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Tuesday 21 Nov 2017

दन्त कथा

केवल गोस्वामी
जे-363, सरिता विहार मथुरा रोड
नई दिल्ली-110046
कई दिनों तक तो मैंने पत्नी को नहीं बताया, कभी दांतों तले उंगली दबाकर, कभी गाल फुलाकर या कमरे में गश्त लगाकर हद से हद एक दो गोलियां निगलकर मैंने दांत के दर्द पर काबू पाना चाहा। मैंने सुन रखा था- मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की। मुझसे यह दर्द ही बर्दाश्त नहीं हो रहा था अब अगर और बढ़ गया तो क्या होगा? इसी डर के मारे मैं इसे गुप्त रखे हुए था। फिर रहीम का यह दोहा याद हो आया- ''रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोए, सुनिहि अठलेहि लोग सब बांट लेहि न कोय।ÓÓ और कहीं हो न हो हमारे घर में यह दोहा आज भी प्रासंगिक था। मैं गालिब के बारे में सोच रहा था। इतना बड़ा शायर हो गया दांत के दर्द पर एक भी गजल नहीं कही। गजल तो क्या एक शेÓर तक नहीं मिलता किसी शायर का। दर्देदिल दर्देजिगर पर ढेरों गजलें लिख मारी। अब यही तो भेड़ चाल है न । एक दर्द का कीर्तन करते रहे दूसरे की घोर उपेक्षा। अब दर्द तो दर्द है, अचानक मेरे मुंह से निकल गया- ''दर्द पर जोर नहीं है यह वह जालिम ऐसी कि उठाए न उठे और दबाए न बने।ÓÓ सचमुच दर्द दब नहीं रहा था, लगा कि अब भेद खुलने ही वाला है।
श्रीमती जी 'हैल्थ एण्ड हाईजीनÓ पत्रिका के पन्ने पलट रही थी और विविध-भारती भी सुन रही थी। बीच-बीच में मेरी ओर देखती तो त्योरियां चढ़ जाती। ''यह क्या उल्टे-सीधे मुंह बना रहे थे? अब इस उम्र में एक्टिंग का शौक चर्राया है।ÓÓ मैं खीसें निपोर देता- 'बात यह है कि आज दफ्तर में...Ó
'मैं समझ गई।Ó वाक्य को बीच में से लपकते हुए उसने कहा- 'दफ्तर में पार्टी होगी और तुमने डॉक्टर की हिदायतें दरकिनार कर जीभर के ठूंसा होगा और अब पेट बेचारा दबाव सह नहीं पा रहा होगा।Ó माथे पर हाथ मारकर उसने पत्रिका को मेज पर पटक दिया और नथुने फुलाकर बैठ गई। दर्द की लहर उठी ऐसी कि पूरा जिस्म झन्ना गया। एक के दो दिखाई देने लगे, पर उसने तो मुजरिम करार दे दिया था। दांत भींच के रह गया। चेहरे पर मुस्कान पोतने की कोशिश की कि शायद थोड़ा तनाव कम हो, मुझे अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका मिले। तभी रेडियो पर किसी दंतमंजन का विज्ञापन बज उठा- ''दांत का दर्द क्या होता है मम्मी?ÓÓ कई बार पहले भी यह विज्ञापन आया होगा पर कभी ध्यान ही नहीं दिया था। बच्चे की मम्मी के जवाब देने से पहले ही मेरे मुंह से निकल गया- 'मुझसे पूछो!Ó और चारपाई से उछलकर जाने कैसे रेडियो का बटन दब गया मुझसे।
'क्याऽऽ?Ó पत्नी का मुंह खुला रह गया। मेरी इस हरकत से वह कुछ आतंकित भी थी। समझ रही होगी शायद मैं पागल हो गया हूं।
दर्द वास्तव में मुझे पागल कर रहा था। सोचा अब भेद खुल ही गया है तो क्यों न बता दूं- प्रिय, दांत का दर्द मेरी जान ले लेगा, और वह गीत जो अक्सर रेडियो से बजा करता है- दर्द भरे स्वर में गाकर कह दूं- 'आखरी रात है कल सुबह न पाओगे हमें।Ó मुझे यकीन है पत्नी मेरे बारे में अपनी राय बदल देगी। मुझ पर लगाए गए सारे बेबुनियाद इल्जाम वापिस ले लेगी। फटाक से मेरे मुंह पर अपना हाथ रखकर वास्ता देगी- ''ना ना ऐसी अशुभ बात मुंह से नहीं निकालते। बस जरा से दांत के दर्द से घबरा गए?ÓÓ (मेरे शेर बेटे के अंदाज में) मेरा हौसला बढ़ाएगी- 'मैं अभी डॉक्टर के पास ले चलती हूं।Ó
किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 'क्याऽऽÓ कहने के बहुत देर बाद उसका मुंह बंद हुआ और बंद क्या हुआ फूल गया। वह उठकर चुपचाप दूसरे कमरे में चली गई और मैं कमरे से बाहर।
डॉक्टर गुप्ता की बात जेहन में आने से पहले उनके दरवाजे पर लिखी 'मशविरे की फीसÓ वाली तख्ती पहले आंखों के आगे कौंध गई। यानी यह महाशय बात करने के पैसे पहले झाड़ेंगे और फिर अगर उनकी समझ में आया तो दर्द बांटेंगे नहीं तो वह भी मुंह फुला लेंगे। अब उनसे कोई यह भी तो नहीं कह सकता कि भाई दुनिया ने मूल्य गिरा दिए, मूल्य सूची प्रदर्शित की, तुम जनता के सेवक कब बनोगे?
चूंकि डॉ. गुप्ता का यह आठवां पेशा है इससे पहले कभी यह वन विभाग में पेड़ उखाडऩे के ठेकेदार भी रह चुके हैं इसलिए दांत उखाडऩे में एक तरह से उन्हें महारत हासिल हो चुकी है। यह पेशा उन्हें रास आ गया है क्योंकि पिछले कई सालों से वह इसी के भरोसे टिके हैं, क्योंकि उन्हें भगवान पर भरोसा है इसलिए उनके हाथ से आज तक कोई मरीज मरा नहीं था। उसका बोलना कुछ देर के लिए भले ही बंद हो गया हो। चूंकि हर आदमी का भाग्य अपना-अपना होता है इसलिए डॉ. गुप्ता के पास कार भी है और कोठी भी। बाजार में दूर-दूर तक कोई दूसरा दांतों का डॉक्टर था भी नहीं इसलिए डॉ. गुप्ता दूसरों के सामने अपनी डिग्री को छिपाकर रखते थे।
डॉ. गुप्ता जहां सड़क के किनारे अक्सर कुर्सी डालकर बैठा करते थे और अपने नए शिकार का इंतजार सांस रोककर करते थे कि अब फंसा कि तब फंसा- पर उस आदमी के सीधा निकल जाने पर अपने ही बाल नोंचते थे। अब मरीज खाने में कई बैंचों के साथ एक बढिय़ा सोफा भी रखा गया था। मेज पर कई रंगीन पत्रिकाएं और दैनिक अखबार भी रखा रहता था। दीवारों पर दंत चिकित्सा संबंधित अनेक रंगीन तस्वीरें भी लटक रही थीं, यानी पूरा माहौल ग्राहक फंसाऊ था। ''अरे भाई, मुंह खोलो, ज्यादा दर्द तो नहीं हो रहा।ÓÓ डॉक्टर के कहने का ढंग इतना निराला था कि दर्द होने पर भी बेसाख्ता हंसी फूट पड़ती थी। डॉक्टर इसे अपनी सफलता मानता था।
दुकान में घुसने से पहले जेब में पड़े सौ-सौ के तीन नोटों को मैंने आखिरी बार देखा और डॉक्टर ने मुझे पहली बार। उस वक्त एक अन्य मरीज मुंह में ढेर सारी रुई दबोचे बिफरी आंखों से डॉक्टर को घूर रहा था। मुझे देखकर उसने आंखों ही आंखों में मुझे शुभकामनाएं दी। वह ज्यादा देर तक वहां पर ठहरा नहीं या डॉक्टर ने उसे ठहरने नहीं दिया। यह भी व्यावसायिक टोटका था। पांच-छ: अलग-अलग रंगों की गोलियां देकर और उतने ही कैप्सूल बाजार से खरीदने की हिदायत देकर डॉक्टर ने उसे बड़ी सहानुभूति से विदा किया। बाहर बरामदे में उसका कम्पाउंडर रजिस्टर खोले बैठा था उसने बड़ी मुस्तैदी से तीन सौ रुपए वसूल करके रजिस्टर में चिडिय़ा बनाई।
'कहिए जनाब क्या हालचाल है?Ó डॉक्टर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला- जैसे मुझे कई जन्मों से जानता हो।
जितनी सहृदयता से डॉक्टर मुस्करा रहा था उतना ही मुझे गुस्सा आ रहा था। मन में आया, उसी अंदाज में जवाब दूं ''जी बिलकुल ठीकठाक हूं, आपकी दुआ से। इधर से निकल रहा था सोचा आपसे दुआ-सलाम करता चलूं।ÓÓ पर मैं ऐसा न कह सका, खून के घूंट पीकर रह गया। मशविरेा की तख्ती देखकर लगा कि जेब में पड़े तीन सौ रुपए थोड़ी देर में डाक्टर की जेब में नजर आएंगे। दस दुकानों पर भावताव करके कोई चीज खरीदने की आदत थी मेरी। पत्नी जब साथ होती तो अक्सर झल्ला कर कहती- ''क्या दो-दो पैसों के लिए झख मारा करते हो...ÓÓ और वह एक ही बार में महीनों की बचत पर पानी फेर देती थी। किन्तु बस चले तो मैंने आज तक किसी को भी मुंह मांगे पैसे दिए नहीं थे। एक जगह ही मेरे इस सिद्धांत की मात हुई थी जब बेबी को पब्लिक स्कूल में दाखिल कराने गया था और फीस फंड-दंड का भुगतान कर कुढ़ता हुआ लौटा था। पत्नी खुश थी। ऐसे बहुत कम अवसर आए थे (शादी समेत) जब हम दोनों एक साथ खुश हुए हों। आज डॉक्टर के सामने मुझे लग रहा था कि मेरे सुनहरे सिद्धांत की दूसरी हार होगी।
आस्तीन चढ़ाकर डॉक्टर ने चुनौती भरे अंदाज में कहा- 'चलिए तो जरा भीतर।Ó
एक शीत लहर दौड़ गई मेरे पूरे शरीर में। मुझे अपनी भूल का अंदाजा हो गया। सोचा पत्नी को कहकर आना चाहिए था। बच्चों को आखरी बार मिल तो लेता। मुझसे पहले जाने वाले मरी•ा की दर्दनाक कराह अब भी मेरे कलेजे को बेध रही थी। मेरे पास अधिक विकल्प नहीं थे। या तो दर्दे दांत को झेलते हुए चारपाई पर दम तोड़ता था या अब इस पहलवान डॉक्टर की सुडौल बांहों में शहीद होता। बहरहाल मरना तो लाजमी था ही सो अपने गुनाहों को याद करते हुए मैं डॉक्टर के पीछे-पीछे चल पड़ा।
ज्यों ही डॉक्टर ने दरवाजा बंद किया, मैंने बड़े-बड़े जमूर, नश्तर और सुईयों को देखकर आंखें मीच ली और यह सोच लिया कि अब यह आंखें कभी खुलेगी नहीं।
डॉक्टर ने जैसे ही मर्दाना हाथों से मेरे जबड़े को छुआ मैं भूल गया कि कौन सा दांत दुख रहा था चूंकि अब तो पूरे जबड़े पर आ बनी थी, डॉक्टर को क्या बताता?
''भइया हौसला करो। तुम तो ऐसे कांप रहे हो जैसे यमदूत का सामना हो गया हो?ÓÓ
डॉक्टर के इस व्यंग्य से तो मैं तिलमिला गया था ''नहीं डॉक्टर! ऐसी कोई बात नहीं। मैं घबरा बिलकुल भी नहीं रहा। दरअसल दर्द इतना हो रहा है कि...ÓÓ
-''हां-हां बताओ तो सही किस दांत में कब से दर्द है? कुछ बोलो तो सही मेरे दोस्त।ÓÓ
''ऊपर से आखरी दांत में आज दोपहर से।ÓÓ संक्षेप में कहकर मैं मन ही मना रहा था कि डॉक्टर अब चाहे जान ले ले किन्तु सवाल न पूछे। दर्द से ज्यादा मुझे उसका बोलना असर कर रहा था।
डॉक्टर ने एक बड़े सुए जैसी कोई चीज मेरे जबड़े के मध्य फंसा दी। चीख भीतर से उठी जरूर पर पिण्डलियों से होती हुई पांवों के रास्ते निकल गई। पसीने की एक तेज धार टांगों को भिगो गई!
'हूं!Ó कहकर डॉक्टर ने दवाई में डूबी हुई सुई का एक फाहा दांतों में फंसा दिया जबड़े अपनी जगह पर आ गए।
मैं सोच रहा था कि अब जमूर घुमाएगा तो पता नहीं मेरा क्या हाल होगा। डॉक्टर ने जैसे ही कहा 'चलिए बाहरÓ, तो मैं डॉक्टर से पहले बाहर था।
''अब दर्द तो नहीं हो रहा न?ÓÓ
''जी, बिल्कुल भी नहीं।ÓÓ
''दरअसल आपके दांत में इन्फेक्शन है। दो एक बार ड्रेसिंग करवाइए फिर देखेंगे क्या कर सकते हैं।ÓÓ डॉक्टर ने कुछ इस अंदाज से कहा कि जैसे मामला बड़ा संगीन हो और वह मुझे बताना न चाहता हो।
'ये गोलियां और कैप्सूल बाजार से ले लीजिए और चार-चार घंटे के बाद खाते रहिएगा। कल फिर बताइएगा।Ó
बाहर बरामदे में बैठे उसके कम्पाउंडर ने मुझे ऐसे देखा जैसे कह रहा हो 'निकालो तीन सौ रुपएÓ मैंने बिना हील हुज्जत के रुपए उसे थमा दिए। उसने बड़ी मुस्तैदी से रजिस्टर में चिडिय़ा बनाई और मुंह फेर लिया। इस वक्त मेरा दायां हाथ छाती पर था। मैं जानता था मैं धंस रहा हूं और उबरने का कोई रास्ता नहीं। जितनी बार यह महाशय बुलाएंगे आना तो पड़ेगा ही।
''क्यों डॉक्टर दांत निकालने के बाद कोई उलझन तो नहीं होगी न?ÓÓ
''कुछ भी हो सकता है मेरे दोस्त।ÓÓ डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा।
मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया। मैंने तसल्ली पाने की गरज से कहा था कि डॉक्टर कहेगा- ''आप भी कमाल करते हैं भाई साहब! हम किसलिए हैं, आपको पता तक नहीं चलेगा वगैरह वगैरह...ÓÓ लेकिन जब उसने कहा कि कुछ भी हो सकता है तो मुझे यकीन हो गया कि यह आदमी तुक्के मार रहा है। मेरी रही-सही उम्मीद भी जाती रही।
लेकिन मेरा अनुमान बिल्कुल गलत निकला। सातवें रोज नहीं डॉक्टर ने चौथे रोज ही दांत निकलकर मेरे हाथ पर रखते हुए कहा- ''लीजिए! इट वा•ा सो सिम्पल-आप यूं ही घबरा रहे थे।ÓÓ और छाती तानकर वह वाश-बेसिन की ओर चल पड़ा।
मैं आश्चर्यचकित कभी डॉक्टर की ओर देख रहा था कभी अपने जुदा हुए दांत की तरफ जैसे प्रसव के बाद औरत नवजात को स्नेह तथा ममता से देखती है- ''नन्हीं सी जान ने कितना तूफान मचा रखा था।ÓÓ ठीक वैसे ही मुझे भी लगा जरा से दांत ने मेरा जीना मुहाल कर रखा था। मैंने एक बार फिर जेब में रखे नोटों को सहेजा जो मेरी नहीं दरअसल डॉक्टर की जेब में होने चाहिए थे।
श्रीमती जी को न जाने कहां से भनक लग गई थी। ज्यों ही मैं सिर लटकाए डॉक्टर के चेम्बर से बाहर निकला वह टैक्सी में मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। आंखों में बड़े-बड़े मोतियों जैसे आंसू भरकर उसने मेरा स्वागत किया जैसे कह रही हों ''हमने एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ निभाने का वादा किया था न? तुमने दस साल में मुझे एक भी मौका नहीं दिया। आज एक मौका था तो तुम उसे भी मुझसे छीनना चाहते थे।ÓÓ
वह भीतर इसलिए नहीं आई थी कि डॉक्टर गुप्ता को वह कभी डॉक्टर नहीं मानती थी। वह क्या मिसेज जॉनसन सिंह भी नहीं मानती थी। उन दोनों की दांत कटी रोटी थी इसलिए दोनों की राय अलग होने का तो प्रश्न ही नहीं होता था। अब मुझे मालूम हुआ कि ये मोटे-मोटे मोतियों जैसे आंसू मेरी सहानुभूति में नहीं थे, यह तो उनकी प्रतिष्ठा खतरे में पड़ गई थी।
मैं मुस्कराता जरूर लेकिन मुंह में तो पाव भर रुई ठूंसी हुई थी इसलिए आंखों ही आंखों में मैंने उनके आने का शुक्रिया अदा किया। मैं जानता था कि हिसाब-किताब तो घर चलकर होना ही है।
वह कुछ बोली नहीं बल्कि मोटे-मोटे मोतियों जैसे आंसुओं को सहेज कर पर्स में रख लिया। पिछली सीट पर एक ओर सरक कर मेरे लिए जगह बना दी। रास्तेभर कोई बात नहीं हुई, होती भी कैसे हम दोनों के मुंह जो फूले हुए थे। टैक्सी ड्राइवर बार-बार शीशे में देखकर किसी उत्तेजक दृश्य की प्रतीक्षा में बेचैन हो रहा था पर जब ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो बोर होकर उसने टैक्सी की स्पीड बढ़ा दी।
हमारे बैठक खाने का रंग-ढंग ही बदला हुआ था। एक पल को गलतफहमी होना स्वाभाविक था जैसे कि यह सारी सजावट मेरे स्वागत के लिए ही हुई हो क्योंकि दूसरा फौरी कारण मेरी समझ में नहीं आया। लेकिन जब मुझे भीतर के कमरे में जाने का आदेश हुआ तो सारी गुत्थी सुलझ गई। श्रीमती जी पिछले पैरों जब बाहर निकल गई तो मैंने सोचा चैन नहीं होगा। दही लेने गई होगी, लेकिन टैक्सी तो जा चुकी थी। श्रीमती जी जब फिर भी नहीं लौटी तो ख्याल आया मेरे लिए कुछ खरीदारी करने मार्केट तक चली गई होंगी। कल्पनाएं जोश मारने लगी। गर्मागर्म देशी घी का हल्वा, घी-दूध के बारे में सोचते-सोचते मैं गाव तकिए का सहारा लेकर पसर गया। वह जरूरी देशी घी लेने के लिए गई होगी। देशी घी हमारे घर में हारी बीमारी में ही आता था। टीटू-बेदी के होने के समय आया था और एक अब आएगा। तब मैं उसे औरतों के चोंचलें मानता था, फिजूलखर्ची समझता था लेकिन अब मालूम हुआ कि यह कितना जरूरी होता है ऐसे मौकों के लिए। अनुभूति की प्रामाणिकता नहीं थी न इसीलिए।
''भाई साहब आ गए क्या?ÓÓ यह श्रीमती जॉनसन सिंह की आवाज थी- ''सचमुच बहुत तकलीफ हुई होगी न।ÓÓ मिसेज वरुणा बता रही थी कि भाई साहब को डॉ. गुप्ता के क्लीनिक में देखा था। वह भी कोई डॉ. है, आपकी किस्मत अच्छी थी कि भाई साहब जिन्दा लौट आए। छि:छि: ही इज़ ए बूचर।
मैं श्रीमती जी के चेहरे पर आने वाले रंगों से अंदाज लगा रहा था। और इन भद्र महिलाओं के विदा होने के बाद अपने पर आने वाली मुसीबत के बारे में स्वयं को तैयार कर रहा था। हलवे की बात कहीं उड़ गई थी।
...''ठीक है डॉ. डिसूजा, अरे वही डिफेन्स कॉलोनी वाला... थोड़ा महंगा जरूर है, पर वहां तकलीफ बिल्कुल भी नहीं होती।ÓÓ यह मिसेज वरुणा की वाणी थी। ''डिम्पी के पापा तो अक्सर उन्हीं से ड्रैसिंग रखते है। उनके दांत देखे नहीं, मोतियों की तरह चमकते हैं अब पैसा होता किसलिए है। भगवान न करे भाई साहब को अगर कुछ हो जाता, तो आपके मन में हमेशा के लिए यह बात रह जाती न, कि डॉ. डिसूजा को क्यों न दिखाया। ही इज रियली वंडरफुल।ÓÓ
इस बीच श्रीमती जी की आवाज न सुनकर मेरा जी बैठा जा रहा था। श्रीमती जानसन सिंह का ऑपरेशन हुआ और श्रीमान वरुणा ने बत्तीसी बदलवाई थी तब यह उनके यहां पर हो आई थी, उन्हें चुकता करने का यह मौका मिला तो वे कैसे जाने देती? कॉफी और आमलेट की सुगंध को मैं स्वाद से ज्यादा बजट से जोड़ रहा था, जाहिर है शेष पदार्थ सुगंधहीन रहे होंगे। जिनकी सुगंध मुझ तक नहीं पहुंच रही थी। मैंने एक बार फिर जेब से निकालकर उस नन्हें से दांत को देखा। एक लम्बी सांस मेरे मुंह से निकल गई- ''काश! यह हाथी का दांत होता।ÓÓ