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Monday 20 Nov 2017

हिन्दी शब्द सागर : प्रथम संस्करण की भूमिका


श्यामसुंदर दास
किसी जाति के जीवन में उसके द्वारा प्रयुक्त शब्दों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। आवश्यकता तथा स्थिति के अनुसार इन प्रयुक्त शब्दों का आगम अथवा लोप तथा वाच्य, लक्ष्य एवं द्योत्य भावों में परिवर्तन होता रहता है। अतएव और सामग्री के अभाव में इन शब्दों के द्वारा किसी जाति के जीवन की भिन्न-भिन्न स्थितियों का इतिहास उपस्थित किया जा सकता हैै। इसी आधार पर आर्यजाति का प्राचीनतम इतिहास प्रस्तुत किया गया है और ज्यों-ज्यों सामग्री उपलब्ध होती जा रही है, त्यों-त्यों यह इतिहास ठीक किया जा रहा है। इस अवस्था में यह बात स्पष्ट समझ में आ सकती है कि जातीय जीवन में शब्दों का स्थान कितने महत्व का है। जातीय साहित्य को रक्षित करने तथा उसके भविष्य को सुचारू और समुज्ज्वल बनाने के अतिरिक्त वह किसी भाषा की संपन्नता या शब्दबहुलता का सूचक और उस भाषा के साहित्य का अध्ययन करने वालों का सबसे बड़ा सहायक भी होता है। विशेषत: अन्य भाषा भाषियों और विदेशियों के लिए तो उसका और भी अधिक उपयोग होता है। इन सब दृष्टियों से शब्दकोश किसी भाषा के साहित्य की मूल्यवान संपत्ति और उस भाषा के भंडार का सबसे बड़ा निदर्शक होता है।
जब अंग्रेजों का भारतवर्ष के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित होने लगा, तब नवागंतुक अंग्रेजों को इस देश की भाषाएँ जानने की विशेष आवश्यकता पडऩे लगी; और फलत: वे देशी भाषाओं के कोश, अपने सुभीते के लिए बनाने लगे। इस प्रकार इस देश में आधुनिक ढंग के और अकारादि क्रम से बनने वाले शब्दकोशों की रचना का सूत्रपात हुआ। कदाचित् देशी भाषाओं में से सबसे पहले हिंदी ( जिसे उस समय अंग्रेज लोग हिंदुस्तानी कहा करते थे) के दो शब्दकोश श्रीयुत जे. फर्गुसन नामक एक सज्जन ने प्रस्तुत किए थे, जो रोमन अक्षरों में सन् 1773 में लंदन में छपे थे। इनमें से एक 'हिन्दुस्तानी अंग्रेजीÓ का और दूसरा 'अंग्रेजी हिंदुस्तानीÓ का था। इसी प्रकार का एक कोश सन् 1790 में मद्रास में छपा था जो श्रीयुत हेनरी हेरिस के प्रयत्न का फल था। सन् 1808 में जोसफ  टेलर और विलियम हंटर के सम्मिलित उद्योग से कलकत्ते में एक 'हिन्दुस्तानी अंग्रेजी कोशÓ प्रकाशित हुआ था। इसके उपरांत 1810 में एडिनबरा में श्रीयुत जे. बी. गिलक्राइस्ट का और सन् 1817 में लंदन में श्रीयुत जे. शेक्सपियर का एक 'अंग्रेजी हिन्दुस्तानीÓ और एक 'हिन्दुस्तानी-अंग्रेजीÓ कोश निकला था, जिसके पीछे से तीन संस्करण हुए थे। इनमें से अंतिम संस्करण बहुत कुछ परिवद्र्धित था। परंतु ये सभी कोश रोमन अक्षरों में थे और इनका व्यवहार अंग्रेज या अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग ही कर सकते थे। हिंदीभाषा या देवनागरी अक्षरों में जो सबसे पहला कोश प्रकाशित हुआ था, वह पादरी एम.टी. एडम ने तैयार किया था। इसका नाम 'हिन्दी कोशÓ था और यह सन् 1829 में कलकत्ते से प्रकाशित हुआ था। तब से ऐसे शब्दकोश निरंतर बनने लगे, जिनमें या तो हिन्दी शब्दों के अर्थ अंग्रेजी में और अंग्रेजी शब्दों के अर्थ हिंदी में होते थे। इन कोशकारों में श्रीयुत एम.डब्ल्यू फैलन का नाम विशेष रूप से उल्लेख करने योग्य है, क्योंकि इन्होंने साधारण बोलचाल के छोटे बड़े कई कोश बनाने के अतिरिक्त, कानून और व्यापार आदि के पारिभाषिक शब्दों के भी कुछ कोश बनाए थे। परंतु इनका जो 'हिन्दुस्तानी अंग्रेजी कोश था उसमें यद्यपि अधिकांश शब्द हिंदी के ही थे, फिर भी अरबी फारसी के शब्दों की कमी नहीं थी; और कदाचित् फारसी के अदालती लिपि होने के कारण ही उसमें शब्द फारसी लिपि में, अर्थ अंग्रेजी में और उदाहरण रोमन में दिए गए थे। सन् 1884 में लंदन में श्रीयुत जे. टी. प्लाट्स का जो कोश छपा था, वह भी बहुत अच्छा था और उसमें भी हिंदी तथा उर्दू शब्दों के अर्थ अंग्रेजी भाषा में दिए गए थे। सन 1873 में मु.राधेलाल का शब्दकोश गया से प्रकाशित हुआ था, जिसके लिए सरकार से उन्हें यथेष्ट पुरस्कार भी मिला था। श्रीयुत पादरी जे.डी.बेट ने पहले सन 1875 में काशी से एक हिंदी कोश प्रकाशित किया था, जिसमें हिंदी के शब्दों के अर्थ हिंदी में ही थे। इसी समय के लगभग काशी से कलकत्ता स्कूल बुक सोसायटी का हिंदी कोश प्रकाशित हुआ था, जिसमें हिंदी के शब्दों के अर्थ हिंदी में ही थे। बेट के कोश के भी पीछे से दो और संशोधित तथा परिवद्र्धित संस्करण प्रकाशित हुए थे। सन् 1875 में ही पेरिस में एक कोश का कुछ अंश प्रकाशित हुआ था, जिसमें हिंदी या हिंदुस्तानी शब्दों के अर्थ फ्रांसीसी भाषा में दिए गए थे। सन् 1880 में लखनऊ से सैयद जामिन अली जलाल का 'गुलशने फैज़Ó नामक एक कोश प्रकाशित हुआ था, जो था तो फारसी लिपि में ही, परंतु शब्द उसमें अधिकांश हिंदी के थे। सन् 1887 में तीन महत्व के कोश प्रकाशित हुए थे, जिनमें सबसे अधिक महत्व का कोश मिरजा शाहज़ादा कैसरबख्त का बनाया हुआ था। इसका नाम 'कैसर कोशÓ था और यह इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था। दूसरा कोश श्रीयुत मधुसूदन पंडित का बनाया हुआ था जिसका नाम 'मधुसूदन निघंटुÓ था और जो लाहौर से प्रकाशित हुआ था। तीसरा-कोश श्रीयुत मुन्नीलाल का था जो दानापुर में छपा था और जिसमें अंग्रेजी शब्दों के अर्थ हिंदी में दिए गए थे। सन् 1881 और 1895 के बीच में पादरी टी. केपन के बनाए हुए कई कोश प्रकाशित हुए थे, जो प्राय: स्कूलों के विद्यार्थियों के काम के थे। 1892 में बांकीपुर से श्रीयुत बाबा बैजूदास का 'विवेकÓ कोश निकला था। इसके उपरांत 'गौरीनागरी कोशÓ, हिन्दीकोशÓ, मंगलकोशÓ, 'श्रीधरकोशÓ आदि छोटे छोटे और भी कई कोश निकले थे, जिनमें हिंदी शब्दों के अर्थ हिंदी में ही दिए गए थे। इनके अतिरिक्त कहावतों और मुहावरों आदि के जो कोश निकले थे, वे अलग हैं।
इस बीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही मानो हिंदी के भाग्य ने पलटा खाया और हिंदी का प्रचार धीरे-धीरे बढऩे लगा। उसमें निकलने वाले सामयिक पत्रों तथा पुस्तकों की संख्या भी बढऩे लगी और पढऩे वालों की भी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी। तात्पर्य यह कि दिन पर दिन लोग हिंदी साहित्य की ओर प्रवृत्त होने लगे और हिंदी पुस्तकें चाव से पढऩे लगे। लोगों में प्राचीन काव्यों आदि को पढऩे की उत्कंठा बढऩे लगी। उस समय हिंदी के हितैषियों को हिंदी-भाषा का एक ऐसा वृहत् कोश तैयार करने की आवश्यकता जान पडऩे लगी, जिसमें हिंदी के पुराने पद्य और नए गद्य दोनों में व्यवहृत होने वाले समस्त शब्दों का समावेश हो; क्योंकि ऐसे कोश के बिना आगे चलकर हिंदी के प्रचार में कुछ बाधा पहुँचने की आशंका थी।
काशी नागरीप्रचारिणी सभा ने जितने बड़े बड़े और उपयोगी काम किए हैं, जिस प्रकार प्राय: उन सबका सूत्रपात या विचार सभा के जन्म के समय, उसके प्रथम वर्ष में हुआ था, उसी प्रकार हिंदी का वृहत् कोश बनाने का सूत्रपात नहीं तो कम से कम विचार भी उसी प्रथम वर्ष में हुआ था। हिंदी में सर्वांगपूर्ण और वृहत् कोश का अभाव सभा के संचालकों को 1893 ई. में ही खटका था और उन्होंने एक उत्तम कोश बनाने के विचार से आर्थिक सहायता के लिये दरभंगा नरेश महाराज सर लक्ष्मीश्वर सिंह जी से प्रार्थना की थी। महाराज ने भी शिशु सभा के उद्देश्य की सराहना करते हुए 125 रु.उसकी सहायता के लिए भेजे थे और उसके साथ सहानुभूति प्रकट की थी। इसके अतिरिक्त आपने कोश का कार्य आरंभ करने के लिए भी सभा से कहा था और यह भी आशा दिलाई थी कि आवश्यकता पडऩे पर वे सभा को और भी आर्थिक सहायता देंगे। इस प्रकार सभा ने नौ सज्जनों की एक उपसमिति इस संबंध में विचार करने के लिये नियुक्त की; पर उपसमिति ने निश्चय किया कि इस कार्य के लिए बड़े बड़े विद्वानों की सहायता की आवश्यकता होगी और इसके लिये कम से कम दो वर्ष तक 250रु. मासिक का व्यय होगा। सभा ने इस संबंध में फिर श्रीमान् दरभंगा नरेश को लिखा था, परंतु अनेक कारणों से उस समय कोश का कार्य आरंभ नहीं हो सका। अत: सभा ने निश्चय किया कि जब तक कोश के लिये यथेष्ट धन एकत्र न हो तथा दूसरे आवश्यक प्रबंध न हो जाय, तब तक उसके लिए आवश्यक सामग्री ही एकत्र की जाए। तदनुसार उसने सामग्री एकत्र करने कार्य भी आरंभ कर दिया।
सन् 1904 में सभा को पता लगा कि कलकत्ते की हिंदी साहित्य सभा ने हिंदी भाषा का एक बहुत बड़ा कोश बनाना निश्चित किया है और उसने इस संबंध में कुछ कार्य भी आंरभ कर दिया है। सभा का उद्देश्य केवल यही था कि हिंदी में एक बहुत बड़ा कोश तैयार हो जाय, स्वयं उसका श्रेय प्राप्त करने का उसका कोई विचार नहीं था। अत: सभा ने जब देखा कि कलकत्ते की साहित्यसभा कोश बनवाने का प्रयत्न कर रही है, तब उसने बहुत ही प्रसन्नतापूर्वक निश्चय किया कि अपनी सारी संचित सामग्री साहित्य सभा को दे दी जाय और यथासाध्य सब प्रकार से उसकी सहायता की जाय। प्राय: तीन वर्ष तक सभा इसी आसरे में थी कि साहित्य सभा कोश तैयार करे। परंतु कोश तैयार करने का जो यश स्वयं प्राप्त करने की उसकी कोई विशेष इच्छा न थी, विधाता वह यश उसी को देना चाहता था। जब सभा ने देखा कि साहित्य-सभा की ओर से कोश की तैयारी का कोई प्रबंध नहीं हो रहा है, तब उसने इस काम को स्वयं अपने ही हाथ में लेना निश्चित किया। जब सभा के संचालकों ने आपस में इस विषय की सब बातें पक्की कर लीं, तब 23 अगस्त, सन् 1907 को सभाके परम हितैषी और उत्साही सदस्य श्रीयुत रेवरेंड ई.ग्रीव्स ने सभा की प्रबंधकारिणी समिति में यह प्रस्ताव उपस्थित किया कि हिंदी के एक वृहत् और सर्वांगपूर्ण कोश बनाने का भार सभा अपने ऊपर ले; और साथ ही यह भी बतलाया कि यह कार्य किस प्रणाली से किया जाय। सभा ने मि. ग्रीव्स के प्रस्ताव पर विचार करके इस विषय में उचित परामर्श देने के लिये निम्नलिखित सज्जनों की एक उपसमिति नियत कर दी- रेवरंड ई. ग्रीव्स, महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी, पंडित राम-नारायण मिश्र बी.ए., बाबू गोविंददास, बाबू इंद्रनारायण सिंह एम.ए. छोटेलाल, मुंशी संकटाप्रसाद, पंडित माधवप्रसाद पाठक और मैं।
इस उपसमिति के कई अधिवेशन हुए जिनमें सब बातों पर पूरा विचार किया गया। अंत में 9 नवंबर, 1907 को इस उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें सभा को परामर्श दिया गया कि सभा हिन्दी-भाषा के दो बड़े कोश बनवावे जिनमें से एक में तो हिन्दी शब्दों के अर्थ हिंदी में ही रहें और दूसरे में हिन्दी शब्दों के अर्थ अंग्रेजी में हों। आजकल हिंदी भाषा में गद्य तथा पद्य में जितने शब्द प्रचलित हैं, उन सबका इन कोशों में समावेश हो; उनकी व्युत्पत्ति दी जाय और उनके भिन्न भिन्न अर्थ यथासाध्य उदाहरणों सहित दिए जाएं। उपसमिति ने हिंदी भाषा के गद्य तथा पद्य के प्राय: दो सौ अच्छे अच्छे ग्रंथों की एक सूची भी तैयार कर दी थी और कहा था कि इनमें से सब शब्दों का अर्थसहित संग्रह कर लिया जाय; कोश की तैयारी का प्रबंध करने के लिए एक स्थायी समिति बना दी जाए और कोश के संपादन तथा उसकी छपाई आदि का सब प्रबंध करने के लिए एक संपादक नियुक्त कर दिया जाय।
समिति ने यह भी निश्चित किया कि कोश के संबंध में आवश्यक प्रबंध करने के लिए महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी, लाला छोटेलाल, रेवरेंड ई. ग्रीव्स, बाबू इंद्रनारायण सिंह एम. ए., बाबू गोविंददास, पंडित माधवप्रसाद पाठक और पंडित रामनारायण मिश्र बी.ए. की प्रबंधकर्ता समिति बना दी जाय, और उसके मंत्रित्व का भार मुझे दिया जाय। समिति का प्रस्ताव था कि उस प्रबंधकर्तृ समिति को अधिकार दिया जाय कि वह आवश्यकतानुसार अन्य सज्जनों को भी अपने में सम्मिलित कर ले। उस समय यह अनुमान किया था कि इस काम में लगभग 30,000 रू. का व्यय होगा जिसके लिये सभा को सरकार तथा राजा महाराजाओं से प्रार्थना करने का परामर्श दिया गया।
सभा की प्रबंधकारिणी समिति ने उपसमिति की ये बातें मान लीं और तदनुसार कार्य भी आरंभ कर दिया। शब्दसंग्रह के लिये, उपसमिति ने जो पुस्तकें बतलाई थीं, उनमें से शब्दसंग्रह का कार्य भी प्रारंभ हो गया और धन के लिये अपील भी हुई, जिससे पहले ही वर्ष 2332 रू के वचन मिले, जिसमें से 1902 रू. नगद भी सभा को प्राप्त हो गए। इनमें से सबसे पहले 1000 रू. स्व. माननीय सर सुंदरलाल सी.आई.ई. ने भेजे थे। सत्य तो यह है कि यदि प्रार्थना करते ही उक्त महानुभाव तुरंत 1000 रू. न भेज देते तो सभा का कभी इतना उत्साह न बढ़ता और बहुत संभव था कि कोश का काम और कुछ समय के लिये टल जाता। परंतु सर सुंदरलाल से 1000 रू. पाते ही सभा का उत्साह बहुत अधिक बढ़ गया और उसने और भी तत्परता से कार्य करना आरंभ किया। उसी समय श्रीमान् महाराज ग्वालियर ने भी 1000 रू. देने का वचन दिया। इसके अतिरिक्त और भी अनेक छोटी मोटी रकमों के वचन मिले। तात्पर्य यह कि सभा को पूर्ण विश्वास हो गया कि अब कोश तैयार हो जायगा।
इस कोश के सहायतार्थ सभा को समय समय पर निम्नलिखित गवर्मेंटों, महाराजों तथा अन्य सज्जनों से सहायता प्राप्त हुई-
संयुक्त प्रदेश की गवर्मेंट                  13000रू.
भारत गवर्मेंट                5000 रू.
मध्यप्रदेश की गवर्मेंट            1000 रू.
श्रीमान् महाराज साहब नेपाल        2000 रू.
 स्वर्गवासी महाराज साहब रीवाँ        1800 रू.
महाराज साहब छत्रपुर            1500 रू.
महाराज साहब बीकानेर            1500 रू.
महाराजाधिराज बर्दवान            1500 रू.
महाराज साहब अलवर            1000 रू.
स्वर्गवासी महाराज साहब ग्वालियर        1000 रू.
स्वर्गवासी महाराजा साहब काश्मीर        1000 रू.
महाराज साहब काशी            1000 रू.
डाक्टर सर सुंदरलाल            1000 रू.
स्वर्गवासी राजा साहब भिनगा        1000 रू.
कुंवर राजेन्द्रसिंह                1000 रू.
श्रीमान् महाराज साहब भावनगर        500 रू.
महाराज साहब इंदौर            500 रू.
स्वर्गवासी राजा साहब गिद्धौर        500 रू.
डॉक्टर सर जार्ज ग्रियर्सन            150 रू.
इनके अतिरिक्त और बहुत से महानुभावों से 100 रू. अथवा उससे कम की सहायता प्राप्त हुई।
शब्दसंग्रह करने के लिये जो पुस्तकें चुनी गईं थीं, उन पुस्तकों को सभासदों में बांटकर उनसे शब्दसंग्रह कराने का सभा का विचार था। बहुत से उत्साही सभासदों ने पुस्तकें तो मंगवा ली पर कार्य कुछ भी न किया। बहुतों ने तो महीनों पुस्तकें अपने पास रखकर अंत में ज्यों की त्यों लौटा दी और कुछ लोगों ने पुस्तकें भी हजम कर लीं। थोड़े से लोगों ने शब्दसंग्रह का काम किया था, पर उसमें भी संतोषजनक काम इने गिने सज्जनों का ही था। इसमें व्यर्थ बहुत सा समय नष्ट हो गया, पर धन की यथेष्ट सहायता सभा को मिलती जाती थी, अत: दूसरे वर्ष सभा ने विवश होकर निश्चित किया कि शब्दसंग्रह का काम वेतन देकर कुछ लोगों से कराया जाय। तदनुसार प्राय: 16-17 आदमी शब्दसंग्रह के काम के लिये नियुक्त कर दिए गए और एक निश्चित प्रणाली पर शब्दसंग्रह का काम होने लगा।
आरंभ में कोश के सहायक संपादक पंडित बालकृष्ण भट्ट, पंडित रामचंद्र शुक्ल, लाला भगवानदीन और बाबू अमीरसिंह के अतिरिक्त बाबू जगन्मोहन वर्मा, बाबू रामचंद्र वर्मा, पंडित वासुदेव मिश्र, पंडित रामवचनेश मिश्र, पंडित ब्रजभूषण ओझा, श्रीयुत वेणी कवि आदि अनेक सज्ज्न भी इस शब्दसंग्रह के काम में सम्मिलित थे। शब्दसंग्रह के लिये सभा केवल पुस्तकों पर ही निर्भर नहीं रही। कोश में पुस्तकों के शब्दों के अतिरिक्त और भी अनेक ऐसे शब्दों की आवश्यकता थी जो नित्य की बोलचाल के, परिभाषिक अथवा ऐसे विषयों के शब्द थे जिन पर हिंदी में पुस्तकें नहीं थीं। अत: सभा ने मुंशी रामलगनलाल नामक एक सज्जन को शहर में घूम-घूमकर अहीरों, कहारों, लोहारों, सोनारों, चमारों, तमोलियों, तेलियों, जोलाहों, भालू और बंदर नचानेवालों, कूचेबंदों, धुनियों, गाड़ीवानों, कुश्तीबाजों, कसेरों, राजगीरों, छापेखानेवालों, महाजनों, बजाजों, दलालों, जुआरियों, महावतों, पंसारियों, साईंसों आदि के पारिभाषिक शब्द तथा गहनों, कपड़ों, अनाजों, पेड़ों, बर्तनों, देवताओं, गृहस्थी की चीजों, पकवानों, मिठाइयों, विवाह आदि की रस्मों, तरकारियों, सागों, फलों, घासों, खेलों और उनके साधनों, आदि आदि के नाम एकत्र करने के लिए नियुक्त किया। पुस्तकों के शब्दसंग्रह के साथ साथ यह काम भी प्राय: दो वर्ष तक चलता रहा। इस संबंध में यह कह देना आवश्यक  जान पड़ता है कि मुंशी रामलगनलाल का इस संबंध का शब्दसंग्रह बहुत संतोषजनक था। इसके अतिरिक्त सभा ने  बाबू रामचंद्र वर्मा को समस्त भारत के पशुओं, पक्षियों, मछलियों, फूलों और पेड़ों आदि के नाम एकत्र करने के लिये कलकत्ते भेजा था जिन्होंने प्राय: ढाई मास तक वहां रहकर इंपीरियल लाइब्रेरी से 'फ्लोरा और फौना आफ  ब्रिटिश इंडिया सीरिजÓ की समस्त पुस्तकों में से नाम और विवरण आदि एकत्र किए थे। हिंदी भाषा में व्यवहृत होने वाले अंग्रेजी, फारसी, अरबी तथा तुर्की आदि भाषाओं के शब्दों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों की जीवनियों, प्राचीन स्थानों तथा कहावतों आदि के संग्रह का भी बहुत अच्छा प्रबंध किया गया था। पुरानी हिन्दी तथा डिंगल और बुंदेलखंडी आदि भाषाओं के शब्दों का भी अच्छा संग्रह किया गया था। इसमें सभा का मुख्य उद्देश्य यह था कि जहाँ तक हो सके, कोश में हिंदी भाषा में व्यवहृत होने या हो सकने वाले अधिक से अधिक शब्द आ जायें और यथासाध्य कोई आवश्यक बात या शब्द छूटने न पावे। इसी विचार से सभा ने अंग्रेजी, फारसी, अरबी और तुर्की आदि भाषाओं के शब्दों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों और स्थानों के नामों आदि की एक बड़ी सूची भी प्रकाशित कराके घटाने बढ़ाने के लिए हिन्दी के बड़े बड़े विद्वानों के पास भेजी थी।
दो ही वर्ष में सभा को अनेक बड़े बड़े राजा महाराजाओं तथा प्रांतीय और भारतीय सरकारों से कोश के सहायतार्थ बड़ी बड़ी रकमें भी मिलीं, जिससे सभा तथा हिंदी प्रेमियों को कोश के तैयार होने में किसी प्रकार का संदेह नहीं रह गया और सभा बड़े उत्साह से कोश का काम कराने लगी। आरंभ में सभा ने यह निश्चित नहीं किया था कि कोश का संपादक कौन बनाया जाय, पर दूसरे वर्ष सभा ने मुझे कोश का प्रधान संपादक बनाना निश्चित किया। मैंने भी सभा की आज्ञा शिरोधार्य करके यह भार अपने ऊपर ले लिया।
सन् 1910 के आरंभ में शब्दसंग्रह का कार्य समाप्त हो गया। जिन स्लिपों पर शब्द लिखे गए थे, उनकी संख्या अनुमानत: 10 लाख थी, जिनमें से आशा की गई थी कि प्राय: 1 लाख शब्द निकलेंगे, और प्राय: यही बात अंत में हुई भी। जब शब्दसंग्रह का काम हो चुका, तब स्लिपें अक्षरक्रम से लगाई जाने लगीं। पहले वे स्वरों और व्यंजनों के विचार से अलग अलग की गई और तब स्वरों के प्रत्येक अक्षर तथा व्यंजनों के प्रत्येक वर्ग की स्लिपें अलग अलग की गईं। जब स्वरों की स्लिपें अक्षरक्रम से लग गईं, तब व्यंजनों के वर्गों के अक्षर अलग अलग किए गए और प्रत्येक अक्षर की स्लिपें क्रम से लगाई गईं। यह कार्य प्राय: एक वर्ष तक चलता रहा।
जिस समय कोश के संपादन का भार मुझे दिया गया था, उसी समय सभा ने यह निश्चित कर दिया था कि पंडित बालकृष्ण भट्ट, पंडित रामचंद्र शुक्ल, लाला भगवानदीन तथा बाबू अमीर सिंह कोश के सहायक संपादन बनाए जाएं और ये लोग कोश के संपादन में मेरी सहायता करें। अक्टूबर, 1909 में मेरी नियुक्ति काश्मीर राज्य में हो गई जिसके कारण मुझे काशी छोड़कर काश्मीर जाना आवश्यक हुआ। उस समय मैंने सभा से प्रार्थना की कि इतनी दूर से कोश का संपादन सुचारू रूप से न हो सकेगा। अत: सभा मेरे स्थान पर किसी और सज्जन को कोश का संपादक नियुक्त करे। परंतु सभा ने यही निश्चय किया कि कोश का कार्यालय भी मेरे साथ आगे चलकर काश्मीर भेज दिया जाय और वहीं कोश का संपादन हो। उस समय तक स्लिपें अक्षरक्रम से लग चुकी थीें और संपादन का कार्य अच्छी तरह आरंभ हो सकता था। अत: 15 मार्च, 1910 को काशी में कोश का कार्यालय बंद कर दिया गया और निश्चय हुआ कि चारों सहायक संपादक जंबू पहुंचकर 1 अप्रैल, 1910 से वहीं कोश के संपादन का कार्य आरंभ करें। तदनुसार पंडित रामचंद्र शुक्ल और बाबू अमीर सिंह तो यथासमय जंबू पहुंच गए, पर पंडित बालकृष्ण भट्ट तथा लाला भगवानदीन ने एक एक मास का समय मांगा। दुर्भाग्यवश बाबू अमीर सिंह के जंबू पंहुचने के चार पांच दिन बाद ही काशी में उनकी स्त्री का देहांत हो गया, जिससे उन्हें थोड़े दिनों के लिये फिर काशी लौट आना पड़ा। उस बीच में अकेले पंडित रामचंद्र शुक्ल ही संपादन कार्य करते रहे। मई के आरंभ में पंडित बालकृष्ण भट्ट और बाबू अमीर सिंह जंबू पहुंचे और संपादन कार्य करने ले। पर लाला भगवानदीन कई बार प्रतिज्ञा करके भी जंबू न पहुंच सके; अत: सहायक संपादक के पद से उनका संबंध छूट गया। शेष तीनों सहायक संपादक महाशय उत्तमतापूर्वक संपादन कार्य करते रहे। कोश के विषय में सम्मति लेने के लिये आरंभ में जो कोश कमेटी बनी थी, वह 1 मई, 1910 को अनावश्यक समझकर तोड़ दी गई।
कोश का संपादन आरंभ हो चुका था और शीघ्र ही उसकी छपाई का प्रबंध करना आवश्यक था, अत: सभा ने कई बड़े बड़े प्रेसों से कोश की छपाई के नमूने मंगाए। अंत में प्रयाग के सुप्रसिद्ध इंडियन प्रेस को कोश की छपाई का भार दिया गया। इस कार्य के लिये आरंभिक प्रबंध करने के लिये उक्त प्रेस को 2000 रू. पेशगी दिए गए और लिखापढ़ी करके छपाई के संबंध में सब बातें तय कर ली गईं।
अप्रैल, 1910 से सितंबर, 1910 तक तो जंबू में कोश के संपादन का कार्य बहुत उत्तमतापूर्वक और निर्विघ्न होता रहा; पर पीछे इसमें एक विघ्न पड़ा। पंडित बालकृष्ण भट्ट जंबू में दुर्घटनावश सीढ़ी पर से गिर पड़े और उनकी एक टाँग टूट गई, जिसके कारण अक्टूबर, 1910 में उन्हें छुट्टी लेकर प्रयाग चले आना पड़ा। नवंबर में बाबू अमीर सिंह भी बीमार हो जाने के कारण छुट्टी लेकर काशी चले आए और दो मास तक यहीं बीमार पड़े रहे। संपादन कार्य करने के लिये जंबू में फिर अकेले पंडित रामचंद्र शुक्ल बच रहे। जब अनेक प्रयत्न करने पर भी जंबू में सहायक संपादकों की संख्या पूरी न हो सकी, तब विवश होकर 15 दिसंबर, 1910 को कोश का कार्यालय जंबू से काशी भेज दिया गया। कोश विभाग के काशी आ जाने पर जनवरी, 1911 से बाबू अमीर सिंह भी स्वस्थ होकर उसमें सम्मिलित हो गए और बाबू जगमोहन वर्मा भी सहायक संपादक के पद पर नियुक्त कर दिए गए। दूसरे मास फरवरी में बाबू गंगाप्रसाद गुप्त कोश के सहायक संपादक बनाए गए। जंबू में तो पहले सब सहायक संपादक अलग अलग शब्दों का संपादन करते थे और तब सब लोग एक साथ मिलकर संपादित शब्दों को दोहराते थे। परंतु बाबू गंगाप्रसाद गुप्त के आ जाने पर दो दो सहायक संपादक अलग अलग मिलकर संपादन करने लगे। नवंबर, 1911 में जब बाबू गंगाप्रसाद गुप्त ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, तब पंडित बालकृष्ण भट्ट पुन: प्रयाग से बुला लिए गए और जनवरी, 1912 में लाला भगवानदीन भी पुन: इस विभाग में सम्मिलित कर लिए गए तथा मार्च, 1912 से सब सहायक संपादन के कार्य के लिये तीन भागों में विभक्त कर दिए गए। इस प्रकार कार्य की गति पहले की अपेक्षा बढ़ तो गई, पर फिर भी उसमें उतनी वृद्धि नहीं हुई जितनी वांछित थी। जब मई, सन् 1910 में 'अÓ 'आÓ 'इÓ और 'ईÓ का संपादन हो चुका, तब उसकी कापी प्रेस में भेज दी गई और उसकी छपाई में हाथ लगा दिया गया। उस समय तक मैं भी काश्मीर से लौटकर काशी आ गया था, जिससे कार्यनिरीक्षण और व्यवस्था का अधिक सुभीता हो गया।
1913 में संपादनशैली में कुछ और परिवर्तन किया गया। पंडित बालकृष्ण भट्ट, बाबू जगमोहन वर्मा, लाला भगवानदीन तथा बाबू अमीर सिंह अलग अलग संपादन कार्य पर नियुक्त कर दिए गए। सब संपादकों की लेखशैली आदि एक ही प्रकार की नहीं हो सकती थी, अत: सबकी संपादित स्लिपों को दोहराकर एक मेल करने के कार्य पर पंडित रामचंद्र शुक्ल नियुक्त किए गए और उनकी सहायता के लिये बाबू रामचंद्र वर्मा रखे गए। उस समय यह व्यवस्था थी कि दिनभर तो सब सहायक संपादक अलग अलग संपादन कार्य किया करते थे और पंडित रामचंद्र शुक्ल पहले की संपादित की हुईं स्लिपों को दोहराया करते थे, और संध्या को चार बजे से पाँच बजे तक सब संपादक मिलकर एक साथ बैठते थे और पंडित रामचंद्र शुक्ल की दोहराई हुई स्लिपों को सुनते तथा आवश्यकता पडऩे पर उसमें परिवर्तन आदि करते थे। इस प्रकार कार्य भी अधिक होता था और प्रत्येक शब्द के संबंध में प्रत्येक सहायक संपादक की सम्मति भी मिल जाती थी।
मई, 1912 में छपाई का कार्य आरंभ हुआ था और एक ही वर्ष के अंदर 96-96 पृष्ठों की चार संख्याएँ छपकर प्रकाशित हो गईं, जिनमें 8666 शब्द थे। सर्वसाधारण में इन प्रकाशित संख्याओं का बहुत अच्छा आदर हुआ। सर जार्ज ग्रियर्सन, डॉक्टर रुडाल्फ हार्नली, प्रोफेसर सिलवान लेवी, रेवरेंड ई. ग्रीव्स, पं.मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या, महामहोपाध्याय डाक्टर गंगानाथ झा, पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी, मिस्टर रमेशचंद्र दत्त, पंडित श्यामबिहारी मिश्र आदि अनेक बड़े बड़े विद्वानों, पंडितों तथा हिंदीप्रेमियों ने प्रकाशित अंकों की बहुत कुछ प्रशंसा की और अंग्रेजी दैनिक लीडर तथा हिंदी साप्ताहिक बंगवासी आदि समाचारपत्रों ने भी समय समय पर अच्छी प्रशंसात्मक आलोचना की। ग्राहक संख्या भी दिन पर दिन बहुत ही संतोषजनक रूप में बढऩे लगी।
इस अवसर पर एक बात और कह देना आवश्यक जान पड़ता है। जिस समय मैं पहले काश्मीर जाने लगा था, उस समय पहले यही निश्चय हुआ था कि कोश विभाग काशी में ही रहे और मेरी अनुपस्थिति में स्वर्गवासी पंडित केशवदेव शास्त्री कोश विभाग का निरीक्षण करें। परंतु मेरी अनुपस्थिति में पंडित केशवदेव शास्त्री तथा कोश के सहायक संपादकों में कुछ अनबन हो गई, जिसने आगे चलकर और भी विलक्षण रूप धारण किया। उस समय संपादक लोग प्रबंधकारिणी समिति के अनेक सदस्यों तथा कर्मचारियों से बहुत रूष्ट और असंतुष्ट हो गए थे। कई मास तक यह झगड़ा भीषण रूप से चलता रहा और अनेक समाचारपत्रों में उसके संबंध में कड़ी टिप्पणियां निकलती रहीं। सभा के कुछ सदस्य तथा बाहरी सज्जन कोश की व्यवस्था और कार्यप्रणाली आदि पर भी अनेक प्रकार के आपेक्ष करने लगे, और कुछ सज्ज्नों ने तो छिपे-छिपे ही यहां तक उद्योग किया कि अब तक कोश में जो व्यय हुआ है, वह सब सभा को देकर कोश की सारी सामग्री उससे ले ली जाय और स्वतंत्र रूप से उसके संपादन तथा प्रकाशन आदि की व्यवस्था की जाय। यह विचार यहां तक पक्का हो गया था कि एक स्वनामधन्य हिंदी विद्वान से संपादक होने के लिये पत्र व्यवहार तक किया था। साथ ही मुझे उस काम से विरत करने के लिए मुझ पर प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न रीति से अनेक प्रकार के अनुचित आक्षेप तथा दोषारोपण किए गए थे। इस आंदोलन में व्यक्तिगत भाव अधिक था। पर थोड़े ही दिनों में यह अप्रिय और हानिकारक आंदोलन ठंडा पड़ गया और फिर सब कार्य सुचारू रूप से पूर्ववत् चलने लगा। 'श्रेयांसि बहुविघ्नानिÓ के अनुसार इस बड़े काम में भी समय समय पर अनेक विघ्न उपस्थित हुए पर ईश्वर की कृपा से उनके कारण इस कार्य में कुछ हानि नहीं पहुंची।
सन् 1913 में कोश का काम अच्छी तरह चल निकला। वह बराबर नियमित रूप से संपादित होने लगा और संख्याएँ बराबर छपकर प्रकाशित होने लगीं। बीच बीच में आवश्यकतानुसार संपादनकार्य में कुछ परिवर्तन होता रहा। इसी बीच में पंडित बालकृष्ण भट्ट, जो इस वृद्धवस्था में भी बड़े उत्साह के साथ कोश संपादन के कार्य में लगे हुए थे, अपनी दिन पर दिन बढ़ती हुई अशक्तता के कारण अभाग्यवश नवंबर, 1913 में कोश के कार्य से अलग होकर प्रयाग चले गए और वहीं थोड़े दिनों बाद उनका देहांत हो गया। उस समय बाबू रामचंद्र वर्मा उनके स्थान पर कोश के सहायक बना दिए गए और कार्यक्रम में फिर कुछ परिवर्तन की आवश्यकता पड़ी। निश्चित हुआ कि बाबू जगन्मोहन वर्मा, लाला भगवानदीन तथा बाबू अमीर सिंह आगे के शब्दों का अलग अलग संपादन करें और पंडित रामचंद्र शुक्ल तथा बाबू रामचंद्र वर्मा संपादित किए हुए शब्दों को अलग अलग दोहराकर एक मेल करें। इस क्रम में यह सुभीता हुआ कि आगे का संपादन भी अच्छी तरह होने लगा और संपादित शब्द भी ठीक तरह से दोहराए जाने लगे; और दोनों ही कार्यों की गति में भी यथेष्ट वृद्धि हो गई। इस प्रकार 1917 तक बराबर काम चलता रहा और कोश की 15 संख्याएं छपकर प्रकाशित हो गईं तथा ग्राहकसंख्या में बहुत कुछ वृद्धि हो गई। इस बीच में और कोई उल्लेख योग्य बात नहीं हुईं।
1918 के आरंभ में तीन सहायक संपादकों ने 'लाÓ तक संपादन कर डाला और दो सहायक संपादकों ने 'बिÓ तक के शब्द दोहरा डाले। उस समय कई महीनों से कोश की बहुत कापी तैयार रहने पर भी अनेेक कारणों से उसका कोई अंक छपकर प्रकाशित न हो सका जिसके कारण आय रूकी हुई थी। कोश विभाग का व्यय बहुत आधिक था और कोश के संपादन का कार्य प्राय: समाप्ति पर था अत: कोश विभाग का व्यय कम करने की इच्छा से विचार हुआ कि अप्रैल, 1918 से कोश का व्यय कुछ घटा दिया जाय। तदनुसार बाबू जगन्मोहन वर्मा, लाला भगवानदीन और बाबू अमीर सिंह त्यागपत्र देकर अपने अपने पद से अलग हो गए। कोश विभाग में केवल दो सहायक संपादक- पंडित रामचंद्र शुक्ल और बाबू रामचंद्र वर्मा- तथा स्लिपों का क्रम लगाने वाले और साफ कापी लिखनेवाले एक लेखक पंडित ब्रजभूषण ओझा रह गए। इस समय आगे के शब्दों का संपादन रोक दिया गया और केवल पुराने संपादित शब्द ही दोहराए जाने लगे। पर जब आगे चलकर दोहराने योग्य स्लिपें प्राय: समाप्त हो चलीं, और आगे नए शब्दों के संपादन की आवश्यकता प्रतीत हुई तब संपादन कार्य के लिये बाबू कालिका प्रसाद नियुक्त किए गए जो कई वर्षों तक अच्छा काम करके और अंत में त्यागपत्र देकर अन्यत्र चले गए। परंतु स्लिपों को दोहराने का कार्य पूर्ववत् प्रचलित रहा।
सन् 1924 में कोश के संबंध में एक हानिकारक दुर्घटना हो गई थी। आरंभ में शब्द संग्रह की जो स्लिपें तैयार हुई थी, उनके 22 बंडल कोश कार्यालय से चोरी चले गए। उनमें 'विव्वोकÓ से 'शÓ तक की और 'शयÓ से 'सहीÓ तक की स्लिपें थीं। इसमें कुछ दोहराई हुई पुरानी स्लिपें भी थीं जो छप चुकी थीं। इन स्लिपों के निकल जाने से तो कोई विशेष हानि नहीं हुई, क्योंकि सब छप चुकी थीं। परंतु शब्द-संग्रहवाली स्लिपों के चोरी जाने से अवश्य ही बहुत बड़ी हानि हुई। इसके स्थान पर फिर कोशों आदि से शब्द एकत्र करने पड़े। यह शब्द संग्रह अपेक्षाकृत थोड़ा और अधूरा हुआ और इसमें स्वभावत: ठेठ हिंदी या कविता आदि के उतने शब्द नहीं आ सके, जितने आने चाहिए थे, और न प्राचीन काव्यग्रंथों आदि के उदाहरण ही सम्मिलित हुए। फिर भी जहां तक हो सका, इस त्रुटि की पूर्ति करने का उद्योग किया गया और परिशिष्ट में बहुत से छूटे हुए शब्द आ भी गए हैं।
सन् 1925 में कार्य शीघ्र समाप्त करने के लिये कोश-विभाग में दो नए सहायक अस्थायी रूप से नियुक्त किए गए- एक तो कोश के भूतपूर्व संपादक बाबू जगन्मोहन वर्मा के सुपुत्र बाबू सत्यजीवन वर्मा एम.ए और दूसरे पंडित अयोध्यानाथ शर्मा, एम.ए.। यद्यपि ये सज्जन कोश विभाग में प्राय: एक ही वर्ष रहे थे, फिर भी इनसे कोश का कार्य शीघ्र समाप्त करने में और विशेषत: व, श, ष तथा स के शब्दों के संपादन में अच्छी सहायता मिली। जब ये दोनों सज्जन सभा से संबंध त्यागकर चले गए तब संपादन कार्य के लिये श्रीयुत् पंडित वासुदेव मिश्र, जो आरंभ में भी कोश विभाग में शब्दसंग्रह का काम कर चुके थे और जो इधर बहुत दिनों तक कलकत्ते के दैनिक भारतमित्र तथा साप्ताहिक श्रीकृष्ण संदेश के संपादक रह चुके थे, कोश विभाग में सहायक संपादक के पद पर नियुक्त कर लिए गए। इनकी नियुक्ति से संपादन कार्य बहुत ही सुगम हो गया और वह बहुत शीघ्रता से अग्रसर होने लगा। अंत में इस प्रकार सन् 1927 में कोश का संपादन आदि समाप्त हुआ।
इतने बड़े शब्दकोश में बहुत से शब्दों का अनेक कारणों से छूट जाना बहुत ही स्वाभाविक था। एक तो यों ही सब शब्दों को संग्रह करना बड़ा कठिन काम है, तिस पर एक जीवंत भाषा में नए शब्दों का आगम निरंतर होता रहता है। यदि किसी समय समस्त शब्दों का संग्रह किसी उपाय से कर भी लिया जाय और उनके अर्थ आदि भी लिख लिए जाय, तथापि जब तक यह संग्रह छपकर प्रकाशित हो सकेगा तब तक और नए शब्द भाषा में सम्मिलित हो जायेंगे। इस विचार से तो किसी जीवित भाषा का शब्दकोश कभी भी पूर्ण नहीं माना जा सकता। इन कठिनाइयों के अतिरिक्त यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि हिंदी भाषा के इतने बड़े कोश को तैयार करने का इतना बड़ा आयोजन यह पहला ही हुआ है। अतएव इसमें अनेक त्रुटियों का रह जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। फिर भी इस कोश की समाप्ति में प्राय: 20 वर्ष लगे। इस बीच में समय समय पर बहुत से ऐसे नए शब्दों का पता लगता था जो शब्दसागर में नहीं मिलते थे। इसके अतिरिक्त देश की राजनीतिक प्रगति आदि के कारण बहुत से नए शब्द भी प्रचलित हो गए थे जो पहले किसी प्रकार संगृहित ही नहीं हो सकते थे। साथ ही कुछ शब्द ऐसे भी थे जो शब्दसागर में छप तो गए थे, परंतु उनके कुछ अर्थ पीछे से मालूम हुए थे। अत: यह आवश्यक समझा गया कि इन छूटे हुए या नवप्रचलित शब्दों और छूटे हुए अर्थों का अलग संग्रह करके परिशिष्ट रूप में दे दिया जाय। तदनुसार प्राय: एक वर्ष के परिश्रम में ये शब्द और अर्थ भी प्रस्तुत करके परिशिष्ट रूप में दे दिए गए हैं। आजकल समाचारपत्रों आदि या बोलचाल में जो बहुत से राजनीतिक शब्द प्रचलित हो गए हैं, वे भी इसमें दे दिए गए हैं। सारांश यह कि इसके संपादकों ने अपनी ओर से कोई बात इस कोश को सर्वांगपूर्ण बनने में उठा नहीं रखी है। इसमें जो दोष, अभाव या त्रुटियां हैं उनका ज्ञान जितना इसके संपादकों को है उतना कदाचित् दूसरे किसी को होना कठिन है, पर ये बातें असावधानी से अथवा जान बूझकर नहीं होने पाई हैं। अनुभव भी मनुष्य को बहुत कुछ सिखाता है। इसके संपादकों ने भी इस कार्य को करके बहुत कुछ सीखा है और वे अपनी कृति के अभावों से पूर्णतया अभिज्ञ हैं।
कदाचित् यहां पर यह कहना अनुचित न होगा कि भारतवर्ष की किसी वर्तमान देशभाषा में उसके एक वृहत् कोश के तैयार कराने का इतना बड़ा और व्यवस्थित आयोजन दूसरा अब तक नहीं हुआ है। जिस ढंग पर यह कोश प्रस्तुत करने का विचार किया गया था, उसके लिये बहुत अधिक परिश्रम तथा विचारपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता थी। साथ ही इस बात की भी बहुत बड़ी आवश्यकता थी कि जो सामग्री एकत्र की गई थी उसका किस ढंग से उपयोग किया जाय और भिन्न-भिन्न भावों के सूचक अर्थ आदि किस प्रकार दिए जायें क्योंकि अभी तक हिंदी, उर्दू, बंगला, मराठी या गुजराती आदि किसी देशीभाषा में आधुनिक वैज्ञानिक ढंग पर कोई शब्दकोश प्रस्तुत नहीं हुआ था। अब तक जितने कोश बने थे, उन सबमें वह पुराना ढंग काम में लाया गया था और एक शब्द के अनेक पर्याय ही एकत्र करके रख दिए गए थे। किसी शब्द का ठीक ठीक भाव बतलाने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया था। परंतु विचारवान पाठक समझ सकते हैं कि केवल पर्याय से ही किसी शब्द का ठीक ठीक भाव या अभिप्राय समझ में नहीं आ सकता, और कभी कभी तो कोई पर्याय अर्थ के संबंध में जिज्ञासु को भी और भ्रम में डाल देता है। इसीलिए शब्दसागर के संपादकों को एक ऐसे नए क्षेत्र में काम करना पड़ा था जिसमें अभी तक कोई काम हुआ ही नहीं था। वे प्रत्येक शब्द को लेते थे, उसकी व्युत्पत्ति ढूंढते थे; और तब एक या दो वाक्यों में उसका भाव स्पष्ट करते थे; और यदि यह शब्द वस्तुवाचक होता था, तो उस वस्तु का यथासाध्य पूरा पूरा विवरण देते थे, और तब उसके कुछ उपयुक्त पर्याय देते थे। इसके उपरांत उस शब्द से प्रकट होने वाले अन्यान्य भाव या अर्थ, उत्तरोत्तर विकास के क्रम से, देते थे। उन्हें इस बात का बहुत ध्यान रखना पड़ता था कि एक अर्थ का सूचक पर्याय दूसरे अर्थ के अंतर्गत न चला जाय। जहां आवश्यकता होती थी, वहाँ एक ही तरह के अर्थ देने वाले दो शब्दों का अंतर भी भली भाँति स्पष्ट कर दिया जाता था। उदाहरण के लिए 'टंगनाÓ और 'लटकनाÓ इन दोनों शब्दों को लीजिए। शब्दसागर में इन दोनों के अर्थों का अंतर इस प्रकार स्पष्ट किया गया है- 'टंगना शब्द में ऊँचे आधार पर टिकने या अडऩे का भाव प्रधान है और 'लटकनाÓ शब्द में ऊपर से नीचे तक फैले रहने या हिलने डोलने का।Ó
इसी प्रकार दर्शन, ज्योतिष: वैद्यक, वास्तुविद्या आदि अनेक विषयों के पारिभाषिक शब्दों के भी पूरे पूरे विवरण दिए गए हैं। प्राचीन हिंदी काव्यों में मिलनेवाले ऐसे बहुत से शब्द इसमें आए हैं जो पहले कभी किसी कोश में नहीं आए थे। यही कारण है कि हिंदीप्रेमियों तथा पाठकों ने आरंभ में ही इसे एक बहुमूल्य रत्न की भांति अपनाया और इसका आदर किया। प्राचीन हिंदी काव्यों को पढऩा और पढ़ाना, एक ऐसे कोश के अभाव में , प्राय: असंभव था। इस कोश ने इसकी पूर्ति करके वह अभाव बिल्कुल दूर कर दिया। पर यहां यह भी निवेदन कर देना आवश्यक जान पड़ता है कि अब भी इसमें कुछ शब्द अवश्य इसलिए छूटे हुए होंगे कि हिंदी में अधिकांश छपे हुए काव्यों में न तो पाठ ही शुद्ध मिलता है और न शब्दों के रूप ही शुद्ध मिलते हैं।
इन सब बातों से पाठकों ने भली भांति समझ लिया होगा कि इस कोश में जो कुछ प्रयत्न किया गया है, बिल्कुल नए ढंग का है। इस प्रयत्न में इसके संपादकों को कहां तक सफलता हुई है इसका निर्णय विद्वान पाठक ही कर सकते हैं। परंतु संपादकों के लिये यही बात विशेष संतोष और आनंद की है कि आरंभ से अनेक बड़े बड़े विद्वानों जैसे, सर जार्ज ग्रियर्सन, डॉक्टर हार्नली, प्रो. सिल्वन लेवी, डॉ. गंगानाथ झा आदि ने इसकी बहुत अधिक प्रशंसा की है। इसकी उपयोगिता का यह एक बहुत बड़ा प्रमाण है। कदाचित् यहां पर यह कह देना भी अनुपयुक्त न होगा कि कुछ लोगों ने किसी किसी जाति अथवा व्यक्तिविषयक विवरण पर आपत्तियाँ की हैं। मुझे इस संबंध में केवल इतना ही कहना है कि हमारा उद्देश्य किसी जाति को ऊंची या नीची बनाना न रहा है और न हो सकता है। इस संबंध में न हम शास्त्रीय व्यवस्था देना चाहते थे और न उसके अधिकारी थे। जो सामग्री हमको मिल सकी उसके आधार पर हमने विवरण लिखे। उसमें भूल होना या कुछ छूट जाना कोई असंभव बात नहीं है। इसी प्रकार जीवनी के संबंध में मतभेद या भूल हो सकती है। इसके कारण यदि किसी का हृदय दुखा हो या किसी प्रकार का क्षोभ हुआ हो तो उसके लिये हम दु:खी हैं और क्षमा के प्रार्थी हैं। संशोधित संस्करण में ये त्रुटियां दूर की जायेंगी।
इस प्रकार यह वृहत आयोजन 20 वर्ष के निरंतर उद्योग, परिश्रम और अध्यवसाय के अनंतर समाप्त हुआ है। इसमें सब मिलाकर 93,115 शब्दों के अर्थ तथा विवरण दिए गए हैं और आरंभ में हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास का इतिहास भी दे दिया गया है। इस समस्त कार्य में सभा का अब तक 10,27,35 रू. साढ़े 8 पैसे व्यय हुआ है, जिसमें छपाई आदि का भी व्यय सम्मिलित है। इस कोश की सर्वप्रियता और उपयोगिता का इससे बढ़कर और क्या प्रमाण (यदि किसी प्रमाण की आवश्यकता है) हो सकता है कि कोश समाप्त भी नहीं हुआ और इसके पहले ही इसके खंडों को दो-दो और तीन-तीन बार छापना पड़ा है और इस समय इस कोश के समस्त खंड प्राप्य नहीं हैं। इसकी उपयोगिता का दूसरा बड़ा भारी प्रमाण यह है कि अभी यह ग्रंथ समाप्त भी नहीं हुआ था, वरन् यों कहना चाहिए कि अभी इसका थोड़ा ही अंश छपा था जबकि इससे चोरी करना आरंभ हो गया था और यह काम अब तक चला जा रहा है, पर असल और नकल में जो भेद संसार में होता है वही यहां भी दीख पड़ता है। यदि इस संबंध में कुछ कहा जा सकता है तो वह केवल इतना ही है कि इन महाशयों ने चोरी पकड़े जाने के भय से इस कोश के नाम का उल्लेख करना भी अनुचित समझा है।
जो कुछ ऊपर लिखा जा चुका है, उससे स्पष्ट है कि इस कोश के कार्य में आरंभ से लेकर अंत तक पंडित रामचंद्र शुक्ल का संबंध रहा है, और उन्होंने इसके लिए जो कुछ किया है, वह विशेष रूप से उल्लिखित होने योग्य है। यदि यह कहा जाए कि शब्दसागर की उपयोगिता और सर्वांगपूर्णता का अधिकांश श्रेय पंडित रामचंद्र शुक्ल को प्राप्त है, तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी। एक प्रकार से यह उन्हीं के परिश्रम, विद्वता और विचारशीलता का फल है। इतिहास, दर्शन, भाषाविज्ञान, व्याकरण, साहित्य आदि के सभी विषयों का समीचीन विवेचन प्राय: उन्हीं का किया हुआ है। यदि शुक्ल जी सरीखे विद्वान की सहायता न प्राप्त होती तो केवल एक या दो सहायक संपादकों की सहायता से यह कोश प्रस्तुत करना असंभव ही होता। शब्दों को दोहराकर छपने के योग्य ठीक करने का भार पहले उन्हीं पर था। फिर आगे चलकर थोड़े दिनों बाद उनके सुयोग्य साथी बाबू रामचंद्र वर्मा ने भी इस काम में उनका पूरा पूरा हाथ बंटाया और इसीलिए इस कोश को प्रस्तुत करने वालों में दूसरा मुख्य स्थान बाबू रामचंद्र वर्मा को प्राप्त है। कोश के साथ उनका संबंध भी प्राय: आदि से अंत तक रहा है और उनके सहयोग तथा सहायता से कार्य को समाप्त करने में बहुत अधिक सुगमता हुई है। आरंभ में उन्होंने इसके लिए सामग्री आदि एकत्र करने में बहुत अधिक परिश्रम किया था; और तदुपरांत वे इसके निर्माण और संपादित की हुई स्लिपों को दोहराने के काम में पूर्ण अध्यवसाय और शक्ति से सम्मिलित हुए। उनमें प्रत्येक बात को बहुत शीघ्र समझ लेने की अच्छी शक्ति है, भाषा पर उनका पूरा अधिकार और वे ठीक तरह से काम करने का ढंग जानते हैं; और उनके गुणों से इस कोश को प्रस्तुत करने में बहुत अधिक सहायता मिली है। इसकी छपाई की व्यवस्था और प्रूफ आदि देखने का भार भी प्राय: उन्हीं पर था। इस प्रकार इस विशाल कार्य के संपादन का उन्हें भी पूरा-पूरा श्रेय प्राप्त है और इसके लिए मैं उक्त दोनों सज्जनों को शुद्ध हृदय से धन्यवाद देता हूं। इनके अतिरिक्त स्वर्गीय पंडित बालकृष्ण भट्ट, स्वर्गीय बाबू जगमोहन वर्मा, स्व. बाबू अमीर सिंह तथा लाला भगवानदीन जी को भी मैं बिना धन्यवाद दिए नहीं रह सकता। उन्होंने इस कोश के संपादन में बहुत कुछ काम किया है और उनके उद्योग तथा परिश्रम से इस कोश के प्रस्तुत करने में बहुत सहायता मिली है। जिन लोगों ने आरंभ में शब्दसंग्रह आदि या और कामों में किसी प्रकार से मेरी सहायता की है वे भी धन्यवाद के पात्र हैं।
इनके अतिरिक्त अन्य विद्वानों, सहायकों तथा दानी महानुभावों के प्रति भी मैं अपनी तथा सभा की कृतज्ञता प्रकट करता हूं जिन्होंने किसी न किसी रूप में इस कार्य को अग्रसर तथा सुसंपन्न करने में सहायता की है, यहां ंतक कि जिन्होंने इसकी त्रुटियों को दिखाया है उनके भी हम कृतज्ञ हैं, क्योंकि उनकी कृपा से हमें अधिक सचेत और सावधान होकर काम करना पड़ा है। ईश्वर की परम कृपा है कि अनेक विघ्न बाधाओं के समय-समय पर उपस्थित होते हुए भी यह कार्य आज समाप्त हो गया। कदाचित् यह कहना कुछ अत्युक्ति न समझा जाएगा कि इसकी समाप्ति पर जितना आनंद और संतोष मुझको हुआ है उतना दूसरे किसी को होना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है।
 काशी नागरी प्रचारिणी सभा अपने इस उद्योग की सफलता पर अपने को कृतकृत्य मानकर अभिमान कर सकती है।