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Monday 20 Nov 2017

चांद पर जाना है जिनको, चांद पर बाशौक जाएं।

जीवन यदु
गीतिका, दाऊ चौरा,
खैरागढ़-491881 (छ.ग.)
मो. 9752023921
(1)
चांद पर जाना है जिनको, चांद पर बाशौक जाएं।
इस धरा पर शेष हैं मेरे लिए संभावनाएं।

घोंसले मत तोड़ चिडिय़ों के भरी बरसात में तू
बेघरों के दुख में शामिल, लौट भी सकती घटाएं।

बेदरो-दीवार वाले घर में जो हैं लोग रहते
आपको वे क्या दिखाएं, आपसे वे क्या छिपाएं।

उस समंदर में भला क्यों डालते हो नाव अपनी?
तैरती हैं जिस समंदर में हजारों हिम-शिलाएं।

सीख जाएं खून को हर हाल में अब $गर्म रखना,
कल सिकुड़ जाएंगी वरना आपकी धमनी-शिराएं।

आज तक पैदा हुआ न एक भी ऐसा हिसाबी,
गिन सके जो आदमी के मन में हैं कितनी गुफाएं।

कौन रत्नाकर जो देखे क्रौंच का मरना सड़क पर,
कौन रामायण लिखे जब मर गई संवेदनाएं।
(2)
गया घर से तो घर का फिर कभी मौसम नहीं देखा।
ज्यों फूलों ले जड़ों तक आके उनका गम नहीं देखा।

नदी सूखी तो सूखा पेड़ भी जो था किनारे पर,
परिंदों ने कहा- ऐसा कहीं हमदम नहीं देखा।

मेरे सपनों में ऐसी एक दुनिया रोज आती है,
किसी की आंख को मैंने वहां पर नम नहीं देखा।

गली-कूचों में उड़ते ध्वज यहां पर सैकड़ों देखे,
अमन का एक भी लेकिन कहीं परचम नहीं देखा।

जो विज्ञापन दवा का कर रहे, उनको कभी मैंने-
किसी के जख़्म पर रखते हुए मरहम नहीं देखा।

दिलों के मेल का मतलब, वो जानेंगे भला कैसे,
दो नदियों का जिन्होंने आज तक संगम नहीं देखा।

वो अखबारों में अक्सर हादसों पर रो लिया करते,
यूं उनके चेहरों पर आज तक मातम नहीं देखा।
(3)
चेहरा उनका मुझे देखा लगा।
हू-ब-हू वह देश का नक्शा लगा।

सत्य को जिस दिन जहां मारा गया,
दूसरे दिन से वहां मेला लगा।

वक़्त ने जब आदमी की जांच की,
$खून पानी से अधिक पतला लगा।

गांव में बांटे गए मोती, मगर-
मुझको कांटे में गूंथा चारा लगा

डर से रोहू के वो काली मछलियां-
बस गईं, पानी जहां ठहरा लगा।

आज हैं अनगिनत कुएं, बोरिंग भी हैं,
किन्तू जोखू आज भी प्यासा लगा।

(4)
सियासत में नहीं कोई भी कुंदन-सा खरा होगा।
चमक सोने की होगी, पर खोटपन से भरा होगा।

दुआ बरसात की मांगों, बहारें आ ही जाएंगी,
बिना बरसात के आए, चमन कैसे हरा होगा।

मेरा सिर क्यों नहीं झुकता महल वाली बुलंदी पर,
वो घर तो हो नहीं सकता, किसी का म$कबरा होगा।

चमकती-सी दिखाई दी मुझे मरहूम की आंखें,
सुबह का ख़्वाब लेकर वो अंधेरों में मरा होगा।

वो अपनापन जताकर पूछता है हाल अब सबसे
सियासत का खिलाड़ी है, ये उसका पैंतरा होगा।

हमारी खोज है अमृत, मगर गैरों के हक में है,
हमारा ख़्वाब वो प्याला, जो अमृत से भरा होगा।
दिखाया आईना उनको तो वो हंसते हुए बोले,
ये मुझ-सा ही दिखे है,पर ये कोई दूसरा होगा।