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Thursday 23 Nov 2017

रचना विरोधी समय में रचना (राजी सेठ की कहानियां)

तरसेम गुजराल
444ए, राजा गार्डन,
 जालंधर-144021
मो. 09463632855
लगभग पच्चीस वर्ष पहले विद्वान आलोचकों ने अपने समय को 'रचना विरोधी समयÓ घोषित कर दिया था। उस वक्त को इतिहास का सबसे अधिक रचना विरोधी वक्त मानकर एक रचना-बधिक समय में रचना पर बात करना दयनीय माना था। रचना को लेकर उत्साहपूर्वक किए ऐसे बाल सुलभ दावे के सामने तो यह दयनीयता और भी विकृत लगने लगती है, परंतु खुली आंखों से देखा जाए तो हिन्दी कहानी के जन्म से लेकर आज तक रचनात्मक चुनौतियों के सामने हिन्दी कथाकार ने पराजय को स्वीकार नहीं किया। (अपवाद सभी जगह, सभी वक्तों में होते हैं।)
इसमें अचरज जैसा कुछ नहीं कि कुछ अन्य कथाकारों की तरह इसी रचना विरोधी समय में राजी सेठ ने मनुष्यता को बचाए रखने की कोशिश में मानवीय संवेदन से ओतप्रोत कहानियों की रचना की है। और इस बात की घोषणा किए बिना कि उनकी प्रखर दृष्टि समाज और देश की विसंगत स्थितियों पर रही है जो देश की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक अव्यवस्थाओं और कुरीतियों का बीज हैं। उनकी कहानियों का यथार्थ ऐसा सीधा, ठोस घोषित भी नहीं है। सोचने का विषय यह भी है कि जो कथाकार आपके पसंदीदा हैं, लाडले हैं, दूरदर्शी हैं, उनकी कहानियों में आपको लगता है कि परिवेश बोलता है, समाज प्रतिबिंबित होता है, समकालीन चिंतन, मानवीय संबंध या व्यवहार दीख पड़ते हैं, परंतु क्या यह सब राजी सेठ की कहानियों में गहन रचनात्मकता के साथ प्रवाहित होता नजर नहीं आता? रामविलास शर्मा ने 'उपन्यास और लोक जीवनÓ में दर्ज किया है, 'माक्र्सवाद और गांधीवाद किसी लेखक को कथाकार नहीं बना देता। कथाकार बनने के लिए जीवन दर्शन से अधिक मार्मिक सहानुभूति आवश्यक है, दृष्टिकोण से अधिक वह दृष्टि आवश्यक है, जो जीवन के हर पहलू को देख सके। सामाजिक जीवन की जानकारी ही न होगी तो दृष्टिकोण बेचारा क्या करेगा?Ó
राजीसेठ का यह कथन यहां विशेष उल्लेखनीय है- 'अपने किसी भी रूप में साहित्य स्तब्ध और निर्मूल्य नहीं है।Ó
सत्य के गुपचुप लगभग अज्ञात हिस्से की तलाश हिन्दी के समीक्षक को (प्रतिमान गढ़ते हुए) हिन्दी लेखक को (अपने कार्य की भूमिका का उत्खनन करते हुए) और एक पाठक को (रचनाकार की दिलचस्प रचना प्रक्रिया समझते हुए) बहुत मनोमुग्धकारी लगता है। राजी सेठ इसकी निरपेक्ष सत्ता को नकारते हुए इसकी सामाजिक पृष्ठभूमि को समझती हैं। वह कहती हैं, ''जीवन के अज्ञात पहलुओं की खोज में सत्य के अन्वेषण का कोई भ्रम हम पाल भी लें तो वह हमारे दंभ का नहीं, हमारे स्वप्न का एक हिस्सा होगा। यह तो सब जानते हैं कि सत्य की कोई निरपेक्ष सत्ता नहीं होती। वह किसी माध्यम या प्रक्रिया से ही अन्वेषित किया जाता है।ÓÓ (संवाद और हस्तक्षेप/पृ.सं./49)
बेलिंस्की ने वास्तविकता को क्यों इतनी जगह दी?- 'वास्तविकता आधुनिक जगत का चरम सूत्र और नारा है। तथ्यों में, अर्थों में, विश्वासों में, मानसिक निष्कर्षों में, वास्तविकता-हर चीज और हर जगह में वास्तविकता ही हमारे युग का पहला और अंतिम स्वर है।Ó (दर्शन साहित्य और आलोचना) सत्य की निर्मम और अटूट प्यास को राजी सेठ की अनेक कहानियों में मजबूती से तलाश किया जा सकता है। केदारनाथ सिंह की 'अगर इस बस्ती से गुजरोÓ शीर्षक कविता की इन पंक्तियों की तरह- 'वो जो दिख रहा है सामने एक पुराना-सा पेड़ उसकी छाल को जरा-सा कुरेदकर देखना/ उसके नीचे दबी हैं कई कहानियां/जाने कितने चरित्र।Ó... अगर रास्ते में दिख जाए/कोई पड़ा हुआ ठीकरा/उठा लेना उसे/हो सकता है उसमें छिपा हो/ कोई नया हड़प्पा।Ó
आधुनिक भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ख्म है- भारत विभाजन। विश्व की अभूतपूर्व दुर्घटना। ऊपर से बेशक दीख रहा हो कि यह आग बुझ गई है, परंतु भीतर ही भीतर अभी तक सुलग रही है। गुस्से से त्यौरियां चढ़ाए मतभेद, अविश्वास का गुजरती रातों में उठता धुआं, पश्चाताप में गले से न उतरते बहकावे। कायदे-आजम को वर्तमान यथार्थ जमीन पर पांव नहीं रखने देता। गांधी की चीख (पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा) हवा में जज्ब हो गई। माउंटबेटन की बंटवारा करने और सत्ता सौंपने की जल्दबाजी जिसमें मौलाना आजाद का सुझाव (तत्काल बंटवारे के निर्णय न लिया जाए) हवा में कागज के टुकड़े की तरह उड़ गया। नेहरू की फुसलाहट- गांधी की चीख से लेकर इस फुसलाहट तक सवाल ही सवाल हैं। विभाजन में हजारों-लाखों बेशकीमती जानें मिट्टी के मोल गईं, भीतर और बाहर के जख्म समेटे लोगों को इधर से उधर भागना पड़ा। कुछ लोगों को 'शरणार्थीÓ होना पड़ा और कुछ को 'मुहाजिरÓ।
अब्दुल्ला हुसैन के उपन्यास 'उदास नस्लेÓ की नजमी एक स्थल पर कहती है कि इतिहास में इंसान अहम नहीं है, घटनाएं अहम हैं। परंतु राजी सेठ विभाजन की भयावहता में उस इंसान की कहानी कहती हैं जो समय की दराज में फंसा हुआ जरूर है, परंतु उसने अपना आत्मबल, अपना स्वाभिमान नहीं खोया है। उनकी कहानी 'मुलाकातÓ का आदमी दलदल में कमल की तरह खिला हुआ है। हमें मेक्सिकन उपन्यासकार कार्लोस फुएन्ते के एक कथन की याद दिलाता है- 'इतिहास जिनकी हत्या करता है कथा उनको जीवन देती है, इतिहास जिनकी आवाज सुनने से इनकार कर देता है, कथा में उनकी आवाज सुनाई देती है।Ó
'मुलाकातÓ कहानी के इस शख्स को भी इतिहास के एक धक्के ने धकेल दिया। लाहौर से विस्थापित होकर सब कुछ लुटाकर हिन्दस्तान आ गए और इस सवाल से टकरा रहे हैं कि इतिहास काट-पीटकर क्या किसी आदमी को दूसरा आदमी बना देता है?
घंटों काठ की दुखदायी बेंच पर सिर झुकाये वह सिर्फ इसलिए बैठे थे ताकि कलेक्टर साहब से मुलाकात हो सके। सुना था कि उसके जैसे उखड़े-उखड़े लोगों को उनसे कुछ मदद मिलती है ताकि वे फिर से कमर कस सकें।
अफसर दयार्द्र बताया गया है। पूछता है- क्या चाहिए?
'यही कोई छोटा-मोटा काम, जिससे गुजारा हो जाए।Ó
अफसर उन्हें गत्ते का डिब्बा दिलवाता है जिसमें थोड़ा आटा है, थोड़े चावल, चाय, साबुन, चीनी वगैरह।
कुछ नहीं बोल पाते वह। अफसर के कोंचने पर कि क्या सोच रहे हैं, कहते हैं-
'सोच रहा हूं- लगातार सोच रहा हूं। फसादों में सबके बच्चे मर गये... मेरे क्यों नहीं मरे- क्यों जिंदा रह गये सब के...Ó वह पराकाष्ठा जब शर्म छिपा नहीं सकती कुछ। वह निराशा का पूरा पृष्ठ जहां हाशिए पर कांपते हाथों से कोई जीने की परिभाषा रचने की कोशिश करता है।
अपना घर, घर का पूरा सामान, रोजी-रोटी, संबंध सभी कुछ खोकर लौटे हुए इस आदमी को- 'गुजारा नहीं चाहिए- काम चाहिए।Ó
पत्नी जब बार-बार अपने पीछे छूटते घर को मुड़-मुड़ कर देख रही थी और आंसुओं के उलार में डूबी थी तब कहा था- 'किसलिए यह रोना-धोना?Ó- जानती हो तुम कोई घर-वर नहीं छोड़ रही हो। अपने देश जा रही हो। अपने देश... पंडित नेहरू को आजादी की बधाई देने।Ó इधर नेहरू जी 14.8.1947 के कांस्टीट्यूएट एसेम्बली के समक्ष भाषण में पढ़ रहे थे- आजाद हुए हम लेकिन आजादी के साथ मुसीबतें और बोझे आते हैं। उनका हमें सामना करना है, उनको ओढऩा है और जो स्वप्न देखा था उसको पूरी तौर से एक असल बनाना है।Ó कहानी का अफसर उस स्वप्न का एक छोटा-सा हिस्सा है परंतु जो असल है, वास्तव है, आत्मा का बोझ है वह 'मुलाकातÓ का यह लुटा-पिटा शख्स है।
राजी सेठ की कहानियों में हमें कुछ भी अनावश्यक नहीं लगता। जिसे चेखव कहते हैं कि उसे निर्ममता से हटा देना चाहिए। इसकी पुष्टि के लिए वह दीवाल पर लटकती बंदूक का उदाहरण देते हैं- 'यदि कहानी के पहले हिस्से में आपने दीवाल पर लटकती बंदूक दिखाई है तो दूसरे या तीसरे हिस्से में उसे चलना चाहिए यदि नहीं चल रही हो तो वह लटकती हुई भी नहीं होनी चाहिए।Ó
'मुलाकातÓ कहानी के पहले पैराग्राफ में वह चाय के थोक व्यापारी की दुकान से खपच्चियां बीनकर लाते हैं। अखबार में लिपटा वह बेडौल-सा बंडल उनके साथ था जिसे उन्होंने बेंच के नीचे खिसका दिया था। कहानी के अंत में वह फफक-फफक कर रो कर हटते हैं। उबाल थमता है तो उठ खड़े होते हैं। 'गुस्ताखी माफ हो साबÓ कहकर कमरे से बाहर निकलते हैं और बेंच के नीचे रखे खपच्चियों के बंडल को भूल जाते हैं। 'अब पता नहीं आग कैसे जलेगी... बुरादा तो कब का खत्म हो चुका अंगीठी का।Ó यह फार्मूला नहीं है उनकी कहानी गढऩे का। कहानी का गठन है, परिपक्वता है। मर्मस्पर्शी सच्चाइयों का स्तब्ध कर देने वाला खाका है। प्रामाणिक और मार्मिक चित्रण है जो स्मृतियों को अपनापन देता है।
'रुको इंतजार हुसैनÓ कहानी की जमीन भी यही है। भारत और पाकिस्तान की सरहद खींच दी है। अतिव्यापन से सरहद जहरीली और विध्वंसक होती चली गई। मर्मान्तक मनोदशा में रहते हैं वे लोग जिनका कितना कुछ लुट चुका, नष्ट हो गया। भौतिक से आत्मिक खजाने तक। 'सामने वाला दरख्त खामोश खड़ा है और अपने लकड़हारे का इंतजार कर रहा है। हम अपने लकड़हारे का भी इंतजार नहीं करते क्योंकि हमारे पास हमारी याददाश्त है।Ó (उदास नस्लें)
इंतजार हुसैन की किताब 'बस्तीÓ छपती है तो वह खरीदकर ले आता है। रखते समय किताबों को गिनता है। देश के बंटवारे पर लिखी गई यह दसवीं किताब है। इन किताबों में उसके जीवन का कोई जरूरी हिस्सा बंद है। किताबों में बंद इबारत में उसके जीवन की धपाधप छिपी है। पत्नी और किताबों के बीच कोई रिश्ता रहा नहीं, 'किताबें रखी रहती हैं, क्योंकि उनका जीने में से गुजरती जिंदगी से कोई वास्ता नहीं। एक-दूसरे की सरहदों में कोई आवाजाही नहीं। होती तो देश विभाजन के इतने बड़े हत्याकांड पर उसके हाथ लगती इतनी-सी किताबें? लाखों के खून-खराबे को जुबान देती कुल जमा दस किताबें? यहूदी अच्छे निकले जिन्होंने अपना दुखड़ा तरल करके सारे संसार की धमनियों में बहा दिया। क्या कोई सूरमा नहीं था यहां, इन दो सरहदों के बीचोंबीच?Ó
किताब में 'अनारकली बाजारÓ का नाम आते ही वह ठिठक जाता है। यह, यह तो उसका अपना शहर है। लाहौर... लाहौर। स्मृतियां नंगे पांव चल देती हैं। पथरीली सड़क पर इंतजार हुसैन को संबोधित होता है- थोड़ा रुको इंतजार हुसैन। अलका सरावगी ने 'कलिकथा : वाया बाइपासÓ उपन्यास में दर्ज किया- 'इतिहास मामूली आदमियों की कथा नहीं कहता, पर हर इतिहास मामूली आदमियों से पटा पड़ा होता है जो इस इतिहास से जूझते हुए जीवन काटते हैं।Ó
राजी सेठ की कहानी 'बाहरी लोगÓ की वृद्धा वर्तमान में नहीं जी पा रही। पच्चीस-तीस साल पहले के रावलपिण्डी में बार-बार चली जाती है चेतना के धरातल पर। 'आपको नहीं पता, इसका पेंच ढीला है। पूरी तरह क्रैक है- बुढिय़ा। इसे अपना कुछ पता नहीं रहता। गैस पर दूध रखती है, दूध उबलता रहता है। नल खोलती है, पानी बहता रहता है। तवे पर रोटी डालती है, जलती रहती है। मालूम है क्यों? क्योंकि यह सदा रावलपिंडी में बैठी रहती है।Ó
एक बड़ा कथाकार कभी खुद को सीमित नहीं करता। उसकी व्यापक संवेदना, जड़ परंपराओं और तात्विक परिवर्तनों से, स्मृतियों से अपने स्वभावानुकूल जो कुछ चुनती है वह उसके अनुभव खंड का हिस्सा हो जाता है जो कि विविध और बहुवर्णी होता है। परंतु हम लोगों में लेबल चिपकाने की ऐसी आदत है जो रचना की विविधता को बचाना नहीं चाहती। राजी सेठ महिला कथाकार हैं तो उनकी स्त्री विषयक कहानियों को ही चुन लिया जाए। प्रेम मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति है और समाज को उच्च मूल्यों की तरफ भी ले जाता है तो यदि उनकी कुछ कहानियां प्रेमपरक हैं तो उन्हें प्रेम की कथाकार के खाते में डाल दिया जाए। बेशक उनके यहां न तो प्रेमाभिव्यक्ति इतनी सरल और सपाट है, न स्त्री मोम की गुडिय़ा या विज्ञापन की कसावट लिए है परन्तु एकपक्षीय वर्गीकरण कथाकार की समग्र चेतना, बड़े स्पेस, व्यापक अनुभव सम्पन्नता को कहीं न कहीं आहत जरूर करता है। शमा जब हर रंग में जलती है तो उसका प्रतिदान उल्लेखनीय होता है। इससे रचनाशीलता  और रचना कर्म का महत्व खुलता खिलता है। रचना के सौन्दर्यात्मक रसास्वादन की थाह मिलती है जो एक तरफ मानवीय कर्म है दूसरी तरफ 'सभीÓ के लिए है।
राजी सेठ का स्त्री विमर्श गोलमोल नहीं है। उनकी स्त्री विषयक, कहानियों में स्त्री अस्मिता का सवाल है। उन संस्कारों का प्रारूप है जो स्त्री को स्त्री ही बनाए रखना चाहते हैं परन्तु स्त्रीवादी कहानियों का एक जैसापन नहीं है। उनके अनुसार 'स्त्री चिंतन के इलाके में कुछ ऐसी हवा चली है कि स्त्री संबंधी हर लेखन एक ही दृष्टिकोण से देखा जा रहा है, जिसका सामूहिक नाम स्त्री-विमर्श है। हर रचना में स्त्री, स्त्री पुरुष संबंध, उसका प्रतिफलन परिवेश एक ही तरह की जिज्ञासाओं का विस्तार करता है। मूल में कुछ विकास संबंधी वैश्विक तथा देशीय कारण भी हैं जिसे उत्तर आधुनिक दृष्टि से साहित्य के पाठ में उपपाठ, निहित पाठ पढऩे के चलने को प्रस्तावित ही नहीं, बल्कि संभव भी किया है।Ó और यह कि पात्रों के रूप में (उनकी कहानियों) में जीवित हुई स्त्रियां सामाजिक चिंतन की किसी धारा में कदम मिलाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी परिस्थिति, इतिहास, संस्कार, प्रभाव के आनुभाविक ताप में से स्वत: उपजी है। उनका यथार्थ वही होने की सीध में है, जिस मिट्टी की वे बनी हैं।... उनका मर्म 'आत्मÓ के उन स्रोतों की खोज तक जाता है, जो निहित तो हैं, पर व्यक्त नहीं।
'अनावृत्त कौन?Ó कहानी में वह प्रश्न पूछती नजर आती हैं कि आधुनिकता के नाम पर जो कुछ भी अंधाधुंध प्रचारित किया जा रहा है, परोसा जा रहा है हमारे लिए, एक औसत हिन्दुस्तानी युवती के लिए क्या सहजस्वीकार्य है? अनुसरणीय है? सवाल संस्कारबद्धता या संस्कार के टूटने का नहीं, सवाल आधुनिक भोगवाद की पंकिल गली-सड़ी वासनानुकूल असांस्कृतिक व्यवस्था को लेकर है। उसे हम बिना आंतरिक सवाल से टकराए आंखों पर पट्टी बांधे क्यों मंजूर कर लें? कैबरे जैसे नाच में कला कहां है? वह जंगली हो जाने का रास्ता तैयार नहीं करता? प्रकाश कैबरे इसलिए देखना चाहता है ताकि वह ज्यादा जंगली हो सके। कथा वाचिका से कहता है- आय शैल गेट मोर वाइल्ड... फार यू... फार यू...। परंतु वाचिका को लगता है कि कैबरे नर्तकी ही नहीं, वही अनावृत्त हुई जा रही है। आसपास की सभी स्त्रियां अनावृत्त होती जा रही है- एक-एक करके, कपड़े झरते जा रहे हैं और पुरुष उन्हें देख रहे हैं- वहशियों की तरह- कितना घृणित लगता है। शेमफुल। डिस्गस्टिंग। वासना में प्रेम नहीं होता। प्रेम में वासना होती है कोमलता लिप्त जिसमें पाशविकता माइनस हो जाती है। प्रेम में देह को बहुत घटिया स्तर पर स्त्री स्वतंत्रता की पैरवी करते दिखाना बाजारवाद को ज्यादा स्वीकार्य है परन्तु इस तरह मूल्यों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध होना किसी को पोंगापथ लग सकता है पर यह संस्कृति के मूलार्थ के लिए अभद्र और अशिष्ट तो है ही।
'सहकर्मीÓ कहानी की स्त्री ललित की कलीग है। अबोले की दीवार के पीछे कार्यरत है परंतु ललित को पत्थर की बुत नजर आती है। ललित के बच्चे के बीमार हो जाने की खबर सुनकर सहानुभूतिवश सवाल-दर-सवाल खड़े कर देती है। अजायबघरों के बाहर खामोश पड़ी तोपों के ठंडे सीने में से एकाएक निकलते गोलों की तरह। अपनी पीड़ा को उसने बक्से में बंद कर जंजीरों से बांध लिया और मन की अतल गहराइयों में उतार लिया है। उसकी खामोशी को कटाक्ष में 'सुपर वोर ओर ट्रेजिडियनÓ जैसे फतवे दिये जाते हैं। उसके पिता नहीं रहे। मां से बरसों मिली नहीं। एक युवक से संबंध बने। मुश्किल में छोड़कर भाग लिया। बच्चे को हॉस्टल में रखा, बीमार होकर चल बसा। एक संवेदनशील लड़की के लिए 29-30 की आयु तक पहुंचते ये सब अंदर से तोड़ देने के लिए बहुत भारी था। कहानीकार की नजर जलने के बाद की राख पर नहीं उसमें दबी चिंगारियों पर है। ललित उसे विदा करते हुए कहता है- 'जीवन अपने लिए भी होता है। राह चलते किसी ट्रेजेडी के हो जाने से सब कुछ खत्म नहीं हो जाता।Ó वह विदा करने के नाम पर यही कहने आया था कि जीवन किसी भी नाम, किसी भी रूप में पुकारे तो वह उसे इंकार न करे।
राजी सेठ चिंतन-स्वातन्त्र्य को तरजीह देती हैं। हमें याद है मिल्टन ने कहा था, 'मुझे समस्त स्वतंत्रताओं से अधिक अपने विवेक के अनुकूल ज्ञान, वाणी और विवाद की स्वतंत्रता दो।Ó 'अपने दायरेÓ कहानी के वाचक की मां को सामाजिक समझौते का रुग्ण विकल्प पसंद नहींÓ- 'मैंने तुमसे कहा था, मुझे पूरा लो या पूरा जाने दो। स्वस्थ अधिकार दो या स्वस्थ मुक्ति, परंतु तुमने संबंध को एक सामाजिक समझौते के तहत जीते रहने की रुग्ण च्वॉयस दी है...। पूरा मरना भी नहीं पूरा जीना भी नहीं..।Ó
हमारी समीक्षा के पास कुछ खाने हैं, कुछ दराज, हम रचना को उन दराजों/खानों में फेंकने के आदी होते जा रहे हैं। यह दराज स्त्री पीड़ा का, यह दराज देह मुक्ति का, यह पितृसत्ता के विरोध का। परंतु क्या हमारे पास ऐसा कोई दराज है जिसमें इस मां के मनोद्गार बंद किए जा सके? आचार्य शुक्ल से आरंभ हुए फुटकर खाते ज्यों के त्यों चले आ रहे हैं जबकि बदलते दौर ने मन:स्थितियों को बदला है। यह स्त्री सड़ा-गला उपेक्षित अंग बनकर जीना नहीं चाहती। दुर्गन्ध से घृणा है... दूसरों की शर्तों पर ही जीना हो तो मरने की अपनी शर्तें क्या बुरी है?
संवेदनाएं धीरे-धीरे जड़ होती जा रही हैं। जीने का ढंग आ गया है। जहां अहसास है, वहां दर्द है, जहां अहसास ही नहीं, वहां दर्द भी नहीं...।Ó
भीतर गुजरते काल पर वह अपनी छापे खोदता चलता है। इन छापों की पोटली बनाकर हम इसे स्मृति की कोठरी में रख लेते हैं। वे वहीं की वहीं रहती हैं, फिर उनमें कोई दूसरा समय, दूसरा काल नहीं जुड़ता। एक रचनाकार का काम है अनसुनी आवाजों को सुनना। सुनना-भीतर पकने देना और फिर शब्द, पेंसिल, ब्रश और रंग द्वारा सबको आकार देना। ...'जरा तमाशा तो देखो। इस दुनिया का- वे सारे दुख-दर्द जो दिखाई देते रहते हैं, वही गाये जाते हैं, बाकी के सब... उनका तो कोई सुराग भी नहीं मिलता। और तो और वे इंसान की अपनी पहचान में भी नहीं आते।Ó
'यह कहानी नहींÓ कहानी के अंकल को अपने अंदरुनी जख्म दिखाने की इच्छा नहीं होती। सड़क पर दौड़ती एक कार सलाखों से भरे ट्रक से टकरा गई। सलाखें मारुति के पेट में धंसती चली गई... बेटा-बहू-पोता-पोती-सभी-के-सभी कालग्रस्त हो गये। राजी सेठ उनके अंतस्रोत और बुनावट को कुछ इस ढंग से बांधती हैं-
शायद वह (अंकल) अपने को बचा लेने में पूरी तरह माहिर हैं। अचानक मिल जाएं तो चेहरे पर एक अधखिली-सी मुस्कान जड़ लेते हैं जिसके चलते सामने वाला वहीं का वहीं रुक जाता है, पीडि़त प्रदेशों में पैर नहीं रखता। कौन जाने यह मुस्कान निजी प्रदेशों में प्रवेश की निषेधाज्ञा है या नियति ने जो दिया उसकी खुली अवमानना।Ó
वह अब मृत्यु की कड़वी स्मृतियों को जीवन का भविष्याधार देने की कोशिश में है। इससे अच्छा कुछ उनकी समझ में आया ही नहीं कि 'वही क्यों अपनी मुट्ठी में इतना कुछ भरकर जीने के लालच में पड़े रहें। मुक्त क्यों न हो जाएं। क्यों न ले लेने दूं सबको-सब कुछ।Ó वह अब अपनी हथेलियां खोल रहे हैं। देवेन उनके बारे में कहता है- मामा तो सदा के ऐसे हैं। बहुत घमंडी। बहुत खुद्दार। हार नहीं मान सकते। किस्मत भी छेड़कर देखे तो धता बता देंगे। उनकी बहुत ऊंची नाक है- इनसान है तो, कभी तो टूटता है। कथा वाचिका का प्रश्न अंधेरे में दीये की लौ जैसा ही है- 'टूटना दिखना होता है क्या?Ó
'यह कहानी नहींÓ का अंकल ऐसा इनसान है जिसे नियति का प्रबल धक्का दु:ख की तलहटियों में धकेल गया है परंतु वह न केवल साबुत निकल आता है अपितु दूसरों के लिए एक लाइन भी खींच देता है तो इसे आदमीयत का लोहा ही कहेंगे-
'यह तो अंकल का जीवट है कि नियति के आदेशों को वह अपनी सज्जित मुस्कानों से परे ठेल रहे हैं। कितने ही बच्चों के भविष्य को सम्मान से जीने दे रहे हैं, खोकर भी दे रहे हैं, अंकल। दु:ख की आत्यंतिकता। उनके पुरुषार्थ की भट्टी में पिघलकर सार्वजनिक हो जाना चाहती है।Ó
इस अंध आधुनिकता में फंसकर लोगों की पूंछ में आग लगी है। एक आपाधापी मची है। एक पागल दौड़। किसी के पास किसी को जगह देने की न इच्छा है न वक्त, लिहाजा सड़कें खूनी हो गई हैं। और फिर मौत जिसके भटकते कदम हर वक्त पीछा करते रहते हैं। हर कोई चुन लिया जाता है। (कई बार पूरा परिवार ही) बाकी बचे नजदीकी लोग सदमे की बर्फानी शिला छाती पर लेकर बैठे रहते हैं। कहावत है कि मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता। जिंदगी की राहें पुकार रही होती हैं। अंकल उस सदमे की बर्फानी शिला हटाकर जीवन को गले लगाने के लिए स्कूल बनवाते हैं, कोई कर्तार सिंह पुल बनाने के लिए निकल पड़ता है। जख्मों को अतीत के हवाले कर जीवन के उपक्रम में कदम रखना बड़े जीवट का काम है। अस्तित्ववादी कहते हैं जीवन का कोई अर्थ नहीं परंतु हम उसे एक अर्थ देकर जीन योग्य बनाते हैं। दशरथ मांझी, (1934) जिन्होंने पहाड़ काटकर 80 किलोमीटर की दूरी को 13 किलोमीटर तक ला दिया, एक पत्रकार से कह रहे थे- पहाड़ मुझे उतना ऊंचा कभी नहीं लगा जितना लोग बताते हैं। मनुष्य से ज्यादा ऊंचा कोई नहीं होता। 'यह कहानी नहींÓ के अंकल और 'पुलÓ कहानी का कर्तार सिंह क्या दशरथ मांझी जैसे स्वप्नदृष्टा नहीं लगते?
राजी सेठ की कहानियों की विविधता, जीवन के प्रति उनका रचनात्मक दृष्टिकोण, दर्शन की गहराई, सामाजिक चेतना हमें मुग्ध और हैरान तो करती है परन्तु सोचने के लिए विवश भी करती है। इस युग के वैचारिक द्वंद्व, स्त्री अस्मिता, व्यक्ति स्वाधीनता और इंसान की सतत् जिजीविषा इन कहानियों का आधार है। सोच-समझ के खुले वातायन, भारतीय पश्चिमी साहित्य का गहरा अध्ययन और अपना रास्ता अथवा विकल्प चुनने का धैर्य और हिम्मत उनकी कहानियों में मुक्ति की तलाश की आदिम सुगंध बनकर उभरती है। संभव है कुछ पाठकों को उनकी कहानियों के नैतिक आग्रह प्रबल नजर आएं परंतु बेहतर जीवनधर्मी मूल्यों की तलाश और पुनस्र्थापना भी कहानीकार का एक काम है जिसे इस उत्तरआधुनिक समय में गैरजरूरी मानकर रद्द किया जा रहा है। रचना विरोधी समय में रचनाधर्मिता में गहरी आस्था उनका अपहचाना, अप्रकाशित गुण है, जिसकी सार्थकता संवेदना जगाए रखने में अंजाम पाती है। भाषा उनकी सृजनात्मक, आकर्षक, कथानुकूल ही नहीं, सम्मोहित करने वाली भी है।