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Tuesday 21 Nov 2017

लली गयी किस देस?


 चन्द्रकिशोर जायसवाल
गुरुद्वारा रोड,
महबूब खाँ टोला,
पूर्णिया - 854301   
मो. 9931018938
पूरे पाँच साल से व्याकुल थी कजरी की माँ, ''किस देस चली गयी मेरी लली?ÓÓ
दिल्ली में मजदूरी करता है गाँव का दीपचन और साल में बस एक बार घर आया करता है दस-पन्द्रह दिनों के लिए। हर बार कजरी-माँ पहुँची है दीपचन के पास अपनी लली के समाचार के लिए और हर बार दीपचन ने उल्टा-सीधा जवाब देकर उससे पिंड छुड़ा लिया है। अब दीपचन की यह बात वह मान भी ले कि बड़े घर में चली गयी है कजरी, बड़ी गृहस्थी का बोझ होगा उसके ऊपर, दस-पाँच नौकरों को चलाना पड़ता होगा, अब उसे दिन में चार बेला खाने की आदत हो गयी होगी, तो क्यों वह उस घर की तरफ  निगाह भी करे जहाँ ठीक से एक बेला भोजन भी नसीब नहीं होता था, मगर यह कैसे मान ले कि उसने गाँव-घर, सखी-सहेली, माँ-बहन सबको बिलकुल ही भुला दिया। एक दिन, आधा दिन के लिए भी नहीं आ सकती भला! विदा के समय किस तरह लिपटकर रोती रही थी वह! उसका दुलहा बोलकर गया था कि हर साल वह कजरी को लेकर रुस्तमपुर आया करेगा पाँच-दस दिनों के लिए। अब यह क्या कि एक पाती तक कभी नहीं आयी उसके कुशल-क्षेम की इन पाँच सालों में!
पिछले साल वह लटक गयी थी दीपचन से, ''इस बार आपके साथ मैं भी चलूँगी, दीपचन। मेरा जी नहीं मान रहा है। देख तो आऊँ कि लली किस हाल में है।ÓÓ
दीपचन ने झिड़क दिया था, ''मैं तुम्हें लेकर कहाँ जाऊँगा, भौजी? मेरे पास उसका कोई पता-ठिकाना तो है नहीं। मेरे पास तो एक ठेकेदार लेकर आया था उसके दुलहा को। दो साल से उस ठेकेदार से भी भेंट नहीं हुई है। ऐसे सुन लो कि सुख में रह रही है तुम्हारी बेटी। कभी भेंट होगी उस ठेकेदार से, तो पूछ लूँगा उससे कजरी का पता। तब चलना मेरे साथ; मैं पहुँचा दूँगा तुम्हें कजरी के घर। अभी कोई जिद मत करो मेरे साथ चलने की। मैं किसी भी सूरत में नहीं ले जाऊँगा तुम्हें।ÓÓ
दीपचन की बातों से चैन कहाँ कजरी-माँ को! हदस समा गया उसके दिल में। यह दीपचन आज तक झूठ ही तो बोलता नहीं रहा है ! न जाने किस वन-बियाबान में है उसकी बेटी ! शायद सोच रही हो, माँ ने इन पाँच वर्षों में कोई खोज-खबर नहीं ली ! बेटी को ब्याह दिया और भुला गयी !
वह गाँव के मुखिया के पास पहुँची अपना दुखड़ा सुनाने। मुखिया ने ध्यान से उसकी बातें सुनीं। उसे पता था कि इस इलाके की बेटियाँ गायब हो रही हैं, बिक रही हैं और इस तरह ब्याही जा रही हैं कि उनका फिर कभी लौटकर आना सम्भव नहीं होता। यह सब नहीं सुनाया उसने कजरी-माँ को, बस इतना भर कहा, ''धरती बहुत बड़ी है, कजरी-माँ। बिना अता-पता के कजरी को ढूँढ निकालना सम्भव नहीं है। तुम भगवान पर भरोसा रखो कि कजरी सुख में जी रही होगी। अभी नहीं आ रही है, मगर कभी घर की याद जोर मारेगी, तो अवश्य आयेगी वह तुम्हारे पास। तुम घर जाओ; मैं यह ध्यान में रखूँगा कि कजरी को ढूँढऩा है।ÓÓ
मुखियाजी के ध्यान में सचमुच कजरी बनी रही। वे दो-तीन बार आ चुके थे कजरी-माँ के पास कजरी की बाबत पूछताछ करने और कजरी-माँ को दिलासा देकर गये थे। मगर कजरी-माँ ने अब मान लिया था कि उसकी कजरी अब कभी लौटकर नहीं आयेगी, कि कजरी दूर देस में मर-खप गयी।
जिस जागेसर को अपनी तीनों बेटियों के ब्याह के बाद जाना था, वह किसी एक का भी ब्याह नहीं कर सका। तीन बेटियों में सबसे बड़ी टिकुली कुँवारी मर गयी थी। शायद पुरखे प्रसन्न हुए होंगे। मगर यह बेटी के मरने का दुख ही रहा होगा कि बाप अधिक दिनों तक जिन्दा नहीं रहा और टिकुली के पीछे चला गया।
टिकुली के बाद अब यह कजरी!
दीपचन ही दुलहे को लेकर आया था और दुलहा रुपये की मोटी थैली लेकर। थैली पर ध्यान नहीं था कजरी-माँ का, मगर यह तो चाहा ही था कि बेटी सुखी घर में जाये। पड़ोस के बछरू ने भी हामी भरी थी, ''यह ब्याह हो जाने दो, भौजी। माना कि कजरी के ब्याह की अभी जल्दी नहीं है, पर ऐसा मौका फिर मिलेगा, इसका कहाँ ठीक ! यह मत देखो कि उम्र कुछ अधिक है दुलहे की, यह देखो कि बेटी बड़े घर में जा रही है।ÓÓ  
''इस बात से भी मत डरो, भौजी,ÓÓ दीपचन ने सुनाया था, ''कि बेटी को दूर देस भेज रही हो। अब कोई देस दूर नहीं रहा, और फिर साल में एक बार कजरी तो आया ही करेगी रुस्तमपुर तुमसे मिलने।ÓÓ
पाँच साल में एक बार भी नहीं आयी कजरी; एक पाती तक नहीं आयी उस दूर देस से। घर की याद अब कब जोर मारेगी? उस दूर देस में मर-खप गयी उसकी कजरी।
उसकी आँखों के आँसू थम ही नहीं रहे थे और वह सबसे छोटी बिंदिया से लिपटकर रोती रही थी। अब तक दूर देस चली गयी बिटिया के लिए रोती रही थी, अब एक और मरी हुई बिटिया के लिए रो रही थी वह।
और एक साल गुजर गया, मगर ऐसा एक दिन नहीं गुजरा जब कजरी की याद नहीं आयी हो।
कि तभी एक सुबह...
उस सुबह कजरी ही आ गयी!
अचानक कजरी प्रकट हुई थी माँ के सामने...''माँ!ÓÓ
गहनों से लदी कजरी ! पटोल-पाटंबर में सजी कजरी!
दीपचन ने कुछ भी झूठ नहीं कहा था। बछरू का कहा सच निकला; बेटी सचमुच बड़े घर में गयी है!
माँ आगे बढ़कर बेटी से लिपट गयी...''कजरी!ÓÓ
और यह छोटा बच्चा? माँ की निगाह बच्चे पर पड़ी, तो बेटी ने जवाब दिया, ''यह तुम्हारा नाती है, माँ?ÓÓ
निहाल हो गयी कजरी की माँ। वह दौड़ गयी बछरू के पास, ''जरा मुखियाजी को कह आइये कि कजरी को घर की याद आ गयी, कजरी माँ से मिलने आयी हुई है।ÓÓ
तेरह की हो गयी बिंदिया, दीदी को देखते ही फिर से आठ की हो गयी...दीदी!...पाँच साल पहले गुम हो गयी दीदी अब जाकर मिली थी...दीदी!...दीदी!!...
''अकेली आयी हो क्या?ÓÓ माँ ने पूछा था।
''नहीं, माँ,ÓÓ बेटी ने जवाब दिया था, ''मेरे साथ कई लोग आये हैं; वे सब दीपचन चाचा के घर पर हैं। मुझे उन्होंने यहाँ भेज दिया।ÓÓ
''कितने लोग हैं?ÓÓ माँ ने पूछा, ''ये लोग तुम्हें पहुँचाने आये हैं?ÓÓ
''नहीं,ÓÓ बेटी ने टूटते स्वर में जवाब दिया, ''बिंदिया को ले जाने।ÓÓ
''बिंदिया को ले जाने!ÓÓ माँ बुदबुदाकर चुप रह गयी।
''बिंदिया को ब्याह कर ले जाने आया है इसका होने वाला दुलहा।ÓÓ
''तो मैं कर दूँगी इसका ब्याह,ÓÓ माँ ने सुनाया, ''तुम हाँ बोल रही हो, तो मुझे अब किसी से पूछने की भी जरूरत नहीं है।ÓÓ
''मैं हाँ नहीं बोल रही हूँ, माँ।ÓÓ
''हाँ नहीं बोल रही हो!ÓÓ माँ बुदबुदायी और फिर पूछा, ''आयी तो हो मेरी हाँ के लिए ही न?ÓÓ
''मुझे बहला-फुसलाकर लाया गया है, माँ,ÓÓ बेटी बोली, ''और आ गयी हूँ तो तुम्हारी एक दूसरी हाँ चाहिये मुझे।ÓÓ
''कैसी हाँ रे?ÓÓ
''अगर तुम हाँ कहो, तो अब मैं लौटकर नहीं जाऊँ।ÓÓ
''लौटकर नहीं जाना है?ÓÓ माँ को एक धक्का-सा लगा।
''मैं तो कबकी भाग आयी होती, मगर निकल भागना सम्भव नहीं हुआ। तुम मुझे हाँ बोल दो, माँ; मैं यहाँ अपना और अपने बच्चे का पेट बकरी चराकर, कुटाई-पिसाई और खेतों में रोपनी-कटनी करके भर लूँगी।ÓÓ
माँ निर्वाक् रह गयी।
देर तक बकारी नहीं फूटी माँ के मुँह से। जब उसने बेटी को हाँ कहने के लिए मन बना लिया, तब पूछा, ''तुम सुख में नहीं हो, कजरी?ÓÓ
बेटी कुछ बोली नहीं; ना में सिर हिला दिया।
''तुम्हें गहनों से लदी देखा मैंने, तो सोचा...ÓÓ
''ये किसी और के गहने हैं, माँ; आने के समय मुझे पहना दिये गये; जाने पर उतार लिये जायेंगे।ÓÓ
''खाने-पीने का दुख है?ÓÓ
कजरी का मुँह नहीं खुला, आँखों से आँसू बह निकले।
''तुम्हारा कोई समाचार मुझे नहीं मिल रहा था, बेटी,ÓÓ माँ बोली, ''अगर तुम्हारे गाँव-घर का पता मुझे मिल गया होता, तो कबकी मैं तुम्हारे पास पहुँच गयी होती। दीपचन ने भी कभी कुछ नहीं बताया।ÓÓ
''दीपचन तुम्हें कभी कुछ नहीं बताता। अगर कहीं से तुम्हें मेरा पता मिल भी गया होता,ÓÓ बेटी ने मुँह खोला, ''अगर तुम मेरे गाँव पहुँच भी गयी होती, तब भी तुम मुझे नहीं ढूँढ़ पाती, माँ।ÓÓ
''क्यों?ÓÓ
''मेरे गाँव का नाम है भखरी। वहाँ बीसों ऐसे घर हैं जिनमें दूर देस की बेटियाँ बहला-फुसलाकर या चुराकर या खरीद कर लायी गयी हैैं। अता-पता लगाकर जब-तब आता रहा है बेटी वाला उस गाँव में, पुलिस के साथ आया है, मगर उन्हें पूरा गाँव यही बताता है कि जिस लड़की को वे ढूँढ़ रहे हैं वैसी कोई लड़की नहीं है उस गाँव में। पूरा गाँव एक होता है और ये लड़कियाँ इतनी मार खायी हुई, इतनी डरी हुई रहती हैं कि हताश-निराश घर में छुपी रह जाती हैं।ÓÓ
''तुम पर भी मार पड़ती थी, कजरी?ÓÓ
''हाँ, पड़ती थी, उनकी बात नहीं मानने पर।ÓÓ
माँ कुछ रुककर थरथराते स्वर में बोली, ''मुझे इस दीपचन ने ही फुसलाया था।ÓÓ
''मैं तो बिकी थी, माँ।ÓÓ
''नहीं, बेटी, मैंने तुम्हें बेचा नहीं था।ÓÓ
''मगर उन लोगों ने मुझे खरीदा जरूर था,ÓÓ कजरी ने सुनाया, ''दीपचन चाचा को पूरे दस हजार दिये गये थे तुम्हें मेरे ब्याह पर राजी करने के लिए। बिंदिया के लिए उसे पन्द्रह हजार मिलेंगे। मुझे भी लोभ दिया गया है कि अगर मैं तुम्हें बिंदिया को ब्याहने के लिए तैयार कर लेती हूँ, तो मुझे कई थान सोने के गहने पहना दिये जायेंगे।ÓÓ
कजरी-माँ के मन में आया कि अगर उसकी बेटी खाते-पीते परिवार में जाये तो फिर उसे इससे क्या मतलब कि दीपचन को दस मिले या पन्द्रह। मार तो इस देस की बहुएँ भी खाती ही हैं बात नहीं मानने पर। इस मार के कारण तो ससुराल से भागा नहीं जाता। उसने कुछ रुककर कजरी से कहा, ''दीपचन को पन्द्रह मिले या तुम्हें सोने का एक थान गहना भी न मिले, मगर यह तो होगा कि पेट भर खाना मिलेगा बिंदिया को। मैं तो इसे ही उसका सुख मानूँगी।ÓÓ
''पेट भर खाना तो मिलेगा, माँ,ÓÓ बेटी ने कहा, ''मगर यह जान लो कि अब अगर मैं बिंदिया को लेकर जाती हूँ, तो फिर किसी बेटी से कभी मिलना नहीं होगा तुम्हारा।ÓÓ
''मैं कलेजे पर पत्थर रख लूँगी, बेटी,ÓÓ माँ बोली, ''मेरे मरने के दिन आ गये। अब और कितने दिन जिन्दा रहूँगी मैं ! इस सन्तोष के साथ तो मरूँगी कि मेरी बेटियाँ सुख में रह रही हैं।ÓÓ
''खाने-पीने के दुख से भी तो बड़ा कोई दुख हो सकता है, माँ।ÓÓ
''खाने-पीने के दुख से बड़ा कौन सा दुख होता है री?ÓÓ माँ बोल गयी, ''मैं तो ऐसा कोई दुख नहीं जानती।ÓÓ
''होता है, माँ;ÓÓ करुण स्वर में बोली कजरी, ''इससे भी बड़े-बड़े दुख होते हैं।ÓÓ
''बताओ तो, कैसा दुख?ÓÓ माँ ने पूछा, ''नैहर नहीं आने का दुख? दूर देस में उदास रहने का दुख? सखी-सहेली से कभी नहीं मिल पाने का दुख, सास-ससुर की बोली-ठोली का दुख? काम के बोझ का दुख? कौन-सा दुख, बेटी?ÓÓ
''इससे भी बड़ा दुख, माँ।ÓÓ बोलकर कजरी माँ से लिपट गयी।
''बतायेगी नहीं, बेटी?ÓÓ माँ की आवाज थरथरायी; आँखों में आँसू आ गये।
''जिस घर में बिंदिया जायेगी, उस घर में तीन भाई हैं।ÓÓ
''तो?...तो क्या हुआ?ÓÓ
''बिंदिया को,ÓÓ कजरी ने सुनाया, ''इन तीनों की बहू बनकर रहना होगा। दिन-रात नोंचते-खसोटते रहेंगे तीनों बिंदिया को।ÓÓ
माँ सन्न रह गयी, ''यह क्या सुना रही हो? क्या सुना रही हो, कजरी? कैसा देस! कैसा मुलुक! ना ना ना, मैं बिंदिया को नहीं ब्याहूँगी उस देस में, कभी नहीं, कभी नहीं।ÓÓ
''हाँ, माँ, कभी नहीं,ÓÓ कजरी बोली, ''और अब मेरे लिए हाँ बोल दो, माँ। मुझे अपने घर में दो भाइयों की बहू बनकर रहना पड़ रहा है।ÓÓ
''तुम...ÓÓ माँ आगे नहीं बोल सकी।
''मैं चीखी, चिल्लायी, मार खा-खाकर अधमरी होती रही, मगर मेरी कौन सुनता? सास-ससुर ने भी सुना दिया कि अब एक और बहू खरीद लाने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं और मैं दोनों भाइयों की बहू हुई।ÓÓ
माँ की आँखें इस तरह बन्द हुईं जैसे कि अब कभी खुलेंगी ही नहीं।
कजरी ने माँ को हिलाया, ''अब वे लोग दीपचन चाचा के घर से इधर आ ही रहे होंगे, माँ। तुम किसी की भी बात मत मानना, बिंदिया के लिए ना और मेरे लिए हाँ पर अडिग रहना।ÓÓ
अचानक कजरी-माँ उठी और कजरी से कहा, ''तुम दोनों बहन घर के खूँटों की तरह गड़ जाओ यहाँ; मैं अभी मुखियाजी को बुला लाती हूँ।ÓÓ