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Friday 24 Nov 2017

अक्षर पर्व पत्रिका का कहानी विशेषांक बहुत उम्दा बन पड़ा है। इसलिए यादगार भी। अंक की कुछ कहानियां ही पढ़ पाया हूं।

बजरंग बिहारी, गोंडा,  उप्र

अक्षर पर्व पत्रिका का कहानी विशेषांक बहुत उम्दा बन पड़ा है।  इसलिए यादगार भी। अंक की कुछ कहानियां ही पढ़ पाया हूं। धीरे-धीरे पूरा करूंगा।
उसमें राधावल्लभ त्रिपाठी जी की एक कहानी सहयात्री शामिल है। कहानी का यथार्थ-बोध ठेठ आधुनिक है। कालवाची आधुनिकता। क्लासिक किस्म की।  जैसे बंग महिला (राजबाला घोष) की दुलाईवाली कहानी । जीवन के वृहत दृश्य का एक टुकड़ा। अनायास। अपने से इतर कोई अन्य उद्देश्य नहीं । देखने में मासूम, निष्प्रयोज्य। पर, असर बहुत गहरा। कहानी के संसार में सामुदायिकता अभी सलामत है। लोग एक-दूसरे को अब तक पहचानते हैं। बच्चे के रोने पर संवेदित होते हैं ।
बस स्टैंड का नजारा खासा अकृत्रिम। डर लगा कि कहीं लेखक रूमानियत में न चला जाए। सहजबोध कायम रहा। एकदम दुनियावी। यथार्थ का आधार भाषा। सब सधा भाषा के बूते। ब्रज-बुंदेली के स्वरों से शास्त्रीय संगीतकार की संगत। एक मार्मिक संगीत पूरे विन्यास में व्याप्त।
यात्री बस का बैक गियर में चलना अर्थपूर्ण। मनुष्यता से आगे जाती आधुनिकता वापस लौट सकती है। फिर से संग-साथ के लिए। यह आस ढाढस बंधाती है। बच्चे का रोना भी एक आशय लिए हुए है। उसके पिता का साथ आना उस आशय को और गाढ़ा बनाता है।