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Thursday 23 Nov 2017

\'उसने कहा था; के प्रकाशन के सौ वर्ष: कुछ अनुत्तरित प्रश्न

 
 महेन्द्र राजा जैन
सन्दर्भ, 8ए बंद रोड  एलेनगंज                                                                                           
 इलाहाबाद, 211002       मो.  9415347351

 
पिछले वर्ष उसने कहा था के प्रकाशन की शताब्दि पर पत्र-पत्रिकाओं में बहुत कुछ लिखा-पढ़ा गया। प्राय: सभी पत्रिकाओं ने उसने कहा था का प्रकाशन वर्ष 1915 माना है, जबकि आज तक किताबों की दुनिया में बताया गया कि उसने कहा था के प्रकाशन को 2014 में 100 साल पूरे हो रहे हैं। वागर्थ (मई 2015) में सुदर्शन वशिष्ठ ने भी ठीक ही लिखा है कि हालांकि सन 2014 में ही उसने कहा था, कहानी के सौ साल मनाए जाने के आयोजन कुछ अखबारों व पत्रिकाओं में देखने को मिले, इनका आधार क्या रहा होगा, यह भी शोध का विषय है। अत: हिंदी साहित्य कोश (सम्पादक- धीरेन्द्र वर्मा ज्ञानमंडल संवत 2015) में विजय बहादुर सिंह द्वारा इस कहानी का प्रकाशन वर्ष 1916 देखा, तो कुछ आश्चर्य होना स्वाभाविक था। इस सम्बन्ध में  एक पत्रिका के सम्पादक का ध्यान दिलाने पर उन्होंने बतलाया कि पिछले सालों में प्रकाशित अनेक अंकों में 1915 उद्धृत है। कहना न होगा कि ये अंक हमारे समय के वरिष्ठ संपादकों ने निकाले हैं जिसमें वर्तमान साहित्य का कथा विशेषांक भी है। चूंकि इस संदर्भ में अंतिम रूप से किसी एक वर्ष को मान्य नहीं किया गया है, अत: हमने 1915 का उल्लेख किया है जिसका सबसे ज्यादा सन्दर्भ पत्र-पत्रिकाओं, किताबों में मिलता है। उनकी इस बात से असहमत होने का कोई कारण नजर नहीं आता, पर मैं समझता हूं कि उन्हें इस सम्बन्ध में अपनी पत्रिका में सम्पादकीय में इस विसंगति पर भी पाठकों का ध्यान दिला देना चाहिए था। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अधिकाँश हिंदी सम्पादक, लेखक-पत्रकार भेडिय़ाधसान की चाल चलने वाले होते हैं। यदि मैं आज कहीं लिख दूँ कि प्रेमचंद की अमुक कहानी नोबेल पुरस्कृत अमेरिकी लेखिका टोनी मोरिसन की अमुक कहानी पर आधारित है, तो मुझे पूरा विश्वास है कि अधिकाँश लेखक-सम्पादक इसकी जांच-पड़ताल किये बिना इसे सही मान लेंगे; बिना इस बात पर विचार किये कि प्रेमचंद की मृत्यु के समय तक तो टोनी मोरीसन का जन्म भी नहीं हुआ होगा और यदि  दो-चार लोगों ने भी अपने किसी लेख या शोध-प्रबंध में इसका उल्लेख कर दिया तो फिर यह एक प्रकार से सत्य मान लिया जाएगा और तब तक संपादकों, लेखकों, शोध छात्रों द्वारा इसकी पुनरावृत्ति की जाती रहेगी जब तक कि कोई मेरे उक्त कथन का खंडन कर कोई नई बात न कह दे। इसी प्रकार उसने कहा था के सम्बन्ध में भी मेरा विचार है कि उसका प्रकाशन वर्ष 1915 सही होने के बावजूद हिंदी साहित्य कोश में दी गयी प्रविष्टि की ओर भी पाठकों का ध्यान दिलाना चाहिए था। हिंदी साहित्य कोश एक स्तरीय  सन्दर्भ ग्रन्थ माना जाता है वस्तुत: हिंदी में इस विषय का और इस प्रकार का यह एक मात्र सन्दर्भ ग्रन्थ है। अत: उसमें लिखी किसी बात की सत्यता और प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं होना चाहिए, विशेषकर इसलिए भी कि हिंदी साहित्य कोश में दी गई इस प्रविष्टि के लेखक भी हिंदी के जाने-माने आलोचक विजय बहादुर सिंह हैं और यह कोश इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष धीरेन्द्र वर्मा के साथ ही धर्मवीर भारती, ब्रजेश्वर वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी और रघुवंश द्वारा तैयार किया गया था जो अपने समय के हिन्दीजगत के जाने-माने विद्वान थे। फिर भी गलती तो इनसान से होती ही है। पर यह एक ऐसी गलती है जिसे किसी भी प्रकार क्षम्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कोई भी सन्दर्भ ग्रन्थ एक प्रकार से प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है, शोध छात्र उसमें दी गई सूचना पर निर्भर रहते हैं और जब कभी किसी प्रश्न पर कोई विवाद शुरू होता है तो उसके हल के लिए इस प्रकार के सन्दर्भ ग्रन्थ की ही सहायता ली जाती है।
उसने कहा था का प्रकाशन सबसे पहले जून 1915 की सरस्वती में हुआ था, यह तो ठीक है, पर इसके लेखक कौन थे चंद्रधर शर्मा गुलेरी या श्री चंद्रधर शर्मा (जैसा कि जून 1915 की सरस्वती में छपा है) भले ही ये दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हों, पर यह भी तो शोध का विषय हो सकता है कि श्री चंद्रधर शर्मा ने अपने नाम के साथ गुलेरी लिखना कब या किस कारण शुरू किया या चंद्रधर शर्मा गुलेरी के नाम से उसने कहा था कहानी पहली बार कब, कहां छपी?
हिंदी लेखकों और उनकी कृतियों के सम्बन्ध में यह कोई नई बात नहीं है। हाँ, यह अवश्य एक नई और अनुकरणीय बात है कि हिंदी में संभवत: पहली बार किसी रचना के प्रकाशन की शताब्दी पर इस प्रकार चर्चा हो रही है। आशा की जानी चाहिए कि हिंदी की कुछ अन्य कालजयी कृतियों के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार की जागरूकता दिखाई पड़ेगी। कामायनी और शेखर: एक जीवनी भी कुछ ऐसी ही कृतियाँ हैं।
पिछले कुछ वर्षों में निराला, जैनेन्द्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा और अज्ञेय की जन्मशती मनाई जा चुकी हैं और ये एक प्रकार से अलक्षित सी निकल गईं। यानी अब यह एक परम्परा सी बन गई है कि साहित्यकारों की जन्मशती मनाई जानी चाहिए। यह अच्छी बात है। जन्ममशती मनाये जाने की आवश्यकता, उपयोगिता और उसके महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता, पर जन्मशती के अवसर पर आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में क्या होता है? क्या यह उन कार्यक्रमों से भिन्न होता है जो सामान्यत: मनाए जाने वाले जन्म दिवस कार्यक्रमों पर होता है या उसी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कर जन्मशती मनाने की रस्म अदायगी कर ली जाती है। आज कितने लोग जानते हैं कि सुमित्रानंदन पन्त की जन्मशती कब थी या उस अवसर पर क्या किया गया? शायद बहुतों को पता न हो कि 1999 में सुमित्रानंदन पन्त की जन्मशती के अवसर पर इलाहाबाद में हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा आयोजित एक  कार्यक्रम में एकेडेमी के तत्कालीन अध्यक्ष हरिमोहन मालवीय ने घोषणा की थी कि उस दिन मनाया जाने वाला कार्यक्रम पन्त शताब्दी वर्ष का पहला कार्यक्रम था और पूरे वर्ष तक यानी पन्त शताब्दी वर्ष में पन्त आधारित विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे।
मैं नहीं जानता कि इलाहाबाद से बाहर अन्य किसी शहर में भी उस वर्ष यानी पन्त शताब्दी वर्ष में कोई कार्यक्रम आयोजित किया गया या नहीं, पर हिन्दुस्तानी एकेडेमी में तो निश्चित ही उस कार्यक्रम के बाद फिर कोई अन्य कार्यक्रम नहीं हुआ। यह अवश्य जानता हूँ कि उसके दो वर्ष पूर्व 1997 में जब जगदीश गुप्त हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष थे उस समय भी हिन्दुस्तानी एकेडमी की ओर से ही पन्त जन्म शताब्दी समारोह हुआ था, यानी एक ही संस्था द्वारा दो अलग-अलग वर्ष पन्त शताब्दी वर्ष मनाया गया। इसी प्रकार निराला के सम्बन्ध में भी विवाद छिड़ गया था कि उनका जन्मशती वर्ष कब है? पत्र-पत्रिकाओं में भी इस पर काफी चर्चा हुई थी कि निराला जन्मशती वर्ष 1996 है या 1997? इसका परिणाम यह हुआ कि निराला जन्मशती वर्ष दो वर्ष तक मनाया जाता रहा। साहित्यकारों की जयंतियों के नाम पर इस प्रकार का खिलवाड़ कब तक होता रहेगा, यह निश्चय ही विचारणीय है।
1989 महावीर प्रसाद द्विवेदी और मैथिलीशरण गुप्त का जन्मशती वर्ष था। मुझे याद नहीं आता देश भर में कहीं उनकी जन्मशती पर कोई आयोजन हुआ। किस साहित्यकार की जन्मतिथि या मृत्युतिथि पर कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाए, यह तय करने के लिए भी क्या कोई मापदंड होता है? इलाहाबाद में हिंदी साहित्य सम्मेलन और हिन्दुस्तानी एकेडेमी की ओर से समय-समय पर साहित्यकारों की जन्मतिथि के अवसर पर कार्यक्रम किये जाते हैं। इसी प्रकार किसी साहित्यकार की मृत्यु पर भी शोक (श्रद्धांजलि) सभा होती है। उसके बाद भी कभी-कभी जन्मतिथि या मृत्युतिथि पर उन्हें स्मरण किया जाता है। लेकिन मेरे लिए अभी तक यह एक रहस्य ही है कि किस साहित्यकार की जन्मतिथि या मृत्युतिथि पर कोई आयोजन हो, इसका निर्णय इन संस्थाओं द्वारा कैसे किया जाता है। डा.रामकुमार वर्मा कई वर्ष तक हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष रहे, पर उनकी मृत्यु पर एकेडेमी ने श्रद्धांजलि अर्पण करना तक उचित नहीं समझा और न ही उसके बाद आज तक उन्हें किसी भी रूप में स्मरण किया गया। डा.जगदीश गुप्त, जो डा. रामकुमार वर्मा की मृत्यु के समय हिन्दुस्तानी एकेडेमी के सचिव थे और उसके बाद वहां के अध्यक्ष हुए, उनके ध्यान में भी कभी रामकुमार वर्मा की स्मृति में कोई आयोजन करने की बात नहीं आई जब कि एकेडेमी के साथ ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में भी दोनों वर्षों तक सहयोगी रहे।
साहित्यकारों की जयंतियां मनाने के सन्दर्भ में मुझे इलाहाबाद में कुछ वर्ष पूर्व निराला जन्मशती पर आयोजित एक कार्यक्रम की याद अनायास ही आ जाती है। इलाहाबाद निराला का निवास स्थान होने के साथ ही उनकी कर्मस्थली भी रहा है, उनकी मृत्यु भी यहीं हुई, उनके पौत्र आदि भी यहीं रहते हैं। मुझे इलाहाबाद में रहते लगभग 35 वर्ष हो रहे हैं, पर याद नहीं आता कि यहाँ की किसी संस्था ने निराला की स्मृति में कभी कोई कार्यक्रम आयोजित किया हो। हिंदी साहित्य सम्मेलन और हिन्दुस्तानी एकेडेमी, जो दोनों ही इलाहाबाद की प्रमुख साहित्यिक संस्थाएं हैं, भी इसकी अपवाद नहीं हैं। इलाहाबाद के लगभग हर गली-मोहल्ले में स्थापित छोटी-मोटी संस्थाओं की तो बात ही क्या की जाए। हां, यहां निराला जयंती पर प्रत्येक वर्ष निराला साहित्य संस्थान की ओर से एक कार्यक्रम अवश्य होता है, पर चूंकि इस संस्था के संस्थापक निराला के पौत्र डा. अमरेश त्रिपाठी हैं और प्राय: सभी कार्यकर्ता उनके अपने लोग ही हैं, अत: यह संस्था एक प्रकार से घर की संस्था ही है और इसके द्वारा मनाया जाने वाला कार्यक्रम पारिवारिक कार्यक्रम ही कहा जा सकता है।
इस सन्दर्भ में यह भी विचारणीय है कि यदि कोई साहित्यकार वास्तव में महान है, साहित्य के इतिहास में उसका उल्लेखनीय योगदान रहा है, यहाँ भी प्रश्न उठता है कि उसे महान बनाने या बनाए जाने का उत्तरदायित्व किसका है? तो क्या हिंदी संस्थाओं की यह जिम्मेदारी या कर्तव्य नहीं हो जाता कि उसे उसकी जन्मतिथि पर किसी न किसी रूप में स्मरण किया जाए? यह क्यों जरूरी सा हो गया है कि हिंदी की संस्थाएं तो हिंदी के नाम पर रोजी-रोटी कमाती रहें, प्रति वर्ष लाखों-करोड़ों के अनुदान डकार जाएं, पर साहित्यकारों को स्मरण करने का कार्य उनके परिवारजन करें। विजयदेव नारायण साही की मृत्योपरांत उनकी पत्नी जब तक जीवित रहीं, प्रतिवर्ष उनके जन्मदिवस पर एक व्याख्यान का आयोजन कराती रहीं। रामकुमार वर्मा की मृत्यु हुए आज 20 वर्ष हो रहे हैं, शुरू में  दो-तीन वर्ष तक उनकी पुत्री ने उनके जन्मदिन पर कार्यक्रम आयोजित किये, पर पिछले कुछ वर्षों से कुछ नहीं हुआ। उपेन्द्रनाथ अश्क को भी हिंदी जगत शायद भूल सा गया है। विचारणीय बात यह है कि जिन साहित्यकारों के परिजन अभी हैं, वे ही क्यों इस प्रकार के आयोजन करें। रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, उग्र, पन्त, महादेवी आदि का साहित्य में योगदान क्या कुछ कम रहा है कि उन्हें स्मरण न किया जाए? महादेवी वर्मा करोड़ों की संपत्ति छोड़ गई हैं और एक न्यास बनाकर भी गई हैं। उनकी मृत्यु हुए आज 25 वर्ष से ऊपर हो रहे हैं, पर न्यास की ओर से उनकी स्मृति में आज तक कभी कोई आयोजन किया गया हो, याद नहीं आता।
किसी महान साहित्यकार की जन्मशती किसी भी देश के लिए महान अवसर होता है। इस अवसर पर क्या किया जाना चाहिए या क्या-क्या किया जा सकता है, यह मुझे तब पता चला जब करीब 50 वर्ष पूर्व मैं लन्दन में था। वह वर्ष संयोग से अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार थामस हार्डी का जन्मशती वर्ष था। वहां जन्मशती वर्ष शुरू होने के बहुत पहले से ही, वस्तुत: लगभग एक वर्ष पहले से ही, इस बात की चर्चा शुरू हो गई थी कि स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर क्या-क्या किया जाना चाहिए या किया जाना है। पत्र-पत्रिकाओं में पाठकों ने सुझाव दिए, तरह-तरह की कमेटियां बनीं और इन कमेटियों में यह बात ध्यान में रख कर ऐसी कई योजनाएं बनाईं गईं कि थामस हार्डी का यह जन्मशती वर्ष लोगों की स्मृति में बना रहे। थामस हार्डी के जन्म प्रदेश कार्नवाल में तो बहुत से आयोजन हुए ही, छोटे-बड़े उद्योगों ने भी राष्ट्रीय स्तर पर थामस हार्डी के जीवन और उसकी रचनाओं से सम्बंधित तरह-तरह के स्मृति-चिह्न तैयार किये जो जन्मशती वर्ष प्रारम्भ होते ही देश भर की दूकानों में बिकने लगे थे। थामस हार्डी के जीवन और कृतित्व से सम्बंधित कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं, उसकी स्वयं की लिखी पुस्तकों के विशेष संस्करण प्रकाशित हुए, सेमिनार-गोष्ठियां आदि तो हुई हीं, विश्वविद्यालयों द्वारा परिचर्चाएं आयोजित की गईं, विशिष्ट व्यक्तियों (थामस हार्डी के साहित्य में रूचि रखने वालों एवं विशेषज्ञों) को देश-विदेश से भाषण के लिए आमंत्रित किया गया, सार्वजनिक पुस्तकालयों में थामस हार्डी की पुस्तकों की प्रदर्शनियां लगाई गईं तथा इसी प्रकार के और भी कार्यक्रम हुए, जिनसे लोगों को थामस हार्डी के जीवन और साहित्य के विषय में तो पता चला ही, वे किस परिवेश में पले-बढ़े, किस परिवेश में उनका साहित्य-सृजन हुआ, यह भी पता चला।
इसी प्रकार 1996 में बाल साहित्य लेखिका बीट्रिस पाटर की नहीं, वरन उसकी पुस्तकों के एक पात्र, या कहूँ नायक की रचना की जन्मशती के उपलक्ष्य में ब्रिटेन में जिस प्रकार पत्र-पत्रिकाओं में धुआंधार प्रचार किया गया, राष्ट्रीय समाचारपत्रों में विशेष रूप से लिखवाए गए लेख प्रकाशित हुए, उसकी कृतियों पर आधारित फिल्म रिलीज की गई, उसकी पुस्तकों के कथानकों की रिकार्डिंग बिक्री के लिए तैयार की गई, बीबीसी तथा अन्य टेलीविजन कंपनियों द्वारा विशेष कार्यक्रम तैयार किये गए, यह सब जानना भी अपने आप में रोचक था।
प्रसिद्ध आयरिश उपन्यासकार जेम्स जायस की जन्मशती के अवसर पर दुनिया भर में तरह-तरह के कार्यक्रम हुए, पर वह वर्ष यानी 2004 जेम्स जायस का जन्मशती वर्ष नहीं, वरन उसके विश्वप्रसिद्ध उपन्यास यूलिसेस के काल्पनिक पात्र हेरोल्ड ब्लूम की साहसिक यात्रा की सौवीं वर्षगांठ थी। 16 जून 2004 दुनिया भर में ब्लूम्स डे नाम से मनाया गया, आयरलैंड की राजधानी डबलिन में 2004 को रिजायस घोषित कर वर्ष भर तरह-तरह के कार्यक्रम हुए जिनका सीधा सम्बन्ध ब्लूम्स डे से था। इन कार्यक्रमों में सबसे महत्वपूर्ण था डबलिन की नगरपालिका द्वारा 13 जून यानी ब्लूम्स डे से तीन दिन पूर्व ओकोनल स्ट्रीट में दस हजार लोगों के लिए सुबह नि:शुल्क जलपान का आयोजन और 16 जून को ब्लूम्स डे के अवसर पर ओकोनल स्ट्रीट पर हजारों लोगों का एडवर्डयुगीन पोशाक में दिखाई देना और उन पर वहां के चर्च के शिखर से दो सुंदरियों द्वारा आलूचा की गुठलियाँ गिराना, यह वस्तुत: यूलिसेस के एक दृश्य का प्रदर्शन ही था।
इस सन्दर्भ में जब निराला जन्मशती की बात सोचता हूं तो बड़ी निराशा होती है, याद नहीं आता कि किसी राष्ट्रीय या स्थानीय संस्था, सरकारी या गैरसरकारी विभाग या किसी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग आदि ने स्थायी महत्व का ऐसा कुछ किया हो जिससे निराला जन्मशती की याद बनी रहे। निराला जन्मशती के कुछ वर्ष पूर्व इलाहाबाद में निराला साहित्य संस्थान द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मैंने कहा था कि निराला जन्मशती के संबध में हमें अभी से सोचना चाहिए और कुछ ऐसी योजनाएं बनाना चाहिए कि उनसे निराला जन्मशती की सार्थकता सिद्ध हो, निराला के सम्बन्ध में लोगों को पता चले, निराला के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश पड़े, आदि। उसी समय मैंने इस सम्बन्ध में दो सुझाव भी रखे थे-
एक तो यह था कि निराला का गीत वर दे, वीणा वादिनी वर दे! साहित्य क्षेत्र में अब तक इतनी अच्छी तरह स्थापित हो चुका है कि प्राय: सभी जगह किसी भी साहित्यिक आयोजन, गोष्ठी आदि का प्रारम्भ इसी गीत के सस्वर पाठ से किया जाता है, पर यह भी देखा जाता है कि सभी जगह प्राय: अलग-अलग ढंग से इसका पाठ होता है, क्योंकि अभी तक यह गीत न तो शास्त्रीय पद्धति से संगीतबद्ध किया गया है और न इसके गायन का कोई ऐसा रूप निर्धारित किया गया है जो सर्वमान्य हो। अत: जिस प्रकार हमारे राष्ट्रगीत जन गण मन, वन्दे मातरम और सारे जहां से अच्छा की संगीतमय प्रस्तुति या सस्वर पाठ के रूप निर्धारित किये जा चुके हैं और देश भर में जहां कहीं भी इन गीतों की प्रस्तुति की जाती है, सभी जगह एक निश्चित रूप में ही उनकी प्रस्तुति होती है, उसी तरह वर दे, वीणा वादिनी वर दे! की एक मान्य प्रस्तुति स्वीकृत करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक अखिल भारतीय प्रतियोगिता कराई जानी चाहिए। जन्मशती वर्ष के एक वर्ष पूर्व से क्षेत्रीय स्तर पर इस प्रकार की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएं। उसके बाद क्षेत्रीय स्तर पर चुने गए प्रतियोगियों की प्रतियोगिता (सेमी फायनल) प्रदेश की राजधानियों में कर प्रदेशीय प्रतिनिधि चुना जाए और फिर उनकी राष्ट्रीय (फायनल) प्रतियोगिता प्रयाग संगीत समिति (यह संगीत विषयों में परीक्षा लेने वाली अखिल भारतीय संस्था है) के तत्वावधान में इलाहाबाद में आयोजित की जाए। इस फायनल प्रतियोगिता में जो प्रस्तुति सर्वश्रेष्ठ घोषित हो, उसे राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी जाए और बाद में सभी साहित्यिक समारोहों, गोष्ठियों, आयोजनों आदि में उसी रूप में वर दे, वीणा वादिनी वर दे ! को प्रस्तुत किया जाए।
मेरा दूसरा सुझाव यह था कि अभी तक किसी भी हिंदी लेखक की ग्रन्थ सूची तैयार नहीं की गयी है। अत: निराला जन्मशती वर्ष के पूर्व ही किसी संस्था या विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा यह कार्य शुरू कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह बहुत ही श्रमसाध्य और समयसाध्य कार्य है और इसे पूरा कराने में कई वर्ष लग सकते हैं। ग्रन्थ सूची से मेरा तात्पर्य केवल निराला की रचनाओं (कविता, कहानी, उपन्यास) आदि की सूची से नहीं वरन ऐसी सूची से है जिसमें निराला की रचनाओं के साथ ही निराला और निराला की रचनाओं से सम्बंधित प्रत्येक रचना की सूची भी हो चाहे वह किसी लेख में निराला सम्बंधित संक्षिप्त टिप्पणी हो या पूरा लेख या शोध प्रबंध, निराला पर लिखी गई कोई कविता हो या उनकी किसी भी कृति की किसी भी रूप में प्रस्तुति, यानी निराला के सम्बन्ध में अब तक जहां कहीं भी किसी भी रूप में कुछ भी लिखा गया या छपा हो उसकी पूरी सूची। इस प्रकार की सूची की उपयोगिता एवं महत्व से शायद ही कोई इनकार करेगा, पर उसे तैयार करने का बीड़ा कौन उठाएगा?
इधर एक बात यह भी देखने में आई है कि कुछ साहित्यकार किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार की जन्मतिथि को अपनी जन्मतिथि भी घोषित करने लगे हैं जिससे उस प्रतिष्ठित साहित्यकार की जन्मतिथि पर उनका जन्मदिन भी मनाया जाए। मैथिलीशरण गुप्त की जन्मतिथि 3 अगस्त है और यह दिन इलाहाबाद में कवि दिवस के रूप में मनाया जाता है। पता चला है कि इलाहाबाद के ही एक प्रतिष्ठित कवि महोदय ने मृत्यु के कुछ वर्ष पूर्व अपनी जन्मतिथि 3 अगस्त घोषित कर दी थी जब कि विश्वविद्यालय के रिकार्ड के साथ ही उनके स्वयं के द्वारा तैयार किये गए प्रकाशनों में भी उनकी जन्म तिथि जुलाई में बतलाई गयी है। इसका परिणाम यह हुआ कि 3 अगस्त को मैथिलीशरण गुप्त के साथ ही उनका जन्मदिन भी कवि दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।