Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

समाधान...?

 

 राजेन्द्र सिंह गहलौत
सिंह प्रिंटिंग प्रेस, बस स्टैण्ड के समक्ष,
 बुढ़ार-484110
जिला- शहडोल (म.प्र.)
मो. 09329562110
हल्कू कोल बुरी तरह से नशे में बदमस्त था फिर भी पिये जा रहा था। उसकी झोपड़ी का दृश्य बड़ा वीभत्स था, उसके पास शराब की दो खाली और दो भरी बोतलें, कांच का गिलास, ढेर सारा खाद्य पदार्थ, मिष्ठान्न, एक नई साड़ी, दवाइयों के सिरप, स्ट्रिप, चूड़ी, आलता, महावर, स्नो, पावडर और भी न जाने क्या-क्या बिखरा हुआ था और इन सामानों के बीच पड़ी हुई थी उसकी पत्नी बुधिया। एक जीर्ण-शीर्ण साड़ी से उसका बदन किसी तरह से ढंका हुआ था। अब बुधिया के शरीर में जान न थी, यह उसके पथराए चेहरे पर भिनभिनाती मक्खियों को देखकर अंदाज लगाया जा सकता था। उसका रुखा-सूखा शरीर, कम उम्र में ही चेहरे पर पड़ी झुर्रियां, पिचके गाल, धंसी हुई आंखें सब लम्बी बीमारी की टूटन एवं अर्से से पेट भर खाना न मिल पाने की व्यथा कथा बयान कर रहे थे। पूरी झोपड़ी में गरीबी, भुखमरी पसरी हुई थी। मृत शरीर से उठती बदबू से झोपड़ी के पास भी खड़ा होना मुश्किल था लेकिन इन सबसे अधिक वीभत्स थी हल्कू की विचित्र विक्षिप्त हरकतें। वह बार-बार कभी दवाई तो कभी मिठाई, पूड़ी अपनी मृत पत्नी को खिलाने का प्रयास करता तो कभी शराब का भरा हुआ गिलास ही उसके मुंह से लगा देता और विचित्र हठ से यह सब खिलाने पिलाने का प्रयास करते हुए बार-बार कहता ''ले खा ससुरी! खात काहे नाही आहे! पियत काहे नही आहे! या सब तोरय खातिर तो लाय हयन...।ÓÓ फिर एकाएक नई साड़ी उसे पहनाने का प्रयास करने लगता- ''ले पहन ले नई धोतिया... पुरान धोतिया तो तोर फट गय हय ना...।ÓÓ इस सब प्रयास में अपनी पत्नी बुधिया के पूरे मुंह को उसने मिष्ठान्न पूड़ी एवं अन्य खाद्य पदार्थों से लथेड़ दिया था, चेहरे एवं सीने को दारू से भिगो दिया था लेकिन बुधिया का मृत शरीर इन सबका उपभोग कैसे करता? वह तो जीवित रहते हुए भी कई दिनों तक सूखी रोटी के टुकड़ों के लिए तरस गई थी। पूरी जिन्दगी तो उसने ग्राम के सम्पन्न ब्राह्मन ठाकुरों के यहां हाड़ पेर कर बनी मजदूरी करके पेट भरा, उनके उतारन कपड़ों से तन ढंका। ऐसी हालत में मरने के बाद उसके मृत शरीर से मिष्ठान्न, विभिन्न खाद्यान्न एवं नई साड़ी का उपभोग का आह्वान करते हुए उससे मखौल करते प्रतीत हो रहे थे।
हल्कू की यह विचित्र विक्षिप्त हरकत पिछले तीन दिनों से लगातार चल रही थी। लगभग दो माह से बीमारियों से ग्रस्त बुधिया तीन दिन पहले ही तो मरी थी, और तीन दिन पहले ही तो देर रात में हल्कू, शहर से शराब के नशे में मदमस्त, ढेर सारा सामान लिए हुए अपनी झोपड़ी में लौटा था। उस रात से ही वह अपनी मृत पत्नी बुधिया को विभिन्न खाद्यान्न एवं पेय पदार्थ खिलाने पिलाने, नई साड़ी पहनाने एवं श्रृंगार प्रसाधनों से सजाने संवारने का विचित्र हठ भरा प्रयास कर रहा था। अड़ोस-पड़ोस के लोगों को दूसरे दिन उसकी इस विचित्र विक्षिप्त हरकत एवं बुधिया के मृत्यु के बारे में पता चला तभी से लोग उसे समझाने तथा लाश के पास से हटाने का प्रयास कर रहे थे। उसकी इस विचित्र विक्षिप्त हालत ने क्षेत्र में एक समस्या का रूप धारण कर लिया था। ग्राम के पंच ने ग्राम पंचायत के सरपंच को सूचित किया और सरपंच कुछ ग्रामवासियों के साथ हल्कू की झोपड़ी तक जा पहुंचा। सर पर विधानसभा का चुनाव था ऐसी हालत में आदिवासी कल्याण का नारा लगाकर वोट बटोरने वाला सत्ताधारी राजनैतिक दल सचेत था कि कहीं विरोधी राजनैतिक दल एक आदिवासी व्यक्ति की ऐसी विक्षिप्त हालत का उपयोग उनके खिलाफ न कर ले। सरपंच भी सत्ताधारी राजनैतिक दल की मशीन का एक पुर्जा था अत: वह इस समस्या के समाधान के लिए कुछ अधिक ही परेशान था। फिर खबरों को मीलों दूर से सूंघ लेने वाले पत्रकार भी तो जिले के नगर से आ पहुंचे थे। न जाने वे इस घटना को क्या रूप देते, अत: सरपंच की चिन्ता वाजिब भी थी। सब हल्कू को समझाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन वह तो किसी के पास आते ही कुल्हाड़ी लेकर खड़ा हो जाता और गरजकर ललकारता- ''खबरदार मोर मेहरारु का कौउनो हाथ न लगाया।ÓÓ सब उसकी इस विचित्र विक्षिप्त हरकत से जहां हैरान परेशान थे वहीं चकित भी थे कि इस कंगालनाथ के पास आखिर इतना पैसा आया कहां से...? जबकि कुछ लोग शासन द्वारा आदिवासियों को अपने स्वयं के उपभोग हेतु शराब बनाने एवं पीने की छूट के नियम की आलोचना करते हुए कह रहे थे कि जब आदिवासियों को शराब बनाने एवं पीने की छूट मिलेगी तो यही हाल तो होगा उनका। लेकिन हल्कू की इस हालत के पीछे कुछ और ही कहानी थी।
धीरे-धीरे टुकड़ों-टुकड़ों में विभिन्न स्रोतों से जो जानकारियां उपलब्ध हुई उससे हल्कू बुधिया की पूरी जीवन गाथा प्रस्तुत होती चली गई। हल्कू का एकमात्र खेत रुंगटा झगरहा की कोल माइन्स की भेंट चढ़ गया था। मुआवजा बिचौलियों में बंटकर जो थोड़ा बहुत हाथ आया वह कब तक काम आता। जमीन कोल माइन्स में अधिग्रहण के फलस्वरूप कालरी में नौकरी मिलने का स्वप्न तब टूटा जब उसके नाम से बुढ़ार शहर के एक दबंग व्यक्ति ने अपनी नौकरी हथिया ली। फरियाद करते दर-दर भटकने के बाद भी वह अपने आपको हल्कू न साबित कर सका जबकि वह नकली हल्कू ठाठ से उसके नाम से कालरी में नौकरी करता रहा और उसे दबंगों द्वारा ही नहीं बल्कि पुलिस, शासन-प्रशासन सभी के द्वारा ऐसा धमकाकर डरा दिया गया था कि वह मारे डर के अपना नाम ही भूल गया था। अपनी जमीन से बेदखल, नौकरी से बेदखल भयभीत सहमा वह हल्कू लगभग टूटकर ही रह गया था और उसके साथ ही टूट गई थी उसकी पत्नी बुधिया। बस शेष बची यह झोपड़ी किसी तरह उनके सर पर छाया किये रहते और बुधिया हल्कू बुढ़ार नगर में बनी मजूरी करके किसी तरह अपना पेट भरते, लेकिन उस दिन जब झोपड़ी के पीछे पड़ी अपनी थोड़ी सी जमीन में वह कुआं खोद रहा था तो एकाएक खुदाई के दौरान उसे जमीन से कोयला निकलता दिखाई पड़ा तो वह घबरा गया, उसका घबराना वाजिब भी था। खेत की जमीन से कोयला निकलने और खेत को कालरी द्वारा अधिग्रहित करने का कटु अनुभव क्या वह कभी भुला सकता था। घबराकर वह आनन-फानन में खुदे हुए कुएं की जमीन को पाटकर ही रुका, लेकिन उसके कुएं की जमीन से कोयला निकलने की खबर न रुक सकी। न जाने कैसे बिन पैर ही चलती हुई वह बुढ़ार के कोयला व्यवसायियों के पास तक जा पहुंची।
कुआं बावड़ी खोदते हुए क्षेत्र के ग्रामवासियों की जमीन से कोयला निकलने की घटना नई ना थी। पूरे क्षेत्र के जमीन की परतों के नीचे कोयला का भंडार है। जहां कोयला का विशाल भंडार होता है, वहां तो कोयला उद्योग की शासन द्वारा अधिग्रहित (गवर्नमेंट अंडरटेकिंग) कम्पनी 'कोल इंडियाÓ माइंस खोदकर कोयला निकलती लेकिन जहां कोयला का अल्प भंडार होता वहां वह उत्खनन कार्य न करती क्योंकि उत्खनित कोयले की कीमत से अधिक व्यय कोयला उत्खनन कार्य में खर्च हो जाता। जबकि किसी भी व्यक्ति का व्यक्तिगत तौर पर कोयला उत्खनन अपराधिक कार्य माना जाता, लेकिन इसके बावजूद समीप के नगर बुढ़ार में कोयला के परिवहन व्यवसाय के आड़ में कोयला के अवैध विक्रय के व्यवसाय में रत कोल ट्रांसपोर्टस का जाल फैला हुआ था। ये कोयला व्यवसायी इस तरह से आसपास के ग्रामवासियों की जमीनों से कुआं, बावड़ी खोदते समय निकलने वाले कोयला के अल्प भंडार के ताक में रहते तथा ऐसी जमीन की खबर मिलते ही उस जमीन को ऐन-केन प्रकारेण अपने कब्जे में कर, अवैध रूप से कोयला उत्खनित कर एवं उसका नाजायज विक्रय कर दिन दूनी रात चौगुनी लक्ष्मी हथियाने में लगे हुए थे। मजे की बात यह है कि यहां 'कोयले की दलाली में हाथ काले नहीं होते।Ó बल्कि हाथ सुनहले होते नजर आते।
हल्कू की झोपड़ी के पीछे कुआं खोदने में कोयला मिलने की घटना की खबर न जाने कैसे उन कोल व्यवसायियों के पास तक जा पहुंची। शायद हल्कू ने ही कहीं अड़ोस-पड़ोस में उस घटना की चर्चा की थी और वहां से खबर उड़ती हुई उन तक जा पहुंची थी और तभी से वे लोग हल्कू की झोपड़ी एवं उसके पीछे स्थित उसकी बाड़ी की जमीन खरीदने के लिए उसके पीछे पड़े हुए थे, अच्छी खासी धनराशि का प्रलोभन भी उसे दे रहे थे पर वह अपने सिर पर छत का एकमात्र आसरा उस झोपड़ी को किसी भी हालत में बेचने के लिए तैयार न था। लेकिन पिछले दो तीन माह से बीमार पड़ी पत्नी की हालत तथा कई-कई दिन तक अनाज के दाने-दाने को तरसते रहने वाली दयनीय दशा ने उसे विचलित कर दिया। बीमार पत्नी की दवा तो दूर वह उसे दो रोटी भी न खिला पा रहा था। दिन दिन भर वह पास के कस्बे बुढ़ार एवं धनपुरी में भटकता रहता लेकिन उसे कोई काम न मिल पाता। आखिर वह टूट ही गया और उस दिन वह बुढ़ार के ट्रांसपोर्ट व्यवसायी पंडित जी को अपनी एकमात्र शेष बची हुई झोपड़ी और उसके पीछे स्थित बाड़ी की जमीन बेच आया। आदिवासी की जमीन आदिवासी ही खरीद सकता है के नियम को अंगूठा दिखाते हुए पंडित जी ने अपने आदिवासी नौकर के नाम जमीन खरीद ली और आदिवासी नौकर ठहरा उनका जर खरीद गुलाम मजाल की वह उनकी इच्छा के खिलाफ चूं भी कर जाए।
आदिवासी... हल्कू ने जिन्दगी में पहली बार अपनी जमीन के कालरी में अधिग्रहण से प्राप्त धनराशि के बाद दूसरी बार इतनी अधिक धनराशि को देखा था। महीनों के फांका के बाद मिली इस धनराशि ने उसे बौरा ही दिया था। वह अपने आपको किसी बादशाह से कम नहीं समझ रहा था। वह सब खुशियां खरीद लेना चाहता था। वह अपनी बीमार, कई दिनों की भूखी पत्नी को खुशियों से निहाल कर देना चाहता था। पूरी जिन्दगी में उसे जो न दे सका वह सब उसे दे डालना चाहता था। पूड़ी-मिठाई, गुडहाई करी, रसगुल्ला, समोसा जिसके लिए कभी उसकी पत्नी तरसी थी वह सब बिन मोलभाव किए वह खरीदता चला जा रहा था। पत्नी के लिए नई साड़ी, उसके श्रृंगार के लिए तेल फुलेल, लाली, स्नो, पौडर, आलता, महावर जो भी उसके समझ में आया,जो भी उसे रुचा उसने खरीद डाला। कस्बे के जिस डॉक्टर के क्लीनिक में उसकी महंगी फीस दे पाने में समर्थ न हो पाने की वजह से वह कभी घुसने का साहस न कर सका था आज उस क्लीनिक में वह धड़ल्ले से घुस गया और बीमार पत्नी का हाल बताकर डॉक्टर से पुर्जा लिखाकर, डॉक्टर की फीस लगभग उसके मुंह पर फेंकते हुए, बाहर निकलकर मेडिकल स्टोर से अपनी बीमार पत्नी की दवाइयां खरीदते हुए उसे आज जिस गर्व और खुशी का एहसास हुआ वैसा जिन्दगी में कभी न हुआ। दवा खरीदते हुए उसे दवा खाते ही स्वस्थ प्रसन्न पत्नी का चेहरा आंखों के सामने नाचता नजर आया। वह जल्द से जल्द अपनी पत्नी के पास पहुंच जाना चाहता था लेकिन कस्बे के बाहर हौली के पास पहुंचते ही उसके पैर रुक गए। अरे... कब से तो दारू उसने चखी ही न थी... अब जब वह सब खरीदने में समर्थ है तो फिर यह मादक आनंद ही क्यों रह जाए। उसके समाज में तो स्त्री-पुरुष सब साथ बैठकर शराब पीते हैं वह भी आज अपनी पत्नी के साथ बैठकर जम कर पियेगा। और तुरंत ही उसने दो बोतल शराब खरीद डाली फिर हाथ में बोतल आते ही वह अपने आपको रोक न पाया और दो बोतल और खरीदकर उनमें से एक को खोलकर हौली की बेंच पर बैठ गया, चिखौने में अंडा भजिया पकौड़ा मंगा लिया और जाम पर जाम ढालता चला गया। शराब के नशे में वह कभी मस्ती से गुनगुनाने लगता- ''नानबाई तोला जान गयो... अरे मय तो तोला पहिचान गयो...ÓÓ तो कभी आक्रोशित होकर न जाने किसे गालियां देने लगता...। आज उसे किसी का डर न था जिनसे वह ताउम्र डरता रहा आज शायद उन्हें गालियां देकर वह मन की भड़ास निकाल रहा था। कुछ देर में ही वह हर तनाव से मुक्त था बस अब वह जल्द से जल्द अपनी पत्नी के पास पहुंचकर उसे खुश और तृप्त कर देना चाहता था उसकी हर अधूरी अभिलाषा को पूरी कर देना चाहता था, लेकिन यह खुशी भी उसके नसीब में न थी। देर रात वह जब अपनी झोपड़ी में पहुंचा तो कुछ भी शेष न बचा था। जिसे सुख पहुंचाने के लिए उसने अपना सब कुछ बेच डाला वही अब इस दुनिया में न थी लेकिन वह इस कड़वी हकीकत को स्वीकार ही न कर पा रहा था। वह तो बस हर हाल में यह चाहता था कि उसकी बीमार पत्नी अपनी बीमारी की दवा पी ले, टेबलेट खाकर स्वस्थ हो जाए, अपने भूखे पेट को लजीज खाद्यान्न, मिठाइयों से तृप्त कर ले, अपने कृषकाय शरीर से फटी पुरानी साड़ी को उतारकर नई साड़ी पहन ले, युवावस्था में ही झुर्रियों पड़े अपने चेहरे पर स्नो पौडर लगा ले, अपनी बिवाइयों से फटी एडिय़ों में आलता, महावर लगा ले और सज संवर कर लजाकर उसकी ओर देखकर हौले मुस्करा दे बस उसे खुशियों का इन्द्रासन मिल जाएगा। वह अपनी इसी खुशी को हासिल करने के लिए विचित्र जिद से कभी दवाई तो कभी पूड़ी मिठाई अपनी पत्नी बुधिया के मृत शरीर को खिलाने का प्रयास कर रहा था। उसने जबरन ही नई साड़ी उसके शरीर पर लपेट दी थी, चेहरे को स्नो पौडर से लथेड़ दिया था, पैरों को आलता महावर से सान दिया था और अब वह चाहता था कि उसकी पत्नी उसके साथ खाये उसके साथ दारू पिये। गालियों की भाषा उसकी अधिकतम प्यार की भाषा थी अत: उसी प्यार भरी भाषा में वह जिद के साथ अपनी पत्नी के मृत शरीर को सब खिलाने-पिलाने का प्रयास करते हुए कह रहा था- ''ले खा ससुरी! ले पी ससुरी! खात काहे नहीं आहे! पियत काहे नाही! या सब तोरय खातिर तो लाये हन।ÓÓ लेकिन उसकी पत्नी का मृत शरीर भला उसकी इस पागलपन भरी जिद को कैसे पूरा कर पाता? शायद हल्कू... आदिवासी हल्कू! पागल हो गया था? आखिर किसी तरह से पंच, सरपंच ग्रामवासियों, पत्रकारों, पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा विक्षिप्त हल्कू पर काबू पाया गया और उसकी पत्नी की दाह क्रिया सम्पन्न हुई और सबने एकाएक आ खड़ी हुई इस गहन समस्या के समाधान से चैन की सांस ली।
अब तो काफी अर्सा हो गया उस घटना को बीते पर यदि कभी जंगल के बीच बसे इस गांव झगरहा तक जाने का मौका वर्तमान में आपको मिले तो अब आपको कहीं भी दूर-दूर तक जंगल नजर नहीं आएगा। झगरहा ग्राम भी मत ढूंढियेगा वह बड़ी-बड़ी मशीनों से कोयला खोदकर ढेर लगाते कोयला उद्योग के तले कहीं गुम हो गया है। लेकिन फिर भी लाठी टेककर चलता अपने आप से ही बातें करता एक फटेहाल विक्षिप्त बूढ़ा आपको जरूर नजर आ जाएगा जो कि पूरे उद्योग क्षेत्र में घूमता हुआ न जाने क्या ढूंढता रहता है? आपने ठीक पहचाना जी, हां यह हल्कू ही है शायद वह अपना गुमशुदा ग्राम, अपनी झोपड़ी, अपनी बाड़ी, अपना खेत और अपनी पत्नी बुधिया को ढूंढते हुए परेशान है। आपने दया कर यदि उसे कुछ भी खाने-पीने को दिया तो एकाएक अट्टाहास करके हंस पड़ेगा और शून्य में हाथ उठाकर न जाने किसे वह खाद्य पेय पदार्थ खिलाने का प्रयास करता हुआ कहेगा- ''ले खा ससुरी! ले पी ससुरी! खात काहे नाही, पियत काहे नाही! या सब तोरय खातिर तो आयÓÓ और खाद्य पेय पदार्थ में से कुछ खाता कुछ शून्य में उछालता फिर ठठाकर हंस पड़ेगा। चलते चलते इतना निवेदन जरूर है कि उसकी इस विक्षिप्तता के पीछे निहित कारणों एवं उनके निवारण का कोई समाधान आपको सूझे तो बतलाइएगा जरूर...।