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Saturday 25 Nov 2017

सिर्फ देने के लिये

 

यशस्विनी पाण्डेय
 बेतियाहाता, गोरखपुर
उत्तरप्रदेश
सिर्फ देने के लिये
अब जब उस स्थिति में खड़ी हूँ
जब किसी नए जीव को पृथ्वी पर
लाने को सोचती हूँ
अपनी ही कोख में रखकर 9 महीने
शरीर को खुले तौर पर बेडौल बेढब
होने का न्योता देते हुए
प्रसवपीड़ा की त्रासदी को सहने को तैयार
एक शिशु जो मुझसे मुझको छिनता है
अचानक से बाहर आते ही
और अपनी आवाज में मांगता है मुझसे
दूध, ऊष्मा, दुलार और
मेरी बाँहों का विस्तार
और मैं देती हूँ उसे वो सब कुछ
जो सदियों से हर माँ देती आई है
अपने बच्चे को जो, जो वो दे सकती है
उससे भी कहीं अधिक
दे देती है अपनी सोच में
कोई विकल्प नहीं मेरे पास भी
विकल्पों की तलाश के लिये
नहीं लायी तुम्हें दुनिया में
मेरे बच्चे
अपनी खुशी के लिये लायी हूँ
अपनी रचना देखने को लायी हूँ
फिर से एक शिशु में खुद को बड़े होते
देखने को लायी हूँ
और तेरी गलतियों पर अपनी गलतियों को याद
करते तेरे नाना-नानी से
दिल के हर कोने से
माफी मांगने को लायी हूं
तुझे ये नहीं सुनना कि
तू इतने महंगे स्कूल में पढ़ कर भी
नम्बर नहं लाया
तेरे डोनेशन में इतने पैसे लगे
इतने में बेचा,
दाम वसूला तेरी पढ़ाई का
या इतने में तेरी शादी
तेरा वो फ्लैट
क्योंकि बहुत सोच समझकर
तुझे इस दुनिया में ला रहे हैं
तुझे ना लाने के भी उपाय हैं
कोई विवशता नहीं
पर तुझे लाना है
मेरे बच्चे!
इस दुनिया में
सिर्फ देने के लिये
सारा आसमान
और सारी धरती!
डर लगता है सम्भाल सकेगी तू इसे!

देवी और साथी
पुरुषोत्तम सहस्त्रबाहु पालनहार तारणहार
ये सारे शब्द पुरुषवाचक क्यों हैं?
स्त्री में ये गुण लक्षण पाए गए
तो उसे क्या कहा जाएगा?
अगर तुम ये सब हो
तो मैं कहां हूं?
एक दिन बहुत दंग होकर
शब्दनिर्माता के पुरुषवादी केंद्रित
शुद्ध भाषा पर
मैंने तुमसे ही ये पूछ लिया
मुस्कुराकर थोड़ा दर्प से
छाती थोड़ा फुलाते हुए
मेरे इस प्रश्न पर मेरी सम्वेदना की
दाद देते हुए तुमने बड़ी ही
चतुराई से कहा
तुम तो मेरे अंदर हो देवी!
मैंने कहा तो फिर तुम कहां हो
तुमने कहा निपट अकेला हूँ मैं!
तुम्हारे सिवाय कौन है मेरा
मैंने कहा मेरे जीते जागते साथी
मुझे अंदर देवी बिठा के मत रखो
मत करो प्राण प्रतिष्ठा मुझमें
रखकर गर्दन पर हाथ
मुक्त करो मुझे अपने इस पुरातनवादी
मानक से, इस दैवीय भार से
और जीने दो संग अपने
अंदर भी बाहर भी
इतनी देर से क्यों मिले
इंसानों ने ही बांट दिया इस खूबसूरत जिन्दगी को
उमर में, साल में, महीनों में, हफ्तों में और घण्टों में
और बांट रहा है प्रतिपल
जीवन को अपने
सेकेंड्स में माइक्रोसेकेंड्स में
इसके साथ ही साथ खुद को भी
नहीं तो जीते और भी हो के
हम बेलौस बेफिक्र बदहवास
मालूम ही नहीं होता कि बीत गए जिन्दगी के
30 साल या 60 साल
मालूम ही नहीं होता कि
तुम तीस साल बाद मिले
ले दे के 40 साल ही और हैं
क्या-क्या करें इसमें
असंख्य पर्वत
कई रंगों से रंगे समन्दर
गहराई ऊंचाई सब तो मापना है
जुदा-जुदा लोग जुदा-जुदा शहर
तुम्हारी नजरों से देखना है
छूना है हर पर्व के रंग साथ तुम्हारे
खेलनी है होरी जाकर मथुरा में
भींग भींग के प्रेमनगरी में
पहन के लाल कोने वाली
सफेद साड़ी
दुर्गा पूजा में
नहाकर सिंदूर से कोलकाता में
देखना है
एक दूसरे को दैवीय प्रतिमा में
तब्दील होते हुए
खेलना है गरबा भी नवरात्रि में
चल के गुजरात
और क्रिसमस गोआ में
लहरों में डूब के देखना है
नए साल का सूरज

उगते हुए
देखनी हैं कितनी सारी
गुफाएंजादुई
जिंदा करना है हमें ही कई संस्कृतियों को
तुम्हारे जन्म को,
हमारे मिलने को
कुछ खास तारीखों को
कुछ खास तरीकों से
तब्दील करना है
रात से दिन को
दिन से सांझ को
स्वाद ब्रम्हांड के पत्ते पत्ते का
संग तुम्हारे ही लेना है
कि निकले कोई जहरीला
पौधा भी
तो साथ ही हम कूच करें
किसी और ग्रह
झंडा गाडऩे हमारे साथ होने का
कौन सा ठीक रहेगा
वीनस या मार्स
अच्छा छोड़ो बस इतना बता दो
कि इतनी देर से क्यों मिले?

अमलतास और गुलमोहर
बस प्रेम करना जानती हूँ तुम्हें
और कुछ नहीं
मुझे नहीं पता ये सामने के दो पेड़
जो लाल और पीले फूलों से
लदे हैं
नीचे इनकी लाल पीली बाहें
झूल रहीं
एक दूजे के स्पर्श को आतुर
इनके नाम क्या हैं
नहीं पता तुमने ही बताया था
कितनी अच्छी जगह हम रहते हैं
हमारे छत के सामने
अमलतास और गुलमोहर हैं
तुम्हें याद है मैंने कहा था
ये लाल वाला पेड़ मैं हूँ
और पीला वाला तुम
तुमने तनिक देर नहीं लगाई
खुद को सिद्ध करने में
और मुझे भी
पीला कर दिया तुमने
अपने हल्दी के रंग से
निखर गयी कांति मुखड़े पर मेरे
जगमगा गयी आभा
प्रेम से तुम्हारे
हर ऋतु में
सर्वदा के लिये
व्याप्त होकर नीली पृथ्वी पर
सूरज की पीली किरणों की तरह।
और ले ली मुझसे
लालिमा जीभर के
पीया प्रेम रंग लाल का छक के
खेली नयनों से होरी तभी
अब झड़ गए हैं वो पेड़
कहीं एक दो फूल दिख जाते हैं
उस मौसम की याद दिलाते
घर भी तो बदल लिये हैं हमने
मौसम की तरह
खिलते हैं फूल हर मौसम
पर प्रिये
उनकी आभा मौसम में ही निखरा करती है
पर कुछ है जो विराट  है, जो नहीं बदला
जो नहीं बदलेगा
किसी भी ऋतु में नहीं
पसर गया है चतुर्दिक
प्रिये उनकी आभा हमसे ही थी
उनमें रंग हमसे थे
वे अगले मौसम फिर खिलेंगे
फीकी सी आभा और रंग लिए