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Saturday 18 Nov 2017

उसने कहा था कहानी मेरे दसवीं के सिलेबस में थी और इसके साथ ही प्रेमचन्द की कहानी नमक का दारोगा और फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ठेस भी और ये तीनो कहानियां मुझे अत्यन्त प्रिय थीं!

 नवनीत कुमार झा, हरिहरपुर, दरभंगा - 847306 ( बिहार )

उसने कहा था  कहानी मेरे दसवीं के सिलेबस में थी और इसके साथ ही प्रेमचन्द की कहानी नमक का दारोगा  और फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ठेस भी और ये तीनो कहानियां मुझे अत्यन्त प्रिय थीं! उस जमाने में साहित्यिक समझ का अर्थ क्या होता है पता नहीं था! लेकिन वैसी कृतियों में अधिक दिलचस्पी हो जाती थी जो भावनात्मक रूप से ज्यादा गहरा प्रभाव उत्पन्न करने वाली होती थीं !! उसने कहा था को जब भी पढ़ता था तो आँखें पनिया जाती थीं ! उस वक्त ये कहाँ पता था कि उसने कहा था के रचयिता पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने मात्र तीन ही कहानियाँ लिखी और हिन्दी कथा साहित्य -संसार में एक सिद्धहस्त कथाकार के रूप में प्रख्यात हो गए। नवम्बर अंक के प्रस्तावना में आरम्भ में ही उसने कहा था का उल्लेख मिला तो प्रस्तावना को ध्यानस्थ सा पढऩे लगा। निस्संदेह गुलेरी जी की यह बेहतरीन कहानी आज भी मेरी प्रिय कहानियों में से एक है। प्रस्तावना में ललित जी ने कथा लेखन के क्षेत्र में हुए विविध गतिविधियों और आंदोलनों का जो एक संक्षिप्त खाका प्रस्तुत किया है वो हिन्दी साहित्य के इतिहास को ठीक से जानने के लिए प्रेरित करता है। अक्षर पर्व के ही पुराने अंकों में प्रकाशित कहानियों का चयन और प्रकाशन करके आप लोगों ने मेरे जैसे नए पाठकों का भला किया है। अक्षर पर्व का यह अंक निस्संदेह एक विशिष्ट अंक है, जो किसी ऐतिहासिक दस्तावेज सा ही महत्वपूर्ण और संग्रहणीय अंक है। भीष्म साहनी जी की विलक्षण एवम् विशिष्ट कहानी वीरो को तो पत्रिका मिलते ही पढ़ लिया था, विशेषांक की बाकी बची कहानियों की तरफ बढ़ा तो अलका सरावगी के पार्टनर ने रोक लिया और मैं इस कहानी में निमग्न हो गया इस विलक्षण कहानी का अन्त अर्थपूर्ण और कचोटने वाला है।
हृदयेश की कहानी बाबा पढ़ी तो बस कुछ मत पूछिए, कि मेरे हृदय का क्या हाल हुआ! कमोबेश हर घर में वृद्ध की स्थिति अवांछित, उपेक्षित और हास्यास्पद सी हो गई है! भारतीय समाज और परिवारों में वृद्ध लोगों की जो स्थिति आज है वो हमेशा नहीं थी। परिवार में वृद्ध की स्थिति फालतू और ग़ैर जरूरी वस्तु के जैसी ही हो गई है। वृद्ध को समझने और झेलने का धैर्य अब बहुत कम लोगों में रह गया है। वृद्ध होने के साथ ही कुछ न कुछ ख़ब्त और सनक तो आ ही जाती है और इसके लिए नाराजग़ी प्रकट करना या वृद्ध को तिरस्कृत करना कहां तक जायज है? जीवन में किसी शगल और शौक का होना वृद्ध के लिए बहुत अच्छा होता है, कम से कम वक्त काटना, सजा काटने जैसा नहीं होता है। हृदयेश हिन्दी के उन विलक्षण कथाकारों में से एक हैं जिनको कथा लेखक की बजाय कथावाचक कहा जाय तो ग़लत न होगा ! पूरी कहानी एक रोचक और लम्बे संवाद जैसा था जिसके माध्यम से हृदयेश ने वृद्ध के प्रति संवेदना जगाने का कुशल और सफल प्रयास किया है। पक्षी और मानव के स्नेह - बन्धन के बहाने से लेखक ने पाठक के हृदय को झिंझोडऩे वाली व्यथा कही है। चन्द्रकिशोर जायसवाल की कहानी संधि में गाँव की कहानी है जो अत्यंत ही मनलग्गू है ! गाँव में वाकई ऐसा ही होता है कि अपनी अदावत निकालने के लिए लोग किसी का पेड़ कटवा देते हैं या फसल बर्बाद कर दिया या इसी तरह के अन्य खुराफात करते हैं। जायसवाल जी की भाषा में एक प्रवाह है, जो सहज और स्वाभाविक सा है और कथा को रोचक बनाता है। राजनाथ भगत एकदम दुनियादार आदमी लगे और दुश्मन को चुटकी में मसलने का कैसा धांसू आइडिया निकाल लिया उन्होंने। गिरिराज किशोर की कहानी समसामयिक समस्या पर केन्द्रित है और लीक से हटकर है।