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Friday 24 Nov 2017

आओ चलें

शिवकुमार अर्चन
10, प्रियदर्शिनी ऋषि वैली
ई-8, गुलमोहर एक्स
भोपाल-462039,
मो. 09425371874
आओ चलें
विगत में लौटें
फिर से बचपन जी लें
सुलझाकर मन की गांठों को
याद करें कुछ भूलें

काट पतंगें, माझा लूटें
चलकर मैदान में
धीरे-धीरे सीढ़ी-सीढ़ी
उतरें तहखानों में
सपनों के घर में लटकाएं
जुगनू की कंदीलें

साध निशाना, चला गुलेलें
तोड़ें कच्ची कैरी
खींसे में पुखराज सरीखी
भर लें नीम निबौरी
वर्तमान धुंधला धुंधला है
देखें पिछली रीलें

नदी नहाएं, छप छप तैरें
सीपी शंख बटोरें
बना रेत में नए निकेतन
दुख की बांह मरोरें
खुशियों की मीठी नहरों का
निर्मल पानी पी लें

पुनर्नवा हो जाएं

आओ हम पोशाकें बदलें
पुनर्नवा हो जाएं

डाल हाथ में हाथ
चलें हम
किसी नदी के तीरे
विस्मृत युगल गीत दुहराएं
फिर से धीरे-धीरे
ऐसी गूंज उठे, इच्छाएं
फिर सधवा हो जाएं


ढोते ढोते उमर थक गई
ये घर और गिरस्ती
खिड़की खोलें, आओ खोजें
कुछ सपने कुछ मस्ती
गमलों का जीवन छोड़ें
वन के फुलवा हो जाएं

झरने का संतूर सुनें हम
मौसम की पदचापें
फूलों की घाटी में उतरें
पर्वत का कद नापें
पानी को बदलें फुहार में
और हवा हो जाएं

मौलसिरी के नीचे

आओ हम तुम
चलकर बैेठें
मौलसिरी के नीचे
आगे-आगे चल जवानी
बचपन पीछे-पीछे

कब से लेटे नहीं
दूब के नरम नरम बिस्तर पर
कब से सुने नहीं है हमने
बंशी मादल के स्वर
चार कदम हम चल न पाए
सुख थे बहुत नगीचे

कोहनी पर आकाश टिकाए
तारावलियां ताके
इस पृथ्वी को उस चंदा की
खिड़की से हम झांके
कब से बंद पड़े हैं मन के
खोलें •ारा दरीचे

क्यों कर सूख नहीं पाता है
इन आंखों का पानी
कितने तो पैबंद लगे हैं
चादर हुई पुरानी
सांसों के ताने बाने से
बुन लें नए गलीचे।