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Thursday 23 Nov 2017

अनथक साधना और जीवट की मिसाल: डॉ. गोपाल राय

सूर्यबाला
बी. 504, रुनवाल सेंटर
गोवंडी स्टेशन रोड
देवनार मुंबई-88
मो. 99309 68670
गोपाल राय जी का जाना, सिर्फ एक व्यक्ति का दुखद अवसान भर नहीं है, यह हिंदी साहित्य के साहित्यालोचन की गौरवशाली परंपरा के अंत का, अवसन्न कर देने वाला अहसास है। अंतिम सांस तक हिंदी समीक्षा के नॉट-आउट रहे खिलाड़ी की उस पारी का अंत है जिसकी दूसरी शुरूआत अब संभव नहीं।
पिछले कई वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे। दशकों दशक लंबे सार्थक, संर्घषरत जीवन के अंतिम अध्याय का काउंट-डॉउन शुरू हो गया था.... फिर भी हमारे बीच उनके होने का अहसास था.... यह एक बड़ी आश्वस्ति थी, इस निरंतर सत्वहीन होते जा रहे शॉर्टकट के समय में।
लेखन के प्रति उनके जैसे समर्पण, अनुशासन और कार्यक्षमता की दूसरी मिसाल आसपास ढूंढनी कठिन थी। शब्दों का संसार उनकी जिजीविषा की संजीवनी से ऊर्जा पाता था, साहित्य को बरतने के सातव्य और अनुशासन से समृद्ध होता था। इच्छाशक्ति के ऐसे धनी थे कि अंतिम दशकों में आयुजन्य शारीरिक अक्षमताओं की आहट लगने के बावजूद कहानी और उपन्यास से जुड़ी अपनी वृहत योजनाओं को पूरा करने की गति और ज्यादा व्यवस्थित, और ज्यादा तेज कर दी। और अंतत: पूरा करके ही विश्राम लिया। यह बहुत बड़े जीवट का श्रमसाध्य कार्य था। जिससे उनके जैसा दुद्र्धर्ष योद्धा ही पूरा कर सकता था।
उन वर्षों में कहानी के इतिहास पर चलते अपने विशद शोध के दौरान यदा कदा मुझसे मेरी कहानियों के लेखन और प्रकाशन वर्षों से जुड़े ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछ लिया करते थे जिनकी स्वयं मेरे पास कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं हुआ करती थी। मैं परेशान हो जाया करती थी। लेकिन वे बिना विचलित हुए या झुंझलाए कहीं न कहीं से, किसी न किसी तरह की अधिकतम सही जानकारी उपलब्ध करके ही रहते थे। उन क्षणों में मेरी कहानियों से जुड़ी उनकी, गुप्तचर सी 'क्रॉस-क्वेशचनिंगÓ मुझे विस्मित कर दिया करती थी।
विचार और दृष्टि की सुस्पष्टता उनके व्यक्तित्व की बहुत बड़ी पूंजी थी। भरपूर आत्मविश्वास से, आवेश में आये बिना नापतौल कर अपनी बात कहने और निद्र्वंद्व भाव से आरोप प्रत्यारोपों को सुनने का अपरिमित धैर्य था उनमें।
वर्षों पहले कलकत्ते में हुई हिंदी-साहित्य-संसद की राष्ट्रीय संगोष्ठी में पहली बार सुना था उन्हें। हिंदी के महत्वपूर्ण उपन्यासों पर  सुचिंतित संतुलित धाराप्रवाह बोलते हुए, प्रशंसात्मक संस्तुतियों के बीच कहानी उपन्यास के अमूर्ततन पक्ष पर अपनी असहमति प्रगट करते हुए विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों का उदाहरण दिया था उन्होंने। यह भी कहा था कि रचनात्मक विधाओं में एक सीमा से ज्यादा अमूर्ततन नहीं चला करता। विशिष्ट थी उनकी अपने विचारों की स्थापना की शैली। निश्चित रूप से बाद में उनकी असहमति की प्रतिअसहमतियां आनी अनिवार्य थी लेकिन वे सस्मित भाव से उन्हें वहन और ग्रहण करने के लिए प्रस्तुत थे। उनकी वह मुद्रा भी मेरे लिए अनुकरणीय थी।
अपनी बात को पुन:-पुन: प्रमाणित या सिद्ध करने की उतावली उनमें कभी नहीं होती थी। न अपनी वैचारिक स्थापना को लेकर किसी तरह का विचलन। दूसरों से अपने तर्क को मनवाने का हठ भी नहीं। उनका अहंकारविहीन आत्मविश्वास चकित करने वाला था।
एक बार मुंबई की किसी साहित्य संगोष्ठी में आये थे। संभवत: मेरा वार्डन रोड वाला फ्लैट, आयोजन स्थल के पास था और दोपहर के भोजन का समय और सुविधा भी थी। वरिष्ठ समीक्षक और उनके मित्र डॉ. त्रिभुवन राय भी साथ थे। अमरकांत के 'दोपहर के भोजनÓ से शुरू हुआ बातों का सिलसिला मेरी कहानियों तक चला तो अनायास मैं सहज विनोदी भाव से कह गई थी- कि मेरे घर में पति से बच्चे तक, कोई मुझे लेखिका के रूप में बिलकुल नहीं जानते, मानते।
छूटते ही गोपाल राय जी, अपनी सहजनिर्दं्वद्वता से दो-टूक लहजे में एक बड़ा सच बोल गए थे- 'आप अंग्रेजी में लिखती होतीं तो वे आपको जानते भी, मानते भी।
ऐसी सहज निर्भीकता और निर्दं्वद्वता से खरा सच बोल जाना उनकी आदतों में शामिल था। उनकी प्रकृति-प्रदत विशिष्टता भी। मेरे उपन्यास यामिनी-कथा पर, जो शायद उन्हीं दिनों आया था, स्वयं सविस्तार बोलने के बाद निदानत: एक छोटे से वाक्य में यह कहना भी नहीं भूले कि अब हमें आपकी उस कृति की प्रतीक्षा है, जिसमें आप अपने को पूरी तरह झोंक दें...
कृति के माध्यम से रचनाकार के अंदर तक पैठ कर थहाने की उनकी अद्भुत क्षमता का परिचायक था, यह वाक्य।
धुन के पक्के तो थे ही। बिना वैसे जीवट और जुनूनी हठ के 'समीक्षाÓ जैसी अपनी तरह की अकेली मानक पत्रिका का अकेले दम पर संपादन, वह भी दो-चार साल नहीं, समूची आधी सदी तक, संभव था भी नहीं। ('समीक्षाÓ के वर्ष 48 अंक 1 में, गोपाल राय जी के पुत्र सत्यकाम जी के अनुसार समीक्षा का पहला अंक वर्ष 67 में निकला था। अर्थात दो-कम पचास वर्षों की अनथक साधना) आर्थिक संसाधनों के सुदृढ़ आधार के बिना नियमित प्रकाशित होने वाली ऐसी पत्रिका का संपादन ही व्यक्ति को तनमन और उपार्जन के उपायों से थका डालने के लिए बहुत होता है लेकिन गोपाल राय जी इस सबके बावजूद अपनी सारी मनोकांक्षी योजानाओं में जुटे रहे। तन से भी ज्यादा ऊज्र्वसित उनका मन था जो शरीर को थकने की इजाजत नहीं देता था। तभी तो हिंदी के पहले उपन्यास, देवरानी जेठानी की कहानी, (जैसा उन्होंने माना) से लेकर प्रेमचंद, अज्ञेय, रेणु,  दिनकर और यशपाल तक की कृतियों को तो अपने मौलिक विवेचन से समृद्ध किया ही, साहित्याब्द कोश से लेकर हिंदी उपन्यास और कहानी के सौ वर्षों के इतिहास और विकास के समग्र आकलन वाली अपनी वृहत और महत्वाकांक्षी योजना को भी समापन तक पहुंचाकर ही विश्राम लिया। यह उनके अजेय और दुद्र्धर्ष जीवट का ही काम था।  तभी तो लगता है, हिंदी साहित्य आलोचन की किसी दूसरी ऐसी पारी की कल्पना दुष्कर है।