम लोगों पर संदेह हो रहा हो, जाने कौन लोग है और यहां क्यों आये हैं। फिर भी उस महिला ने हम लोगों से अजनबीपन का व्यवहार नहीं किया।
अभी आती हूं बोल कर महिला रसोई की तरफ  चली गयी जो पास में ही थी। रसोई भी क्या थी पांच बाई छह फीट का एक घेरा, जो टटरों वाला था। उसके भीतर माटी का एकमुंहा चूल्हा था जो लिपा पुता था। वह चूल्हे में आग जलाने की कोशिश करने लगी। संतोष ने चाय बनाने से उसे रोका भी पर वह कहां मानने वाली थी।
उसने कहा- बाउजी कुछ नाहीं कर रहे हैं चाह बनाय रहे हैं अउर घर में है भी का। अगर आप लोग थोड़ा रुकेंगे तो तरकारी भात भी बनाय देते हैं। तरकारी तो हमरे पास है बगल से थोड़ा चाउर मांग लाते हैं।
मनीष ने उस महिला को रोका।
आप ई सब काहे कर रही हैं, हम लोग नाश्ता कर के आये हैं अभी कुछ खाना नाही है।
अरे साहब ई कइसे होगा। कहते हुए उसने आग जला दी और चूल्हे पर अल्यूमुनियम की केटली चढ़ा दिया फिर चाय बनाने का सारा उपक्रम यानि चीनी और चाय की पत्ती थोड़ी देर में स्टील की गिलासों में काली चाय हम लोगों के सामने थी। काली चाय भी मजेदार होती है ऐसा ही हम लोगों को लगा। चाय पीते हुए ही संतोष ने महिला से पूछा।
बच्चे कहां हैं?
ननिअउरे भेज दिये हैं साहेब, इहां तो गड़बड़ है, जाने कब थाना आ जाये अउर मारपीट करने लगे। हमार नूनू आये थे वही बच्चों को लिवा गये। बोल रहे थे तूंहो चलो, गांव में का रखा है, इहौं मर मजूरी करना है अउर उहौं भी, जब पाहुन जेहल चले गये हैं तब तूं का करेगी इहां रुक कर। पर हम काहे जाते ओनके संघे साहेब। ई हमार घर है, ईहंय मरय अउर जीयय के है, हम ऊहां काहे जांयें साहब? सो हम नाहीं गये। हमय एकय बाती कऽ तकलीफ है साहेब, हमैं पुलिस वाले काहे छोड़ दिये, हमहूं के पकड़ लिए होते अउर जेहल भेज देते तो ठीक था। हम तो दारोगा से बोल रहे थे-साहब हमहूं के ले चलो, हमहूं नक्सली हैं, हमरे ईहां नक्सली आते भी हैं, अउर हम ओनकर काम भी करते हैं पर साहेब पुलिस वाले खाली हमरे मन्सेधू को पकड़ ले गये अउर खूब मारे पीटे। ऊ सब ओन से कबूलवाय रहे थे, बार बार पूछ रहे थे नक्सलियों का पता ठेकाना बताओ पर हमरे मन्सेधू के का मालूम है नक्सलियन के बारे में। अब इहय सोचो साहेब आप लोग हमरे टोला में आये हो, हमरे टोला वालों को आप लोगन के बारे में का मालूम है कि कहां रहते हैं आप लोग, अउर का करते हैं, आपइ बताओ साहेब कोई के का मालूम है आप लोगन के बारे में? नाहीं नऽ आइसहीं हमलोग नक्सलियन के बारे में का जानते हैं, उहौ लोग तो मानुषै के तरह देखाते हैं। तनिक सोचीं साहेब! काल्हु अगर पुलिस हमैं पकड़ ले अउर पूछय कि तोहरे ईहां कउन आया था? उसका पता ठेकाना बताओ तो हम का बतायेंगे साहेब। हम लोग आपके बारे में का बताय सकते हैं, इहय बोलेंगे नऽ कि एक साहेब आये थे अउर अपने को संसथा वाला बोल रहे थे। बस ईहय नऽ। इहौ बताय सकते हैं साहेब के ऊ देखने में साहेब लगते थे, मोटे तगड़े अउर गोर गार थे, अउर का बोलेंगे साहेब?
तोहार नाम का है पूछा संतोष ने।
हमार नाउं डंगरी है-उसने बताया।
अच्छा घबराओ नाहीं हम लोग तोहरे मन्सेधू को जल्दी ही जेहल से निकलवा देेंगे, ओनकर जमानत हो जायेगी। हमार आदमी कचहरी जांयेगे अउर जमानत करायेंगे तोहके घबराये का काम नाहीं है। हमार बात बूझ रही हो डंगरी। संतोष ने डंगरी को आश्वस्त किया पर डंगरी तो डंगरी थी जाने कितने आश्वासनों को जमीन पर गिरते-भहराते उसने देखा था फिर वह भला क्यों संतोष द्वारा दिए गये आश्वासन पर यकीन कर लेती।
ओनकर जमानत कइसे होइ जाई साहेब, नक्सलियन कऽ जमानत कहां होती है। ओन्है तऽ गोली मारी जाती है, आप हमैं काहे फुसलाय रहे हैं?
डंगरी ने संतोष को उलाहा।
नाही नाही ऐसा नाही है, हम हैं, हमार संगठन है तोहरे मन्सेधू कऽ जमानत जरूर कराएगा, तू घबराओ नाहीं। संतोष ने दुबारा डंगरी को आश्वस्त किया, डंगरी चुप हो गयी जो उसकी विशेषता थी। आमतौर पर जंगल में बसने वाले लोग प्रतिवाद नहीं करते। वे किसी की भी बात को सहजता से स्वीकार लेते है। डंगरी ने भी वैसा ही किया।
हम लोग करीब ग्यारह बजे दिन के आस पास डंगरी के घर पहुंचे थे अधिक देर तक वहां रूका नहीं जा सकता था। संतोष को एक दूसरे गांव भी जाना था। उसने डंगरी को एक हजार रुपया दिया जिसे वह नहीं ले रही थी।़
काहे के लिए रुपया दे रहे हैं साहेब! डंगरी ने संतोष से पूछा।
बस ऐसे ही, इसे मदद समझ लो। कल तेरे पास चावल भी चला आएगा। हमारा एक साथी चावल लेकर कल तेरे पास आएगा। तुझे किसी भी तरह की परेशानी हो तो हमारे साथियों को बता सकती हो। हम लोग तेरी हर तरह की मदद करने के लिए तैयार हैं।
नाही साहेब! इसे हम नाही ले सकते। हम गरीब जरूर हैं पर भीख मांगने वाले नाही हैं। हमैं भगवान ने दुइ ठे हाथ दिया है, हम कमांएगे अउर खाएंगे। भीख मांग कर हम नाही खा सकते साहेब। कोई जानेगा तऽ इहै बूझेगा कि हमार आपसे लस पुस है, ई थोड़े बूझेगा कि आप हमार मदद कर रहे हैं। सो हम रुपया नाही लेंगे साहेब।
डंगरी ने सतोष को रुपया लौटा दिया पर संतोष भी कम नहीं था।
अरे एमें का है एक भाई अपनी बहिन की मदद नाहीं करेगा तो कौन करेगा। हमैं आपन भाई समझो, तोहैं हमार कसम है, ई रुपया तऽ तोहें रखना ही होगा। फिर तो डंगरी के आंगन का दृश्य ही बदल गया। डंगरी के विलापों से मुझे भी लगा कि मैं रो पड़ूंगी किसी तरह मैंने खुद को रोका फिर भी आंसू तो छलक ही गये जिन्हें रोका नहीं जा सकता था।
डंगरी को समझा बुझा कर संतोष ने उसे रुपया दे दिया फिर हम लोग उसके घर से निकले पर टोले से निकलना आसान नहीं था। शायद टोले वालों को संतोष के बारे में खबर हो चुकी थी फिर क्या था करीब बीस लोग डंगरी के घर के सामने- साहेब हमरे ईहां चाह पी लीजिए फिर जाइएगा। साहेब हमरे ईहां खाना खा लीजिए फिर जाइएगा। जितने लोग उतनी दावतें। किसी के यहां चाय पीने के लिए तो किसी के यहां खाना खाने के लिए। संतोष ने सभी को आश्वस्त किया कि वह दुबारा टोले में आएगा फिर बारी बारी से सभी के यहां खाना खाएगा। किसी के यहां नाश्ता तो किसी के यहां खाना। पर आज जल्दी है जाने दीजिए।
किसी तरह हमें टोले वालों ने छोड़ा। टोले वालों के प्यार ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया। वहां कोई बनावट नहीं थी। जो था सारा कुछ खुला खुला था। गरीबों के यहां दिल होता है पहले कभी सुना था उस तरह के दिल को उस समय देख रही थी। कोई आदमी संतोष जैसा भी हो सकता है, लोगों के दिलों पर राज करने वाला। एक बार फिर मैंने संतोष को देखा पर वह स्थिर था, उसके चेहरे पर नेताओं वाली झूठी गरिमा नहीं थी। मुझे बहुत ही अच्छा लगा, मन में आया कि संतोष की उसके सामने ही प्रशंसा करूं पर वह कुछ अधिक हो जाता सो मैंने संतोष से कुछ नहीं कहा। शायद उसे पता था कि ऐसा ही होता है फिर हम लोग उस गांव से निकल पाये।
उस टोले के बहुत सारे लोग संतोष को जानते थे पर डंगरी।
डंगरी संतोष को नहीं जानती थी ऐसा क्यों? शायद वह औरत थी और औरतों से समाज बदल का दूर-दूर तक नाता नहीं, क्या यह सच है?