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Tuesday 21 Nov 2017

अगस्त अंक मिला। इस अंक में प्रस्तावना के तहत \'स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशाÓ के संबंध में ललित सुरजन ने ठीक ही कहा है

जितेन्द्र धीर, मो. 8961272416
अगस्त अंक मिला। इस अंक में प्रस्तावना के तहत 'स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशाÓ के संबंध में ललित सुरजन ने ठीक ही कहा है कि 'हिन्दी साहित्य का नया इतिहास लिखने का समय आ चुका है।Ó वस्तुत: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के सात-आठ दशकों में कविता के शिल्प, कथ्य, भाषा, विचार आदि में बहुत कुछ नया जुड़ा है। इन सब पर समग्रता से विचार नहीं किया जा गया। निश्चित तौर पर यह समय की आवश्यकता है। आलोचना का सुमेरू अपने कंधे पर उठाए आलोचकों को इस पर ध्यान देना चाहिए। वृहत्तर समाज से कटकर आज का कवि बंद कमरों की संगोष्ठियों तक ही सीमित रह गया है। सुरजनजी का यह कहना बिल्कुल सही है। किसी भी प्रकार के आंदोलन से आज का कवि उस तरह नहीं जुड़ पा रहा है जैसा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के प्रथम 20 वर्षों में जुड़ता था या उससे आंदोलित होता था। लय से हीन, छंद मुक्त कविता का जो वर्तमान परिदृश्य है वह कितनी दूर तक आगे जाएगा या रहेगा यह तो समय ही बताएगा। जहां तक हिन्दी गल या नवगीत की बात है, इसमें आज बहुत कुछ रचा जा रहाहै। गल हो गीत हो दोनों ही छांदसिक विधाएं हैं। इसकी कुछ अपेक्षाएं होती हंै। इन विधाओं में रचना करने वाले को उन अपेक्षाओं पर खरा उतरना होता है। तभी बात बनती है। कुशेश्वर व राजकिशोर राजन की कविताएं अच्छी लगीं। तबस्सुम फातिमा की कविता 'कब्रगाहों की वीरान सल्तनतÓ बड़े असरदार ढंग से कथ्य को संप्रेषित करती है। अन्य सामग्री भी पठनीय है।