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Monday 18 Feb 2019

कानों को उजियारा कैसे भाएगा

 

कुमार विनोद
 गणित विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र - 136119 (हरियाणा)
मो.9416137196    
कानों को उजियारा कैसे भाएगा
आंखों से संगीत समझ ना आएगा

हर शै की दुनिया में अपनी ही वुक़अत
दिल का काम दिमाग़ कहां कर पाएगा

झील ये कल तक झरना बन इठलाती थी
वक़्त से बचकर कौन कहां तक जाएगा

रूप बदलकर आईने में रोज़ यूं ही
कब तक पगले तू ख़ुद को भरमाएगा

ईश्वर कोई शब्द नहीं है यार मेरे
पोथी पढऩे से जो समझ में आएगा

बच्चे की आंखों में झांक के देखो तो
मुस्काता-सा बुद्ध नजऱ आ जाएगा

इक दिन दिख भी जा तू मुझको ओ छलिए
जिस्म ओढ़कर कब तक तू भरमाएगा

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कोई सपना हक़ीक़त में बदल जाए तो क्या कीजे
किसी दिन चांद धरती पर उतर आए तो क्या कीजे

क्षितिज को मानकर सच तुम चले जाओ कहीं तक भी
मरुस्थल में भरम पानी का हो जाए तो क्या कीजे

ये सूरज, चांद और तारे, हैं तेरे अक़्स का हिस्सा
जो ये ब्रह्माण्ड तुझमें फिर सिमट जाए तो क्या कीजे

महज़ इन्सान बनना भी बहुत मुश्किल है दुनिया में
ख़ुदा समझे जो ख़ुद को और इतराए तो क्या कीजे

नकलची बंदरों जैसा हुआ करता है आईना
किसी के मुस्कुराते ही वो मुस्काए तो क्या कीजे

ये दुनिया खेल माया का, है सब कुछ उसकी ही माया
वो अपने जाल में हमको जो उलझाए तो क्या कीजे

उलझ जाएं बहुत ज़्यादा कभी जब तार जीवन के
कि ऐसे में समर्पण ना किया जाए तो क्या कीजे