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Sunday 19 Nov 2017

झूला ( अनुवादक- डॉ. सुशीला दुबे)


 उज्ज्वला केलकर
176/गायत्री फ्लैट नं. 12, चव्हाण कॉलोनी
सांगली- 416416.
अनुवादक-
डॉ. सुशीला दुबे
फ्लैट नं. 303, बिल्डिंग नं.डी-2
शिवसागर को-ऑपरेटिव्ह सोसायटी, माणिक याग, सिंहगड रोड,
पुणे-411051
मो.- 9923011613
झूला झूल रहा है, आगे-पीछे, पीछे-आगे। कांचन झूले के डंडे पर पांव मोड़कर मजे में झूल रही है। शान से, लेकिन सावधान है। हाथ मोड़कर छाती पर रखे है। सर नीचे,... एक-दो-तीन... आठवें अंक पर झूले पर का यह शीर्षासन समापन। डंडे के चारों ओर एक चक्राकार प्रदक्षिणा और दूसरे ही क्षण आगे लपककर कांचन के हाथ पकडऩा, उसी स्थिति में दो झूले फिर अबाऊट टर्न। फिर से दोनों हाथों से अपने झूले का डंडा पकडऩा। एकदम पक्का... तब तक आठ अंक की गिनती होती है। एक लय में। शामियाने के अंदर के दीप बुझा दिए गए हैं। बाहर की ओर के खंभे पर लगी ट्यूब लाइट का धुंधला उजाला यहां तक पहुंचता है। सब कलाबाजी अंधेरे में ही दिखानी है। यही इस सर्कस की खासियत है। शामियाने के एक कोने में सर्कस का बैंड बज रहा है। सब कलाबाजी बैंड की धुन पर है। ऐसा आभास जगाना है। बस्स! नहीं तो बाकी सब कुछ निश्चिंत, सुंदर, सुघड़, जमीन से पचास, पचपन साठ फीट ऊंचाई पर बंधे अनेक झूले, एक डंडे वाले, उस पर डबलबार, सिंगलबार और कई प्रकार की कलाबाजियां की जाती है। वह कलाबाजियां दिखने वाले हम दस बारह लड़कियां। रंगबिरंगें, ट्विंकल नायलॉन के झालर लगे फ्रॉक के घेर फैलाकर कलाबाजियां करती हैं।
बौने ने एक बार कहा था, ''पब्लिक को लगता होगा, आसमान की परियां अधर में तैर रही हंै।ÓÓ
कांचन ने मेरे हाथ की केवल कनिष्ठिका पकड़ रखी है। अगले झूले में फिर से अबाऊट टर्न। पहले झूले का डंडा पकड़कर झूलते रहना है। उससे अगले झूले पर कांचन मेरे पांव पकड़ लेगी, फिर रोज़ा कांचन के। पैंतीस फीट ऊंचाई पर नेट बंधा है। उस पर बौना खड़ा है। हाथ में लंबी छड़ी है। हम तीनों की सांकल झूले के डंडे के सहारे झूल रही है। आगे-पीछे, पीछे-आगे। अब बौना उछलकूद करके यह सांकल पकडऩे की कोशिश करेगा। फिर छड़ी ऊपर करेगा। कभी वह गिरेगा, कभी छड़ी गिराएगा। फिर जैसे-तैसे छड़ी रोज़ा के हाथ आएगी। फिर एक के बाद एक रोज़ा, कांचन और मैं छड़ी पर फिसलते हुए नीचे आएंगी। इस खेल का हमारा आखिरी आइटम! सब कलाबाजियों के बाद हम कभी-कभी उकता जाते हैं। परसों कांचन ने बौने से कहा, ''तुम्हारी मर्कट लीला जल्दी समाप्त करो। हमारे हाथ भर आते हैं। तब बौने ने कहा- ''मास्टर ने मुझसे कहा है कि मैं कम से कम पांच मिनट पब्लिक को हंसाकर रिलॅक्स करुं। अब तुम्हें तकलीफ होती है तो मैं कोई न कोई रास्ता निकालूंगा, पर उसके बदले में मुझे कुछ न कुछ...रिश्वत कहो, गिफ्ट कहो... क्या?ÓÓ अपना मुंहासे वाला थोबड़ा आगे करके गाल पर टॅप करते हुए कहा- ''वन फॉर वन मिनिट बिफोर, टू फॉर टू मिनिट बिफोर, थ्री...ÓÓ
''डू यू मीन इट?ÓÓ
''येस, ऑफ कोर्सÓÓ चेहरे पर शरारती हंसी बिखेरते हुए बौना बोला। कांचन आगबबूला हुई। ''छी: गंदा कहीं का! इससे तो बेहतर है हाथ टूटने तक लटकते रहना! इस बौने से तो सायकल चलाने वाला बंदर बेहतर है।ÓÓ कांचन बौने पर झुंझला रही थी। वह भी कमाल करती है। अब बौने की बात का क्या बुरा मानना? उसकी तो सभी बातें हंसी मजाक की होती हैं। उसे संजीदा होते हुए कभी किसी ने देखा है भला? लोगों को हंसाते हंसाते विदूषक की तरह बर्ताव करना, बात करना, हाव-भाव दिखाना उसका स्वभाव बन गया है। इतना सहज जैसे हम सांस लेते हैं। कांचन से उसने जो कहा वह यकीनन मजाक में ही कहा। नहीं तो मैं, कांचन,रोज़ा,परमेश्वरी हम सब उसकी बेटियों जैसी हैं। पर कांचन यह बात मानने को तैयार नहीं। वह कहती हैं, उसने सिर्फ कहा नहीं, वह सूचित करना चाहता था।
क्या कांचन की बात सही होगी?
क्या चेहरे जैसे उसके विचार भी विद्रूप होंगे? कहीं मन में दबे विचार अनजाने असावधानी में उछल पड़े होंगे? कांचन भन्ना रही थी लेकिन बौने के चालचलन में कोई फर्क नहीं था। वह चिढ़ रही थी इसलिए वह ज्यादा पीछे पड़ रहा था। वही निरीह मजाक! लेकिन कांचन का गुस्सा उफन रहा था, फौव्वारे जैसा।
बौने ने शादी नहीं की है। क्यों नहीं की होगी? बौना है इसलिए? लेकिन ऐसे कितने ही विदूषकों की शादियां हुई हैं। थोड़ा बहुत समझौता करना पड़ता है। बस। मास्टर जी ने कितनी बार कहा है, कभी मजाक में, कभी बातों-बातों में, कभी गंभीरता से। लेकिन वह सब बातें मजाक समझकर चल देता है। एक बार उसने कहा मेरे आसपास मंडराने वाली इन आसमान की परियों को देखकर वह डाल से जल जाएगी। और मुझ बेचारे के गले में फांस लग जाएगी। और भी ऐसी ही अंटशंट... उसकी निश्चित धारणा थी कि क्या जरूरत है शादी करने की?
बौने का चेहरा विद्रूप है लेकिन उसका बोलना, हंसना ऐसा शानदार है कि उसके अस्तित्व से शामियाने में चैतन्य सरसराता है। भोजन के समय अगर वह नहीं रहता तो कादर की बनाई चिकन करी और कबाब एकदम बेस्वाद लगने लगते हैं। बौना जहां भी होता है वहां हंसना खिलखिलाना चलता रहता है। हंसी मजाक में कुछ ज्यादा ही खा लेते हैं। दिन भर के काम की थकान कम हो जाती है। बौने की मां से मिलना चाहिए। उससे पूछना चाहिए कि क्या यह पैदा हुआ तब भी रोने की बजाय हंस रहा था। गांव में उसकी छोटी बहन की प्रसूति हुई थी। शो समाप्त होने पर स्पेशल टैक्सी लेकर वह गांव जाने वाला था। लेकिन उससे पहले शो चल रहा था तब तार आया था। लड़का पैदा हुआ लेकिन मां चल बसी। तब भी वह हंसा था। खिलखिलाकर हंसा था। इतना कि उसकी हंसी से डर लगने लगा था। सबके मन में आया था कि वह रो दे तो अच्छा है। सबको हंसाने वाले बौने को उस दिन सबने रुलाने की कोशिश की थी। बाद में वह गांव जाकर आया। बता रहा था, बहन का बेटा अपने मामा पर गया है। याने मुझ पर! और वह हंसता रहा बस, इतना ही! अन्यथा पिछले बीस सालों में कभी उसका संतुलन बिगड़ा हुआ मुझे तो याद नहीं!
सब लोगों को बौने का सहारा है। मैनेजर उसकी इज्जत करता है। कोई कहता है कि वह मालिक का दूर का भानजा है। बचपन में उसकी बदसूरत, भद्दी शक्ल, व्रण से भरा चेहरा, पीठ का कूबड़ और बौनेपन की वजह से उसका मजाक उड़ाया जाने लगा। इसलिए स्कूल, घर सब छोड़कर उसने इस सर्कस में पनाह ली। यहीं पला-बढ़ा। यहीं पर उसने अपनी कला दांव पर लगाई। अपनी मासूम निरीह हंसी खुलकर बिखेर दी। अपनी अलग पहचान बनाई। वह सबको अपना लगने लगा। और अब कांचन उसके बारे में ऐसा कह रही है। जरूर उसे गलतफहमी हुई है। दरअसल जो वास्तव में है ही नहीं उस कीड़े का उसकी कल्पना में नाग बन गया है। बौना तो शायद भूल भी गया कि उसने ऐसा कुछ कहा था। पर कांचन खार खाए बैठी है। उसे कहीं अंदर तक चोट पहुंची है।
परसों बौने की वजह से सब ठीक हो गया। हुआ ऐसा कि श्रीनिवासन को बुखार था। सुबह से चिंता लगी थी कि उसका शो हो पाएगा या नहीं? उसका शो महत्वपूर्ण होता है। तोप में बत्ती लगाते ही मृत्यु गोल में मोटर सायकल पर उड़ान! फिर नीचे से ऊपर चक्कर लगाना। दर्शक सांस रोककर देखते हैं। मोस्ट थ्रिलिंग आइटम। देखने वाले के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। थ्रिल ही मनोरंजन है। दो रुपए देकर थ्रिल की अनुभूति लेना। उसके लिए कोई अपनी जान दांव पर लगाता है। मृत्यु गोल में गोल गोल घूमना। अति सावधानी से, पल भर की गलती न करते हुए।
झूले पर कलाबाजी करते हुए यह सब विचार मेरे मन में आ रहे थे। मन भी कैसा बावरा होता है। पता नहीं कब क्या सोचने लगे। सब कलाबाजियां आदत के मुताबिक अपने आप हो रही थीं। फिर मृत्युगोल में गोल-गोल घूमने वाला श्रीनिवासन आंखों के सामने आया। सुबह उसे तेज बुखार था। आज सब ठीक तो होगा न? पलभर के लिए मन पागल हो गया। उसके आसपास मंडराने लगा। और मैंने झूला छोड़ा तब कांचन का झूला पीछे चला गया था। मैंने नीचे नेट की तरफ। पता नहीं कैसे, पर बौने ने अपने छोटे हाथों से मुझे गिरने से पहले पकड़ लिया। ''आसमान की परी नीचे कैसे आ गई, छलांग लगाकर...ÓÓ ऐसा कुछ बड़बड़ाते हुए अपने शक्तिशाली हाथों से झूले की तरफ ऊपर उछाला। कांचन के पांव हाथ में आ गए। मेरी जान में जान आई। नीचे बौने की बकबक और अंग विक्षेप चल ही रहे थे। दर्शक खिलखिलाकर हंस रहे थे। तालियां बजा रहे थे। उन्हें लगा मेरा गिरना, खेल का ही हिस्सा है। नीचे जमीन पर खड़े मास्टर जी की लाल-लाल आंखें धीरे-धीरे साफ होती गईं।
आज भी मन घबरा रहा है। लगता है कुछ बुरा होने वाला है। श्रीनिवासन अच्छे खानदान का ग्रेजुएट लड़का है। पता नहीं कौन से अनाम आकर्षण में वह कहीं और नौकरी न ढूंढते हुए, यहां सर्कस में आ गया। कॉलेज के दिनों में भी वह डबलबार, सिंगलबार, रोमनरिंग, मलखंभ आदि खेलों में दिलचस्पी लेता था। सायकल रेस में यूनिवर्सिटी में फस्र्ट आया था। उसका मूड अच्छा रहा तो खूब बातें करता है। अपने बारे में, घर के बारे में, कॉलेज के बारे में, सर्कस में आने के बारे में। यहां उसने पहले छोटे-मोटे काम लिए। फिर सबसे महत्वपूर्ण मृत्युगोल में मोटर सायकल चलाने का काम सीख लिया। अब वह कहता है, कि इस काम से वह उकता गया है। अब वह कहीं घर बसाना चाहता है। गृहस्थी बसाकर आराम से रहना चाहता है। यहां-वहां घूमते रहने से भी वह उकता गया है। बंबई जैसे महानगर में उसे रोजी-रोटी मिलना मुश्किल नहीं है। वह कहता है, बंबई में उसके समाज के कई लोग हंै। दो वक्त की रोटी का इंतजाम कैसे भी हो ही जाएगा। लेकिन यहां से छुटकारा मिले तब ना। मास्टर जी कहते हैं ''तुम्हारी जगह दूसरे किसी को तैयार करो और फिर तुम चले जाओÓÓ वही तो वह कर नहीं पा रहा है। वैसे वह बड़ा आलसी और सनकी है। इसीलिए मुझे उसकी हमेशा चिंता लगी रहती है। कहीं भी, कैसा भी, झुक जाता है। बिना सोचे समझे भटक जाता है।
श्रीनिवासन... जाते समय मुझे साथ ले जायेगा न? मुझे देखते ही उसकी आंखें चमकने लगती है। मंत्रमुग्ध हो जाता है। उसकी बातें सुनने वाला भी मुग्ध हो जाता है। पर क्या वह मुझसे ही ऐसी बातें करता है या सभी से? वह कहता है, यहां इस प्राणी संग्रहालय में और यहां के इंसानों में तुम ही अकेली सही मायने में स्त्री लगती हो। बाकी सब मर्दाना लगती हैं। उसे मेरे लिए बहुत अपनापन है। कम से कम मुझे ऐसा लगता है। उसकी बातों से, उसके बर्ताव से। लेकिन यहां से जाते समय वह मुझे ले जाएगा न? मेरा यहां से छुटकारा होना कोई मुश्किल काम नहीं है। झूले पर कलाबाजियां दिखाने वाली यहां कई लड़कियां हैं। मुझ पर और कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं है। वैसे भी, यह काम मुझे पसंद नहीं है। मैं इस सर्कस में पली-बढ़ी। मैं किसी की गिनती में नहीं थी। कोई कहता है, बड़े मालिक को मैं सड़क पर पड़ी मिली थी। कोई कहता है, दो आदमी एक बच्चे को लेकर भाग रहे थे। मालिक ने देखा और उन्हें डांटा। तब वे मुझे यहां छोड़कर भाग गए। कोई कहता है, मेरी मां ने ही मुझे मालिक के हवाले कर दिया था। इतना बड़ा कुनबा है, उसमें एक जीव क्या भारी पड़ेगा? जितने मुंह उतनी बातें। पर एक बात सच है कि मुझे समझने लगा तब से मैं यहां सर्कस में ही हूं। अब बड़े मालिक नहीं रहे। बचपन से यहां रहकर भी मुझे इस काम में दिलचस्पी नहीं है। आज यहां कल वहां घूमते रहने से स्कूल की पढ़ाई भी ढंग से नहीं हुई। देखकर, सुनकर, पढ़कर जो भी मिले पढ़ती रहती हूं। अपनी सर्कस की दुनिया कितनी अलग है, असली दुनिया से टूटकर अलग, एक जगह पड़े जैसी। क्या मैं कभी उस दुनिया में जा पाऊंगी, दूसरी दुनिया में।
सर्कस की दुनिया में पली-बढ़ी इसलिए कलाबाजी के कुछ आसान खेल सीख लिए। नहीं तो यहां मेरा अस्तित्व शून्य है। श्रीनिवासन की वजह से पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि मेरी इस निरर्थक जिंदगी में कुछ अर्थ है। फिर मैं काम में और अपने आप में भी दिलचस्पी लेने लगी। हर काम मन लगाकर करने लगी। एक बार श्रीनिवासन ने कहा था- यहां के रुखे, नीरस, जानलेवा माहौल में मैं तुम्हारे कारण ठहरा हूं। मृत्यु गोल में भी मैं तुम्हारे बारे में सोचता रहता हूं। सिर्फ तुम्हारे बारे में।
इतनी अच्छी-अच्छी बातें कैसे कर लेता है वह? सामने वाले को खुश करने वाली.. यह सब बातें उसके मन की, अन्तर्मन की होगी ना? या केवल शब्द। मुझे खुश करने के लिए? वह मुझसे ही ऐसी बातें करता है या औरों से भी? कांचन... रूबी... सभी से वह ऐसी ही मीठी-मीठी बातें करता होगा। सच क्या है, जान लेना चाहिए। बौने को विश्वास में लेना पड़ेगा। उसे कहना पड़ेगा कि श्रीनिवासन के मन की गहराई तक जाकर जान ले। वह बहुत चंचल है। उसका स्वभाव बच्चों जैसा है। उसे संभालना चाहिए। ख्याल रखना चाहिए। मैं सब कुछ करूंगी। लेकिन वह मुझे साथ ले जाए तब न! उसे कसम दिलानी होगी। बाद के वादे नहीं चाहिए। उसे जता देना चाहिए कि यहां से जाने से पहले शादी करके ही मुझे साथ ले जाय। बौने से कहना चाहिए कि तुम मेरी ओर से उससे बात करो। तुम्हारे सिवा यहां मेरा अपना कोई नहीं है। और फिर एक अच्छा सा घर। अरे हां, मुझे खाना बनाना सीखना पड़ेगा। कोई बात नहीं, मैं सीखूंगी। यहां जान हथेली पर लेकर लटकते रहने से वह काम बेहतर होगा। झूले का हिलोरा, लय में गिने जाने वाले अंक, पलभर की गलती हुई तो हाथ-पांव खो जाने की संभावना!
आजकल श्रीनिवासन की रूबी के साथ घनिष्ठता बढ़ती जा रही है। रूबी उन्मुक्त... आंधी जैसी... वह किसी एक से दिल लगाकर बैठेगी। ऐसा तो नहीं लगता। फिर भी आजकल वह श्रीनिवासन के बारे में बहुत अपनापन जताती है। अपनापन या प्यार? हमेशा कहती है, वह कितना लापरवाह है, उसकी हंसी कितनी मधुर है। उसके घुंघराले बालों में उंगलियां फेरने का मन करता है। उसके पीछे मोटर सायकल पर बैठने में कितना थ्रिल और चार्म है। रूबी की बातें, बर्ताव सब कुछ नि:संकोच! वह कहती है श्रीनिवासन को कसकर पकड़कर बैठना... मोस्टथ्रिलिंग एक्स्पेरियंस! पहले श्रीनिवासन को कसकर पकड़कर बैठी रूबी... खूबसूरत... सुडौल, लाल पोशाक में... नजरें गड़ा देने वाली... रूबी ... कुछ नया... काश यह बात अपने दिमाग में आती! रात-दिन उसकी चिंता लगी रहती है, फिर भी यह बात मेरे दिमाग में क्यों नहीं आई? रूबी से पूछना चाहिए कि आज के दिन मैं उसके पीछे बैठना चाहती हूं। अगर उसने पूछा- क्यों बैठना चाहती हो तो क्या बताऊंगी? मुझे किसी अशुभ घटना की आहट ने घेर लिया है। वह हंसेगी। खिल्ली उड़ाएगी? कहेगी, ''नॉनसेन्स!ÓÓ शायद श्रीनिवासन को बताएगी, शायद दोनों हंस पड़ेंगे। मजाक उड़ाएंगे। क्या मास्टर जी से पूछा जाए? लेकिन वे कहेंगे, ''अभ्यास चाहिए.. पकड़ पक्की चाहिए... छूट गई तो... ÓÓ
झूला झूल रहा है। श्रीनिवासन मुझे ले जाएगा या रूबी को? असमय, अनचाहे विचार... श्रीनिवासन कब जाने वाला है? उसके मन में क्या है, यह जान लेने का काम बौना कर सकता है। क्या वह मेरे लिए इतना करेगा? उससे अपना क्या संबंध है? कांचन ने गलतफहमी कर ली है। बौना सचमुच मासूम है। लेकिन कांचन को कैसे समझाए? बौने को देखते ही वह आगबबूला होती है। कहीं कांचन सही तो नहीं है? बौने के मन में कहीं वासना की कोंपल लहलहा रही है, बढ़ रही है? पांच-छ:-सात आठवें अंक पर झूले के डंडे के चारों तरफ प्रदक्षिणा और कांचन की ओर लपकना... कांचन के हाथ में सिर्फ दोनों कनिष्ठिका... मैं लटकती रहती हूं। फिर जंजीर बनेगी... बौने के छड़ी फेंकने तक लटकते रहना... क्या बौना यह लटकना रोकेगा?... हमेशा... हमेशा के लिए...?