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Saturday 18 Nov 2017

देर आयद, दुरुस्त आयद


108 त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने, गुरुबक्श की तलैया, पो.ऑ. जीपीओ, भोपाल-462001 (म.प्र.)
मो. 09425790565
जब भी किसी गजलगो का पहला गज ल-संग्रह मंज रे-आम तक आता है, पाठक और समीक्षक एक अलग नज रिए से उसकी पड़ताल करने लगते हैं। गीत और मुक्त-छंद कविताओं की लघु यात्रा के बाद, '$कदम-$कदम पर चौराहेÓ 59 वर्षीय मधुवेश की गजलों का पहला संग्रह है जिसमें उनकी नई-पुरानी 87 गजलें संग्रहित हैं।
मधुवेश गांव की पृष्ठभूमि से चलकर पहले आगरा और फिर दिल्ली जैसे महानगर में रोजी -रोटी का संघर्ष कर रहे हैं। उनके पास भांति-भांति के विपुल जीवनानुभवों की संपदा है जिन्हें वे अपने अलग-अलग शेरों में बांधने की कोशिश करते हैं। कभी वे अपने प्रयास में सफल हो जाते हैं तो कभी शेर बन नहीं पाता। लेकिन, उनके शेरों को पढ़कर यह अवश्य लगता है कि वे वर्तमान समय और समाज की विसंगतियों, विद्रूपताओं, विडंबनाओं से अच्छी तरह वाकि$फ हैं। इन $गजलों में, मधुवेश ने अपने समय और समाज की दु:ख-तकली$फ, ऊब-घुटन, आशा-आकांक्षा, जय-पराजय, असंतोष-आक्रोश और प्रतिरोध को बेहद संवेदना के साथ अभिव्यक्त करने की कोशिश की है।
मधुवेश अपने शेरों में केवल आज के आदमी की ही नहीं, बल्कि हमारे समय के पर्यावरण तक की पीड़ा को महसूस करते हैं। वे जगर-मगर, दिखावटी, आंखों को चुभने वाली रोशनी के माध्यम से रात-भर के लिए पंछियों के छिन जाने वाले बसेरे की बात कुछ इस पीड़ा के साथ नजर करते हैं-
जाने कैसे बीती होगी रात पंछियों की उस दिन
बिजली के बल्बों से जिस दिन तुमने खूब सजाए पेड़ 
मधुवेश एक लंबे समय से अपनी डोर के साथ बंधी पतंग के पारस्परिक रिश्ते को भी बखूबी जानते हैं। तभी तो वे पूरे विश्वास के साथ यह शेर कह पाते हैं-
जोर के झटके पतंगों को न दो
वो समझती हैं इशारे डोर के
मधुवेश चाहे आकाश की बात करें, चाहे आज के बाजा र की, उन्हें लगातार अपनी, अपने मूल की याद बनी रहती है। बा•ाार के ते•ा उजालों के बीच भी वे अपने जीवन से जुड़े अंधकार को कुछ यूं नजर करते हैं-
बाजारों की तेज रोशनी आंखें चुधियां देती हैं
यूं भी आ जाती है हमको याद कभी अंधियारों की
मधुवेश अपनी छोटी-बड़ी विडंबनाओं का भी $खूब मजा लेते हैं। इसी तरह अपने छोटे-छोटे सुखों के लिए भी संकोच या प्रतीक्षा करना उन्हें बिल्कुल नहीं भाता। इसी भाव-भूमि के उनके दो शेर-
सोच रहा हूं सोचेगी तो क्या सोचेगी आ$िखर वो
गोरी-गोरी दुल्हन आकार काले-काले कमरे में

हर $खुशी के वास्ते त्योहार का क्या देखना
वो नई साड़ी अटैची से निकालो आज ही

मैं समझता हूं- गजलकार मधुवेश ने अपने जीवन में हर तरह के अभाव का डटकर सामना किया है। वे परिस्थिति के अनुरूप न केवल निर्णय लेते हैं, बल्कि उस दृश्य का भरपूर आनंद भी उठाते हैं। यथा-
$खूब ये तकिया लगाया $फाइलों का आपने
और मे•ाों की बनाई चारपाई $खूब है

न जाने कहां रख दिया वो लि$फाफा
चलो बैठकर अब खंगालो किताबें

पड़े हैं मुद्दतों से जो जमी पर आस्मां ओढ़े
कभी फुटपाथियों के $ख्वाब से बिस्तर नहीं निकले
निम्न मध्यम वर्ग का आदमी भी अपनी आकांक्षाओं को मारता नहीं। कर्जा लेकर भी वो अपनी इच्छाओं को पूरा कर ही लेता है। मधुवेश का एक शेर-
कभी पंखा कभी कूलर कभी सोफा कभी टी.वी.
कि हमने इस तरह पूरे किए अरमान किस्तों में
चाहे सेंधमारी हो, चाह जेब काटना, आज के मनुष्य की पूजा-पद्धति के साथ उसका कोई तारतम्य नहीं है। इसी सदी का आदमी, या तो पूजा-अर्चना करता नहीं और अगर करता भी है तो काम की तरह। उनका एक शेर-
सुना वो जेबकतरे थे, मगर पक्के नमा•ाी थे
खुदा की बंदगी पर हो सके तो सोचना यारो
इसी तरह मधुवेश जानते हैं कि आतंकवाद को पूरी दुनिया में किस तरह जबरन एक जाति-विशेष पर चस्पा किया जारहा है। मार्मिक शेर-
बम-धमाकों से जुड़े जो दाउदों के तार फिर
देश के कितने मुसलमानों पे बिजली गिर गई

सच कई कड़वे हमारे पास बा$की हैं अभी
एक ही से आपके कानों पे बिजली गिर गई
शेर के रूप में कहने के लिए मधुवेश के पास बातें बहुत सारी हैं- और वे भी पारंपरिक गजल के फ्रेम से बाहर की अनेक बातें। बीस वर्ष से मधुवेश दिल्ली जैसे महानगर में रहते हैं तो महानगरीय आदमी की मानसिकता के विश्लेषण के भी कुछेक शेर उनके यहां मिलते हैं। जैसे-
ची$ख सुनकर बंद कर ली थीं उन्होंने खिड़कियां
और कहते हैं कि मैं आवाज देकर देखता

किसी को कौन ताकेगा शहर में खिड़कियों से अब
मकानों में जहां दीवार से दीवार मिलती है
लगता है- मधुवेश गरीबी के भोक्ता कवि हैं। इसलिए उनके पास $गरीबी पर जितने भी शेर मिलते हैं, उनकी चमक असंदिग्ध है। जैसे-
कभी मक्खी कभी मच्छर कभी बिच्छू कभी विषधर
गरीबों के घरों में मौत के सामान हैं कितने

छीन ली उस शख़्स की सारी हंसी यूं $कर्ज ने
कम हुई फिर और कम फिर अंतत: गायब हुई।
गक़ाल की भाषा को लेकर भी मधुवेश किसी संकट के शिकार नहीं है। खांटी देशज मुहावरा और शेरों की देशज खनक। हिन्दी या उर्दू के शब्दों के प्रति भी कोई विशेष आग्रह नहीं। कुल मिलाकर, मधुवेश के शेर पाठक को बेहद अपने-से लगते हैं।
लेकिन, मधुवेश की कुछेक गजलें शेरों की शक्ल में वस्तु: गीत या नज़्म ही प्रतीत होती हैं- जिनमें एक ही कथ्य आदि से अंत तक निरंतर चलता रहता है। पृ. क्र. 26 पर 'घनश्याम पैसे के बिनाÓ गजल के 15 शेर घनश्याम-कथा का विस्तार से वर्णन करते हैं। 'एक चिडिय़ाÓ, 'राजा जीÓ रदीफ की $गज़लें भी इसी कुल की गजलें हैं। मैं समझता हूं कि मधुवेश इस मंतव्य को समझेंगे और अगले गजल में इस प्रकार के अतिशय प्रयोगों से बचेंगे।
दो-तीन शेरों में मधुवेश के यहां व़ज्न और बहर से विचलन भी दिखाई देता है। जैसे-
मोरचे पर आपका यूं डटे रहना ही नहीं
वापसी का भी जरूरी है बचाना रास्ता

थामे डोर पतंगों की दो राजा बैठ दूर-दूर
देख रहे हैं लो का$गज से हाथापाई का$गज की
मधुवेश की एक गजल के दो-तीन शेरों में 'ऐबे-शुतुरगुर्बाÓ भी है। केवल एक शेर उद्धृत कर रहा हूं-
कहीं ऐसा न हो तुम जिंदगी से हाथ धो बैठो
अदालत में खड़े होकर सचाई पेश मत करिए
मेरी धारणा है कि मधुवेश अपेक्षाकृत सच्चे गजलकार हैं। वो अपनी गलतियों से सीखना भी चाहते हैं और गजल की यात्रा में आगे बढऩा भी चाहते हैं। इसलिए उनकी न्यूनतम गलतियों के लिए चिंतित होने की बहुत आवश्यकता नहीं।
लेकिन, मधुवेश कविता में झूठ नहीं बोलते। मैं मानता हूं- कविता में झूठ बोलना सबसे आसान काम होता है। मानवोचित डरों के परिप्रेक्ष्य में उनके दो शेर-
उम्र-भर मैं मौत से डरता रहा बस इसलिए
जिंदगी तेरे मुझे $कर्जे चुकाने थे बहुत

क्या जरूरी है कि उनके दु:ख न हों
जो नहीं रोते किसी के सामने
अनंत जीवन-संघर्षों के बीच, मधुवेश हताश कम ही होते हैं। वे अपनी जिंदगी के साथ-साथ अपने शेरों में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ते। यथा-
जलाते एक से इक दूसरा फिर तीसरा दीया
कभी के बंध चुके होते खुले बिस्तर अंधेरों के
आयु के हिसाब से, गल के क्षेत्र में काफी देर से आए, किन्तु, अत्यंत ही सजग, संवेदनशील और दृष्टिसम्पन्न कार मधुवेश से समकालीन हिन्दी  को काफी उम्मीदें हैं। '$कदम-$कदम पर चौराहेÓ निस्संदेह एक संग्रहणीय -संग्रह है।  ठ्ठ