Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

कहानी का गंतव्य

कैलाश बनवासी
 41,मुखर्जी नगर,सिकोलाभांठा,
दुर्ग(छ.ग.)
मो. 9827993920
इस दौर की चुनौतियाँ बेहद ढीठ, शातिर और सूक्ष्म हो चली हैं। यह हमको स्वीकार करना ही होगा। हम आज ऐसे वैश्विक समाज में जी रहे हैं, जहाँ सूचनाओं का अपार भंडार है, और 'नॉलेज इज पावरÓ का बहुराष्ट्रीय बोलबाला है। साथ ही समूची दुनिया को बरास्ते भूमंडलीकरण कारपोरेटीकरण की जबरदस्त तैयारी है, अर्थात् एक प्रतिशत बनाम 99 प्रतिशत। और आवारा वित्तीय पूँजी राष्ट्रों की सत्ता की नियंत्रक शक्ति बन चुकी है जिसका नंगा, हिंसक और बेरोकटोक प्रदर्शन जारी है। जिसके आगे उनके लोकतंत्र, प्रशासन, न्याय-व्यवस्था और मीडिया चाकर हैं। संस्कृति के क्षेत्र में ये चुनौतियां जैसे सुरसा की तरह दिन-पर दिन विकराल होती जाती हैं। आम आदमी के औजार-वोट हों या हड़ताल, आज धन शक्तियों  के रहमोकरम पर हंै। बावजूद रैलियों, धरनों,और विरोध के इस नव आर्थिक साम्राज्यवाद का कुछ बिगड़ता नजर नहीं आता। यह जैसे एक विशाल दैत्य है जिस पर हम अपने मुक्के बरसा रहे हैं और दैत्य है कि ठठाकर हँस रहा है, जैसे यह वाकई एक बचकाना और मूर्खतापूर्ण काम है जिससे उस पर कोई आँच आने वाली नहीं है। यह बिम्ब बहुतों को एक निराशावादी,और पराजयबोध से ग्रस्त बिम्ब लग सकता है, लेकिन अभी सच्चाई यही है और इसे बदलने में वक्त लगेगा।
  संस्कृति के नाम पर आज जो छूँछ, फूहड़ नाच-गाने बचे हुए हैं, या ऐसे ही सिनेमा और सीरियल, जिनसे कुछ भी बनन-बनानेे की उम्मीद बाकी नहीं है। सब कुछ मनोरंजन के नाम पर ठेला जा रहा है और पीढिय़ों को दिमागी रूप से दिवालिया बना देने की तैयारी है। सांस्कृतिक मोर्चे को इधर केंद्र में भाजपा के सत्ता में आ जाने के बाद बेहद ताकतवर हो चले हिन्दुत्व ब्रिगेड ने आक्रामक जयघोष के साथ संभाल लिया है, और बृद्धिजीवियों की हत्याएं करने, धमकी देने सहित मंदिर निर्माण, घर-वापसी, लव-जिहाद, शिक्षा, प्रार्थना, योग जैसे तमाम एजेंडों या उपकरणों से इस देश की सांस्कृतिक बहुलता को खत्म करने की दीर्घकालिक योजना है। एक फासिस्ट संस्कृति की आहट हम सुन रहे हैं,जो सबसे अधिक विचारों की स्वतंत्रता का दुश्मन है।
   लिखे हुए शब्द की अहमियत इस नव तकनीक समाज में कम से कम होती जा रही है। इसी के साथ उपभोक्तावाद के मायाजाल में समाज बुरी तरह फंसता जा रहा है। बराबरी, न्याय, अधिकार की लड़ाई अब कोई दूर की कौड़ी लाने जैसा लगने लगा है। दरअसल आज मूल्यहीनता और विचारहीनता को ही संस्कृति  के रूप में स्थापित किया जा रहा है। ऐसे में छपे हुए शब्द अपनी उस भूमिका से बहुत पीछे हो गए हैं जब कहा जाता था-जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो! इस वातावरण में निश्चय ही कला की भूमिका बदल जाती है, और आपकी कलम को किसी भी सतहीपन, सरलीकरण से बचाने की जिम्मेदार बढ़ जाती है। इसी के साथ आपको अपना व्यक्तित्व इन प्रचलित सांचों से अलग गढऩे की भी अहम जिम्मेदारी हो जाती है, अन्यथा, पद, पुरस्कार पीठ के स्वार्थ आपको अपने रंग में रंग देने बेताब हैं ही।
     यह साहित्यिक विधाओं के संकट का भी समय है। बावजूद अच्छा लिखे जाने के उन्हें पाठक वैसे नहीं मिल रहे हैं जो उम्मीद करते हैं। देश के सबसे बड़े कवि का कविता संकलन भी आज पाँच सौ प्रतियों में सिमटकर रह गया है। कहानी और उपन्यास की स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन यहाँ प्रकाशकों के अपने लाभ की राजनीति  है जो सरकारी खरीदी के लालच में किताब का मनमाना दाम रखते हैं।
   समकालीन कथा, मेरी मोटी समझ से, लगभग शहर केन्द्रित, और मध्यवर्गीय भावबोध का साहित्य हो चला है। नवें दशक के पूर्वाद्र्ध तक कहानियों में हमें फिर भी किसान, मजदूर, दस्तकार, या ऐसे निम्न वर्गीय लोगों का जीवन, उनके सुख-दुख और संघर्ष पढऩे मिल जाते थे। लेकिन हम सब बेहद अच्छी तरह से वाकिफ  हैं, इधर समाजवादी शासनों का विखंडन, दुनिया के एकध्रुवीय होने और भूमंडलीकरण के बहाने विश्व बाजार का दरवाजा खोल देने, और देश की धन-संपदा की लूट के लिए मल्टीनेशनल्स को बुलाने और जंगलों, आदिवासियों, खेतों को उनके मनमाफिक विशाल चारागाह में बदल देने के दौरान धीरे-धीरे यहाँ का सबकुछ बदल रहा था। एकाएक सैकड़ों की संख्या में अरबपतियों का उदय, कर्ज में मिलते कई हजार करोड़ों की उन्हें छूट, उनकी पूँजी में हजारहों गुने की बढ़ोतरी के साथ-साथ इन्हीं लालसाओं में लगे दलाल वर्ग का आना फिर बाजार के लिए बिछ जाना...कितना कुछ होता रहा और कुछ साल के बाद ,इक्कीसवीं सदी में जिस भारत में हम सांस लेते हैं वह उस भारत से बिलकुल जुदा है जो कभी गांधी अपने सपने में देखा करते थे। जीने का ढंग बदला तो विचार बदल गए। शहर की कौन कहे, गाँवों तक बाजार ने ऐसी सेंध लगा दी कि वे भी इसके पीछे-पीछे चलने लगे। समय बदला तो हमारी कहानी बदल गयी। इसके नायक बदल गए। कहानी से अधिकाधिक बाजार के लिए की मांग बढ़ गई। बाद में उत्तर आधुनिकता की आंधी इतिहास, विचार, समाजवाद के साथ-साथ कहानी उपन्यास आदि के अंत की घोषणाओं के साथ उन सरोकारों को ही उड़ाकर ले गई। अखबार और पत्रिकाओं  के रंगीन होने के साथ इनमें मध्यवर्ग या नव धनाढ्य वर्ग का जीवन,उनकी शयनकक्षीय लीलाएं और कामनाएं आ गईं, जिसे इन्हीं मानसिकता के संपादकों ने अपनी पत्रिका की खरीदी बढ़ाने इसे बाकायदा एक मुहिम का रूप दे दिया गया और इनके विशेषांक पर विशेषांक निकाले। इसी बीच,नये लेखकों की एक बड़ी टीम आती है तो उनके लेखन को भी इसी बिक्री लाभ की दिशा दिखा दी गई। कहा यह जाने लगा, कि ये ही देश की सच्चाई अधिक नयेपन के साथ ला रहे हैं। लेकिन इस नये में अच्छी किस्सागोई है, कहने की कला है, देसी से लेकर लेटिन अमेरिकन जादुई यथार्थवाद है, भाषा के रंजक खेल हैं, लेकिन वे तत्व जानबूझकर छोड़ते चले गए जो मनुष्य के भीतर के गहन गुस्से और उसकी छटपटाहट से जागता है। ज्यादातर तो वह नयेपन के नाम पर लड़के लड़कियों के प्रेम या अंतरंग संबंध जिसमें सो कॉल्ड बोल्डनेस के नाम पर परोसी जाती अश्लीलता।
   हमें यह स्वीकारने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिये कि कहानी का बजार काफी फैला और फल-फूल रहा है। लेकिन अपने आपसेे यह प्रश्न जरूर करता हूँ कि आखिर यह कहानी हमें दे क्या रही है? मात्र यथार्थ को रख देने की प्रविधि आज कथा में पिछड़ी हुई प्रविाधि है, इससे कोई बात नहीं बनने वाली। कथाकार ज्ञानरंजन अपने एक लेख समय,समाज और कहानी में एक जगह कहते हैं-'यथार्थ ठोस नहीं है,वह हर दिन बदल रहा है। वह ज्यादा अप्रत्यक्ष,अमूर्त और सूक्ष्मता में कैद होने के साथ-साथ,उतनी ही जटिल लुका-छिपा है। उसका फोटोग्राफ आसानी से नहीं बन सकता। उसमें परदेस आ गए हैं और दीर्घकालिक संधियां।Ó तो हमें नये प्रयोग भी चाहिए, लेकिन, वही जो इस दौर के चाल-चलन और यथास्थिति पर सीधा हमला करे।  आज स्थिति यह है कि गाँव के या किसी गरीब की कहानी होते हुए भी वह उसके पक्ष की कहानी नहीं होती,या प्रतिरोध की कहानी लगती होने के बावजूद दरअसल वह बाजार की मांग पर उन्हीं शक्तियों के पक्ष में खड़ी हो जाने वाली और दूसरे पक्ष को कमजोर कर देने वाली कहानी हो सकती है। यदि सिनेमा का उदाहरण लेकर कहें तो किसान की आत्महत्या जैसा बेहद संगीन विषय भी 'पिपली लाइवÓ फिल्म में एक मजे देने वाला हास्य बनकर रह जाता है। ये साहित्य में भी होता है। स्त्री विमर्श के नाम पर देहवाद की वकालत की जाती है। यहाँ यह भी कहना होगा, इस दौर में अधिसंख्य समीक्षा आलोचना भी जैसे इन्हीं के मुताबिक चलती रही, जिसने मजदूर, किसान या ऐसे ही किसी गरीब-गुरबे की कहानी को देखना तक गवारा नहीं किया। गाँव,किसान या मजदूर देश की राजनीति, प्रशासन में ही नहीं वरन साहित्य में भी बुरी तरह छला गया है।
   आज जो युवा पीढ़ी हमारे सामने है, वह किसी भी सामाजिक सरोकार से कोई सरोकार नहीं रखने वाली पीढ़ी है, जो अपनी अच्छी जिंदगी के मायने केवल अपने मौज-मजे तक ही मानती है, या कभी विरोध दिखाना हुआ तो कैंडिल-मार्च का प्रदर्शन। एक कथाकार के रूप में मुझे एक बड़ी चुनौती तो यही लगती है कि इसे किस तरह संबोधित करें। क्योंकि ये हम लोगों के उस विचार, स्वप्न से जैसे कोसों दूर के आदमी हैं जिन्हें हमारी भाषा और बातें बहुत अजीब और किसी अजायबघर की लगती हैं। यहीं लगता है कि साहित्य सहित तमाम कलाएं अपनी भीषण विफलता के दौर में है। तो क्या इनकी जरूरत के हिसाब से, पठनीयता के लिहाज से पेश आया जाए? मुझे लगता है यह करना कोई अनुचित नहीं होगा। क्योंकि अंतत: सबसे पहली जरूरत तो अपनी कहानी को उन्हें पढ़ाने की है, विचार तो उसके साथ-साथ चला ही आएगा। इस मायने में यह कलाओं के लिए, खासकर जनपक्षधर कलाओं के लिए दोहरे तिहरे संघर्ष और चुनौतियों का समय है। किसी दौर में प्रेमचंद, कभी रेणु, कभी परसाई, तो कभी निर्मल वर्मा सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखक थे। हमारे दौर में यह स्थान कुछ समय के लिए कथाकार उदयप्रकाश को हासिल हुआ था लेकिन आज वे उस शीर्ष गौरव को गंवा चुके हैं। सब कुछ आज छितराया-सा मालूम होता है। एक विश्वसनीयता का संकट भी हम लेखकों का बड़ा संकट है।
   ज्ञान जी की ही एक बात से अपनी बात समाप्त करूंगा- 'दी हुई दुनिया को स्वप्न की दुनिया से जोडऩा ही कहानी का गंतव्य है।Ó