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Monday 20 Nov 2017

भोगवाद की व्यापकता

सदाशिव श्रोत्रिय
आनंद कुटीर
नई हवेली
नाथद्वारा-313301
मो. 9352723690
इसे  नकार पाना कठिन है कि हमारा देश जो अब तक चार्वाक के दर्शन को या शुद्ध भोगवाद को आलोचना की दृष्टि से देखता था और त्याग,तप, निस्वार्थ सेवा ,इन्द्रिय-निग्रह आदि गुणों  को अधिक आदर देता था अब जैसे अचानक संपूर्णत: भोगवाद की गिरफ्त में आ गया है। इसके पीछे और अन्य कारण चाहे जो रहे हों पर इसमें पूंजीवाद और  तकनीकी विकास की निश्चय ही अहम भूमिका रही है। पूंजीवाद ने जहां लोगों के लिए ऐसी  आय को संभव बनाया है जो पहले उनके लिए अकल्पनीय थी वहीं तकनीकी विकास ने उन्हें          भोग-विलास और इन्द्रिय-सुख के अनेक नए साधन उपलब्ध करवाए हैं। यह किंचित विडम्बनापूर्ण है कि अब तक भोग की जगह त्याग को और स्वार्थ की जगह परमार्थ को मानवीय श्रेष्ठता का मापदंड मानने वाला हमारा देश अब अधिक अर्थोपार्जन और अधिक व्यय की सामर्थ्य को ही मानव जीवन की सफलता का पर्याय मानने लगा है। अधिकाधिक भोग ही हमारे यहां अब सर्वाधिक स्पृहणीय हो गया है और भोगवाद ही अधिकांश लोगों का इष्ट   बन बैठा है।
अच्छे जीवन का अर्थ अब किसी बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित जीवन न होकर अधिकाधिक भोग-विलास में बिताया जीवन होता जा रहा है। अच्छा खाना-पीना, अच्छा पहिनना-ओढऩा,अच्छा दिखना-दिखाना ,देश-विदेश के सैर-सपाटे,आधुनिकतम आरामदेह उत्पादों का मजा लेने में समर्थ होना यही अब अच्छे जीवन की परिभाषा होती जा रही है। एक दिन तो इस दुनिया से जाना ही है ; अत: जब तक जीना है तब तक क्यों न सुख से जिएं- यही भोगवादी सोच आज आम भारतीय के कार्यकलापों को नियंत्रित करने लगा है।
यह सच है कि मानव ने अपनी प्रगति के तौर पर अपने लिए अधिकाधिक आराम और सुख- सुविधाएँ जुटाने की कोशिश की है। पर एक स्वस्थ संस्कृति आराम, सुख-सुविधा और मनोरंजन के साथ श्रम,परोपकार,लोककल्याण और चुनौतीपूर्ण जीवन को भी आदर्श के रूप में देखती है। दुर्भाग्य से आज आरामतलबी की चाह हमारे समाज का एक प्रमुख गुण बनता जा रहा है। हम देखते हैं कि तकनीकी साधनों के अभाव में पहले जो लोग बिना बिजली के पंखों के गर्मियां काट लेते थे वे अब आय और साधन-वृद्धि के साथ पंखे से कूलर और कूलर से एसी वातानुकूलन की चाह करने लगे हैं। बिजली की बढ़ती दर और गहराते जाते ऊर्जा  संकट के बावजूद लोग अपने आराम और सुविधा की खातिर रसोईघर तक में बिजली उपकरणों के प्रयोग में संकोच नहीं करते। जो पहले द्वितीय श्रेणी के शयनयान आरक्षण से संतुष्ट हो जाते थे उनकी मांग अब वातानुकूलित शयनयानों के लिए इतनी बढ़ गई है कि तीन  महीने पहले आरक्षण शुरू होने पर भी चंद मिनटों में ही उनके सारे आरक्षण समाप्त हो जाते हैं। अब लम्बी यात्राओं की तकलीफ से बचने के लिए हमारे इस विकासशील देश में भी अनेक लोग वायुयान-यात्रा को तरजीह देने लगे हैं।
सब जानते हैं कि जो व्यक्ति केवल अपने लिए अधिक आराम की चाह करता है वह स्वाभाविक रूप से दूसरों के आराम की जरूरत के बारे में असंवेदनशील हो जाता है। दूसरों को कष्ट उठाते देख कर भी वह अपने आराम में कोई कमी नहीं आने देना चाहता। हम  देखते हैं कि किसी विकलांग,बच्चे वाली स्त्री या वृद्ध को खड़े देख कर भी आराम से बैठे कई  युवा आजकल  किसी सार्वजनिक वाहन में अपनी सीट नहीं छोडऩा चाहते। किसी मेहमान के आ जाने पर पहले के मेहमान नवाज़ लोग उसे अपने घर के सर्वाधिक आरामदायक माहौल में  रखते  थे। पर अब किसी  मेहमान के आ जाने पर भी  लोग  सामान्यत: अपने या अपने बच्चों के आराम में कोई फर्क नहीं आने देना चाहते। आरामतलबी की यह चाह अब कुछ इस कदर बढ़ी है कि लोग अपने भाई-बहनों , रिश्तेदारों या अपने मां-बाप तक के लिए अपने आराम में किसी तरह की कमी बर्दाश्त नहीं कर सकते। आरामतलबी की चाह ने इस तरह इन्सान को धीरे-धीरे औरों के प्रति असंवेदनशील बना दिया है।
अब कोई किसी की खातिर कष्ट  नहीं उठाना चाहता। शारीरिक श्रम या दूसरों की सेवा अब हमारी जीवन शैली का अंग नहीं रह गया है जैसा कि वह पहले हुआ करता था। पहले लोग सोचते थे कि जिन मां-बाप ने हमारे बचपन में कष्ट उठा कर हमें बड़ा किया उनकी वृद्धावस्था में सेवा करना हमारा भी कर्तव्य है। माता-पिता के प्रति वह कृतज्ञता भाव नई पीढ़ी की नैतिकता का हिस्सा नहीं रह गया है। अब तो यदि  माता-पिता के पास कुछ दौलत है तो कई  बेटे-बेटियों की इच्छा उसे जल्द से जल्द हथिया लेने की रहती है ताकि वे उसकी बदौलत आज की दुनिया के बहुत से मजे ले सकें। भोगवाद की परिणति इस प्रकार की स्वार्थपूर्ण असंवेदनशीलता के अलावा और किसमें हो सकती है?
 दुर्भाग्य से यह स्वार्थीपन भी आज दुतरफा हो गया है। आराम की  चाह ने कई माता-पिताओं  को भी अपने बच्चों के प्रति   असंवेदनशील बना दिया है। ऐसे लोग  बच्चों को  एक बोझ  के रूप में देखते हैं जिसे उन्हें  जल्दी से जल्दी उतारना है ताकि वे फिर से आराम और मौज-मस्ती से रह सकें। बच्चों को जल्द से जल्द  आत्मनिर्भर बना कर ऐसे माता-पिता स्वयं भी अब अपनी  तमाम जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना चाहते हैं। बच्चों का भार उतारने के लिए वे उनकी शिक्षा पर,उनके कोचिंग पर, किसी अच्छी शिक्षण-संस्था में उनके प्रवेश पर चाहे जितना खर्च उठाने  को तैयार रहते हैं। ऐसे लोग अपनी तरह अपने बच्चों को भी दूसरों के काम नहीं आने देना चाहते। वे उन्हें  उन कामों में वक्त जाया नहीं करने देना चाहते जो उनमें  परोपकार और निस्वार्थ सेवा के भावों  का विकास कर उन्हें उपयोगी नागरिक या रिश्तेदार बनाए। तुम्हें प्रतिदिन ऐसा भी कुछ करना चाहिए जो शुद्धत: परोपकार की भावना से किया गया हो और जिसके एवज में तुम किसी व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा न रखते हो, जैसी कोई नैतिक शिक्षा देने  के बजाय आज के ये  मां-बाप अपने बच्चों में, वही करो जिससे तुम्हें व्यक्तिगत लाभ हो, जैसा विचार  विकसित करने को अधिक कल्याणकारी मानते  हैं। बढ़ती हुई आत्मकेंद्रितता ने हमारे समाज में व्याप्त प्रेम को धीरे-धीरे निर्वासित कर दिया है। कुछ लोग शायद कहें कि जात-पांत और विभिन्न सामाजिक वर्गों में बंटे भारतीय समाज में  प्रेम-भाव  पहले भी बहुत व्यापक नहीं था ; किन्तु इस बात को नकारना मुश्किल है  कि पहले वह जहां-जहां और जितनी मात्रा में था वहां  भी वह अब पहले की तुलना में काफी कम हो गया है।
अधिक भोग-विलास के लिए अधिक धन अर्जित करने की इच्छा रखने वाला इस बात की परवाह नहीं करता कि वह अपने मुनाफे के लिए दूसरों को नुकसान तो नहीं पहुंचा रहा। पैसे का लोभी व्यक्ति नैतिक-अनैतिक और पाप-पुण्य का ख्याल नहीं करता। उसे यदि चटपटा-मजेदार बेचने से अधिक आय होती है तो वह इस बात की फिक्र नहीं करेगा कि उसकी बेची वस्तु आगे चल कर उसके ग्राहकों का कोई नुकसान तो नहीं                   करेगी। मुनाफाखोर बाजार तो आगे रह कर ग्राहक को किसी चीज़ का आदी बनता है ,और ग्राहक का काम जब उसका आदी हो जाने के कारण चल नहीं पाता तब वह ग्राहक से उस चीज की मनमानी कीमत वसूल करता  है।
विज्ञापनों के माध्यम से पूंजीवादी बाजार भोग का जो व्यापक प्रदर्शन करता है उससे कोई बिरला ही इस भोग से ललचाए बिना रह पाता है। जब इतनी सुख-सुविधाओं, खाने-पीने की इतनी चीजों, इतनी तरह के वस्त्रों-आभूषणों-जूतों,इतने साबुनों-क्रीमों-लोशनों,इतने होटलों-रेस्तराओं, इतने फ्लैटों-बंगलों ,इतने देश-विदेश के टूर-पैकेजों ,इतने गानों, विडिओ क्लिपों, धारावाहिकों-चलचित्रों के मजे लेना संभव हो तो इन सबसे मुख मोड़ लेने वाला क्या असामान्य  मनोरोगी नहीं कहलाएगा ?
 भोग के लिए अधिकाधिक पैसे की चाह किसी काम के करने वाले को उस काम की श्रेष्ठता व पूर्णता के लिए प्रेरित नहीं करती। न ही वह व्यक्ति के मन में उस काम के प्रति कोई प्रतिबद्धता पैदा करती है। जब भोग ही जीवन का लक्ष्य हो जाए  और जब पैसे को  ही उस लक्ष्य प्राप्ति के एकमात्र साधन के रूप में देखा जाने लगे तो इसका परोक्ष परिणाम यही हो सकता है कि उस काम  से लाभान्वित होने वाले अन्य लोगों का ख्याल काम करने वाले के मन में  रह ही न जाए। संस्था, समाज और देश से तब भला किसी का क्या लगाव बना  रह सकता है? पैसे की चाह काम की गुणवत्ता को भी  गौण बना देती है। पैसे से इतर किसी बड़ा उद्देश्य के लिए कार्य करने वाला तब तक संतुष्ट नहीं होता जब तक वह अपने काम में कोई नई ऊंचाई न छू ले  या उसमें अपने किसी स्वप्न की सिद्धि  न देख ले। प्रसिद्ध शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां को मैं कई बार मंच पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते समय  कोई अनूठा और अनजाना वह सुर लग जाने की इच्छा  करते सुना करता था। पर जिस कलाकार की निगाह सिर्फ पैसे पर है उससे ऐसी किसी उत्कृष्टता या अनूठेपन  की चाह की उम्मीद नहीं की जा सकती। हमारे  समाज की स्थितियां दिनोंदिन  एक ध्यानचंद, एक अलाउद्दीन खां, एक मुक्तिबोध या एक मकबूल फिदा हुसैन की पैदाइश  के लिए कम अनुकूल  होती जा रही हैं।
दौलत के आकर्षण और भोगों की अधिकाधिक चाह का एक असर यह हुआ है कि बहुत से वे लोग भी अब पैसे या भोग का लालच देकर खरीदे जा सकते हैं जिन्हें पहले किसी भी कीमत पर नहीं खरीदा जा सकता था। पहले बड़े बड़े सम्राट भी किसी बड़े साधक, तपस्वी, ज्ञानी या कलाकार के सामने सर नवाते थे। अपने देश का नाम ऊंचा करने को पहले कोई बड़ा खिलाड़ी किसी भी सम्पत्ति से अधिक महत्वपूर्ण मानता था। जिन कामों को पहले लोग सर्वाधिक गोपनीय मान कर उन्हें किसी  के सामने करने में लजाते थे उन्हें आज बहुत से लोग कैमरा और कैमरा वालों के सामने करने में भी कोई शर्म नहीं करते। एक गरीब देश में, जहां  युवा बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही हो, पैसे की खातिर जरूरतमंद  लोग आज  किसी  भी तरह की निर्लज्जता या अनैतिकता के लिए मजबूर किए जा सकते हैं।
मध्यवर्ग की भौतिक  समृद्धि का असर भारतीय स्त्रियों पर भी सीधा पड़ा है। नारी स्वातंत्र्र्य,सशक्तीकरण, बराबरी, आत्मनिर्भरता, अपनी देह पर अधिकार आदि कई तरह के व्यक्तिवादी नारों ने  इस असर में वृद्धि की है। पहले जहां घर की युवा होती लड़कियों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे सुबह जल्दी उठ कर घर को साफ-सुथरा व व्यवस्थित रखने में अपनी मां की मदद करेगी वहां प्रतिदिन सुबह देर तक सोते रहना  अब युवा  लड़कियों की आम आदत होती जा रही  है। स्त्रियों की गपशप की परंपरागत आदत को  मोबाइल फोन और व्हाट्सएप जैसे साधनों ने नई धार दे दी है। इन  नए मनोरंजन साधनों   की व्यापकता ने दुर्भाग्य से उनके लिए  यथार्थ और फैंटेसी में, वास्तविक और अवास्तविक में  भेद कर पाना तक  कठिन बना दिया है।
 पहले जहां भारतीय गृहिणी अपने घर से एक प्रकार का दिली लगाव रखती थी वहां घर  अब उसके लिए  केवल अपने भोग और आराम का  साधन रह गया है। घर की सुन्दरता और व्यवस्था  से भी उसे अब बहुत ज्यादा  लेना-देना नहीं है। यह काम भी  अब वह यथासंभव नौकरों से करवाना चाहती है। अपने समय को वह अब तरह तरह के मनोरंजनों में बिताना चाहती है। उसका मन अब टीवी पर आने वाले धारावाहिकों  में ,मोबाइल पर की जाने वाली गपशप में और व्हाट्सएप के द्वारा भेजी जा सकने वाली चटपटी-मजेदार  चीजों में अटका  रहता है। बनाव- श्रृंगार के नवीनतम साधनों की जानकारी, महंगे आभूषण, वस्त्र, किटी पार्टियां, तफरीह के लिए महंगी देश-विदेश-यात्राएं अब हमारी अधिकांश मध्यवर्गीय स्त्रियों की कामनाओं  का हिस्सा बन चुके हैं। पश्चिमी यौन-नैतिकता के अन्धानुकरण और संदेशवाहन के नवीनतम साधनों की बदौलत किसी  से भी  संपर्क की नई और पहले अकल्पनीय संभावनाओं  के चलते दाम्पत्य-संबंधों की हमारी पारंपरिक नैतिकता पर भी आज तरह तरह के खतरे मंडराने लगे  हैं।
अधिक संपत्ति को ही सफल जीवन का पर्याय मानने वालों की एक समस्या यह होती है कि वे अपने धन का उपयोग जीवन में अधिकाधिक खुशियां बटोरने के लिए कैसे करें? मानव जीवन की एक  जटिलता इस बात में  निहित है कि किसी  व्यक्ति को वास्तविक खुशी केवल धन की या आराम की अधिकता से ही  नहीं हासिल हो सकती। आदमी कई बार बहुत श्रम करके, दूसरों के लिए कुछ करके या किसी बड़े उद्देश्य के लिए  कष्ट उठा कर जो खुशी हासिल करता है उसकी तुलना में  भोग-विलास द्वारा हासिल खुशी बहुत तुच्छ लगती है। अपने द्वारा अर्जित धन का उपयोग व्यक्ति आज सामान्यत: अपने इन्द्रिय-तोष या आराम के अधिकाधिक साधन जुटाने में करने लगा  है। पर इन्द्रियों के द्वारा हासिल किया जाने वाले  सुख का स्तर खाने-पीने, सुनने, देखने, सूंघने, घूमने-फिरने और मैथुन आदि इच्छाओं की संतुष्टि  से तब तक ऊपर नहीं उठ  पाता जब तक कि व्यक्ति उसके लिए स्वयं भी ज्ञान-वृद्धि, अभ्यास और तप द्वारा अपनी रुचियों का परिष्कार न कर ले। शारीरिक भोगों में ऊब की स्थिति बहुत जल्द आ जाती है। अवस्था-जनित अक्षमता भी व्यक्ति को धीरे-धीरे बहुत अधिक  इन्द्रिय-भोग में असमर्थ बना देती है।
भोगवादी सोच का सीधा सम्बन्ध भौतिकतावाद से है क्योंकि भोगवादी व्यक्ति ही  इस जीवन को पूर्णत: भौतिकतावादी दृष्टि से  देखता है और जब तक वह जीवन है तब तक उसके अधिकाधिक मजे ले लेना चाहता  है। जिसे हम आज वैज्ञानिक दृष्टि कहते हैं उसका एक आयाम निश्चित रूप से यह सोच है कि मनुष्य शरीर महज एक जटिल यन्त्र जैसा  है और मनुष्य के तमाम अनुभव उसे प्राप्त इस शरीर-यन्त्र की ही बदौलत है। जब तक यह यन्त्र है तभी तक किसी व्यक्ति का अस्तित्व है और उसके बाद उसका कुछ भी बाकी नहीं बचने वाला है। चार्वाक का दर्शन भी कुछ इसी तरह का था और इसीलिए वह जीते जी मानव जीवन के तमाम मजे ले लेने का पक्षधर था।
आज चूंकि अधिकांश लोग भौतिकतावाद में विश्वास करने लगे हैं भोग ही अब उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य बनता जा रहा है। मनुष्य शरीर अब उनके लिए रहस्यमय नहीं रह गया है क्योंकि अनेक प्रकार की चिकित्सकीय खोजों ने उससे सम्बंधित कई समस्याओं के हल खोज लिए हैं और उसकी यांत्रिक जटिलता को भी बोधगम्य बना दिया है। मनुष्य जीवन की कल्पना आज लोग ऊंचाई हासिल करने के किसी दुर्लभ अवसर के बजाय केवल सुख-भोग के अवसर के रूप में करते हैं।
भौतिकतावादी व्यक्ति के अनुभव सामान्यत:  भौतिक और मूर्त वस्तुओं तक सीमित रहते हैं किन्तु अमूर्त की कल्पना उसके लिए सहज नहीं होती। वह मानव शरीर की तो कल्पना कर सकता है किन्तु  मानव के द्वारा अनुभव किए जाने वाले विभिन्न मनोभावों तक उसकी पहुंच नहीं होती। अधिक सूक्ष्म मनोभावों की कल्पना कर  पाना तो उसके लिए संभव ही नहीं होता। उदाहरण के लिए यदि हम स्त्री-पुरुष  संबंधों की बात करें तो भौतिक दृष्टि वाला व्यक्ति शारीरिक संबंधों  की कल्पना तो सरलता से कर लेता है  किन्तु प्रेम-संबंधों की बहुत सी जटिलताओं और सूक्ष्मताओं के बारे में वह निश्चय ही  असंवेदनशील साबित होता है। रूमानी प्रेम से जुड़े विरह,समर्पण,वफादारी जैसे सूक्ष्म  मनोभावों तक उसकी पहुंच मुश्किल से  होगी। मीरां, गालिब या रवीन्द्रनाथ के काव्य में जिस तरह के अपार्थिव और सूक्ष्मतर प्रेम का वर्णन हमें मिलता है उस तक तो यह व्यक्ति कभी पहुंच ही नहीं पाता।
हम देखते हैं कि श्रेष्ठ काव्य के प्रति, शास्त्रीय संगीत के प्रति या बहुत सी प्रभावशाली कलाकृतियों के प्रति लोगों में  अब पहले जैसी संवेदनशीलता नहीं रही । न केवल यह बल्कि बहुत सी वे  मानवीय स्थितियां भी, जिनमें पहले सामान्य व्यक्ति भी विचलित महसूस करता था अब अधिकांश  लोगों के लिए सह्य हो गई हैं । बहुत सी हिंसा, क्रूरता, अनैतिकता, झूठ आदि को आज का भौतिकतावादी आसानी से पचा जाता है।
भोगवाद का एक आवश्यक परिणाम यह हुआ है कि संयम, आत्मतोष, कमखर्च आदि पर आधारित बहुत से मूल्य अब कोई मूल्य ही नहीं रह गए हैं 7संतोष ,जिसे पतंजलि के योगसूत्र में अनुत्तम सुखलाभ का स्रोत बताया गया है ,आज केवल  मनुष्य की प्रगति के एक बाधक तत्व के रूप में देखा जाने लगा है। इसी तरह अपव्यय पर  नियंत्रण या मितव्यय को केवल कंजूसी या साधनहीनता का पर्याय मान लिया जाता है। ब्रह्मचर्य का जिक्र नई पीढ़ी के लोग अब केवल उपहास या व्यंग्य के लिए करते हैं।
अत्यंत समृद्धि के काल में भी हमारे यहां के ऋषि-मुनियों ने, संतों-धर्मोपदेशकों ने इस बात को जान लिया था कि मनुष्य का वास्तविक सुख भोग में निहित नहीं है। उन्होंने यह जान लिया था कि जो प्रारंभ में अच्छा लगता है वह अंत में मनुष्य के क्लेश का कारण बनता है, कि अतिरेक से बचना और एक मध्य मार्ग अपनाना व्यक्ति को अनेक मानवीय  कष्टों से बचाए रखता है, कि अहिंसा ,सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, शौच, संतोष और तप मनुष्य को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाने के साधन हैं।
औद्योगीकरण के माध्यम से गरीबी हटाने और आर्थिक समृद्धि लाने का जो  दौर हमारे यहां  शुरू हुआ है उसने हमारे उस सांस्कृतिक पर्यावरण को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है जिसमें उपर्युक्त आत्मिक उन्नति लाने वाले गुणों को पनपाया जा सकता था। अधिकाधिक भोग ही आज दुनिया के अन्य लोगों की तरह हर भारतीय का भी चरम लक्ष्य बनता जा रहा है।
विचारधाराओं के बारे में एक खतरनाक बात मुझे यह लगती है कि जब कोई  समाज किसी एक विचारधारा को पूरी तरह अपना लेता है तो उससे भिन्न प्रकार की विचारधारा स्वयमेव उस समाज के लिए अस्वीकार्य हो जाती है। जो  समाज  बच्चों को गलती के लिए दण्डित करने को गलत मान लेता  है उसके लिए ताडय़ेत दश वर्षाणि जैसी किसी प्राचीन विचारसरणी तक लौट पाना असंभव सा  हो जाता है। आज जो व्यक्ति स्वयं अधिक पैसा खर्च न करके उसे अपने बच्चों या अन्य जरूरतमंद लोगों  के लिए बचा कर रखना चाहता है या जो बहुत ज्यादा व्यवस्था बनाए रखने या नियमानुसार काम करने की बात करता है उसे आज के मनश्चिकित्सक  ओ सी पी डी (ओब्सेसिव कम्पल्सिव पर्सनेलिटी डिसऑर्डर) से ग्रस्त बता देते हैं। जब तक संभव है जिंदगी के मजे ले लो ; भाड़ में जाएं आपके  बाद  जन्म लेने  वाले , आज के  नए चार्वाक-वादी कहते लगते हैं।
भोगवाद की सबसे बड़ी खामी यही है कि उसमें भोग को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेने से व्यक्ति की चारित्रिक, नैतिक और आत्मिक गुणवत्ता में लगातार गिरावट आती जाती है जिसके कारण वह मानव-जाति  के सामूहिक विकास के  स्वाभाविक और प्राकृतिक लक्ष्य से ही भटक जाता है। आत्मकेंद्रितता में वृद्धि के कारण वह दूसरों के लिए किसी काम का नहीं रह जाता और इस तरह वह मानव जाति के विकास को ही अवरुद्ध कर देता है।
 वैज्ञानिक सोच के नाम पर यदि  लोग मानव जीवन को पशु-जीवन का ही एक रूप म़ान कर  सुख भोग को ही उसका अंतिम लक्ष्य मान लें तो  वे इस  तरह से समूची  मानवता  के ही दुश्मन हो जाएँगे। उन्हें न तो तब अन्य लोगों के दु:ख-दर्द की चिंता रहेगी और न ही आने वाली पीढिय़ों के कष्टों का कोई ख्याल। न्याय, नैतिकता, धर्म, कत्र्तव्य अदि की  तमाम अवधारणाएं भी ऐसे लोगों के भोग-विलास की इच्छाओं की  भेंट चढ़ जाएंगी और मनुष्य के एक उच्चतर प्राणी के रूप में विकसित होने की संभावनाओं का अंत हो जाएगा। यदि मनुष्य के रूप में मनुष्य को अपनी निरंतर बेहतरी का  लक्ष्य याद  न रहे तो वह विकास की तमाम बातें करता हुआ भी प्राकृतिक विकास ( एवोल्यूशन) के अपने पूर्व-निर्धारित प्राकृतिक  मार्ग से भटक जाएगा जिस पर लौट कर आने में उसे फिर न जाने कितना  समय लग जाएगा ।