Monthly Magzine
Wednesday 23 Jan 2019

अजित कुमार ने नागार्जुन के दोहे पर बड़ी कसरत नाहक की।

शंकरमोहन झा, हिन्दी विद्यापीठ, देवधर (झारखण्ड) 814115
अजित कुमार ने नागार्जुन के दोहे पर बड़ी कसरत नाहक की। 'जली ठूंठÓ का अर्थ उन तक कैसे सम्प्रेषित नहीं हुआ, पता नहीं। घोर अंधेरे के बाद भी सूरज की संभावना तो रहती ही है। आपातकाल में जब संहारक कालिमा शासन के  द्वारा लाई गई, पूरा देश श्मशान में तब्दील कर दिया गया, तब भी सृजन की कोकिला ने संभावना की कूक भर दी और उन्मत्त शासन को चुनौती दी। दोहे का पद-बंध भी बड़ा मौजू है। जहां सृजन की सारी संभावना खत्म करने की कोशिश की गई वहां भी सर्जक सृजन की कूक भर गया। यह दोहा सदियों बाद भी याद किया जाएगा। इस पर आप अन्य काव्य मर्मज्ञों से भी राय ले सकते हैं। आज राजनीति जिस तरह अभिधा पर उतर आई है उसका प्रभाव साहित्यलोचकों पर न पड़े।