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Sunday 19 Nov 2017

कुछ लोहा कुछ मोम

डॉ. ब्रम्हजीत गौतम
युक्का 206,
पैरामाउण्ड सिम्फनी
क्रासिंग रिपब्लिक, गाजियाबाद-201016
मो. 9760007838, 9643722154
काव्य की लगभग सभी विधाओं में विपुल साहित्य-रचना कर हिन्दी साहित्य को अभिवृद्ध करने वाले कवि चन्द्रसेन विराट का मुक्तक-संग्रह 'कुछ लोहा कुछ मोमÓ अपने अंदर कुल 515 मुक्तक समाहित किए हुए हैं। श्री विराट के पांच मुक्तक-संग्रह इसके पूर्व भी प्रकाशित हो चुके हैं। जैसा कि नाम से ही ध्वनित हैं, संग्रह में दो खंड हैं। पहला- कुछ लोहा, इसके अंतर्गत 264 मुक्तक हैं और दूसरा कुछ मोम, जिसके अंतर्गत 261 मुक्तक हैं। वस्तुत: मनुष्य के मन में आग आर पानी दोनों एक साथ निवास करते हैं। एक ओर यदि वह हर क्षण जीवन की खुरदुरी सच्चाइयां, कड़वाहट और व्यवस्थाजनित आक्रोशों का सामना करता है तो दूसरी ओर उसके जीवन में कुछ पल ऐसे भी आते हैं, जब वह इन सब दबावों से मुक्त होकर, जिंदगी के सारे झमेले को भूलकर कुछ पल सुख-संतोष और प्यार के वातावरण में चैन से बिताता है। जीवन युग्मों से बना है। यहां अगर धूप है तो छांव भी है, उदय है तो अस्त भी है, दिन है तो रात भी है और चढ़ाव है तो उतार भी है। एक पक्ष अगर लोहे की तरह कठोर है तो दूसरा मोम की भांति स्निग्ध और कोमल भी है। बस, इन्हीं विचारों और भावों को अभिव्यक्ति करने वाले मुक्तकों के संग्रह का नाम है 'कुछ लोहा कुछ मोमÓ।
अपने नाम और व्यक्तित्व के अनुरूप विराट जी की अनुभूतियां का वितान भी बहुत व्यापक, विस्तृत और विराट है। उन्होंने जीवन को बहुत गहराई से देखा, समझा और भोगा है, फलत: उनकी उक्तियों में दीर्घ अनुभव की ईमानदारी और सच्चाई दिखाई देती है। यही कारण है कि उनके मुक्तकों में कबीर की साखियां, रहीम के दोहों या गल के शेरों जैसी प्रभान्विति के दर्शन होते हैं। राजनीतिक सत्ता की यह विशेषता है कि वह अपने विरोधियों का वर्चस्व सह नहीं पाती। किसी न किसी हथकंडे से वह उन्हें अपने काबू में कर लेना चाहती है। इस भाव की अभिव्यक्ति के लिए कवि का यह मुक्तक देखिए।
वह उसे नापसंद करती है / तेज हो लौ तो मंद करती है
सत्ता विद्रोह वाली प्रतिभा को / अपनी बोतल में बंद करती है
सब जानते हैं कि भाव की दृष्टि से मुक्तकों में पूर्वापर संबंध नहीं होता। प्रत्येक मुक्तक दोहों या के शेरों की भांति स्वतंत्र होता है। फलस्वरूप जितने मुक्तक, उतने विषय। जिस प्रकार एक उद्यान में बहुगंधी और बहुवर्णी फूल, पौधे लताएं, कांटे आदि पाए जाते हैं, उसी प्रकार विराट जी ने भी अपनी अनुभवों, जीवन-मूल्यों और सुख-दु:खों को इन मुक्तकों की विषयवस्तु बनाया है। छोटी-छोटी चार पंक्तियों में बड़ी से बड़ी बात कह देना ही एक कुशल मुक्तककार की विशेषता है। वह भी इस खूबी से कि उसका प्रभाव हृदय को आंदोलित कर जाए। एक अति सामान्य बात भी मुक्तक के माध्यम से प्रभावपूर्ण बन जाती है। जीवन की नश्वरता पर कवि का यह मुक्तक में देखिए-
कौन कल जाएगा, किसे मालूम / किसका क्रम आएगा, किसे मालूम
दोस्तों इस भरी सी महफिल में, कौन उठ जाएगा किसे मालूम
संग्रह के दूसरे खण्ड के अधिकांश मुक्तक जीवन की कोमलकांत भावनाओं- जैसे प्रेम, देशभक्ति, मानवता, प्राकृतिक सौंदर्य आदि अनुभूतियों से सम्पन्न हैं। हालांकि यह वर्गीकरण बहुत अधिक सटीक नहीं बन पाया है। इनमें कवि की कल्पना को खूब ऊंची उड़ान भरने का अवसर मिला है। एक-दो मुक्तक देखना उचित होगा-
दिल को कुछ $गम का मजा लेने दो / अश्क-शबनम का मजा लेने दो
साथ हो तुम तो हमें बेमौसम / आज मौसम का मजा लेने दो
ब$र्फ जब गिरती हो, देखा जाये / फाहे रुई के कोई बरसाये
$खून से भीगी हुई घाटी में / कैसी पाकीजा सफेदी छाये
मुक्तकों का कोई एक निश्चित छन्द नहीं होता। इन्हें किसी भी छंद में लिखा जा सकता है। इस संग्रह के अधिकांश मुक्तक उर्दू की दो अति प्रचलित बहरों पर आधारित हैं। ये हैं- 1. $फाइलातुन मुफाइलुन $फेलुन (अर्थात स्ढ्ढस्स् ढ्ढस्ढ्ढस् स्स्) और $फाइलातुन फइलातुन $फेलुन् (अर्थात स्ढ्ढस्स् ढ्ढढ्ढस्स् स्स्)। किन्तु कुछ मुक्तकों में दोनों बहरों का मिश्रण है। उदाहरण के लिए ऊपर उद्धृत चार मुक्तकों में से प्रथम दो, बहर क्र. 1 पर तथा अंतिम दो, बहर क्र. 2 पर आधारित है। किन्तु ऐसे भी अनेक छंद है, जिनमें उक्त दोनों बहरों का समन्वय देखने को मिलता है। जैसे-
छंद है, छंद-मुक्त सर्जन है (स्ढ्ढस्स् ढ्ढस्ढ्ढस् स्स्)- बहर क्र. 1
शक्ति-पूजा का अमर प्रणयन है (स्ढ्ढस्स् ढ्ढढ्ढस्स् स्स्) - बहर क्र. 2
पीढिय़ां पढ़ के अचंभित होंगी (स्ढ्ढस्स् ढ्ढढ्ढस्स् स्स्) - बहर क्र. 2
वो निराला का निरालापन है (स्ढ्ढस्स् ढ्ढस्ढ्ढस् स्स्) -बहर क्र. 1
कहते हैं कि कवि जब लिखता है तो एक रौ में लिखता है। फलस्वरूप अपने दोषों की ओर उसका ध्यान नहीं जाता। किन्तु लिखने के बाद उसे अपनी रचना को एक आलोचक की दृष्टि से अवश्य पढऩा चाहिए और अपेक्षित सुधार करना चाहिए। ताकि यह न कहना पड़े कि-
निज नजरिये पे नाज करता है / गर्म अपना मिजाज करता है
दाद देता नहीं है आलोचक / कुछ न कुछ एतराज करता है
अथवा
उनको रचना में सुहाता क्या है / दोष देखेंगे, लुभाता क्या है
वे कसाई है ंसदा काटेंगे / काटने के सिवा आता क्या है
विराट जी ने अपने कवि-जीवन की एक लम्बी यात्रा तय की है। आज भी उनकी लेखनी अविराम है। जो लिखता है, उससे त्रुटि होना भी स्वाभाविक है। 'गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में।Ó ऐसा शायद ही कोई कवि होगा, जिससे त्रुटियां न होती हों। कभी भाव की, कभी भाषा की तो कभी छांदसिक अनुशासन की। समग्रत: विराट जी ने इन मुक्तकों में अपनी सुदीर्घ काव्य-प्रतिभा और विराट जीवनानुभवों का निचोड़ प्रस्तुत किया है। ये मुक्तक हर वर्ग के व्यक्ति के लिए प्रेरक और शिक्षाप्रद हैं। लेखनी की इस उर्वरता के लिए कवि को अशेष बधाइयां।