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Wednesday 22 Nov 2017

\'अलीगढ़\' एक याद

मुकुट सक्सेना
5-ग-17, जवाहर नगर
जयपुर-302004
मो. 09828089417
'अलीगढ़' एक याद
दशकों दशकों बाद भी
क्यों आती रहती है
अलीगढ़ की याद?
अलीगढ़ के साथ
याद आते हैं सर सय्यद अहमद खां
और मुस्लिम यूनिवर्सिटी
फिर डॉ. जाकिर हुसैन
उभरते हैं स्मृति पटल पर
मजा ज
तथा
अपने अपने कमरों में
तकिये के नीचे छिपाकर रखी
उनकी गजलों के साथ
दीवानी लड़कियां!
मजा ज के सहपाठी
अली सरदार जा$फरी
प्रो. हबीब
मासूम रजा 'राहीÓ
उनका उपन्यास 'आधा गांवÓ
तथा
महाभारत सीरियल के लिए
लिखे संवाद;
और वह हॉल, जहां फिल्माई गई
'मेरे महबूबÓ की राजेन्द्र कुमार द्वारा
गाई दर्शाई सदाबहार गजल-
'मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम!!Ó
तो दूसरी ओर
शहर की नितांत पुरानी
दुनिया
बेहद कम चौड़ी सड़कें
संकरी गलियां
आड़ी-तिरछी छोटे-बड़े मकानों की
कतार-दर-कतार
घनी आबादी में घर-घर तालों का
कुटीर उद्योग
मक्खी, मच्छरों की भरमार
हर समय उड़ती धूल/और
कीचड़ की दुर्गन्ध,
अचल तालाब पर
ग्लेहराज जी का छोटा किन्तु
ऐतिहासिक मंदिर
चार-पांच सिनेमाघरों में
मशहूर 'तस्वीर महलÓ
फूल चौराहा, सरा$फा बाजार
मदारगेट, दुबे का पड़ाव,
ऊपरकोट की जामा मस्जिद
तहसील कोल
अलीगढ़ से पूर्व रहे
हरीगढ़ की पहचान,
जयगंज का
घिचपिच बाजा र
मेरिस रोड पर नीरज जी का
मकान
डी.ए.वी. बारह सैनी, महेश्वरी
और धर्म समाज कॉलिजों की
धूमधाम/
नुमायश का रोमांच
तथा
वह सब अच्छा बुरा
जो हर शहर में रहता है पसरा!!
साथ ही याद आते हैं
स्वतंत्रता से पूर्व और
बाद के परिदृश्य
जहां
देश के बंटवारे की पड़ी
दा$गबेल;
हुई साम्प्रदायिक मारकाट
अलीगढ़ बन गया जिसका
पर्याय,
आहत और हताहत लोग
रहा साक्षी मैं भी
उस समय का!!
मेरा छोटा सा अलीगढ़
कितनी बड़ी-बड़ी हस्तियों का गढ़
ढोता रहा कैसी कैसी
पस्तियों का बोझ
झेलता रहा बार-बार
अनेकानेक प्रहार
छलनी हुए कलेजे के साथ
समेटे रहा अपना इतिहास!!
वही,
हां वही अलीगढ़
क्यों आता रहता है मुझे
याद, बार-बार
लगातार-
अभी तक?
यह जानते हुए भी
कि वह अब कहां
पहचान पायेगा मुझे
पीढ़ी दर पीढ़ी के
इतिहास हो जाने के बाद??

हमारे जंगल
छीन ही लिए तुमने
हमारे पेड़-रुख,
झाड़-झंकाड़
खर-पतवार/यानी
हमारे घर-बार
और बना, खोल लिए
अपने पेट्रोल पम्प
साथ में विशाल
जलपान गृह/जैसे
कांच का महल
हमारे जंगल में!
शायद
समझ लिया हमें
निरीह, हेय और
असहाय;
बिगाड़ भी क्या सकते हैं
ये टिड्डे
कभी इंसान का कुछ?
लेकिन
हम लेंगे प्रतिशोध
अपने सामथ्र्य भर
छा जाएंगे हजारों की
तादाद में/तुम्हारे
इर्द-गिर्द
चप्पे-चप्पे पर
मौन
कुचले जाने के लिए
तुम्हारे बूटों के तले
अथवा चिपक जाएंगे तुम्हारी
गर्दनों पर
'सुविधाओंÓ में
निवृत्त होते समय।
चीखेंगे तुम्हारे ग्राहकों के
बच्चे, हमें
उड़ता फुदकता देख;
हो जाएंगी तुम्हारी
व्यवस्थाएं
अस्त-व्यस्त/कभी न कभी
भयभीत
और किंकत्र्तव्यविमूढ़
कर देगी हमारी
सामूहिक उपस्थिति
एक न एक दिन।
तब
होना होगा तुम्हें
निरुत्तर
हमारी अहिंसा के
समक्ष!!

दैनिक अखबार
यत्र-तत्र-सर्वत्र
सूचनाओं के ढेर में से
सहेज लाने पर
सार समाचार

यंत्रीकृत यंत्रणाओं में
से गुजरता हुआ
जब झूठ-सच की
धरती फोड़कर
होता है मेरा जन्म
तब मेरे अस्तित्व में
अपना अस्तित्व खोजने वाले
पाठकों की
बांछें खिल जाती है-
मुझको देखते ही;
और मैं जन-जन के हाथों में
भोर की किरण के साथ
किलकारता हुआ
फूला नहीं समाता
करोड़ो-करोड़ों की
प्रात:कालीन तृप्ति में ही
लगती है मुझे, मेरी सार्थकता
शाम तक रद्दी हो जाने के
बावजूद!!