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Sunday 19 Nov 2017

परियाँ

 

 जाफर मेहदी जाफरी
3।3
रॉयल अपार्टमेंट्स
चक्की वाली गली
केला नगर
अलीगढ़- 202002
मो. 9889053590
वह छत पर दीवार का सहारा लिए खड़ी सितारों भरे आकाश को एकटक देख रही थी। अचानक एक तारा टूटा और एक लम्बी सी लकीर बनाता हुआ दूर कहीं जा कर गुम हो गया। उसका दिल धड़का और बेसाख्ता उसका हाथ पेट पर पहुंच गया। झुक कर उसने देखा और फिर जहाँ खड़ी थी। वहीं बैठ गई। हाथ अब भी उसका पेट पर ही था। हल्की सी सरसराहट महसूस हो रही थी।....जान के अन्दर एक जान ..अपने होने का अहसास करा रही थी। उसके होठों पर मुस्कुराहट दौड़ गई लेकिन फौरन ही बुझ भी गई। अन्दर की मीठी सी हलचल भी थम गई। शायद दोनों ने ही एक साथ एक ही बात सोची थी। ...एक ने खो देने का और दूसरे ने खो जाने का डर महसूस किया था। उसने घबरा कर बार-बार, हाथ अपने पेट पर फेरना शुरू किया लेकिन कुछ भी आभास न हुआ। उसने आसमान की तरफ  देखा और कुछ इस तरह से देखने लगी जैसे कुछ तलाश कर रही हो। सच भी यही था। वह ढूंढ रही थी उसे जो आसमानों में कहीं रहता है ..खुली आँखों से नजर नहीं आता लेकिन दिल की आँखें उसे पा ही लेती हैं। और वह भी हर पल यह अहसास कराता रहता है कि मैं हूँ ....मुझ से माँगो। जो माँगोगे अगर तुम्हारे हक में बेहतर हुआ .....तो दूंगा।
       उसने बगैर हाथ उठाए आँखों ही आँखों में फरियाद की- मेरे मालिक रहम कर। तेरी ही दी हुई जान है। तू ही हिफाजत कर। उसकी निगाहें घूमती हुई एक चमकते हुए सितारे पर जा कर टिक गईं। जो काफी रोशन था। वह उसे देखती रही फिर उसे ऐसा लगा जैसे वह मुस्कुरा रहा है।
नादान लड़की, क्या तू नहीं जानती कि अल्लाह भी उसी की मदद करता है जो अपनी मदद आप करता है। निवाला भी उस वक्त मुंह में जाएगा, जब तुम्हारे हाथ उसे उठा कर मुंह तक ले जाएंगे। मुंह तक पहुंचाना भी कोई बड़ी बात नहीं है। मुंह चलाना जरुरी है जब हलक से नीचे उतर जायगा तब तुम्हारा काम खत्म। कदम तुम्हें बढ़ाने होंगे। मुंह तुम्हें खोलना होगा।
        तभी उसे कदमों की चाप सुनाई दी। उसने गर्दन घुमा कर सीढिय़ों की जानिब देखा। रेहान ऊपर आ रहा था।
अरे, तुम यहाँ बैठी हो? मैं तुम्हें कहाँ-कहाँ ढूंढ रहा था?
    उसने उसकी बात का कोई जवाब न दिया और वह उसके करीब आ कर बैठ गया।
क्या सोच रही हो? वही दिमाग में चल रहा होगा। सोचती बहुत हो। मैंने जो कहा है उसमें हमारी ही भलाई है।
 कैसी भलाई। मेरी समझ में नहीं आता। तुम ऐसा क्यों चाहते हो?
अब बहस न करो। जो कह दिया, वह कह दिया। अब उठो और जल्दी सो जाओ। सुबह जल्दी उठना है। आठ बजे का अपॉइंटमेंट है।
   हल्की रोशनी में उसने उसके चेहरे की तरफ  देखते हुए धीमे से कहा-  तुम अपना फैसला बदल दो। मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।
   वह उसके कन्धे पर हाथ रखता हुआ बोला- देखो, अभी तो सिर्फ मालूम करना है। जरूरी नहीं है कि हम जैसा सोच रहे हैं वैसा ही हो। हो सकता है वैसा न हो जैसा हमने सोचा है। फिर तो सब ठीक ही रहेगा।
 हम। नहीं। मुझे अपने साथ शामिल न करो। यह सिर्फ तुम्हारा फैसला है। तुम्हारी सोच में, मैं तुम्हारे साथ नहीं हूं। मेरे लिए तो दोनों ही प्यारे हैं। मैं किसी भी सूरत में, किसी को भी खोना नहीं चाहती।
मत खो। लेकिन शर्त एक ही है।
अन्दर का हाल मुझे क्या मालूम?
इसी लिए तो डाक्टर के पास चल रहे हैं।
और अगर?
फिर मजबूरी है
यह कह कर वह उठ गया। और जाते-जाते बोला- मेरा फैसला अटल है। उसमें कोई तब्दीली नहीं हो सकती। अपने जेहन को तैयार कर लो।
कभी दिल की भी सुना करो।
वह सुनी-अनसुनी करके जा चुका था। अचानक उसे अपने पेट में सरसराहट महसूस हुई। उसने उस जगह पर अपना हाथ रख दिया। अन्दर बैचेनी थी। फिर उसका हाथ इधर-उधर रेंगने लगा। तेजी से, बहुत तेजी से। वह घबरा गई। मेरे अल्लाह यह क्या हो रहा है? मेरी बच्ची, मेरी जान, तू क्यों परेशान है? तेरी मां है न? कुछ न होने दूंगी। यह मेरा वायदा है। तू सुकून से रह मेरी बच्ची।
     पेट की हलचल थम गई। उसने राहत की सांस ली। दोनों हाथ जमीन पर टेके और धीरे से उठ गई। आहिस्ता -आहिस्ता सीढिय़ां उतरती हुई अपने कमरे में आई। रेहान सो चुका था। उसके खर्राटे कमरे में गूंज रहे थे। उसने तेज लाईट बन्द की और हल्की रोशनी का बल्ब जला दिया। नीला आसमान कमरे में उतर आया। उसने आँखें बन्द कर ली और सोने की कोशिश करने लगी लेकिन दिमाग बातें करता रहा। और फिर वह न जाने कब झपक गई।  वह न सोई थी न जागी। उसे अपने अंदर से आती एक आवाज सुनाई दी-
 मां
 हां ...मेरी बच्ची।
 दुनिया कैसी है?
 बहुत बुरी ..
नहीं माँ , क्या दुनिया बहुत खूबसूरत है?
 हाँ बेटी ...बहुत खूबसूरत है लेकिन इसमें रहने वाले...उनके बारे में कुछ नहीं कह सकती।
मुझे भी दुनिया देखनी है
जरूर देखोगी मेरी बच्ची
 कैसे माँ?
 मैं अपनी ऊँगली पकड़ा कर, अपनी आँखों से, तुझे सारी दुनिया दिखाउंगी।
लेकिन उन का क्या करेगी जो मुझे आने से रोक रहे हैं?
उन पर तू खाक डाल।
क्या करेगी तू। लड़ पायगी
क्यों नहीं, तेरे लिए तो सब कुछ कर गुजरुँगी।
माँ, मुझे बस तेरा ही सहारा है। मैं जानती हूँ कि तू मेरे आने में मेरी मदद जरूर करेगी लेकिन कभी-कभी डर लगता है कि तू कहीं कमजोर न पड़ जाय ।
 न मेरी बिटिया, ऐसा न सोच। हिम्मत रख, अपनी मां पर भरोसा रख। तेरे बाप की एक न चलने दूंगी। अगर वह मर्द है तो मैं भी औरत हूं।
 पापा ऐसे क्यों हैं, जब-जब उनकी बातें सुनती हूं। मुझे डर लगने लगता है।
डर नहीं मेरी बच्ची। तेरा बाप बुरा नहीं है। बस अक्ल का अन्धा है। बोलता पहले है। सोचता बाद में है। वक्त का इन्तिजार कर। वह भी चाहेगा। जरूर चाहेगा।
हां मुझे भी लगता है। ऐसा होगा। मैं भी उन्हें बहुत चाहूंगी। उनका खयाल रक्खूंगी। सारा गुस्सा दूर कर दूंगी। फिर देखना वह मेरे बगैर एक पल भी न रह पाएंगे, लेकिन?
लेकिन क्या?
पहले वह मुझे आने तो दें।
आएगी मेरी जान, तू जरूर आएगी। तू चिन्ता बिल्कुल न कर। चल अब आराम कर, जरा भी दु:ख न कर। मैं सब ठीक कर दूँगी।
कितनी प्यारी है तू माँ। मैं हमेशा तेरे साथ ही रहूँगी ।
 न, मेरी बच्ची, ऐसा नहीं कहते। बेटियाँ परियों की तरह होती हैं। जब वे आती हैं तो आँगन खुशियों से भर जाता है। उनकी हंसी, उनकी खिलखलाहटें हर कोने, हर गोशे में गूँजती हैं। उनकी नन्हीं-नन्हीं शैतानियाँ देख कर दिल को ठन्डक मिलती है। उनका प्यार, उनका जादू अपना असर दिखता है। और फिर एक दिन वे अपना आँगन छोड़ कर उड़ जाती हैं। एक दूसरे आंगन को अपना बनाने के लिए। पहला आँगन सूना हो जाता है लेकिन यह सूनापन भी दिल को तस्कीन देता है क्योंकि हर माँ-बाप की यही तमन्ना होती है।
             सुबह का सूरज चमका। उसकी आँख खुल गई। रेहान बाथरूम में था। उसके गाने की आवाज आ रही थी। यानि आज वह बहुत खुश था। खुशी में ही वह नहाते-नहाते गाता था। उसे दु:ख हुआ लेकिन फौरन ही उसने अपने आप को सम्हाल लिया। दु:ख-वुख से काम नहीं चलना था। कुछ करना था। एक फैसला लेना था, खुद से। और उसके फैसले को मुँह की खिलानी थी।
  ठीक आठ बजे वे दोनों नर्सिंगहोम पहुंच गए। ज्यादा इन्तिजार नहीं करना पड़ा। नम्बर जल्द आ गया। वह केबिन में दाखिल हुई। डाक्टर मुस्कुराई और बेड पर लेटने का इशारा करती हुई अपनी कुर्सी से उठी और उसके पास आ गई।
अल्ट्रासाउंड शुरू हुआ। उसके पेट पर हाथ चलाती हुई डाक्टर मुस्कुरा कर बोली।
पहला इशू है?
जी, डाक्टर।
मुझे लड़की लग रही है।
जी, मुझे भी।
डाक्टर अपना काम करती रही और वह अपने आप को तैयार करती रही। यही वक्त था। यही मौका था। चुप रहना बेवकूफी थी। कुछ कर गुजरने का यही समय था। उसने डाक्टर के चेहरे की तरफ  देखा और बोली-
मैम ...आप से एक फेवर चाहती हूं
हां-हां ..बोलो।
आप अपनी रिपोर्ट में लड़की नहीं .....लड़का दिखाइएगा।
    डाक्टर का हाथ रुक गया।
क्यों? ओ, समझ गई, लेकिन?
 लेकिन क्या डाक्टर?
यह तो बेईमानी होगी।
हां होगी, लेकिन एक नेक काम के लिए। आप ने भी तो एक कसम ली होगी .....जिन्दगियां बचाने की?
वह तो ठीक है लेकिन फंस भी सकती हूं।
 सच लिखने के बाद जो कुछ होगा, उस गुनाह में क्या आप की शिरकत न होगी?
ओह, तुमने मुझे बड़े धर्मसंकट में डाल दिया।
 प्लीज डाक्टर मेरा साथ दीजिए। मुझ पर और मेरी बेटी पर रहम कीजिए। मैं उसे यह दुनिया जरुर दिखाना चाहती हूं। आप के बगैर यह मुमकिन नहीं है। प्लीज डाक्टर मदद करिए।
 डाक्टर उसका चेहरा देखती हुई सोचती रही फिर बोली-
ठीक है ....मैं तुम्हारा साथ दूँगी। बस अब और किसी के पास न जाना।
थैंक्यू डाक्टर।
 थैंक्यू माँ।
 एक खिलखिलाहट उसके कान में गूँजी और वह मुस्कुरा उठी।
 रेहान खुश था। बहुत खुश। उसकी मुराद आ गई थी। अब वह उसका पहले से ज्यादा खयाल रखता। हिल कर पानी भी न पीने देता। एक आया भी उसने रख दी जो दिन भर घर का काम करती और उसका पूरा ध्यान रखती। वह रानी बनी बैठी रहती।
 कभी-कभी उसे गिल्टी फील होती। अपने झूठ पर शर्मिंंदगी होती। फिर वह अपने आप को समझाती। कैसा रंज? कैसा गम? कैसी शर्मिन्दगी? यह झूठ ही तो एक जिन्दगी को, जिन्दगी देने वाला है। इसका कैसा पछतावा? रही बात रेहान की, तो वह खुदगर्ज है। वह मेरा नहीं, अपने बेटे का खयाल रख रहा है। अगर अभी उसे सच्चाई मालूम पड़ जाय तो उसका मिजाज बदल जाएगा। पूरा घर सर पर उठा लेगा। ...हूँ..छोड़ो भी इन बेवकूफी की सोचों को, लेकिन? जैसे-जैसे दिन करीब आ रहे थे। उसकी दिल की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। एक तरफ  खुशी थी तो दूसरी तरफ  डर। डर इस बात का कि क्या होगा जब सच सामने आएगा। कैसे निपटेगी वह? फिर उसने इन सोचों को भी एक कोने में डाल दिया, देखा जाएगा, जो भी होगा निपट लेंगे।
        वह दिन भी आ ही गया। जब वह नर्सिंगहोम में दाखिल हुई। और उसने एक बच्ची को जन्म दिया। जब उसकी निगाह उस पर पड़ी तो उसकी आंखे खुशी से डबडबा गई। गोरी-चिट्टी, गोल चेहरा, प्यारी सी हसीन बेटी। वह उसे देख कर खुशी से फूली नहीं समां रही थी। लेकिन फौरन ही रन्ज के सियाह बादल उसके हंसते-मुस्कुराते आसमान पर मंडराने लगे। तूफान आ चुका था। खबर बाहर तक पहुंच गई थी। रेहान हत्थे से उखड़ गया था। पहले तो वह डाक्टर से उलझा और फिर आन्धी की तरह उसके कमरे में दाखिल हुआ। नर्स उठ कर बाहर चली गई।
धोखेबाज, तुमने मुझे धोखा दिया। अब अपने अन्जाम के लिए तैयार रहो। मैं नहीं छोडूंगा तुम सब को।
वह चीखता-चिल्लाता कभी बाहर जाता। कभी अन्दर आता। कभी सर पीटता। कभी सर पकड़ कर बैठ जाता। वह सब देख रही थी, सुन रही थी। लेकिन वह खामोश थी, बिल्कुल खामोश। न कुछ बोल रही थी, न कोई जवाब दे रही थी। बस अपनी बेटी को मीठी-मीठी नजरों से देखे जा रही थी।
      अचानक मोबाइल की घन्टी बजी। रेहान ने झल्ला कर फोन रिसीव किया। और उसके चेहरे का रंग बदलने लगा। गुस्सा काफूर हो गया। खुशी की लहरें हिलोरे मारने लगी। वह सब कुछ भूल गया। लपक कर अपनी बीवी के पास आया और जोश में उसके दोनों हाथ पकड़ता हुआ चीखा- सबीना, सबीना, मेरा प्रमोशन हो गया। मैं कम्पनी का मैनेजर बना दिया गया .....वाह ....कैसा चमत्कार हुआ है ।
  सबीना मुस्कुराई। बेटी की तरफ देखा और आहिस्ता से बोली-मुबारक हो, उसके कदम भाग्यवान हैं, तुम्हारे लिए रहमतें लेकर आई है।
 वह चौंका। पहली बार उसने अपनी बेटी की तरफ  देखा। उसके पालने के पास आया। और फिर उस चेहरे की मासूमियत पर उसकी नजर टिक गई। वह देखता रहा, देखता रहा। फिर वह झुका। हाथ बढ़ाए और बच्ची को गोद में उठा कर उसका माथा चूमता हुआ बोला - सलामत रहो।  ठ्ठ