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Sunday 15 Jul 2018

अक्षर पर्व अक्टूबर-2015 अंक में आपकी प्रस्तावना के साथ बहता चला गया।

केवल गोस्वामी,  सरिता विहार, नई दिल्ली
अक्षर पर्व अक्टूबर-2015 अंक में आपकी प्रस्तावना के साथ बहता चला गया। जहां किनारे लगा वहां विषय से भरता चला गया। आपके टैन कमांमेंट्स में प्रलेस तथा दीगर संगठनों की प्रासंगिकता तथा उनकी वर्तमान स्थिति के साथ राजनैतिक दलों से उनकी स्वायत्तता की चर्चा भी होनी चाहिए थी। इनकी आत्मालोचन एक प्रमुख मुद्दा है जिसे दरकिनार करके हम कहीं नहीं पहुंच सकेंगे। उस में संगठन विशेषतया प्रलेस की वर्तमान स्थिति और उसकी निष्क्रियता के कारणों का भी उल्लेख करना चाहिए था। संगठन है पर नहीं है, केन्द्र द्वारा भीष्म जी और ताबां साहब को उनकी जन्मशती पर भुला देना और लेखकों के प्रतिरोधक आंदोलन को दिशा न देना भी एक मुद्दा है। नामवर जी की टिप्पणी भ्रामक और गैर जरूरी है, इन मुद्दों से बचकर हम अपनी बात को पूरा नहीं कर सकते।