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Friday 24 Nov 2017

अपने अज्ञान को जानने का ज्ञान

निर्मला डोसी
ए-5, ओरियन सेक्टर-1
चारकोप कांदिवली (पश्चिम)
मुंबई-400067,
मो. 9322496620
दैनिक अखबार में 'आजÓ स्तंभ पर नजर पड़ी तो जरा सी चौंक गई... पता नहीं क्यों हुआ ऐसा। शहर में आज होने वाले कार्यक्रमों की फेहरिस्त में एक जगह नजर टिक गई। तरुणा जैन के काव्य संग्रह का लोकार्पण बिड़ला मातुश्री में और जाने-माने लोगों के आने की खबर छपी थी। अभी दो महीने पहले ही तो एक किताब छपी थी, इतनी जल्दी एक और.. कमाल है।
पहली पुस्तक के लोकार्पण पर सभी को निमंत्रण मिला था। हम चारों ने मिलकर मंत्रणा की, और नहीं गए। और तो और, मां को भनक तक न लगने दी कि उनकी चहेती बेटी के लेखन का प्रथम पुष्प साहित्य वाटिका में सम्मिलित हुआ है।  बैर मां की खुशी से कतई नहीं था हमें... पर तरु दी को हम कोई भाव नहीं देना चाहते थे। दूसरे दिन अखबारों में विस्तार से कार्यक्रम की रिपोर्ट छपी थी फोटो में दी गणमान्य लोगों के साथ मंच पर खड़ी थी। वही हमेशा वाला भावनाशून्य चेहरा लिए। हमेशा अखबार पढऩे वाली मां ने पढ़ा और न किसी से पूछा, न कुछ कहा। लगा कि हमारी करतूत ताड़ ली उन्होंने और जरा गुमसुम सी हो गई थी। बेटी की उपलब्धि से खुश तो जरूर हुई होंगी पर हम सबकी ओछी हकत ने दुखी इतना किया कि दो दिन तक उदास रहीं।
शाम को खुद ब-खुद मेरे पैर 'बिड़ला मातुश्री भवनÓ की तरफ बढ़ चले। मेरे घर के पास ही तो पड़ता है। सभागृह खचाखच भरा था। मुख्य अतिथि अभी नहीं पहुंचे थे। दी की दोनों पुस्तकों पर वक्तव्य चल रहे थे। कविताओं के टुकड़े पढ़े जा रहे थे। तालियों की गडग़ड़ाहट जारी थी। दी मंच पर निर्विकार मुद्रा में बैठी थी। जब अपने लेखन पर उन्हें कुछ कहने के लिए माइक पर बुलाया गया तो सिर्फ इतना बोली- 'मेरे लेखन में जो कुछ अच्छा है वो मेरे अपनों का आशीर्वाद है और जो भूलें रह गई हैं वे मेरी अपनी हैं। कोशिश रहेगी कि उन्हें दूर करने में सफल हो सकूं।Ó
मुझे खुद पर जरा सी हैरत हुई। इससे पहले जब भी कोई दी की प्रशंसा करता, मेरे अंदर भक से कुछ जल उठता। आज दो घंटे से उनकी स्तुति गाई गई, फिर भी मेरे अंदर वैसा कुछ हुआ कैसे नहीं? न खुशी... न गम। ईष्र्या का ईंधन शेष हो गया था या मैंने हार मान ली थी। हार... किससे... और क्यों...।
मुझसे उनका क्या मुकाबला भला... शानदार घर, गाडिय़ां, झिलमिलाते हीरे, सरसराते शि$फोन प्योर जेट... ऐशो आराम के दुर्लभ सरोजाम करतल पर मेरे और 'दीÓ वही सूती कड़ी कलफ लगी सूफियाने रंगों की साडिय़ों में दिखती। विवाह, उत्सव, त्यौहारों पर रंग थोड़े खुशनुमा भले हो जाते पर विशेष बदलाव नहीं रहता। थकान उनके मुरझाए चेहरे पर हर वक्त रहती।
हम दोनों बहनें अपनी एसी गाडिय़ों में नित नए कपड़े, गहने पहनकर जाती। कोशिश करती कि कभी तो जिस तरह हमारे अंदर जो भक् से जल उठता है वैसा वे भी महसूस करें... पर कहां, वे तो हमें देखते ही खिल जातीं। हमारी सज्जा पर दृष्टि डालकर गहरे अपनत्व से कहतीं, यह साड़ी तो खूब जंच रही है रे तेरे पर या 'इस रंग में अच्छी लग रही होÓ या फिर कहती 'कान के इयरिंग बड़े सुंदर हैं इतने भारी पहनने से कान नहीं दुखते क्या।Ó उनकी सरल सहज टिप्पणियों ने कभी हमारी धधकती ईष्र्या पर जरा से समझ के छींटे नहीं मारे। उनकी बातों में रची बसी आत्मीयता को समझा ही नहीं हमने।
हम दोनों बहनों के शरीर पर सुख सम्पन्नता के भेद की परतें चढ़ती जा रही थी। घर के शीशे चिढ़ाने लगे थे। हर महीने हजारों रुपए फूंक रहे थे शरीर को सही अनुपात में लाने के लिए और दी के शरीर में अच्छा लगने जैसा मामूली सा भराव आया था जो उनके व्यक्तित्व को और निखार गया था। अब यह साधारण सी बात भी न जाने क्यों हमारे कुढऩे का कारण बन गई थी। जबकि उनके चेहरे पर उम्र ने जरूरत से ज्यादा गहरे निशान छोड़े थे। जरूरत से ज्यादा धूप भी तो उन्हीं के हिस्से में आई थी। गढ़े में धंसी आंखें, संवला गया गेहुंआ रंग और उड़ गए थे लम्बे घने बाल। उनका यह रूप हमें जरा सी ठंडक देता था। कई बार हम एक दूसरे को कोई ब्यूटी टिप्स दे रहे होते और उनके आते ही चुप हो जाते। क्यों चुप हो जाते यह मैं नहीं जानती।
याद नहीं पड़ता ये सब कब शुरू हुआ... पहले तो ऐसा कुछ नहीं था। हम तीनों ससुराल से आती रात भर बातें करतीं धीरे-धीरे...। अपने सुख-दुख बांटती। बाद में हमारी बातों के विषय बदलने लगे। अरु दी और मैं प्राय: गहनों कपड़ों फैशन की बातें करते जबकि तरु दी किताबों, सिनेमा, नाटकों की। ऐसा भी नहीं था कि हम इन विषयों पर पहले बातें करते ही नहीं थे। खूब फिल्मी गाने साथ गाते.. मुझे बचपन में तुकबंदी करने का शौक था। दी मुझे प्रोत्साहित भी करती, यहां तक कि मेरी उन तुकबंदियों को किसी पत्रिका में छपवाने भी भेजा और अक्सर सुनाने का आग्रह किया करती थी। अरु दी को पत्रिकाओं में रुचि थी और तरु दी वे तो शुरू से ही पढऩे में जहीन और बाद में जैसे किताबी कीड़ा बन गई थी।
आज वे जिस जगह है वहां पहुंचना आसान तो नहीं रहा होगा। पच्चीस वर्षों में पढऩे-लिखने में जितना श्रम व समय दिया उतना शैक्षणिक क्षेत्र में दिया होता तो आज न जाने कितनी डिग्रियां उनके नाम के साथ जुड़ जाती और संभवत: किसी ऊंची कुर्सी पर आसीन भी हो जाती..। तभी शायद हम उनकी कद्र कर पाते। यूं तो श्रम और समय के एवज में काफी कुछ मिला है उन्हें। उसे आंक पाना हमारे वश में है कहां? उम्र के पांचवें दशक में दी गई पत्रकारिता की परीक्षा का परीक्षाफल उनका बेटा लाने गया। वह कहता है कि यह उसके जीवन का स्मरणीय क्षण था। अब तक मांएं ही बच्चों के रिजल्ट लाने जाती रही है। उस दिन बेटा गया था और मां के सर्वोच्च श्रेणी में आने का सम्मान लेकर आया था। उसने सोचा यह सम्मान तो मां को उनकी मां के हाथों मिलना चाहिए लिहाजा बड़े गुपचुप तरीके से मौसियों को फोन करके बुलाया और नानी के हाथों वह शील्ड मां को दिलवाई। खुद तरु दी को भी ऐसी शानदार सफलता का अंदेशा नहीं था। उस दिन मिली अप्रत्याशित खुशी ने मौका ही नहीं दिया कि वे अपने भाई-बहनों भावजों के चेहरे पढ़ती। संभवत: वही दिन रहा होगा जब वे कतार से जरा सा अलग खड़ी लग रही होंगी। उसी दिन से अब तक दबे पड़े ईष्र्या के बीज अंखुवा गए होंगे। तभी तो चारों ने अकथित बेरुखी का रुख अपना लिया था।
उसके बाद कभी भी तरु दी किसी अच्छे कार्यक्रम की बात करती, अच्छी पुस्तक के बारे में बताना चाहती या नामी अखबार के लिए खुद द्वारा लिए किसी साक्षात्कार की चर्चा करती तो चारों को जैसे सांप सूंघ जाता। तुरंत बात पलट देते। चारों उन्हें अनदेखा कर दूसरी बात पर बतियाने लगते। कई बार उनकी उपस्थिति में किसी ने तरु दी की ताजी प्रकाशित रचना या पढ़ी गई कविता पर कुछ कहा नहीं कि वे वहां से उठकर बाहर चले जाते। अनजाने में जो भी तरु दी का प्रशंसक होता, वो बेवजह उनका दुश्मन बन जाता। तरु दी को ये बातें बहुत बाद में समझ आई थी। जब समझ में आ गई तो वे बुझती चली गर्इं। अपनों के इस निर्मम रवैये ने उनकी रचनात्मक ऊर्जा को बाधित भी किया। फिर मानव मन की खूबियों और खामियों को समझने वाली तरु दी ने धीरे-धीरे मानव मन की इस कमजोरी को स्वीकार कर लिया था। विष भी तो तब तक खारा लगता है जब तक उसे खारा समझकर न पिया जाए। एक बार सच्चाई स्वीकार कर लेने के बाद गरल को गले उतारना सहज हो जाता है। गरल को पचाने में समय तो लगा ही था। फिर वे अपने आप में सिमट गई थी। अपनी किसी गतिविधि की चर्चा भूलकर भी नहीं करती। उन्हें अपने अनुभव सुनने पर प्रतिक्रिया में ऐसे-ऐसे बेरहम अनुभव होते जो अन्तत: उन्हें बेचैन करते थे। वे रातों जागती अपने आपसे बतियाती।
आखिर ऐसा क्यों हुआ... क्यों वे भाई-बहनों की मंडली से बाहर कर दी गई। क्या बदल गया था उनमें... कहां भूल हो गई...। आत्म निरीक्षण की आदत हमेशा रही उनकी तो सबसे पहले खुद में ही झोंका था। परखा और पड़ताल की। कोई छोर तब भी कहां मिला। वे स्वयं हमेशा सबकी श्री समृद्धि, वृद्धि से प्रसन्न होती रही हैं तो तकलीफ से दुखी भी। फिर क्यों वे सब उससे, स्पष्ट चाहे न कहें दूरी बनाकर रखते हैं। जब-तब तीखे नश्तर लगाने से भी नहीं चूकते। कसूर क्या है उनका...?
यूं तो हमारा पारिवारिक माहौल ऐसा ही रहा जहां साहित्य संगीत व कला के क्षेत्रों से कोई खास वास्ता रहा नहीं किसी का। जहां पढऩे का अर्थ सिर्फ इतना भर कि किसके नाम के पीछे डिग्री के कितने पुछल्ले लगे हैं या फिर धड़ाधड़ पैसा कमाने वाला सफल माना जाता है। भले अहंकार में मदमस्त हर वक्त अपनी वाणी के कोड़े हर किसी पर फटकारता रहता और उसका लबादा उठाने वालों, हें-हें करने वालों का अभाव नहीं रहता। पाठ्य पुस्तकों से इतर भी कितना कुछ है जो जीवन की सच्ची पढ़ाई करवा सकता है यह हम न जानते थे और न मानते थे। इसलिए ही तरु दी ने क्या पाया है और क्यों प्रबुद्ध तबके में उनकी इतनी कद्र है यह समझना हमारे लिए संभव ही नहीं था।
जिन जाने-माने लेखकों की रचनाएं पढऩे की सलाह कभी हमें तरु दी देतीं, उन्हीं की नई पुस्तकों की समीक्षाएं तरु दी से करवाई जा रही है अब। उनकी इस उपलब्धि को चाहते तो समझ सकते थे हम... किन्तु ईष्र्या का अजगर जो हमारे अंदर कुंडली मारे बैठा था वह हमें अवसर ही नहीं देता कि हम दूसरी तरह से सोचते।
अखबार पत्रिकाओं से रेडियो, टी.वी. कहां नहीं थी तरु दी। शुरूआती दिनों में मेरी बेटी कहीं छपी मासी की फोटो घर भर में दिखाती फिरी। कटिंग काटकर स्कूल बैग में रखकर अपने दोस्तों को दिखाने ले गई। मैंने क्या किया... आज जब अपने दिल का गुबार बताने बैठी ही हंू तो कह ही डालूं...। मैंने चुपके से वो अखबार छुपा दिया ताकि इस मासी पुराण को विराम लगे जो मेरे कानों में पिघल शीशे की तरह टपक रहा था।
कोशिश तो की थी मैंने भी खुद को संवारने की या उन्हें पछाडऩे की पता नहीं। एक कोर्स भी शुरू किया। हर सप्ताह उन्हीं से किसी विषय में लिखवा लेती थी। लिखने से क्या होता है बोलती तो मैं ही थी और हर बार पुरस्कार भी पाती। पाकर इतराती भी खूब मगर दी को सहयोग के लिए धन्यवाद तो कहना दूर... किसी से जिक्र तक न करती कि लिखकर किसने दिया।
यह तो अक्सर होता। जन्मदिन, सालगिरह, गृह प्रवेश, स्मृति सभा, निमंत्रण पत्र, मनुहार पत्रिका, संगीत संध्या इत्यादि रोजमर्रा के तमाम आयोजनों पर दी की सहायता ले ली जाती और उस 'मैटरÓ की कोई प्रशंसा करता तो उसे अपने खाते में जमा कर लिया जाता। कई बार तो दी खुद खड़ी यह तमाशा देख रही होती।
अभी उस दिन की ही तो बात है। मैं डॉक्टर के पास गई थी अपने दुखते दांत दिखाने। इंतजार करते वक्त टेबिल पर पड़ी पत्रिकाएं उलट-पुलट रही थी। हिन्दी की वहां पड़ी एकमात्र पत्रिका उठा ली और समय काटने कहानी पढऩे लगी।
कथा की नायिका कह रही थी- 'तुम अपने जेवरों, कपड़ों, घरों, गाडिय़ों पर इतना इतराती हो और उसके सामने दूसरे को कुछ न समझने का दंभ पालती हो, बताओ जरा कि इन्हें पाने में, जुटाने में तुम्हारी अपनी सहभागिता कितनी है? ये तुम्हारे घर के पुरुषों के श्रम का प्रतिफल है। आठों प्रहर इनके जिक्र को फिर भी मैं तुम्हारा अहंकार नहीं नादानी समझती हूं। जानती हूं आदमी जिस चीज से घिरा रहेगा बात भी उसी की करेगा। शिकायत इतनी सी है तुमसे कि मुझे बेवजह अहंकारी का खिताब क्यों दिए बैठे हो। चाहूं तो अपनी अब तक की विकट यात्रा की निष्पत्ति पर जरा सा अहंकार कर भी लूं, मगर मैंने लम्बे पच्चीस वर्षों तक साहित्य में गहरे पैठ कर यह जाना है कि जितना मैं जानती हूं वह सागर की एक बूंद भर भी नहीं है और सच मानो अपने अज्ञान को जानने के लिए भी बड़े ज्ञान की जरूरत है। इतना ज्ञान ही अब तक पाया है मैंने कि अपने बारे में आकलन कर सकूं कि मैं कितनी अज्ञानी हूं और कितना मुझे पाना है।
कहानी बीच में छोड़कर पन्ना उलटा... कहीं यह कहानी तरु दी ने तो नहीं लिखी- पर नहीं... वह किसी और की कहानी थी। मुझे ऐसा क्यों लगा कि यह बात तो 'तरु दीÓ की है। अर्थात् अपने अज्ञान को जानने का रास्ता यहीं से निकल सकता है शायद...।