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Monday 20 Nov 2017

अच्छे दिन आने वाले हैं

 

यश मालवीय
ए-111 मेंहदौरी कॉलोनी
इलाहाबाद- 211004 (उ.प्र.)
मो. 019839792401
अच्छे दिन आने वाले हैं
बाज का मुंह और चिडिय़ों के निवाले हैं
$खून में डूबे हुए सारे रिसाले हैं
आंख में परछाइयां हैं और जाले हैं
असलहों की टोह में मस्•िाद शिवाले हैं
सूझता कुछ नहीं चितकबरे उजाले हैं
लोग अपनी आंख में ही पांव डाले हैं
सिर उछाले हैं कभी नारे उछाले हैं
कढ़ी बासी है मगर फिर-फिर उबाले हैं
इन्हें समझो सि$र्फ तारीखें़ खंगाले हैं
सल्तनत के लिए तरकीबें निकाले हैं
बात आ$िखर क्या करेंगे बंद ताले हैं
क्रूर तेवर देखिए भेडिय़ों वाले हैं
हाथ में तिरशूल है, बर्छियां-भाले हैं
र में साकार है, हर काम टाले हैं
और भोलेनाथ की नगरी संभाले हैं
$खून जनता का कि जिससे दिया बाले हैं
तीरगी के सांप के हम सब हवाले हैं
आग बोकर बहुत गाढ़ा धुआं चाले हैं
आप जाने किस किसिम का वहम पाले हैं
अच्छे दिन आने वाले हैं!
अच्छे दिन आने वाले है!!

पत्थर जैसा चेहरा

आंधी पानी ते धाम का
पत्थर जैसा चेहरा
राजनीति में बड़े काम का
पत्थर जैसा चेहरा

रूह तड़पती गांधी जी की
छलनी है फिर छाती
उनका नाम ले रहा कोई
हिंसक सा गुजराती

शीशे में देखो अवाम का
पत्थर जैसा चेहरा

टुकुर टुकुर बस ताक रहे हैं
विश्वनाथ अविनाशी
सरयू तट पर बसी अयोध्या
पर चढ़ बैठी काशी

इस विकास ने किया राम का
पत्थर जैसा चेहरा

लहर लहर हो गई सुनामी
तीरथ का जल खौला
साधु-संत महात्माओं को
देख देख जी हौला

धुंधलाया सा सुबह शाम का
पत्थर जैसा चेहरा

ठंडे कभी नहीं हो सकते
गर्म लहू के छींटे
चाहे जितना करते आरती
पत्थर पानी पीटे

गंगा पूजे ताम झाम का
पत्थर जैसा चेहरा

दांव-पेंच से भरी हुई है
बिखरी छितरी दाढ़ी
धोने चली सियासत,
गंगा जी की मैली साड़ी

तुमने देखा क्या प्रणाम का
पत्थर जैसा चेहरा।

भूखा बंगाली भात भात

क्या चांद रात, क्या काल रात
भूखा बंगाली भात भात

चलता महारास का पहिया
घूमा है विकास का पहिया
पहिए के नीचे है जनता
कुचले है विनाश का पहिया

गोजर बिच्छू का संग-साथ
इनके उनके हैं पांव-हाथ

रोली-टीका, सा$फा-पगड़ी
सोने की थाली में खिचड़ी
है तीर-धनुष, तलवार-ढाल
ये नागनाथ,  वो सांपनाथ
करते हैं केवल बड़ी बात

केवल मेंढक नापे-तौले
भीतर ही भीतर बस खौले
पोस्टर-नारे-झण्डे लेकर
सड़कों पर जाने पर हौले

फिर हुए ढाक के तीन पात
पूछते बिरादर कौन जात

करते अभिवादन-अभिनंदन
गंगा के घाट घिसे चंदन
है 'छन्नूलालÓ, गगनभेदी
सत्ता का मंच, भजन-कीर्तन

जो टेक रहे हैं सिर्फ माथ
रखते हैं भीतर बड़ी आंत

कर रहा जमूरा वाह-वाह
है भांग धतूरा वाह-वाह
घंटा-घडिय़ाल, शंख ध्वनि संग
बज रहा तमूरा वाह-वाह

पेटों पर मारा करे लात
है नशा किये सारी बरात।