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Saturday 18 Nov 2017

बूढ़ा दरख्त

सुधा गोयल
290-ए कृष्णा नगर,
बुलंद शहर-203001 (उ.प्र.)
मो. 09917869962
बाहर किसी की पदचाप गूंजी तो शुभदा की नजर दरवाजे की ओर उठ गई, लेकिन पास आती पदचाप धीरे-धीरे दूसरी दिशा की ओर मुड़ गई। उन्होंने आंखें मूंद लीं। मन ही मन अपनी सोच पर हंसी आई। आशा की हल्की सी झलक सभी सोचों को परे धकेल देती है? मयंक क्या पैदल चलकर आएगा? दरवाजे पर गाड़ी का हार्न सुनाई देगा या टू सीटर की घरघराहट। मयंक को टैक्सी ही ज्यादा पसंद है।
पन्द्रह दिन हो गए खबर दिए, लेकिन अभी तक उसका कोई पता नहीं। मन भ्रमर की तरह हर वक्त उड़कर मयंक के चारों ओर घूमता रहता है। एक उसी की आस में प्राण धारण किए पड़ी है। आ जाए तो इस देह धर्म से मुक्ति मिले। जैसे सारा वक्त मयंक के साथ बंध गया है। सुबह होती है चिडिय़ों के चहचहाने से, उम्मीद की धूप फैलने लगती है। शाम के साए उतरते हैं तो उम्मीद के साए सिमटने लगते हैं। रात का एक प्रहर बीतते-बीतते सब कुछ उनके मन के अंधेरे जैसा हो जाता है।
पिछले पन्द्रह दिनों से कमली ही उन्हें संभाले हैं। बेटा परदेश में है, लेकिन रिश्तेदारों की क्या कमी है? गिनने बैठे तो अंगुली की पोर भी कम पड़ जाएं। पर ऐसे रिश्तेदारों से क्या फायदा? जिनका होना न होना सब बराबर है। हां यदि आज ही वे मर जाएं तो सब मातम-पुरसी के लिए इकट्ठे हो जाएंगे। प्रशंसा, दु:ख और अपनत्व के मिले-जुले ढेरों जुमले यहां-वहां उनके आंगन में उड़ते रहेंगे। अब तो उन्हें कोई समेट भी नहीं पाएगा। मयंक क्या उनके बाद यहां रुकेगा? लेकिन इन जुमलों को सच समझ उन्होंने बटोरना चाहा था- तब जब मयंक चार साल का था और वे इस भरी दुनिया में अकेली रह गई थीं।
सहारे के लिए उन्होंने किस-किस की ओर नहीं देखा, लेकिन शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि इन मगरमच्छी आंसू बहाने वालों के साथ जीवन का सफर पूरा नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्वयं को टटोला। अपनी शक्ति को संभाला और धर्मपथ पर बिना किसी की परवाह किए अकेली चल पड़ीं।
एक बार फिर रिश्तेदारों की भीड़ उनके द्वार पर जुटी। उन्हें जमाने का ऊंच-नीच समझाया जाने लगा। किसी संभ्रात परिवार की विधवा को घर से बाहर काम नहीं करना चाहिए। विधवा वह भी जिसने अभी जीवन के चौबीस बसंत देखे हैं।
''फिर क्या करे वह?ÓÓ उसने प्रश्न भरी दृष्टि सबकी ओर घुमाई। ''मुझे आश्रय कौन देगा?ÓÓ अपना प्रश्न अपना कहे जाने वाले सभी के चेहरों पर चिपकाया। सबकी नजरें झुक गईं। कोई भी इतनी हिम्मत वाला न निकला जो कह सकता कि मयंक को समर्थ होने तक मैं सहारा दूंगा।
उसने घृणा से जमीन पर थूक दिया। उसकी आंखों में आग बरसने लगी-''क्या लेने आए हैं आप सब? जब आप सब यह नहीं देख सकते कि हमारे मुंह में निवाला गया या नहीं। एक निवाले की व्यवस्था आप कर नहीं सकते और मुझे ऊंच-नीच समझा रहे हैं। आप सब जाइए। मुझे अपना जीवन आप जीने दीजिए। मेरी मुश्किल आप आसान नहीं कर सकते तो और मुश्किलें पैदा मत करिए।ÓÓ
एक-एक कर वे चेहरे धुंधलाते चले गए, लेकिन उनका रास्ता भी इतना आसान न था, न मंजिल इतनी पास। जितने कांटे वे बिखेर सकते थे, बिखेरे, जितना लहूलुहान कर सकते थे किया। उसे जितनी चोटें लगतीं, उसका आत्मविश्वास उतना ही दृढ़ होता। और एक दिन निरर्थक भीड़ की निरर्थक बातों को उसने सोचना छोड़ दिया। वे सब भी थक कर चुप हो गए। एक-एक कर सभी रिश्तेदारों के चेहरे उनकी आंखों के सामने सजीव होने लगे। उन्हें भुलाने के लिए करवट बदली और क्षीण सी आवाज में कहा- 'पानीÓ।
कमली ने उठकर कुछ बूंदें पानी चम्मच से उनके मुंह में टपका दीं। उन्होंने आंखें खोलीं। कमली के सूखे चेहरे की ओर देखा। लक्ष्य किया कमली ने-
''कैसी तबियत है अम्मा? कुछ चाहिए?ÓÓ उन्होंने इशारे से मना किया।
''भैया का इंतजार है अम्मा। अब तक तो आ जाना चाहिए था उन्हें। आ जाते तो...ÓÓ
और वहीं शुभदा के सिरहाने बैठ उनका सिर सहलाने लगी। कमली का स्पर्श पा आत्मविभोर हो उठीं शुभदा। स्नेह, अपनत्व और लाचारी के चन्द अश्रुकण ढुलक गए।
''रो रही हो अम्मा? कोई कष्ट है क्या? डॉक्टर को बुलाऊं?ÓÓ
''नहीं री, तू यहीं बैठ। ऐसे ही जी भर आया। निश्चित ही तू पिछले जन्म में मेरी मां रही है। तभी मां की तरह सेवा कर रही है।ÓÓ
''अम्मा क्यों नरक में डालती हो मुझे? तुम्हारा सहारा न मिलता तो क्या गति होती?ÓÓ
''करने वाला तो वह है।ÓÓ शुभदा ने ऊपर की ओर इशारा किया और आंखें मूंद लीं। इतना ही बोलने में वे हांफने लगीं। कमली ने थरमस से दूध उड़़ेला और आधा कप दूध उन्हें जिद्द कर पिला दिया। फिर आसपास ही बिछी चारपाई पर लेट गई। जब से शुभदा बीमार पड़ी हैं, कमली यहीं उनके पास लेटती है। पता नहीं कब अम्मा को उसकी जरूरत पड़ जाए।
यह बात नहीं कि कमली कुछ सोचती ही नहीं। शुभदा भी सोचती हैं, वह भी सोचती है। कभी-कभी दोनों की सोच एक जैसी होती है। कमली सोचती है- अम्मा के बाद वह कहां जाएगी? भूखी-प्यासी उजड़ी, जीवन से निराश इस द्वार पर आ गई थी और अम्मा ने बेटी की तरह झाड़-पोंछकर, नहला-धुलाकर अपने गले से लगा लिया था। कुछ भी तो नहीं पूछा था उसके बारे में। जैसे डायरी के पुराने पृष्ठ फाड़कर निकाल दिए थे और शेष कोरे कागजों पर स्वयं अम्मा अपनी कलम से इबारत लिखती चली गई थीं। अभाव और जिल्लत की जिन्दगी से उसने भी मुक्ति पाई थी।
और शुभदा के लिए भी कमली ही चिंता का विषय है। मयंक आ जाए तो सारा झंझट ही समाप्त हो जाए। समझा देंगी उसे। समझ जाएगा। मां की बात कभी टालता नहीं। और यदि नहीं आया तो...। इस पर तो उन्होंने विचार ही नहीं किया। देह की डोर क्या उसके आने तक जुड़ी रहेगी? बड़ी गलती कर दी उन्होंने। अभी वक्त है। कमली के लिए व्यवस्था कर दें तो ठीक रहेगा।  
उन्होंने कमली को आवाज दी। बैठने की इच्छा प्रकट की। कमली ने दीवार के सहारे तकिया लगा उन्हें बिठाया। उन्होंने कागज कलम और चश्मा मंगवाया। असमंजस में पड़ी कमली उनकी हर आज्ञा पूरी कर रही है। शुभदा ने कांपते हाथों से कागज पर लिखा-
''बेटा मयंक! तुम तो बाहर रहते हो। अपने लिए कमा लेते हो। यह मकान तुम्हारे पिताजी की पूंजी है। यदि तुम इसे बेचना चाहो तो बाहर का एक कमरा कमली के लिए छोड़ देना। पुत्रवत् इसने मेरी सेवा की है। कुछ तो प्रतिदान मिलना ही चाहिए। इसका मेरे अलावा कोई नहीं है। जाएगी कहां? ये मेरा अनुरोध नहीं आज्ञा है।ÓÓ
और नीचे अपने हस्ताक्षर कर तारीख डाल कागज को मोड़ कमली को देती हुई बोली-
''कमली, इसे संभालकर रख। मेरे जाने के बाद मयंक आए तो उसे दे देना।ÓÓ
''अम्मा, ऐसा क्यों कहती हो?ÓÓ रुआंसी हो उठी कमली।
''जाना ही पड़ेगा। मुझे सहारे दे कमली। मैं लेटूंगी।ÓÓ
कमली ने पीठ के पीछे से तकिए निकाल दिए। वे लेट गईं। नन्हा दो साल का बरामदे में बैठा मयंक, अपनी तोतली, अटपटी भाषा में लड़ता हुआ- ''मोटा बन्नर काटीÓÓ और दोनों छोटे हाथों से इशारा करता कि बंदर कितना मोटा है। कभी उन्हें चींटी से कहता, कभी पेट से चूहा निकालता, कभी उनके आंचल का कोना पकड़कर दुमकता- ''मां चिज्जी और वे उसकी छोटी छोटी हथेलियों पर दो-दो किशमिश रख देती। गली में सब्जी वाला आता तो उनका आंचल पकड़कर खींचता। साथ में बाजार जाता और आरेंज लाली पॉप लेकर ही आता। जितना छोटा उतना ही नटखट।
मयंक के साथ खेल में लगे-लगे कब दिन होता और कब रात आ जाती पता ही न चलता। वक्त पंख लगाकर उड़ रहा था। दिनेश लौटते तो उनकी अंगुली पकड़ मयंक एक चक्कर बाजार का जरूर लगाता। सुबह दूध लेने साथ जाता।
जब पहले दिन स्कूल गया तो लौटकर एक गुड़ी-मुड़ी कागज उन्हें थमा दिया। उन्होंने खोलकर देखा। कापी से फाड़ा कागज और उसके बीच पेंसिल से खींची आड़ी तिरछी रेखाएं।
''ये क्या है मयंक?ÓÓ कागज दिखाते हुए उन्होंने पूछा।
''चिट्ठी है।ÓÓ
''किसको लिखी है?ÓÓ
''तुम्हें।ÓÓ
''हूं, पढ़कर सुनाओ। क्या लिखा है।ÓÓ वे मुस्करा रही थीं और मयंक पढ़कर सुना रहा था-
''मम्मी, तुम मुझे मिलने क्यों नहीं आई? मुझे तुम्हारी याद आ रही है।ÓÓ
 और उन्होंने लाड़ से गोद में भरकर चूम लिया था। वह प्रथम चिट्ठी अब तक संभालकर रखे हैं उसके बाद रोज ही एक चिट्ठी लिखकर लाता और उन्हें थमा देता।
स्मृति पटल पर एक-एक कर जाने कितने दृश्य आने लगे। यूनिवर्सिटी में टॉप करने पर जब सरकारी वजीफे से अमेरिका जाकर पढऩे की खबर मयंक ने दी तो लगा वे आकाश में उडऩे लगी हैं। उनकी मंजिल इतनी सहज तो न थी। फिर कैसे पहुंच गईं यहां तक। तब लगा, जैसे उनका कत्र्तव्य पूरा हो गया। मयंक को उसकी राहें मिल गई हैं। तभी कुछ खटका था मन में। इतनी दूर मयंक को भेजकर अकेली कैसे रह पाएंगी? और मयंक वह तो अपने उत्साह में ही सब भूल गया था। उनका कुम्हलाया चेहरा देखकर कहा था-
''डोन्ट वरी मम्मी। बस दो ही साल की तो बात है। वक्त यों ही गुजर जाएगा। मम्मी, यू आर ग्रेटÓÓ और वे उसका मन रखने के लिए मुस्करा पड़ी थीं।
मयंक चला गया था और वे उसकी प्रथम चिट्ठी के प्रथम अक्षरों को बांचती एयरपोर्ट पर खड़ी रह गई थीं। एक-एक दिन कर दो साल कटे तभी मयंक का पत्र उन्हें मिला-
''मम्मी! यहीं जॉब मिल गया है। तीन साल का कान्ट्रेक्ट है।ÓÓ
चिट्ठी को थामे उनकी हथेलियां पसीजती रहीं। स्मृतियों के सैलाब आते रहे। वे डूबती-उतरती रहीं। सपने बुनतीं, फिर उधेड़ देतीं। मयंक के पत्र से ही जाना कि उसने वहीं किसी से विवाह कर लिया है। उस दिन उम्मीदों की गठरी पर बैठी सिसकती रहीं और अरमानों से संजोए ढेरों आभूषणों पर धूल जमती रही। आशीर्वाद के दो अक्षर लिख भेज दिए। सोचा- कभी तो मयंक बहू को लेकर आएगा, तभी पहनाकर आंखें तृप्त कर लेगी।
आई थी वह विदेशी बहू विदेशी लिबास में। उन्होंने अपने मन के हर कोण से बहू को देखा और परखा, लेकिन उनके द्वारा चाव से खरीदे गए गहने और कपड़े कहीं भी फिट नहीं बैठ रहे थे। क्या दें, कैसे दें? क्या बहू स्वीकार करेगी? अपने ही संस्कारों से वे संकुचित होती रहीं। बहू को देने की हिम्मत नहीं हुई तो जाने से एक दिन पहले धीरे से मयंक को देती हुई बोलीं-
''तूने लिखा होता तो मैं इसके मतलब का सामान खरीदती।ÓÓ
मयंक ने सब खोलकर देखा, फिर शैली से पहनने को कहा। उन्हें उसे पहनने में मदद की। मयंक ने कैमरे से ढेरों चित्र खींचे। शैली भी मुस्करा रही थी, लेकिन फोटो खिंचवाने के बाद शैली ने कहा-
''मम्मा, बड़ा अनइजी लग रहा है।ÓÓ और उसने एक-एक चीज उतारकर रख दी। मयंक के जाने के बाद कमरे में जाकर देखा तो सारा सामान ऐसे ही पलंग पर रखा था।
वहीं जाकर बस गया वह। आया है कई बार। चलने के लिए भी कहा है, लेकिन इस उम्र में क्या वे विदेशी वातावरण में निभ पाएंगी? सब कुछ अनइजी उन्हें भी लगेगा। कई बार मयंक भी उन्हें रिश्तों की भीड़ का अंग लगा है।
बार-बार मन को समझाती हैं- इतनी दूर से आना क्या इतना आसान है? क्या पता छुट्टी मिले या न मिले। यहां तक आने के लिए ढेरों रकम भी तो चाहिए। बहुत तरह से मन समझाती हैं, लेकिन वही मयंक, मयंक की वही प्रथम चिट्ठी, उन्हें अंदर तक भिगो जाती है। पुत्र के सुख के लिए उन्होंने सबसे किनारा किया और पुत्र उन्हें मंझधार में छोड़ गया। वे जीवनभर अकेली रहीं, कभी स्वयं से लड़ीं तो कभी समाज से। लड़-लड़कर वे थक गर्इं। उन्हें लगता कि वे टूट रही हैं।    शायद टूट ही जाएं उस बरगद के पेड़ की तरह जो उनके घर के सामने था।
वे उस समय आठ-दस साल की रही होंगी। एक अजीब सी आवाज उस पेड़ से आती थी। कितना बड़ा पेड़ था वह। उसकी लम्बी-लम्बी जटाएं धरती को छूती रहती। रात के सन्नाटे में पेड़ की आवाज बड़ी भयावह लगती। लगता जैसे पेड़ कराह रहा है। बच्चे डर कर उससे दूर भागते। सब कहते- उस पर भूत रहता है। उधर नहीं जाना चाहिए।
उन्होंने भी मां से पूछा था। मां ने बताया था कि पेड़ बहुत पुराना है। उसकी जड़ें खोखली हो रही हैं। कभी भी गिर सकता है। इसीलिए चरमराता रहता है।
मां की बात सुनकर उनका भय तो दूर हो गया था, लेकिन एक बूढ़ा, बीमार पेड़ हमेशा उनकी स्मृति में रहा। वही पेड़ रोज उनकी यादों में आता है। वैसी ही कराह वे रोज सुनती हैं। लगता है वे स्वयं उस पेड़ में तब्दील होती जा रही है। सोचते-सोचते जाने कब सो गई।
सुबह कमली ने जब जगाया तो देखा, अम्मा सोते-सोते अकेली ही यात्रा पर निकल गई हैं। उनके चेहरे पर पूर्ण शांति है। उसने चादर से अम्मा का मुंह ढंक दिया।