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Saturday 18 Nov 2017

मंटो : एक वैष्णव की दृष्टि में


डॉ. त्रिभुवन राय
2/सी-6 सेक्सरिया कंपाउण्ड
मुकुंद जाधव मार्ग,
 परेल विलेज
मुंबई- 400012
'चांद' के फांसी अंक में प्रकाशित अपनी एक क्रांतिकारी कविता के माध्यम से हिन्दी साहित्य में अपना हस्तक्षेप दर्ज कराने वाले बहुमुखी साहित्यिक व्यक्तित्व के धनी दुर्गादत्त त्रिपाठी कृत 'मंटो मिला थाÓ अपने समय का एक महत्वपूर्ण लघु उपन्यास है। त्रिपाठी जी मूलत: कवि थे; किन्तु कथा साहित्य में उनका अवदान कम उल्लेखनीय नहीं है। इस दृष्टि से उनके छ: उपन्यास और पांच कहानी संग्रह देखे जा सकते हैं। यद्यपि त्रिपाठी जी जयशंकर प्रसाद के मित्रों और सहयोगियों में से एक थे, तथापि अपने कथा साहित्य में वह प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा का सार्थक एवं प्रभावी निर्वाह करने वाले कथाकार के रूप में सामने आते हैं। 1962-63 के बीच उन्होंने मंटो पर उस समय लिखा जब हिन्दी-उर्दू के बीच की खाई बढ़ती जा रही थी। दूसरी ओर मंटों पर एक बदनाम कथाकार का लेबल चस्पा करने में व्यवस्था के ठेकेदारों और संकीर्ण दिमाग के आलोचकों ने कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। इसमें संदेह नहीं कि मंटों में कमियां थी, पर समाज की सच्चाइयों को वह जिस तल्खी से उकेरता था, उससे कोई भी तटस्थ सुधी पाठक उसकी कलम का लोहा माने बिना नहीं रह सकता। मंटो के व्यक्तित्व और कृतित्व की असली ऊंचाइयों की पहचान कराने के उद्देश्य से लिखा गया समीक्ष्य उपन्यास उदार वैष्णवी व्यक्तित्व के धनी लेखक त्रिपाठी की तटस्थ सत्यानुसंधान की वृत्ति के साथ साहित्य के मूल धर्म के प्रति उनकी समर्पित निष्ठा के प्रमाण के रूप में सहृदयों के भीतर अपनी जगह बनाता है।
जैसा कि उपन्यास के प्राक्कथन में कहा गया है, सआदत हसन मंटो से लेखक की भेंट 1961 की गर्मियों में उनके साहित्य के माध्यम से होती है। सभी जानते हैं मंटों तब तक दिवंगत हो चुके थे। लेकिन रियासत भाई के रूप में लेखक ने मंटों को जिस बेबाकी के साथ पेश किया है, कौन कह सकता है कि वह मंटो से नहीं मिला है अथवा मंटो के साथ नहीं रहा है। मंटो को जानने के लिए लेखक ने ठीक कहा है, 'आपको उसकी किताबें उसके साथ रहकर पढऩी पड़ेंगी।Ó स्वयं लेखक जैसे-जैसे मंटो की लेखन शक्ति की गहराइयों में उतरता है, उसे लगता है, ''मंटो अमर है। वह अपनी हर कहानी के तानों-बानों से सांस ले रहा है।ÓÓ (प्राक्कथन) मंटो ने अभावों की ही जिंदगी नहीं जी, समर्थ और पढ़े-लिखे लोगों की उदासीनता का जहर भी छककर पीया था, लेकिन इसके बावजूद वह 'एक दार्शनिक की मस्ती में कहकहे लगाकर उसका मजाक उड़ाता रहा।Ó उसी फक्कड़़ रचनाकार का अक्स उतारने के लिए उपन्यासकार त्रिपाठी महीनों उसकी किताबों के साथ हर पल चिपके रहते हैं। जाहिर है, कृति में प्राप्त मंटो का बिम्ब अंत:साक्ष्यूमलक ही अधिक है।
उपन्यास की कथाभूमि दिल्ली है। यहां बरकत बिल्डिंग की कुल जमा छ: छोटी खोलियों में से एक फ्रीलांसर मंटो की आरामगाह है। उसका दोस्त रियासत भाई भी उसके साथ रह रहा है। मंटो के पैसे अधिकतर रियासत भाई के पास ही रहते हैं। वही उसके खजानची जो हैं। इसलिए जब पैसों की तंगी होती या मकान मालिक समय पर भाड़ा न पहुंचने पर उसके लिखने-पढऩे में खलल पैदा करता तो वह रियासत भाई से यह सवाल किए बिना नहीं रहता कि 'यह क्या वाहियात है जी? क्यों इन तीन कौड़ी के आदमियों की इतनी जुरअत बढ़ाते हो? मुझे मुर्ग न खिलाते तो क्या मेरा पेट न भरता? मुझे गरम सूट न सिलवा देते तो क्या मैं नंगा रहता? मुझे बिला •ारूरत न पीने देते तो क्या मैं मर जाता? उस वक्त तो तुम धन्ना सेठ बन गए और आज मकान वाला तुम्हारी सारी धन्ना सेठी पर लानत बरसा गया।ÓÓ (पृ.33)
मंटो एक बेबाक इंसान और सच्चा दोस्त है। रियासत भाई के भतीजे की बीमारी और अस्पताल में दाखिल होने की खबर पर तंगहाल दोस्त को आश्वस्त करते हुए वह कहता है, ''फिक्र किस बात की है? एक मेरा शे$फर का लाइ$फ टाइम कलम है, एक कीमती सुनहरी घड़ी है और एक पौने तोले का सोने का छल्ला है। कहीं रखकर सौ रुपए लिए लेते हैं। लो, मैं अभी लाता हूं।ÓÓ (पृ. 47) यह दूसरी बात है कि उसी समय डेढ़ सौ का मनीआर्डर आ जाने के कारण इसकी नौबत नहीं आती। कथाकार मंटो अपने ही ढंग का फक्कड़ और लापरवाह इंसान था। पर उसके परले सिरे की लापरवाही में भी अपने ही तरह की महानता थी, तभी तो जाखल से भेजे हुए दोस्त का तार उसकी एक मैनुस्क्रिप्ट के भीतर से झांकता दिखाई देता है। मंटो स्वाभिमानी भी आले दरजे का है। बस में पुलिस कप्तान प्रेमी के साथ बैठी मिस गुलशन के गुस्से की भी उसे कोई परवाह नहीं, उल्टे उसे इस बात का शक होता है कि कहीं उसका दोस्त रियासत भाई उससे माफी न मांग ले। इसलिए वह उसकी छाती पर उंगली छुआते हुए आंखों ही आंखों में सावधान करना नहीं भूलता। (पृ. 30) युवती के पुलिस के हवाले करने की धमकी पर वह इस तरह से जवाब देता है जैसे उसने कुछ सुना ही न हो।
सौंदर्य प्रेमी मंटो को यह बात अखरती है कि उसके दोस्त के दिल में खूबसूरत से खूबसूरत औरत को देखने की ख्वाहिश क्यों नहीं है? एक दिलावर मर्द की आंखें खूबसूरती  को देखकर झेंपें, यह उसे कतई पसंद नहीं। भला, अल्लाहताला की बनाई हुई चीजों को देखने में शर्मिंदगी और झेंप कैसी? फिर भी अगर इंसान का दिमागी बड़प्पन हुस्न को अपने से बड़ा समझता है, तो समझो वह मर चुका है। इसलिए दोस्त को चेताते हुए वह यह कहना नहीं भूलता, ''मगर याद रहे, तुम वह इंसान हो कि दामन निचोड़ दो तो फरिश्ते वजू करें।ÓÓ (पृ. 38) लेकिन मंटो सौंदर्य के पीछे भागने वालों में से नहीं। 'वह दरअसल हुस्न के दिलोदिमाग और रुह को ताजा कर लेने भर का कायल था। ठीक उसी तरह जैसे कहीं से फूलों की खुशबू उमड़ती देखकर उसे सूंघते-सूंघते फेफड़ों में भर लेना जरूरी हो जाता है।Ó (पृ. 39)
मंटो हसीन है और हुस्न से ज्यादा नशा उसकी रहस्य भरी आंखों में रहता है। औरों के लिए हमदर्दी भी उसके भीतर कम नहीं। तभी तो मिस डौली और गुलशन पाल जैसी औरतें भी उसकी निकटता के लिए बेताब रहती है। लेकिन साफगो मंटो बेबाकी से उन्हें उनकी सच्चाई का अहसास कराकर उन्हें अपने हालातों से जूझने के लिए खुद खड़ा होने का रास्ता दिखाने में कोई चूक नहीं करता।
कथा नायक मंटो शराब भी पीता है और नूरी के कोठे पर भी चला जाता है। इसे वह जश्न नहीं, लंबी बोझिल जिंदगी का महज एक 'आइटमÓ भर मानता है। वह साफ-साफ कहता है, ''बीवी बच्चों वालों के मुकाबले में फक्कड़ कोई नया काम नहीं करता। शादीशुदा लोगों की नंगी से नंगी वासना भी बदनाम नहीं होने पाती, क्योंकि वह समाज से लायसेंस जो ले लेते हैं। वे अपनी जरूरतें छिपाकर पूरी कर लेते हैं, जबकि हमारी बाजारू मिठाई की तरह उघड़ी दिखाई देती है। मुझे स्त्री-पुरुष के मुहब्बत के दावे में सबसे पहले वह वासना दिखाई देती है जो जानवरों की वासना से भी ज्यादा भौंड़ी और खुली हुई है। ... फक्कड़ पर कोई औरत हावी नहीं हो सकती। क्योंकि वह हर मर्तबा न$कद भुगतान करता है। हर वक्त राजा समझा जाता है और उसे किसी की आइन्दा मुसीबतों से कोई सरोकार नहीं होता।ÓÓ (पृ. 57) वैसे इस काम को वह बेहतर नहीं मानता, मगर एक फक्कड़ के लिए जिंदगी का एक यही पहलू बाकी रह जाता है। इसलिए यह उसकी विवशता भी है। जाहिर है, वह जहां भी मौका मिले वहीं मुंह मारने वालों में शुमार नहीं किया जा सकता।
जीवन के प्रति उसकी अपनी साफ दृष्टि है और इंसानी रिश्तों के प्रति दृढ़ निष्ठा है। इसीलिए कमियों के बावजूद अपने मुकम्मल दोस्त अनवर की अनुपस्थित में बेगम साहिबा के खुले आमंत्रण को वह कबूल नहीं कर पाता। दिमाग की गरमी को दूर करने के लिए वह अपनी अंतरात्मा को धोखा नहीं दे सकता था। वह जानता था कि दोनों किस रास्ते पर जा रहे हैं और अगले पांव कहां पडऩे वाले हैं। (पृ. 85)
अनवर साहब पूरे बनिया थे, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन वे एक आले दर्जे के इंसान थे। बेगम के और उसके (मंटो के) संबंधों को लेकर उनके दिमाग में शक सुबहे के लिए कोई जगह नहीं थी। बेगम अनवर भी उन्हीं की तरह बड़ी आजाद ख्याल औरत थी। वह उसकी इज्जत भी करती थी। आग्रहपूर्वक खिलाने-पिलाने के साथ सौ-पचास रुपए भी उसकी जेब में डाल दिया करती थी। उनके बेवा होने और रुंधे गले से शौहर के इंतकाल की खबर पर मंटो की आंखों में आंसुओं का आ जाना स्वाभाविक था गो कि रोने या सोग मनाने वालों के पास खड़ा होना उसका शगल नहीं था। (पृ. 83) जाहिर है, अनवर साहब के न रहने पर उसे दिली सदमा लगा था और बेगम के प्रति गहरी हमदर्दी थी। पर मरहूम शौहर के प्रति बेगम की बेवफाई में वह हिस्सेदार बनने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए हमेशा-हमेशा के लिए दिल्ली छोडऩे का निश्चय करता है। यह देखकर उसका दिल फटता है कि ''बेगम को अपने शौहर की रूह का भूत इतना खौफनाक मालूम होता है कि उन्होंने तहय्या कर लिया है कि चैन और सकून पाने के लिए धीरे-धीरे अनवर की वह तमाम छोटी-मोटी शौक की चीजें फेंक देंगी जो उनकी याद दिलाती है।ÓÓ (पृ. 95) प्रकट है, चीजों के बदले उस रंग रूप को देखकर मंटो हैरान ही नहीं, स्तब्ध भी है। प्रेस का मैनेजर बनाकर बेगम चाहती है कि मंटो उन्हीं के साथ रहे। मगर मंटो की रूह अपने बीवी बच्चों की जंजीरों के अलावा किसी नई बंदिश को कबूल करने को तैयार नहीं थी। (पृ. 96)
मंटो नौकर-नौकर के बीच फर्क नहीं करता। क्या पांच का क्या पचास का। इसलिए रामदीन जब उसे प्रेस का मैनेजर समझकर जमीन पर बैठना चाहता है तब वह उसे ऐसा करने से मना कर देता है। क्योंकि बेगम अनवर का निजी नौकर रामदीन भी उसे अपने जैसा ही एक जरूरतमंद गरीब भाई दिखाई देता है। अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसे नौकरी की तो जरूरत है, इसलिए वह प्रेस की मैनेजरी स्वीकार जरूर करता है, पर उसका स्वाभिमान और फ्रीलांसिंग जिंदगी की आजादी उसे भीतर तक कोचे बिना नहीं रहते। उसे लगता है, ''अनवर लाख बेइमान रहा हो, मगर फिर भी मर्द था। मैं उससे सीना तानकर बातें करता था। कभी-कभी अकड़ भी जाता था। हर तरह की खरी-खोटी सुना दिया करता था और वह बेचारा सुनता रहता था। ऐसे मामले में मेरा आज तक किसी औरत से वास्ता नहीं पड़़ा। मैं समझता हूं, औरत के सामने वैसी बेबाकी नहीं बरती जा सकती और खसूसन एक नौकर की हैसियत से।ÓÓ (पृ. 117-18) मंटो मैनेजर के रूप में काम तो शुरू करता है, पर रामदीन के भागते ही उसे भी फ्रांटियरमेल पकडऩे के लिए निकलना पड़ता है। हां निकलने के पहले वह रियासत भाई से यह कहे बिना नहीं रहता कि ''यह दुनिया बहुत गिर रही है और इंसानियत एक मजाक बनती जा रही है। ऐसे माहौल में तुम्हारे जैसे सीधे सच्चे और नेक नौजवान को तनहाई बहुत फायदेमंद साबित होगी।ÓÓ (पृ. 138) वैसे अगर रियासत भाई शादी भी कर लें तो भी उसकी फिक्र दूर हो जाएगी। हालांकि शादी एक जुआ बनती जा रही है। मगर खुदा का शुक्र है, हमारे हिंदुस्तान की सरजमीं पर फिर भी नेक लड़के-लड़कियों का अकाल नहीं पड़ा है। (पृ.वही) सिद्धांतवादी मंटो को सट्टेबाजी जैसी चीजों से नफरत है। लेकिन अतिथि की खातिरदारी उसकी फितरत में है। इसलिए न चाहते हुए भी वह लालाजी को अपने परिचित बुजुर्ग साहबान के पास ले जाने के लिए तैयार हो जाता है। उसे तो लगता है, अगर वह बुजुर्ग किसी  से खुश होकर उसे सट्टे पर दड़ा बता सकते हैं तो यकीनी रोजगारी आदमी हैं। इस ख्याल से भी उनके पास जाने के लिए उसे हां कहनी पड़ी।(पृ.106) लेकिन लालाजी की कोई भेंट वह किसी भी तरह कबूल नहीं करता। लालाजी के गिड़गिड़ाने पर वह बहुत साफ शब्दों में कहता है, ''मेरे दोस्त न मंटो किसी दरगाह का सजदानशीन है और न किसी मुरीद का पीर। यह लवा•ामात उन्हीं लोगों को रास आते हैं। प्रकट है, मंटो स्पष्टवादी और प्रगतिशील विचारों का आदमी है।ÓÓ
प्रेम में मजहब को घुसेडऩा भी मंटो को कतई पसंद नहीं है। इसलिए 'दो कौमेंÓ कहानी में वह अपनी सहानुभूति उस हिन्दी लड़की को देता है, जो मुस्लिम लड़के की मजहबी संकीर्णता को ठुकराकर उससे शादी करने से इनकार कर देती है। रियासत भाई के पूछने पर कि तुमने उस लड़के के मुकाबिले उस लड़की की हिमायत क्यों की? बड़ी बेतकल्लुफी से उसने कहा था- ''लड़का नालायक था और इसी बर्ताव के काबिल था।ÓÓ
लिखना मंटो के लिए जीवन की दूसरी जरूरतों की तरह एक जरूरत थी। इसलिए वह उसे पूरा किए बिना नहीं रह सकता था। असल में उसके जीवित रहने के लिए लिखते रहना जरूरी था। बकौल रियासत भाई के ''वह कहानी लिखता भी तब है जब राज, समाज या समाज में रहने वालों की कोई हरकत उसकी बर्दाश्त के बाहर हो जाती है। वह मजहब के नाम पर इंसान और इंसान के बीच का फासला पैदा करने वाले ढोंगियों को कभी नहीं बख्शता। उसे यह जानने की कोई जरूरत नहीं कि वह किस मजहब के हैं।ÓÓ (पृ. 87)
अपने लेखन को लेकर मंटो में कोई दंभ नहीं था। वह अपने को कोई महान रचनाकार भी नहीं समझता था, तब भी अपने लिखे के प्रति उसके भीतर अटूट विश्वास था। इसलिए जब उसकी कहानियों को अश्लील कहकर उसे जलील किया जाता था तब उसका क्षुब्ध होना लाजिमी था। इसी क्षोभ की स्थिति में उसने एक बार कहा था, ''जी करता है, मैं साहित्य छोड़कर चुंगी की दुकान कर लूं।ÓÓ शफ्फाक दिल मंटो को 'सियाह कलम मंटोÓ का फतवा देने वालों को उसका जवाब था, ''मैं तह•ाीब-ओ-तमद्दुन की और सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए यह मेरा काम नहीं, दरजियों का है। लोग मुझे सियाह कलम कहते हैं, लेकिन मैं तख़्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफेद चाक का इस्तेमाल करता हूं ताकि तख़्ता-ए-सियाह की सियाही और ज्यादा नुमाया हो जाए।ÓÓ (उद्धृत सआदत हसन बजरिए रिसायत भाई, लेखक भोलाशंकर, पृ. 12)
'लायसैन्सÓ कहानी के संदर्भ में मंटो के एक सहृदय पाठक मिस्टर नाथ की टिप्पणी भी यहां काबिले गौर है। लोग कहते हैं उन्होंने दिल खोलकर नंगी वासना का वर्णन किया है। मगर मैं कहता हूं कि अपराधी और उत्तरदायी लोगों पर पूरी-पूरी ताकत से वार करने के लिए वह फिर भी कम-से-कम नंगी भाषा से काम निकाल ले जाते हैं। अधिकतर तो इशारों से ही अपना मतलब समझाते हैं। (पृ. 52)
ऐसा नहीं कि मंटो आलोचकों की राय की कद्र नहीं करता। वह उन्हें सुनता है और पढ़ता भी है। पर समय की सच्चाई से मुंह मोडऩे वाले संकीर्ण दृष्टि लोगों की वह कतई परवाह नहीं करता। रियासत भाई से ऐसे लोगों के संबंध में वह बैलोस शब्दों में कहता है, ''ये लोग समझते हैं कि ये लोग कलम का मुंह मोड़ सकते हैं और उसके मजदूर को भूखा मार सकते हैं। इनमें से कभी किसी ने कोई कहानी नहीं लिखी। ये अंदाज भी नहीं लगा सकते कि रोल का तसव्वुर कैसे किया जाता है और फिर उसमें जान किस तरह डाली जाती है। उसे वह जैसा कुछ करे, करने दिया जाता है। राइटर तो उसी हस्ती के एक कोने में छिपा हुआ, उसके साथ-साथ चलता है। अगर वह किसी बाजारू के कोठे की तरफ लपकता है तो हमें भी खिंचे-खिंचे उसके पीछे वहीं पहुंचना होता है। अगर वह खुद संभल जाता है तो वह जाने। हम न उसे गिरा सकते हैं। न संभाल सकते हैं।ÓÓ (पृ. 44) कहना न होगा कि सहज सृजनात्मकता का सत्य ही मंटो के लिए सबसे बड़ा सत्य और कला की उपलब्धि है।
'मंटो मिला थाÓ परकाया प्रवेश क्षमता का भी एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है। रियासत भाई की काया में प्रविष्ट होकर उपन्यासकार अपने कथानायक की जिंदगी को आमने-सामने से देखता ही नहीं, उसकी रचना प्रक्रिया का भी सबसे नजदीकी गवाह बनता है। जाखल में मिले मंटो के अधिकारी पाठक नाथ की आत्मीय टिप्पणियों में भी प्रकारांतर से उसी के विचारों का बिम्ब मिलता है। इसी कारण जीवन चारितात्मक उपन्यास के रूप में भी इसमें रचनाकार की समीक्षात्मक दृष्टि अधिक उभरी है। इसलिए आश्चर्य नहीं यदि लेखक इसे समीक्षात्मक कृति या समीक्षात्मक उपन्यास कहता है।
उपन्यास की एक बहुत बड़ी सीमा यह है कि इसमें आजादी के बाद मंटो के पाकिस्तान में बिताए जीवन और उसके बाहरी भीतरी संघर्षों को कोई स्थान नहीं मिला है। इसी तरह उसके आरंभिक जीवन की झांकी भी यहां गायब है। उपन्यास की सृजनात्मकता पर उसकी आलोचक दृष्टि का हावी होना भी यहां खटकता है। तब भी शोषित पीडि़त मानवता के धरातल पर उपन्यासकार का अपने कथानायक के साथ तादात्म्य इस उपन्यास की अपनी शक्ति कही जा सकती है। इसी कारण जैसा कि उपन्यासकार ने स्वयं कहा है, 'यह मेरे देश के एक ऐसे सपूत का स्मारक है, जिसके साथ जिंदगी भर जुल्म हुआ। उसने मां की गोद में अमूल्य रत्न बिखराए परंतु उस पर पागल कहकर पत्थर बरसाए गए।Ó (प्राक्कथन पृ. 28) सांप्रदायिक सौहाद्र्र की दृष्टि से भी इसकी महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। हां यह दुर्भाग्य की बात जरूर रही है कि किसी बड़े प्रकाशक के बैनर तले प्रकाशित न हो पाने के कारण इस कृति को हिन्दू-उर्दू पाठकों के बीच न तो उपयुक्त प्रचार मिल पाया और न ही उतना महत्व, जो इसे मिलना चाहिए था।