Monthly Magzine
Monday 20 Nov 2017

अधूरे दूरदर्शन

रमाकांत श्रीवास्तव
एल.एफ.-1/कनक स्ट्रीट
ई 8/218, तिलंगा, भोपाल-462039
मो. 9977137809
मैं ऐसी ट्रेन में पहली बार बैठा जो स्टेशन पर निर्धारित समय से पचास मिनट पहले पहुंचकर प्लेटफार्म पर खड़ी हो गई हो और सुपरफास्ट एक्सप्रेस होने के बावजूद अपने अंतिम पड़ाव पर चार घंटे विलंब से पहुंची। जगन्नाथपुरी की यात्रा के लिए मैंने वाल्साड-पुरी सुपरफास्ट एक्सप्रेस में आरक्षण करवाया था। भोपाल जंक्शन से उसके छूटने का समय सुबह 8.30 बजे है और पुरी स्टेशन पर पहुंचने का समय दूसरे दिन सुबह 10 बजे का है। भोपाल से गाड़ी किसी चुस्त खिलाड़ी की तरह रवाना हुई लेकिन पुरी पहुंचते-पहुंचते वादाखिलाफ नेता में तब्दील हो गई।
ट्रेन में पहली बार ऐसे सहयात्री से भेंट हुई जो थैले में 12-13 पानी की बोतलें लेकर चल रहे थे। अच्छी बात यह थी कि जब हमारी बोतल का पानी खत्म हो गया और हम नई बोतल खरीदने वाले थे तभी उन्होंने कहा- 'आप पानी की चिंता मत कीजिए, हमारे पास बहुत पानी है।Ó हमने थोड़ी विनम्रता दर्शाते हुए उनके उदार प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन्होंने थैले से निकालकर पानी की सीलबंद बोतल दी जो आश्वस्त कर रही थी कि पानी में बेहोशी की दवा नहीं मिली है। चोरों-लुटेरों ने भारतीय समाज के आपसी सौहाद्र्र भरे संबंधों की ऐसी-तैसी कर दी है अत: रेल विभाग की नसीहत माननी चाहिए। फिर, रेल विभाग सावधानी बरतने के परामर्श के लिए अभी तक तो कोई अतिरिक्त पैसे नहीं ले रहा है। जबलपुर से पात्रा दम्पति चढ़े थे और हमारे केबिन में सहयात्री बने। उनके सामान को देखकर दहशत हो रही थी। लगभग 30 डाक सामान तीन केबिन की सीटों के नीचे ठूंसा गया। उनके कुछ सहयोगियों, जो स्टेशन पर उन्हें गुलदस्ते देकर विदा करने आए थे, जिनमें से तीन-चार तो साथ में चल रहे थे, और 'दो नौकरोंÓ ने यह कर्मकांड बहुत ही कुशलता से सम्पन्न किया। गाड़ी रवाना होने पर जब वे आश्वस्त होकर सामने बैठ गए तो मैंने पूछा- 'आप कहीं तबादले पर जा रहे हैं?Ó
दरअसल उनकी डॉक्टर पत्नी रिटायर हुई थीं और वे गृहस्थी के पूरे साजो-सामान के साथ भुवनेश्वर जा रहे थे। वे उड़ीसा के ही मूल निवासी थे और वहां की संस्कृति के जानकार। अपनी यात्रा पर रवाना होने से पहले मैंने अपने कवि मित्र पूर्णचंद्र रथ का एक मोनोग्राफ पढ़ा था- 'विश्ववसु का समाज।Ó उन्होंने तथ्यों की जानकारी जुटाकर यह स्थापना दी है कि उड़ीसा की संस्कृति के केन्द्र में जगन्नाथ हैं जो मूलरूप से शबर जाति के देवता थे। जिन्हें ब्राह्मणों ने 'हाईजैकÓ कर लिया। पात्राजी देर तक इस संबंध में बातें करते रहे। पूर्णचंद्र रथ द्वारा प्रयुक्त 'जगन्नाथ संस्कृतिÓ शब्द से तो वे सहमत थे ही उन्होंने यह भी माना कि उसके मूल में 'विश्ववसुÓ नाम के शबर का जिक्र मिलता है। पात्राजी उडिय़ा भाषा के साहित्यि की बाबत भी जानकारी रखते हैं अत:उनका साथ मेरे लिए 'सत्संगÓ की तरह था।
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नेट पर काफी होमवर्क करके मैंने लियो कैसल बीच होटल में कमरा बुक कराया था। नाम में क्या रखा है- यह बात सच होते हुए भी ठांयदार नाम का अपना प्रभाव होता है। उस होटल के स्वागत कक्ष को रिसेप्शन के बजाय डेस्क कहना बेहतर होगा। सामान्य रूप से कल्पना होती है कि वहां कोई सुंदर युवती या स्मार्ट युवक आपका स्वागत करेगा। इसके विपरीत, मैंने जीवन में पहली बार होटल के डेस्क पर बनियाइन पहने एक पहलवाननुमा आदमी को देखा तो मन को धक्का लगा। यह भी लगा कि इस बंदे को तो अखाड़े में होना चाहिए था जहां यह अपनी बनियाइन से भी मुक्ति पा सके। उसकी एक विशेषता यह भी थी कि उसे किसी ने मुस्कुराने से मना किया था। होटल मैनेजर से फोन पर पहले ही बात करके मैंने बतला दिया था कि टॉयलेट पाश्चात्य शैली का अनिवार्य है। मुझे जो कमरा दिखलाया गया उसमें वह व्यवस्था नहीं थी। जाहिर है कि जमकर फटकारना जरूरी हो गया। तब उन्होंने पहली मंजिल के एक कमरे में यह कहकर ठहराया कि शाम को मेरी पसंद का ग्राउंड फ्लोर का कमरा मुझे उपलब्ध करा देंगे। नहा-धोकर खाना खाते इतना वक्त हो गया था कि अपरान्ह और संध्या का उपयोग केवल मंदिर देखने और समुद्र तट पर थोड़ा समय गुजारने में ही किया जा सकता था।
पुरी के लगभग सभी होटलों के कुछ प्रिय या कहें कि व्यावसायिक दृष्टि से फायदेमंद पंडे हैं। होटल व्यवसाय के नये तरीकों में, देशकाल के हिसाब से सुविधाओं का विकास हुआ है। धर्म का व्यवसाय तो वैसे भी पुराना है जो अब बाजार के साथ नए तरीके से जुड़ गया है। मंदिर देखने के लिए मैं बहुत उत्सुक था। 1957 में, जब मैं स्कूल का छात्र था तब मैं माता-पिता के साथ जगन्नाथपुरी आया था। वह हमारे परिवार और एक अन्य परिवार के साथ की गई तीर्थयात्रा थी। अम्मा और दद्दाजी पर उस तीर्थयात्रा का जीवनभर प्रभाव रहा। अपनी रसोई में बने दाल-भात का भोग ही अम्मा अपने ईष्ट को अर्पित करती थीं।
उस यात्रा में हमारे परिवार ने जगन्नाथ मंदिर, स्वर्गद्वार, सागर तट, साक्षी गोपाल और भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर देखा था। वह यात्रा परिचित परिवार के पंडाजी के सौजन्य से सम्पन्न हुई थी। कोणार्क का सूर्यमंदिर तब इतिहास के अध्येताओं और पुरातत्वविदों के आकर्षण का केन्द्र रहा होगा। तीर्थयात्रियों के लिए शायद नहीं। तब तक सूर्यमंदिर विश्व धरोहर में भी शामिल नहीं था।
होटल के वेटर ने एक पंडा महापात्रा जी का नम्बर दिया। फोन पर महापात्रा जी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि जब आप मंदिर के द्वार पर पहुंचें तो मुझे फोन कर लीजिए। मैं वहां आपसे मिल लूंगा। शहर की सबसे अच्छी सड़क मंदिर वाली है। क्यों न हो! आखिर वी.वी.आई.पी. के लिए बनी है। भगवानजी को मौसी के घर जाना होता है। धरती के वी.आई.पी.लोगों का आना-जाना भी लगा रहता है। और इन वी.आई.पी. की करतूतों से त्रस्त भक्तिभाव से भरे लाखों-करोड़ों सामान्यजनों का भी जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए जाना होता है। उनकी प्रार्थनाओं में इन वी.आई.पी. जनों द्वारा  निर्मित शोषण और विषमता भरी सामाजिक संरचना में अपने लिए न्यूनतम आवश्यकताओं की प्राप्ति से मिलने वाले सुख को पाने की आशा है। मंदिर से काफी पहले सवारी रोक दी जाती है और मंदिर तक पैदल जाना होता है। व्यवस्था की दृष्टि से यह ठीक भी है। अच्छा होता कि उतने इलाके में बाजार भी न होता ताकि मंदिर की भव्यता का आभास हो पाता लेकिन यह शायद कभी भी संभव नहीं था और अब तो बाजार की डंकाध्वनि के सामने सब कुछ नगण्य है। दर्शनार्थियों के लिए यह श्रद्धा का केन्द्र और पंडे-पुरोहितों के लिए कमाई का साधन है किन्तु यह भारतीय कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण संरचना है।
कई दशकों के बाद मंदिर को देखकर लगा कि चारों तरफ से दबकर मंदिर सिकुड़ गया है। किसी भी कोण से उसका पूरा भव्य आकार देखना संभव नहीं है। उसे अब मंदिर की तस्वीरों में ही देखा जा सकता है। मंदिर के द्वार तक पहुंचने के पूर्व ही एक मध्यवय के धोती-कुरता-तिलकधारी सज्जन बगल में साथ चलने लगे थे। वे 'कहां से आएÓ से शुरू होकर गोत्र तक पहुंचे। यह भी जड़ दिया कि मध्यप्रदेश से आने वाले जजमानों का पंडा मैं ही हूं।Ó मैंने म•ाा लेते हुए कहा कि हमारे पंडा जी मंदिर द्वार पर हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। तब उन्होंने अंतिम कोशिश की- 'मैं आपको अच्छी तरह घुमा दूंगा। पचास रुपए दे दीजिएगा।Ó जब इस पर भी बात नहीं बनी तो अपना कार्ड थमाकर कहा- 'कभी किसी को पुरी आना हो तो उन्हें मेरा नंबर दे दीजिएगा।Ó बंदा शरीफ था।
मंदिर द्वार पर महापात्राजी प्राप्त हुए। गदबदे शरीर के, सांवला रंग, धोती पहने, उघारे बदन और लंबे बालों वाले महापात्रा विनम्र मुस्कुराहट के साथ मिले। बातचीत में भले आदमी लगे। भीड़-भाड़ तो वहां हर दिन की बात है अत: सुरक्षा व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है। पांच दशकों में दुनिया कितनी बदल गई है इसका आभास हर जगह होता है। इसी मंदिर में कभी हमारे परिवार ने निद्र्वन्द्व भाव से प्रवेश किया था। आज तो यह सुरक्षा व्यवस्था बेहद जरूरी है। धर्म का स्थूल रूप मनुष्य को क्रूर और मानव-विरोधी बनाता है। कट्टर पंथ के रास्ते पर चलने के इच्छुक हमारे भी कुछ संगठन हैं। सहिष्णुता के मुद्दे पर कुतर्क करके अपने मुंह मियां-मिट्ठू बनना अलग बात है। मोबाइल फोन और जूते-चप्पल रखने की व्यवस्था ठीक है। महापात्रा जी ने मंदिर द्वार के सामने स्थापित गरुड़ स्तंभ के विषय में बतलाना शुरू किया तो मैंने उनसे कहा- 'महापात्रा जी, इसका इतिहास और मंदिर का इतिहास हमें मालूम है। दर्शन तो आप कराएंगे ही, हमारी रुचि मंदिर की कला और उसकी कार्यप्रणाली जानने में है।Ó महापात्रा कुछ अप्रस्तुत हुए। हैरानी से विचित्र जजमान को देखा फिर बोले- 'जी... आप जैसा कहें। आइए।Ó
पूर्णचंद्र रथ ने अपने मोनोग्राफ में लिखा है- 'वस्तुत: जगन्नाथजी उड़ीसा के आदिवासी जनसमुदाय के देवता हंै। विश्ववसु के शबर समाज के देवता जो कालांतर में कलियुग के प्रथम आराध्य देव के रूप में समूचे विश्व में समादृत हुए।Ó धार्मिक ग्रंथों और जनश्रुतियों में विभिन्न उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए इस कहानी की कई वाचनाएं हैं। शबर जाति के मुखिया विश्ववसु के रहस्यमय इष्टदेव नील माधव के विषय में जानकारी पाने के लिए अवंति के राजा इंद्रद्युम्न ने ब्राह्मण विद्यापति को विश्ववसु के पास भेजा था। एक किंवदंती कहती है कि विश्ववसु की पुत्री से विवाह करके विद्यापति ने रहस्य को जानना चाहा किन्तु सफल नहीं हुए। फिर राजा स्वयं आया और फिर कैसे 'ब्रह्मदारूÓ के लट्ठे से मूर्तियां बनी- यह कहानी ग्रंथों और लोकमुख में अपने-अपने ढंग से विकसित हुई। कहते हैं कि यह भी अनुबंध हुआ था कि कलयुग के देव जगन्नाथ के पुजारी विद्यापति के वंशज होंगे और शबर समाज के सदस्य मंदिर के सेवादार का काम संभालेंगे।
भगवान जगन्नाथ की कहानी की किस वाचना पर पंडे विश्वास करते हैं? क्या मंदिर की व्यवस्था में पुजारी और सेवादारों की वही परंपरा जारी है? मेरे इन प्रश्नों से महापात्रा जी को कुछ प्रयोजन नहीं था। वे बतला रहे थे कि मंदिर के दो तरह के प्रसाद हैं। दाल-भात के प्रसाद के लिए तो कहावत प्रसिद्ध है- 'जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ।Ó दूसरा प्रसाद पत्तों से बनी दलिया में पक्की सामग्री वाला है जिसे दर्शन के समय पंडाजी जगन्नाथ जी को अर्पित करके शेष श्रद्धालु को दे देते हैं। दर्शनार्थी उसे अपने साथ ले जाते हैं। रुपये 350/- में डलिया खरीद कर जब दीपा पंडा जी के साथ, मंदिर के भीतर जाने लगीं तो मुझसे पूछा- 'आप चलेंगे भीतर?Ó मैंने हामी भरते हुए कहा- 'जरूर चलूंगा। तुम्हारे भगवान से न मेरी दोस्ती है और न ही दुश्मनी। फिर मंदिर की नाट्यशाला और गर्भगृह को देखने की इच्छा है और मूर्ति को देखने की भी।Ó
मंदिर के भीतरी हिस्से का कुछ भाग पेंट कर दिया गया है जिसके कारण पत्थर का अपना सौन्दर्य दब सा गया है। शायद जलवायु से उसकी सुरक्षा के लिए ऐसा किया जाता हो। अंदर धक्का-मुक्की वाली भीड़ थी। कुछ अन्य प्रसिद्ध मंदिरों में पंक्ति बनाकर जिस तरह भीड़ को अनुशासित किया जाता है, वैसा यहां नहीं दिखलाई दिया। कम से कम, उस दिन तो नहीं! दर्शन के लिये गर्भगृह की ओर उमड़ती भीड़ का न•ाारा देख कर उड़ीसा की गरीबी का आभास होता है। अधिकतर पस्तहाल लोग थे जिनके चेहरों पर दीनता चिपकी थी। भगवान की कृपा के आकांक्षी भक्त, हाथ जोड़े हुए चिपचिपाती गर्मी वाले गर्भगृह की ओर एक-दूसरे को धकियाते हुए बढ़ रहे थे। थके हुए लडख़ड़ाते बुजुर्गों, कांपती हुई विधवाओं के चेहरों पर आत्मनिवेदन की उत्कंठा थी। अपने धर्म का भीषण घोष करते हुए खुद भगवान के रक्षक बनने का ढोंग पालने वालों से दर्शनाभिलाषी भक्त भिन्न हैं। हजारों साल के संस्कारों ने इन्हें यही सिखाया है कि जगन्नाथ के दरवाजे से कोई निराश नहीं लौटता। जिस समाज की व्यवस्था में साधनहीन के लिए कोई भविष्य नहीं और उस स्थिति के लिए पूर्वजन्म के कर्मों का फल मानने के उपदेश दिये गए वहां शोषित-वंचित और कहां जायेगा। खेती उजड़ गई, सर पर कर्•ो, रो•ागार नहीं, रिश्तों का भरोसा नहीं उनकी निराशा का संबल और क्या है? पांच सौ साल पहले तुलसीदास ने अपने इष्ट से प्रार्थना की थी कि दरिद्रता का जो दानव दुनिया को दबा रहा है उसका संहार करो। हमारी आज की व्यवस्था भी निष्प्रयोजन कर्मकांड में और सत्ता कागजी आंकड़ों में बेशर्मी से उलझी है। दीन भक्तजनों के अलावा अपने कुकर्मों के लिये देवी कवच पाने के विश्वासी भी तीर्थों की भीड़ में उपस्थित होते हैं।
गर्भगृह की देहरी के कुछ पहले ही भीड़ रोक दी गई। दर्शनार्थी उचक-उचक कर, एडिय़ां उठा कर इष्ट देव की मूर्ति देखने के लिए एक-दूसरे से रगड़ खा रहे थे। पंडा जी ने वहीं रुकने का इशारा किया और स्वयं वहां से चले गये- संभवत: पंडों के लिये बने किसी पाश्र्व द्वार की ओर। इस आधे-अधूरे दर्शन लाभ की प्राप्ति लोगों को कितना संतोष दे रही थी यह तो वही जानें। बाद में यह जरूर मालूम हुआ कि निकट दर्शन के लिये भी दिन में कुछ समय निर्धारित है जिसका लाभ पचास रुपये (संभवत:) का टिकट लेकर लिया जा सकता है। कुछ देर में ही पंडाजी प्रसाद की डलिया लेकर आ गये। उन्होंने ईमानदारी से मंदिर के मुख्य द्वार तक हमें छोड़ा। उसके पूर्व उन्होंने मंदिर परिसर के अन्य द्वार दिखलाए और मंदिर की रसोई बाहर से दिखलाई यह बतलाते हुए कि एक के ऊपर एक हंडियां रखकर दाल-भात बनाने की पाक विधि पुरी के मंदिर में ही है। इस अधूरे दर्शनलाभ के बाद हम लोगों ने तय किया कि शाम का शेष समय गोल्डन बीच पर बिताया जाय। बीच का दृश्य लगभग वैसा ही था जैसा अन्य समुद्र तटीय शहर में होता है। फर्क केवल इतना है कि यहां टूरिस्ट जैसे दिखलाई देने वाले कम लोग थे। तीर्थयात्रा का लाभ लेने वाले लोगों का यह सागर दर्शन था। मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा उन्हें 'स्वर्गद्वारÓ तक खींच लाती है जो गोल्डन बीच कहे जाने वाले सागर तट से लगा हुआ आगे का समुद्री किनारा है। पूरी का प्रसिद्ध बीच तो वही है। गोल्डन बीच से लगी सड़क की दूसरी तरफ  होटल बने हैं- तारांकित और बिना तारों वाले। नगर का सबसे गुल•ाार इलाका शायद यही है।
बीच पर थोड़ी चहलकदमी के बाद होटल लौटने के लिए हमने रिक्शा किया। पुरी में जींस और टी शर्ट पहने रिक्शेवाले मुझे नहीं दिखलाई दिए जो आजकल मजदूर वर्ग की नई पीढ़ी की भी पोशाक है। चाय पीने की बलवती इच्छा थी अत: अपने रिक्शेवाले से कहा- 'यार, सड़क के किनारे किसी ठेले पर अच्छी चाय पिलवा सकते हो।Ó उसने कुछ आगे चलकर रिक्शा रोककर कहा- 'यहां अच्छी चाय मिलेगी।Ó मैंने रिक्शा से उतरकर कहा- 'आओ, तुम भी चाय पी लो।Ó सड़क के उस पार लहराता हुआ समुद्र था और इस पार चाय की गुमटी की बेंच पर बैठकर हम चाय पी रहे थे। मैंने रिक्शेवाले से पूछे- 'यहां तुम लोगों का यूनियन है?Ó
'हां साहब, तीन यूनियन हैं। मैं भी मेम्बर हूं। रिक्शेवाले ने कहा।Ó
'किस-किस पार्टी का यूनियन है?Ó मेरे इस प्रश्न से वह थोड़ा हैरान सा दिखा। थोड़ी देर चुप रहकर उसने थोड़े कंधे उचकाकर कहा- 'ये तो मेरे को नहीं मालूम।Ó यह मेरे लिए हैरानी की बात थी।
'यूनियन तुम लोगों की मदद करता है?Ó
'हां, कुछ टूट-फूट होने पर सहायता करता है।Ó
अधूरी जानकारी वाले रिक्शा चालक ने हमें दस मिनट में ही होटल पहुंचा दिया तब लगा कि किसी शार्टकट से हमारा होटल गोल्डन बीच से अधिक दूर नहीं था। लौटने पर होटलवाले ने मेरा कमरा बदल दिया जो ठीक-ठाक था। कमरा, उससे लगा छोटा सा कारीडोर, बगीचा, लॉन और सौ गज पर दिखलाई देने वाले समुद्र का फुल व्यू। और हां, इस कमरे में पाश्चात्य शैली का कमोड था! सुबह एक आश्चर्य के साथ हमारी नींद खुली। पक्षियों का कलरव और कौवों की कांव-कांव! पांच वर्षों के बाद सुनी। चार अक्टूबर की तारीख थी और पितर पाख चल रहा था। कौवे शायद किसी के पुरखों को तारने के लिए अपना भाग स्वीकार करने आए थे। सागर तट पर उड़ते हुए जलपाखी! यह आंखों को सुख देने वाला दृश्य था।
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हमने दूसरे दिन कोणार्क और भुवनेश्वर जाने का कार्यक्रम बनाया था। होटल वाले से ही हमने टैक्सी की व्यवस्था करने के लिए कहा था। जिस व्यक्ति से बात करके टैक्सी तय की, बाद में मालूम हुआ कि वह टैक्सीवाला नहीं बल्कि दलाल था जिसकी होटलवाले से सेटिंग थी। हमने कहीं भी चर्चा न करके, होटल वाले का भरोसा करके गलती की थी। जब टैक्सी ड्राइवर से हमारी बात हुई तब पता चला कि दलाल ने अच्छा खासा चूना हमें लगाया था।
हमारे कहे अनुसार टैक्सी सुबह नौ बजे आ गई। ड्राइवर अज्जू यानी अजय पढ़ा-लिखा जवान आदमी था- बहुत शिष्ट-शांत स्वभाव का। रास्ते में उसने खुद ही पूछा, 'आपसे देवराज (दलाल) ने कितने में सौदा पक्का किया?Ó बातों में मालूम हुआ कि यदि एजेंसी या ड्राइवर से सीधी बात की होती तो हमारे पांच सौ रुपए बच सकते थे। मैंने सोचा कि कहावत सही है कि हम अपनी गलतियों को ही 'अनुभवÓ का नाम देते हैं। अजय ने विनम्रतापूर्वक कहा कि इस बाबत मैं उससे कुछ न कहूं वर्ना उसके माध्यम से ग्राहक मिलने बंद हो जाएंगे। फिर उसने कहा- 'सर, जब तक आप यहां है, कहीं जाना हो तो आप मुझे सीधे फोन कर लें। मैं आपको वाजिब रेट पर ले चलूंगा।Ó
'हमें परसों चिल्का लेक जाना है। कितना पैसा लगेगा?Ó मैंने पूछा।
'नौ सौ रुपए। जितने समय और आप जहां चाहेंगे गाड़ी रुकेगी।Ó
बात मेरी समझ में आई। दलाल महोदय ने चिल्का के लिए पंद्रह सौ बतलाया था। मैंने अजय से कहा- 'परसों सुबह साढ़े नौ बजे आ जाना।Ó
कोणार्क के रास्ते पर ही चंद्रभागा बीच पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। यह सागर तट दर्शनीय है। यदि आप ऐसे दिन वहां पहुंचते हैं जब धूप खिली हुई है तब तो क्या कहना! हमारी पुरी यात्रा में यह सबसे नयनाभिराम दृश्य था। सागर का नीला जल वही होता है, लहरों के टूटने से उठता झाग वही होता है, रेतीले तट पर विनम्र भाव से आकर लौटती लहरें वही होती हैं, मंडराते हुए वही जलपाखी होते हैं कि लगता है प्रकृति ने यहां कविता रची है। एक घंटा वहां रुककर और नारियल पानी पीकर हम लोग कोणार्क की ओर रवाना हो गए।
कोणार्क सूर्य मंदिर की भव्यता आपको तुरंत अपने प्रभाव में ले लेती है। मंदिर के विशाल परिसर में घूमते हुए आपको लगेगा कि इतिहास लगातार आपका पीछा कर रहा है। मैंने वर्षों पहले जगदीशचंद्र माथुर का नाटक 'कोणार्कÓ पढ़ा था। उसकी कहानी हांट करती है। ऐतिहासिक धरोहरों के विषय में पुराण कथाएं राजाओं-महाराजाओं के आसपास दैवी आभा निर्मित करती हैं जबकि लोक में प्रचलित कहानियों में कहीं न कहीं तत्कालीन व्यवस्था में द्वंद्व की ओर इंगित उपस्थित है। तेरहवीं सदी में निर्मित यह मंदिर किन्हीं तकनीक की त्रुटियों, आर्थिक- सामाजिक-राजनैतिक कारणों से खंडित होने लगा था। राजा नृसिंह देव ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। बेशक, उन्हें याद किया जाना चाहिए किन्तु इस कलाकृति का निर्माण किसने किया? हमारी चेतना और इतिहास दृष्टि में वे कहां हैं? कहते हैं कि बारह हजार शिल्पियों ने बारह वर्ष की अवधि में इसे बनाया। वास्तुविदों और शिल्पियों की कला के सामने नतमस्तक हुए बिना कोई कलाप्रेमी यहां से वापस नहीं लौट सकता। अपने संपूर्ण आकार में इस बेमिसाल मंदिर की संरचना कितनी भव्य और सुंदर रही होगी इसकी कल्पना करने के लिए भी गहरी कलात्मक संवेदना चाहिए। मंदिर की कलात्मक दीवारों पर एक भरा-पूरा संसार है। मनुष्य जीवन की विभिन्न छवियां यहां है। बरात और उत्सव के दृश्य हैं तो युद्ध के लिए सन्नद्ध सेना है। प्रेम और संभोग की मुद्राएं हैं। मिथुन मूर्तियों में संभोगरत विदेशी आकृतियां दिखलाई देती हैं। संभवत: गणिकाओं के यहां आने वाले विदेशी व्यापारी और सैनिकों को दर्शाया गया है। वनस्पतियां, पशु-पक्षी सभी कुछ यहां है। तत्कालीन नागरिक जीवन के कई पहलू वहां देखे जा सकते हैं। भारतीय जीवन के उत्सव और नृत्य -संगीत की एक दुनिया यहां मौजूद है। आधुनिक काल के कलाकारों ने नृत्य की इन मुद्राओं से प्रेरणा ली। नाटकों और फिल्मों के ड्रेस डिजाइनर्स ने अपनी कृतियों को सजाया। कला के ग्रंथों पर शोध करने वालों के लिए ये आधार बने। भारतीय शास्त्रीय और लोक वाद्यों पर कोई भी शोधकार्य प्राचीन हिन्दू मंदिरों और बौद्ध विहारों की मूर्तियों और चित्रों के संदर्भों में बिना अपूर्ण हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कोणार्क मंदिर के विषय ऐसी टिप्पणी की है कि मनुष्य की भाषा की तरह पत्थरों की भी भाषा होती है।
मंदिर परिसर में सूर्यरथ के सात घोड़ों में एक ही घोड़ा शेष बचा है। बारह जोड़ी रथचक्रों और सात घोड़ों की आकृतियों के साथ इस संरचना के उदात्त सौन्दर्य की कल्पना ही की जा सकती है। अपने वास्तुदोषों और आक्रमणकारियों के धर्मोन्माद के कारण मंदिर नष्ट होता गया। एक ऐसा भी समय आया कि उसके साथ ही नगर और बंदरगाह भी नष्ट हो गया और चारों तरफ जंगल उग आया। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे ही काल का अकुंठ नृत्य कहा है। इस बिन्दु पर आकर यह सत्य स्वीकार करना चाहिए कि अंग्रेजी हुकूमत ने भारत का शोषण किया और उसके गौरव को पददलित किया किन्तु उन्होंने इतिहास और पुरातत्व के शोध की वैज्ञानिक प्रविधि विकसित की। आधुनिक संग्रहालयों की स्थापना की और कई महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थलों और ग्रंथों को पुन: प्रकाश में लाने का काम किया। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के महत्वपूर्ण कार्य की शुरूआत की। समय के थपेड़ों को सहकर, अपने शेष कला संसार के साथ अब कोणार्क का यह मंदिर 'विश्व धरोहरÓ है।
सूर्य मंदिर के परिसर से बाहर आने पर अनुभव होता है कि पुराकथाओं, इतिहास, सामंती व्यवस्था में कलाकारों के द्वन्द्व की एक फैन्टेसी से बाहर आ गए हैं। जैसे टाइम मशीन से अतीत के धुंधलके में सैर करके वापस वर्तमान के आलोक में लौटना। इस सवाल के साथ अपनी कीर्ति की पताका फहराने के अभिलाषी तथाकथित प्रतापी नरेशों ने मंदिर बनवाने के लिए यदि अपना खजाना खाली कर दिया होगा तो सामान्यजन का जीवन कैसा रहा होगा? साथ ही यह कि शिल्पियों की सौन्दर्य चेतना और सधे हाथों के कौशल से निर्मित इस मंदिर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित रहा होगा। आज के जीवन का विद्रूप फिर वही है। आज जब यह संस्मरण लिख रहा हूं तब धर्म के ठेकेदारों और समाजशास्त्रियों में यह बहस जारी है कि सिंगनापुर के शनि मंदिर में एक महिला द्वारा देवमूर्ति की पूजा धर्मविरुद्ध है या नहीं!!!
भुवनेश्वर की ओर टैक्सी ड्राइव करते हुए अजय बतलाता है कि अधिकतर पढ़े-लिखे लोग उड़ीसा से बाहर चले जाते हैं क्योंकि यहां रोजगार के अवसरों का अभाव है। खुद अजय कम्प्यूटर का जानकार है और वह बंगलोर में एक कंपनी में नौकरी कर रहा था। घरेलू परिस्थितियों के कारण उसे लौटना पड़ा। ड्राइविंग सीखकर अब वह टैक्सी ड्राइवर बन गया है। बैंक से फाइनेंस कराकर खुद की टैक्सी लेने की स्थिति में वह नहीं है। स्वयं की राम कहानी से बाहर निकलकर उसने कहा- 'अभी अपन रास्ते में पडऩे वाले धौलगिरि स्थान पर चल रहे हैं जहां भगवान बुद्ध का मंदिर है।Ó छोटी पहाड़ी पर स्थित बुद्ध की मूर्ति और स्तूप की सुन्दरता और स्वच्छता देखकर अच्छा लगा।
भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर के कलात्मक वैभव ने एक बार फिर से चमत्कृत किया। मंदिर की दिलकश नक्काशी इतनी बारीक है कि लगता है जैसे कागज पर पेंसिल से डिजाइन बनाई गई हो। पीठिका से लेकर शिखर तक की नक्काशी आश्चर्यचकित करती है। शिखर को देखकर आज से हजार वर्ष पहले की भारत की तकनालाजी के प्रति आदर भाव उत्पन्न होता है। गर्भगृह में विशाल शिवलिंग को घेरे पंडे-पुरोहित जजमानों के हाथ पकड़कर लगभग जबरन संकल्प करवाने की फिराक में दिखे। फिर भी कहना होगा कि पुरी और भुवनेश्वर के पंडे अन्य स्थानों की अपेक्षा विनम्र है। फर्श की चिपचिपाहट पर सावधानीपूर्वक कदम जमाते हुए हम जल्दी ही बाहर आ गए। होटल वापस लौटने पर अजय ने पूछा- 'सर, चिल्का लेक कब जाएंगे?Ó
'परसों जाएंगे साढ़े नौ बजे। कल शाम तुम्हें फोन करेंगे। चिंता मत करो। दलाल से इस संबंध में कोई बात हम नहीं करेंगे।Ó
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तीसरा दिन हमने अपने कमरे में और होटल के सामने वाले बीच पर बिताया। होटल का रेस्टोरोंट वैसे भी सात बजे के बाद सक्रिय होता था। बीच पर छोटी-छोटी चाय की झोपड़ीनुमा गुमटियां हैं और वहां चाय बढिय़ा बनती है। इनमें दो-तीन ऐसे भी टी स्टॉल थे जिनके सामने फाइबर की पांच-छ: कुर्सियां भी रखीं थी। ऐसे ही एक स्टॉल पर हम सुबह साढ़े छ: बजे पहुंच गए। आसपास के कुछ बीच होटल में टिके लोग भी अपनी सुबह सार्थक करने वहां मौजूद थे। चाय का आर्डर देकर हम कुर्सियों पर बैठकर समुद्र की लहरों की सुंदरता देखते रहे। हमसे बायीं तरफ अपने जाल फैलाए और समुद्र में मत्स्याखेट के लिए तैयारी करते मछुआरों की हलचल थी। हमारी आराम की मुद्रा के बरक्स वहां जीवन संग्राम की श्रमशीलता थी। दोपहर के आराम के बाद शाम का समय हमने फिर समुद्र तट पर बिताया। मनुष्य की तरह समुद्र भी दिन के विभिन्न पहरों में अपनी मुद्राएं और मेकअप बदलता है। शाम को समुद्र ठीक वही नहीं होता जो सूर्योदय के समय होता है। एक मजेदार दृश्य यह देखा कि शाम को कुछ लोग बैठने के लिए कुर्सियां किराए पर दे रहे थे। प्रति कुर्सी बीस रुपए देकर आप रेत पर बैठने वालों को तुलना में अधिक सुविधाग्रस्त समझ सकते हैं क्योंकि उन पर बैठने के बाद समझ में आएगा कि कुर्सियां आरामदेह नहीं है। हमने दो कुर्सियां लीं और डेढ़ घंटे उन पर बैठकर पूरा पैसा वसूल किया। यह सागर तट अधिक भीड़-भाड़ वाला नहीं था लेकिन चायवाले, झालमुड़ी वाले, ऊंट वाले, मालिश वाले यहां भी थे। कुछ लड़के-लड़कियों के दल सप्ताहांत की मौज-मस्ती और सुरक्षित मेल-मिलाप को सम्पन्न कर सकने की सुविधा का लाभ उठाते भी दिखे। मध्य वर्ग के युवाओं की संख्या अधिक दिखलाई दी। होटल लौटकर अजय को फोन किया। अजय ने आग्रह किया कि वह टैक्सी होटल को कुछ दूर सड़क पर खड़ी रखकर फोन करेगा और हम कुछ कदम चलने का कष्ट करें।
सुबह साढ़े नौ बजे हम चिल्का झील की ओर रवाना हो गए। पुरी से चिल्का की ओर जाने वाला रास्ता ग्रामीण क्षेत्र से होकर जाता है। स्कूल ड्रेस में साइकिल पर स्कूल जाती लड़कियों को देखना मुझे भाता है। अजय ने बतलाया कि सरकारी स्कूल ही अधिक हैं और उनमें पढ़ाई का स्तर अच्छा है। चिल्का झील के मोटर बोट क्लब पर पहुंचकर निराशा हुई। हमारे मन में कल्पना थी कि सुंदर बंधे घाट, रेस्टोरेंट और चहल-पहल का वातावरण होगा। भोपाल की बड़ी झील का बोट क्लब बहुत खूबसूरत स्थान है उसकी तुलना में चिल्का का यह नौका केन्द्र और झोपड़ीनुमा रेस्टोरेंट बहुत दीनहीन न•ार आ रहे थे। फिर भी चिल्का तो चिल्का है। ग्यारह सौ किलोमीटर के विस्तार की एशिया की सबसे बड़ी लेगून। एक टेबल-कुर्सी डालकर बैठे सज्जन चिल्का विकास प्राधिकरण के कर्मचारी या एजेन्ट लगे जो पर्यटकों के नौका विहार के लिए नाव तय करके रसीद काट रहे थे। उनसे मालूम हुआ कि मशीन बोट से घूमने के लिए चार पैकेज हैं जो एक हजार नौ से शुरू होते हैं। हमने चौबीस सौ वाला पैकेज चुना जिसमें डॉल्फिन दर्शन, आइलैंड, रेड क्रैब, सी माउथ और त्रिदेव मंदिर तक लगभग 66 किलोमीटर की सैर का प्रावधान है। यह लगभग 3 घंटे का नौका विहार है जिसमें बोटवाला नाविक ही आपका फ्रेंड, फिलासफर भले ही न हो पर आपका गाइड जरूर होता है। उसे फ्रेंड बना लेने पर वह पर्यटक के प्रति अधिक सम्मान भाव रखता है और फ्रेंड बनाने का सर्वाधिक प्रचलित और अचूक तरीका है वार्तालाप जिसका प्रयोग मैं अपनी यात्राओं में अवश्य करता हूं।
नौका विहार के पूर्व बतलाया गया कि यदि लंच लेना है तो रेस्टोरेंट में आदेश अभी देना होगा। कहा गया है कि इस झील की मछलियां और झींगे स्वादिष्ट होते हैं। हमने भात झींगाकरी और सलाद का आर्डर एक रेस्टोरेंट में नोट कराया और निर्दिष्ट मशीन बोट में सवार हुए। अगले तीन घंटों तक शनिदेव हम पर कृपालु रहे। दरअसल हमारे खेवनहार का नाम सनीचर था जो हंसमुख, हट्टे, कट्टे अधेड़ अवस्था की ओर बढ़ते व्यक्ति थे। पुराण कथाओं के विपरीत सनीचर हंसमुख और सद्भाव से भरे हुए थे। आश्वस्तकारी। बोट रवाना होने से पहले एक और व्यक्ति आकर सनीचर के पास बैठ गया। बोट की मशीन चालू करके सनीचर ने हमें बतलाया कि पहले हम डॉल्फिन देखने जा रहे हैं। क्योंकि मशीन की कमान सनीचर के हाथ में थी अत: मैंने दूसरे सज्जन को अपने पास आकर बैठने का इशारा किया। जब वे सामने आसीन हो गए तो मैंने पूछा- 'आप सनीचर जी के पार्टनर हैं क्या?Ó
'नहीं... मैं तो कुछ समय बाद वहां उतर जाऊंगा।Ó उन्होंने दूर दिखलाई देती जमीन की तरफ इशारा किया। वह मेनलैंड का ही हिस्सा था जो अंतरीप की तरह झील में दूर तक चला गया है। नारियल, सुपारी और केले के वृक्षों की हरियाली के बीच बंगलेनुमा कुछ भवनों के आकार न•ार आ रहे थे। एकाएक मुड़कर एक तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा- 'उधर देखिए सर, डाल्फिन! यहां से उनका इलाका शुरू हो गया है।Ó मैंने अपने मोबाइल का कैमरा आन किया। डॉल्फिन की पूंछ का ऊपरी हिस्सा दिखलाई दे रहा था। कुछ क्षणों के उपरांत गोता लगाने के लिए जब वह थोड़ी ऊपर आई तो उसकी पीठ दिखलाई दी। कुछ दूर पर एक दूसरी डॉल्फिन का सिर न•ार आया। झील के उस इलाके में हमारी बोट लगभग आधे घंटे तक रही फिर विपरीत दिशा में मुड़ गई। सामने बैठे सज्जन ने कहा- 'अब बोट एक आईलैंड और बे ऑफ बंगाल के मुहाने तक जाएगी।Ó स्वाभाविक जिज्ञासा से मैंने पूछा- 'आप क्या करते हैं?Ó
'सर, मेरा नाम देवेन्द्र जेना है। मैं चिल्का डेवलपमेंट कारपोरेशन में नौकरी करता हूं।Ó उन्होंने फिर इशारा किया- 'वो वहां मेरा ऑफिस है। मैं वहां उतर जाऊंगा।Ó
'आप किस पद पर हैं?Ó मैंने पूछा।
'मेरा पदनाम है टाइड गेस। समुद्री लहरों के उतार-चढ़ाव पर न•ार रखने का काम है।Ó जेना ने मुस्कुराते हुए कहा- 'आप कह सकते हैं कि मैं लहरें गिनने का काम करता हूं।Ó
मुझे लगा कि इस लेगून का ऐसा जानकार मुझे और कहां मिलेगा। मैंने जानना चाहा कि चिल्का झील के एक विशेष क्षेत्र में ही डॉल्फिन क्यों दिखलाई देती है? जेना जी ने बतलाया कि यह स्थान उनका प्रजनन क्षेत्र है इसलिए डॉल्फिन को पसंद है। निगम की ओर से सुरक्षा का ध्यान रखा जाता है और उनकी गिनती भी की जाती है। अभी इनकी संख्या 156 है और वे झील के इस हिस्से में ही रहती हैं वरना यह झील कहीं-कहीं तो तीन-चार फुट ही गहरी है। दूर जहां मछली पकडऩे के जाल लगे थे, उस तरफ इशारा करते हुए बोले- 'वहां देखिए, जाल के पास ही मछुआरा पानी में खड़ा है। देखिए, पानी उसकी कमर तक ही है।Ó
'इन डाल्फिनों का मछुआरे चोरी-छिपे शिकार तो नहीं करते?Ó दीपा ने पूछा।
'नहीं... नहीं मैडम। ये डॉल्फिनें तो मछुआरों-मल्हारों का पेट पालती हैं। हर टूरिस्ट इन्हें देखना चाहता है। ये हमारे लिए वरदान हंै इसलिए इनका ख्याल तो यहां मेहमानों की तरह रखा जाता है। मल्लाह मानते हैं कि जो इन्हें नुकसान पहुंचाएगा उसकी मृत्यु हो जाएगी।Ó
मैंने दूसरा सवाल सामने रखा- 'जो मशीन बोट यहां चल रही हैं ये निगम की हैं या निजी हैं?Ó
'ये नावें निजी हैंÓ जेना बोले।
'बैंक से लोन मिलता होगा?Ó
'लोन तो अभी मिलना शुरू हुआ है सर। बोट वालों के लिए अपनी बोट रखना बड़े खर्चे की बात है। एक मशीन बोट- ऐसी बोट जिसमें आप बैठे हैं, करीब ढाई लाख में बनती है। इसकी लकड़ी बहुत महंगी आती है।Ó
'सरकार या निगम की सहायता मिलती है?Ó
'थोड़ी बहुत सहायता ही मिलती है। निगम का काम तो लेक के विकास और देखरेख से जुड़ा है।Ó
'नाविकों की आर्थिक स्थिति तो टूरिस्ट सीजन से जुड़ी है। उनकी दशा कैसी है?Ó मैंने पूछा।
जेना मुस्कुराते हुए कुछ देर चुप रहे। फिर बोले- 'सर, एक बात सुनकर आप आश्चर्य करेंगे। यहां इन लोगों ने एक सिस्टम बनाया है। दिनभर में जो नावें चलती हैं उनके नाविक शाम को अपनी कमाई एक जगह इकट्ठी करते हैं और फिर सबको बराबर-बराबर बांट देते हैं।Ó
मैंने अविश्वास के साथ कहा- 'क्या सचमुच ऐसा होता है! यह अद्भुत है। बंटवारा क्या सभी नाविकों में होता है?Ó
'सब में नहीं। दिन में जितनी बोट चलेंगी, उनके बीच बंटवारा होता है।Ó
'यह तो कमाल है!Ó मैंने कहा- 'यह तो सही मायने में सहकारिता का उदाहरण है।Ó
मेरा मन देर तक इस बात को हजम नहीं कर पाया। लगातार सोचता रहा कि जेना जो कुछ बतला रहे हैं क्या यह ठीक उतना ही सच है? यदि है तो जड़ अनुष्ठान प्रियता के मुकाबले यह कर्मठ व्यक्तियों का साझा जीवन लक्ष्य है जिसमें समाजवाद की एक हल्की झलक है जिसे वर्षों पूर्व हमारी समाज व्यवस्था त्याग चुकी है और आज भी उसके विरोध में प्रचार जारी है। इस बीच बोट उस तट पर पहुंच कर रुकी जहां जेना को उतरना था। उतरने के पहले जेना बोले 'सर, आपके साथ बहुत अच्छा लगा।Ó फिर श्रीमती जी से उन्होंने कहा- 'मैडम, हथेली खोलिए।Ó दीपा ने हथेली फैला दी तो जेना ने हथेली पर कुछ रखकर उनकी मुट्ठी बंद कर दी और कहा- 'जब बोट चालू हो जाए तब इसे देखियेगा।Ó हाथ हिलाकर जेना चले गए। बोट रवाना हुई तो दीपा ने मुट्ठी खोली। हथेली पर एक मोती रखा था। प्रेमपूर्वक बातचीत करने के प्रतिदानस्वरूप दोस्ती की यह निशानी थी। स्नेहभरा अहेतुक उपहार! हमें अपने जीवन में मिले सबसे कीमती सर्वोत्तम उपहारों में एक! मुक्तिबोध अनायास ही याद आ गए- जैसे तुम भी आदमी वैसे मैं भी आदमी! जियो देवेन्द्र जेना।
जिस आइलैंड और रेड क्रैब को हमारे नौका-विहार के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में दर्शाया गया था वह तो पहलू का ऐसा दिल निकला जिसका शोर तो बहुत सुनते थे पर वहां खून का कतरा भी नहीं था। विभिन्न झीलों या विशाल तालाबों के बीच के द्वीपों को पर्यटकों के लिए आकर्षक बनाया जाता है लेकिन यह द्वीप... नहीं। 'आइलैंडÓ एक हरा-भरा सुनसान स्थान है। समुद्र तट से जरा सा ऊपर जाकर आप लघुशंका निवारण का आनंद ले सकते हैं। प्रेमियों का जोड़ा हो तो और आगे बढ़कर झाडिय़ों के बीच गुम होकर, थ्योरी को प्रेक्टिकल में ढालने का अरमान पूरा करते हैं। बोट से तट पर उतरते ही कुछ लाल केकड़े दिखलाई दिये जो हमारे पदचाप की धमक सुनते ही बिलों में घुसने का उपक्रम करने लगे। खासा महंगा पैकेज एक सुविधा को पाकर ही सार्थक होता है वह है तट पर ही बने होटल 'चिल्का कान्फ्यूएंसÓ में काफी पीकर। यह बिना दीवारों का, लकड़ी की बल्लियों पर टिका झोपड़ीनुमा छाजन है। उसी के नीचे कुछ कुर्सियां और दो-तीन टेबल हैं। जो भी हो, है तो 'चिल्का कान्फ्यूएंस!Ó वहां बैठकर बंगाल सागर के मुहाने और विस्तृत जलराशि को देखते हुए कॉफी पीने का अपना आनंद है। उस एक कप कॉफी में पांच सौ की वसूली का म•ाा है। याद दिला दूं कि 1900 रुपए के पैकेज में, बस यह आइलैंड और रेड क्रैब नहीं है। हम और अनुभव सम्पन्न हो गए।
काफी खत्म हुई तो सनीचर ने कहा- 'सर, आपको थोड़ा और आगे ले जाकर फिर वापस घूमते हैं। लौटती यात्रा में बोट एक स्थान पर थोड़े से दांये तट पर बढ़ी जहां तीन छोटे-छोटे मंदिर दिखलाई दिये। सनीचर ने कहा- 'सर, ये है त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के मंदिर। अभी उधर कीचड़ है इसलिए यहां से दिखला रहा हूं। आप कहें तो और पास चलें।Ó
इंकार करते हुए मैंने कहा- 'नहीं भाई, वापस चलो। सारे देवताओं से पावरफुल शनिदेव जब हमारे खेवइया हैं तो और किसी की कृपा हमें नहीं चाहिए।Ó
हमारी वापसी की यात्रा में और भी नावें दिखलाई दीं। कुछ भी सवारियों ने हाथ हिलाकर अभिवादन किया। उल्लास में साथ होने का अहसास! तथाकथित घाट पर लौटकर रेस्टोरेंट में हमने भात-झींगा खाया। मुझे बिलकुल ही बेम•ाा लगा। अनुभव में थोड़ी और वृद्धि हुई। हमारे सारथी ने शाकाहारी भोजन कर लिया था। होटल लौटते समय लगभग आधा रास्ता तय किया था कि खासी बारिश शुरू हुई। हल्की बारिश और बदली तो दूसरे दिन हमारे ट्रेन में बैठते तक होती रही। हमारे घूमते-घामते तक मौसम ने दोस्त की तरह साथ दिया।