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Friday 24 Nov 2017

दरपन में जैसा दिखता है वैसा वह मासूम नहीं है,

 

डॉ. परशुराम शुक्ल
देवीपुरम कॉलोनी
शिवपुरी (म.प्र.) 473551
दरपन में जैसा दिखता है वैसा वह मासूम नहीं है,
उसके भीतर क्या-कैसा है दरपन को मालूम नहीं है।
साधन को साधन से ज्यादा जिसने माना धोखा खाया,
चश्मा कितना ही महंगा हो आंखों का वह नूर नहीं है।
चाहे धन हो, चाहे ओहदा, चाहे विद्या, प्रभुता, अनुनय,
कारण कुछ हो, मिला न ऐसा कोई जो म$गरूर नहीं है।
कहां गए वे दिन वे रातें जिनमें जीना धन्य हुआ था,
बीते को बस याद किया है यह जीवन मायूस नहीं है।
उनकी खुशबू लिए हवा ने समझाना चाहा है विरही,
तुम जिसकी खातिर निकले हो वह दरवाजा दूर नहीं है।

(2)
देखते आ रहे हैं जमाने से,
कोई खुश नहीं दिखा जमाने से।
रात सदा रात ही कहलाएगी,
नहीं दिन होगा दिया जलाने से।
झूठ और सच तो खुद बोलते हैं,
बा आये बहाने बनाने से।
आज के बच्चे न जी सके बचपन,
असमय ही लगते हैं सयाने से।
आज बड़ी बात है मिलकर बैठें
यही चाहता विरही जमाने से।
सुपारी
निर्मित के निर्माता बनने का इतिहास
शब्द का इतिहास
यह भी सही है शब्द (नाम) नहीं होते,
होते हुए भी हम नहीं होते।
सुकोमल, सुचिक्कण तन होता
गुलाबी ओंठ, मोतिया दांत, रतनारी आंखें
सुदर्शन वसन-अलंकरण होता
मन होता उन पर
बेचैन बिना उनके
आंखों में वे ही होते।
सब वैसे ही होता जैसा होता है
कोई नाम नहीं होता किसी का।
शब्द नहीं होते
सौन्दर्य, प्रेम, दर्शन, विवाद-
तथ्यों के वैज्ञानिक संवाद नहीं होते।
गूंगी रहती कला
वीणा को बोल कौन देता?
पता क्या कैसा होता लोक
अवश्य ही लोक गीत नहीं होते।
शब्द ब्रम्ह नहीं होता
ब्रम्ह शब्द नहीं होता
अनेकार्थी रिश्ते-व्यवहार

ज्ञान-विज्ञान के आधार
व्यवस्थाएं-आस्थाएं
शब्द पर निर्भर
अर्थ-निर्झर।
शब्द शिल्पियों ने गढ़ी
प्रतिमा विराट
साहित्य देवता की
कैसे होती प्राण-प्रतिष्ठा
शब्द नहीं होते तो।

यह भी है सच
दुरुपयोग शब्द शक्ति का
सूखते अर्थ-निर्झर
बंजर होते शब्द-खेतों से
ऊबे हुए लोग
विखंडन-कूप में डूबे लोग
नकारते हैं शब्द की महिमा।
शब्द-चाणक्य की आज्ञा
नहीं मानते हुए चन्द्रगुप्त।
महाबलियों ने हथियाए हैं
शब्दों के हथियार।
चन्द्रगुप्तों ने महाबलियों के साथ
शब्द की हत्या की सुपारी दे दी है।
कुछ कर सको तो करो।