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Monday 20 Nov 2017

वंदे मातरम् (अवधूत)

प्रो. प्रदीप भार्गव
निदेशक, गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान,
झूंसी, इलाहाबाद
मो. 9415237820
स्वतंत्रता दिवस पर राजा प्रात: काल योगासन करने के बाद वंदे मातरम् गुनगुना रहा था। अभी लालकिले की प्राचीर से बोलने में तीन घण्टे शेष थे। प्रात: जल्दी उठना उसकी दिनचर्या थी। वंदे मातरम्। सुजलां-सुफलाम् मलयज शीतलाम्। अरे, तभी बेताल उसके कंधे पर आ बैठा और बोला मैं तेरी देशभक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। तू अपने काम के लिए बहुत समर्पित है। नित नई घोषणाएं करता है। आज आज़ादी का दिन है। वन्दे मातरम् का दिन है। आज़ादी का दिन है। आज देश आज़ाद हुआ था। हम आज़ाद हुए थे। पर क्या हमारा सुजलाम्-जल, सुफलाम्-फल और मलयज शीतलां-हवा आज़ाद है? क्या सबको जल, फल और हवा पाने की आज़ादी है? प्रकृति की देन को कोई बंधक तो नहीं बना रहा राजन्?  अगर ये ही बंधक हो गए तो मातृभूमि क्या होगा? वंदे मातरम् किसको बोलेंगे? ये बहुत कठिन समय है राजन्। अगर तू समय पर नहीं चेता तो अनर्थ हो जाएगा। आज़ादी का क्या अर्थ रह जाएगा? आ आज इस गीत को समझें और ढँूढे कि इस गीत का और आज़ादी का क्या रिश्ता है। तुझे जल, फल, वायु की आज़ादी की कथा सुनाता हूं। सुन। अगर तू बीच में बोला तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।
    देख राजन्, सुजलाम् होता है, सुंदर जल, पवित्र जल। ऐसा जल या तो हिमालय की कंदराओं में आज़ाद है, या फिर मिनरल वॉटर की बोतलों में बंद। या फिर दूर कहीं गांवों में आज़ाद है जो शहर की जद से बाहर हैं, या रेगिस्तान के तालाबों में जहां बरसात का पानी इक_ा होता है। ऐसे तालाबों को लोक बहुत सहेज कर रखता है। देखो! कितना कुछ बदला है राजन। गर्मियों में सेठ लोग जल सेवा करते थे, पौशाला या प्याऊ लगाते थे। अब यही सेठ मिनरल वॉटर बेचते हैं। नदियों का पानी तो मैला हो गया है। प्रयाग के पानी में मल-मूत्र है, कानपुर की चमड़े की सफाई से निकला क्रोमियम है। डुबकी लगाने से पहले सोचना पड़ता है। टेरी डैम में बंधा पानी न छोडें़, तो कोलिफॉर्म और क्रोमियम से माघ मेले में स्नान करें।
हे राजन् वेदों में जल की बड़ी महिमा है। वेदों में वर्णन है : जल की नदियाँ बह रही हैं, मानो वो दूध में शहद मिला रही हैं। जो जल सूर्यकिरण से शुद्ध बनता है अथवा जिसकी पवित्रता सूर्य करता है, वो जल हमारा आरोग्य सिद्ध करे। जिन नदियों में हमारी गौएँ जल पीती हैं और जिनके लिए हवि बनाया जाता है उनके जल का गुणगान करना चाहिए। जल में अमृत है, जल में औषध है, जल के शुभ गुण से घोड़े बलवान बनते हैं और गौएँ भी बलवती बनती है (अ., का. 1, सू. 4, मं. 2)।
    हे राजा, हर जल की अलग महिमा है। मेघों से प्राप्त जल नदी, समुद्र, जलमय प्रदेश, मरुदेश, कुएँ और बावड़ी से प्राप्त जल, कुंभ में रखे जल के गुण अलग-अलग होते हैं। जिस जल पर सूर्यकिरण पड़ती है और नहीं पड़ती है, बहती नदी और ठहरे तालाब, पुष्प पराग से प्लावित जल और जिस जल में गौएँ पानी पीती हैं, उनका गुणधर्म अलग-अलग होता है। जल अमृत होता है और जल में औषध होती है। जल आरोग्य करता है, बल और प्रजनन शक्ति देता है।
हमारी प्रगति होने के बाद, हे राजन् कौन ऐसा जल-स्त्रोत हैं, जहां का जल विषाक्त न हुआ हो। उसमें न अब अमृत है, न औषध है। अब जल में पेपर मिलों से निकला पानी, टैनरियों से निकला क्रोमियम युक्त पानी, रसायन, हैवी मेटल्स और सीवरेज का कोलीफार्म युक्त पानी है। भूजल में फर्टिलाइजऱ और पेस्टीसाइड के खतरनाक रसायन हैं। पहले पानी औषध था अब पानी पीने पर औषधि लेनी पड़ सकती है।
    हे राजन्, अब जल को साफ़  करने की विशाल इंडस्ट्री खड़ी हो गई है। मिनरल वॉटर की इंडस्ट्री अब 6000 करोड़ की है और बढ़ रही है। और न जन कितने प्लास्टिक का कचरा बना रही है। और एक्वा गार्ड और आर.ओ. का बाज़ार अभी 3400 करोड़ का है और दिन रात प्रगति कर रहा है। जो मेघों का जल प्राणिमात्र को एक समान मिलता था (अ. का. 10, सू. 1, मं. 9) अब निजी होता जा रहा है। जो जल पृथ्वी की गंध धारण करता था (अ. का. 12, सू. 1, मं. 23) अब गंधहीन होता जा रहा है।
हमारे सहयोगी संतोष के नीबीकलां गांव में अभी न एक्वा गार्ड है और न ही आर.ओ.। व्यंग्य से मुस्कुरा कर संतोष ने बताया कुएं का पानी गर्मी में अभी भी शीतल है, कहीं-कहीं कुएं के पानी में नीम की गंध आती है। तालाबों के पास पीपल है, जिसके फलों से मछलियां भोजन लेती है। चापांकल (हैंडपंप) से पानी लेते हैं, थोड़ा कसैला होता है, पर भरना आसान। जैसे-जैसे गांव के पास अट्टालिकाएं बनेंगी, ऊंचे रहने वाले लोग अपने ट्यूबवैल बनाएंगे, शीतलता और गंध वाले जल-अमृत की पूर्णाहुति होगी।
लोक के लिए पानी ही जीवन है। अब उसे पाने के लिए पानी-पानी होना पड़ता है। और तो और, आंख का पानी भी कहां बचा है? झूठ का बोलबाला है। जो जोर से झूठ बोलता है, उसी की जीत है। रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न उबरे मोती मानुस चून। राजन् तेरे मोती की आभा में कहाँ कमी है, वह तो दिन दूना, रात चौगुना तेरे लिए चमकता है। ''इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति,ÓÓ मुक्तिबोध ने कहा था। पर बुढिय़ा ने आटा सानने के लिए बचा पानी दोपहर 3 बजे से शहर की परिक्रमा लगा रहे सारसों के लिए रख दिया था। कवि केदारनाथ सिंह ने बताया कि सारस पानी को खोजते दूर-देसावर से आए थे, न तो उन्होंने बुढिय़ा को देखा, न आंगन में रखे जल भरे कटोरे को। वे वापस उड़ गए। मुड़ के शहर को देखा। पता नहीं उनकी निगाह में दया थी कि घृणा। (कविता अकाल में सारस) राजन् आगे की कहानी ये कि कटोरे का पानी काला कुत्ता पी गया।
सारसों को शहर में पानी नहीं मिला राजन्। गाँव में किसान की बात तो छोड़। कुम्हार को बर्तन ढालने के लिए, ईंटा बनाने वाले, धोबी, नउए- सभी को सुजलाम् चाहिए। कहो तो, उनको काम करने की आज़ादी के लिए पानी चाहिए। पानी नहीं तो आज़ादी नहीं। कहीं काले कुत्तों ने ही बचा-खुचा सुजलाम् हथिया लिया और ऊंचे दाम पर बेचने लगे तो कौन आज़ाद रहेगा? उत्तराखण्ड में देश का सबसे स्वच्छ जल मिलता है। उसे कंपनी वाले रोक कर बिजली बना रहे हैं। कच्चे पहाड़ों में टनल बना रहे हैं। पानी को रोकने और जंगलों के कटने से उत्तराखण्ड झंझावात झेल रहा है। बद्रीनाथ धाम पर संकट है। वैसे एक धाम न रहे, तीन तो हैं। जल और तीर्थ का गहरा संबंध है। जल की स्वतंत्रता बाधित हो, तो तीर्थों का क्या होगा। लोक गाँव से कभी-कभार निकलता है, तो मेले-तीर्थों के लिए ही। गाँव के कामों से महिला को छोटे-बड़े तीर्थों, मेले-उत्सवों में ही थोड़ी आज़ादी मिलती है, मन बहल जाता है। प्रयाग के महाकुम्भ में भी संगम में पानी की कमी थी। हमें हमारा जल, तीर्थ, मेले उत्सव, धर्म सब बचाने हैं। राजन् ''तेरा यह सौंदर्य वह वैचित्र्य, ईश्वर भक्तिÓÓ बद्रीधाम को, जल-तीरथों को बचा लेगी। ऐसा मुक्तिबोध ने कहा था और लोगों का भी विश्वास है।
सुजलाम् से सुफलाम् का रिश्ता है। जल न हो तो फल कहां से हो। सुफलाम् पैदा करने वाले पंजाब के किसानों ने पूरे देश को अन्न दिया, हरित क्रांति की। पर अपने भूजल में ज़हर  घोल दिया। कैंसर को अपना लिया। भटिण्डा से कैंसर एक्सप्रेस रेलगाड़ी बीकानेर आने-जाने लगी। कजऱ् इतना ले लिया कि वापस न कर पाए। पश्चिम उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों ने रस भरी गंडेरियाँ दीं पर स्वयं सूख गए। चीनी मिल मालिक उन्हें सताते हैं, करोड़ों का बकाया है। शिमला के सेबों पर जमी कीड़ामार दवाई चाव से खाते है। इलाहाबाद का बेदाना अमरूद ढूँढे से नहीं मिलता। फालसे और खिरनी तो कितनी कम मिलती हैं। हापुस आम इंग्लैण्ड, अमरीका और दुबई न जाए तो बच्चों को दिखा पाएं। शिवलिंग पर चढऩे वाले बेरों का स्वाद और पपीते की महक न रही। देशी गोल टमाटर ढूंढे से नहीं मिलते। उंगली जैसी पतली ककडिय़ां अब सोटे के आकार की हो गईं। गांव के छोटे बच्चों को कलमी आम तो कभी शायद ही मिलता था, अब तो छोटा रस वाला आम टेटना, भी जाता रहा। तरह-तरह की छोटी अमिया, चीनी जैसे दाने वाली- चिनयाहवा, काले से पीली होने वाली- करीवा, गिर के फट जाने वाली- फटावा, अचार के लिए अच्छी खट्टी-नुनचाहवा, रेशों वाली- जरकुलावा, एक ही पेड़ की दो शाखा में अलग-अलग स्वाद वाली- दुईपड़हावा अब जा रही हैं। हाँ फलों के नाना प्रकार के जूस खूब मिलते हैं- साल भर, मौसम का कोई चक्कर नहीं। सुफलाम् की प्रोसेसिंग हो गई। रामदेव का मल्टीग्रेन आटा आ गया। किसी की फल मिलने की आज़ादी गई, किसी को भरपूर रस मिला। सुफलाम् की आज़ादी छिनी तो विदेशी दवाई कंपनियों का न्यूट्रिशनल सप्लीमैण्ट मिल रहा है। आगे भी मिलता रहे इसकी आज़ादी है। 'जो तीन बेर खाती थीं, वे तीन बेर खाती हैंÓ भूषण ने 100 साल पहले कहा था। अब तो राजन् 'बेरÓ की झाडिय़ां जा रही हैं। न्यूट्रिशन के लिए कंपनियों का ही आसरा बचा है- ''इतना गूढ़, इतना गाढ़ा, सुंदर जालÓÓ, मुक्तिबोध ने कहा था।
जल और फल की तरह हवा की आज़ादी भी सुंदर जाल में फंस गई है। मलयज शीतलां - मलय पर्वत से आने वाली शीतल पवन - को नमन। पर ये कहां है राजन्।
    वेदों में वर्णन है: वायु नाम ही प्राण है। ऋग्वेद में वायु को पृथ्वीस्थानीय प्राण बताया गया है। (भूत, भविष्य और वर्तमान काल में जो है सब प्राण में ही रहता है।) वायु के बिना क्षणमात्र भी जीवन रहना कठिन है। वायु हमारे फेफड़ों के अंदर जब जाता है, तब उसके साथ प्राण शक्ति अंदर जाती है और उससे हमारा जीवन होता है। यही प्राणायाम का सत्य है। (ऋ. 10/90/13) अथ. 19/6/7, आंतरिक प्राण का बाह्य वायु के साथ नित्य संबंध है। सूर्य जब उदय होता है, तब सभी दिशाओं में सूर्य किरणों के द्वारा प्राण रखा जाता है। सहस््राों किरणों के साथ प्रकाश देने वाला यह, प्रजाओं को प्राण उदय को प्राप्त होता है। (प्रश्न. उ 1/6-8)।
ऋग्वेद में वायु प्राण वायु है। इक्कीसवीं शताब्दी के पर्यावरण वेद में वायु मारक वायु है। पर्यावरण के शास्त्र में हर वस्तु को मापा-परखा जाता है। जो हमें दिखाई भी न दे, उसे नाप लेते हैं। हर वस्तु में मिश्रित वस्तुओं के हरेक कण को जाँचा परखा जाता है। इतनी बारीकी से कि एक ग्राम या एक मीटर के दस लाखवाँ भाग भी माप लें। इसे माइक्रोग्राम या माइक्रोन कहते हैं। हर कण की मारकता को समझा जा सका।
पर्यावरण वेद के अनुसार-   
इंद्रप्रस्थ की मलयज शीतलां अब दिल्ली में ऊष्ण और कसैली हो चुकी है। दुनिया में सबसे दूषित वायु दिल्ली में है। ऐसा विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट कहती है। शहरों की 'हवाÓ सबको लुभाती है। इस हवा में धूल, चिमनियों का धुआँ, मोटरगाडिय़ों, मोटरसाइकिलों, डीजल, एलपीजी से निकले कार्बन के महीन टुकड़े हैं, नाइट्रोजन और कार्बन ऑक्साइड घातक गैस घुली मिली हैं। ये सूर्य की रोशनी में ओजोन के साथ मिलकर अत्यधिक ओज़ोन बनाते हैं। ओज़ोन बहुत प्रतिक्रियात्मक गैस है। इससे खांसी, गले में जलन, लम्बी और गहरी सांस लेने से सीने में जलन और दर्द होता है। दमा और बिगड़ जाता है। सूर्य की तपिश जितनी ज्यादा होती है ओज़ोन भी उतनी ही अधिक बनती है। सूर्य तब प्राण रखता था, अब प्राण हन्ता हो गया है। ओज़ोन बनाता है। ओज़ोन की मात्रा दिन में आठ घण्टे में औसत एक घन मीटर में 100 माइक्रोग्राम (एक ग्राम का दसलाखवाँ भाग) से अधिक नहीं होनी चाहिए। दिन के समय में, गर्मी में और बरसात के बाद ये बड़े शहरों में 180 से 400 तक पाई गई है। शहरों के आसपास के गाँवों में भी ओज़ोन फैल जा रही है।
ओज़ोन के अलावा हवा में धूल, कार्बन और अन्य छोटे-छोटे कण होते हैं। इन्हें पारटिक्यूलेट मैटर (पी.एम.) कहते हैं। इसमें 2.5 माइक्रोन (एक मीटर का दस लाखवाँ हिस्सा) तक के छोटे-छोटे कण होते हैं, जो ऐसे ही दिखाई नहीं देते। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह एक घन मीटर में 25 माइक्रोग्राम से अधिक नहीं होने चाहिए। हमारे देश में 60 का मानक पर कई गुना ज्यादा पाए जाते हैं। दिल्ली में दिन भर का औसत करीब 200 से 500 के बीच पाया जाता है।  
    दिल्ली के लोधी गार्डन में दुनिया भर के एम्बेसेडर, बड़े नौकरशाह, उनकी पत्नियाँ और उनके कुत्ते मॉर्निंग वॉक करने गाडिय़ों में बैठकर आते हैं, वहां पीएम 800 तक पाया गया। मानक से 13-14 गुना अधिक। जो ए.सी. में रहते, घूमते और काम करते हैं वे भी मानक से तीन गुना अधिक पीएम का सेवन करते हैं। जो दिल्ली में दिन भर ठेला चलाते या लगाते हैं, ऑटो चलाते हैं या किसी भी काम से बाहर रहते हैं उनके अंदर छोटे-बड़े कण अधिक जाते हैं। ये कण देखने में छोटे हैं पर घाव गंभीर करते हैं। धीरे-धीरे बहुत सालों-साल में ये कण और ओज़ोन और अन्य घातक गैसें साँस के जरिए खून में पहुँचती हैं और धमनियों में जमने लगती हैं। इससे धमनियाँ कठोर और उनमें रुधिर प्रवाह रुक-रुक कर चलता है। कभी दिल की माँसपेशियाँ काम करना बंद कर देती हैं, कभी दिल के वॉल्व गड़बड़ हो जाते हैं, कभी दिल का कोई और हिस्सा। बहुत क्लिष्ट है दिल का मामला। इस बीमारी को डाक्टर बहुत प्यार से इस्चीमिया कहते हैं। अब रोगी फँसा। इस्चीमिया के अधिकतर रोगी अमीर होते हैं। शारीरिक श्रम अधिक करने वालों के दिल की धमनियाँ और मांसपेशियों की कवायद ज्यादा होती है और इस्चीमिया कम। पर शारीरिक काम करने के लिए सड़क पर या मिलों में, जहाँ धूल और धुएं का अंबार है, रहना होता है। धीरे-धीरे जवान फेफड़ों पर साल-दर-साल परतें चढ़ती रहती हैं, जुकाम खांसी होती है। शरीर कमज़ोर हो जाता है। ये परतें कब कैंसर बन जाएँ, पता नहीं चलता। फेफड़े में टी.बी. की शाही बीमारी बैक्टीरिया फैलाते हैं। ऐसा नहीं कि टी.बी. शहर में ही होती हो। गाँव में भी होती है, पर वहाँ भोजन पर्याप्त नहीं होता और लोग कुपोषण और तम्बाकू के शिकार होते हैं। कोलकाता के एक कैंसर अस्पताल में 11,000 बच्चों की जांच की। हर सौ में 44 बच्चों के फेफड़े खराब या बाधित थे, 15 के आँखों में तकलीफ  थी, 11 को जी मिचलाने की शिकायत और 9 का दिल तेजी से घड़क रहा था।
शहर के हर क्यूबिक मीटर में धुआं और ज़हर गाँव के हर क्यूबिक मीटर से अधिक होता है। अमीरी भी शहर के हर क्यूबिक मीटर में अधिक होती है। मलयज शीतलाम् शायद गांव में अभी भी भोर में मिल जाए पर शहर के लोधी के बागों में प्रात: काल में भी नहीं। शहरों में मलय पर्वत गंध नहीं, मल गंध मिलेगी। दुनिया के 20 सबसे अधिक धुएं, गंधाते, ज़हरीले शहरों में से 13 भारत में हैं।
    आधुनिक रसायन शास्त्र पशिचम में लिखा गया। इस वेद ने पेट्रोल-डीज़ल बनाया इन्हीं से मनुष्य और फसलों के लिए नाना दवाइयाँ बनाई। तकनीकी क्रांति की। फिर प्रदूषण दिया जो हमारी प्राण-वायु को नष्ट कर रहा है।    
जहाँ की मलय शीतल हो वहां शस्य श्यामला - हरी भरी धान से समृद्ध धरती होती है। हरे भरे जंगल हुआ करते थे। जंगल में पेड़ ज्यादा और आदमी कम होते हैं। अंग्रेज़ और बाद की सरकारें जंगलवासियों को जंगल का दुश्मन समझती हैं। वे जंगलों को नष्ट करते हैं। बहरहाल नई नीतियों के अंतर्गत धुएं और जहर का विस्तार होना तय है। राज्य सभा को 13 अगस्त 2015 को बताया गया कि 2000-2015 के छ: वर्षों में मात्र 1,84,393 हैक्टेयर जंगलात की भूमि पर अब विकास के 7,716 प्रोजैक्ट चलाए जाएंगे। जिन राज्यों में जंगल ज़्यादा वहां ज़्यादा वन काटे गए और काटे जाएंगे। (तेज़ी से प्रगति करते छत्तीसगढ़ में 22 हजार हैक्टेयर, आंध्र और तेलंगाना मिलाकर 19 महाराष्ट्र और झारखण्ड में 18-18 उड़ीसा में 17, अति सुंदर अरुणाचल में 14 उत्तराखण्ड में 11, रेगिस्तानी राजस्थान में 8 और हिमाचल में 4 हज़ार हैक्टेयर में वन काटकर प्रगति हो रही है।) जंगलवासी ही जंगल से निष्कासित हो रहे हैं। ज्यादा तो नहीं है, पर देश के वन क्षेत्र का एक प्रतिशत भी नहीं है। शस्य श्यामला को बचाने के लिए 78,600 हैक्टेयर भूमि वन खड़ा करने के लिए दी जा चुकी है। ली 1,84,000 हैक्टेयर। वन बनाने के लिए रु. 6840 करोड़ भी आबंटित किया गया है। हो सकता है जंगल मनरेगा के मजदूर लगाएं। हर हैक्टेयर के लिए करीब 3.7 लाख रुपया। बहुत जल्दी नए वन उग आएंगे और हमारी धरती शस्य श्यामला होगी।
तो राजन् किसी को ज़हरीला धुंआ बनाने की आज़ादी है और किसी को पीने की। तू हरेक की आज़ादी का समर्थक है और बाज़ार की आज़ादी का भी। जिन्दगी का सोज़ मनाता चला गया, हर फिक्र को धुँए में उड़ाता चला गया। तू बाज़ार की बात बहुत मानता है। बाज़ार का यह सिद्धान्त है जो प्रदूषण करे उससे वसूल करे। निगेटिव एक्सटरनेलिटीज़ कर लगवाकर अगर इस धुँए को जल्दी कम न कराएगा तो लोधी गार्डन में घूमने वाले भस्मासुरों को भस्म होने में कुछ ही समय लगेगा। वे प्रदूषण की बात बड़ी-बड़ी करते हैं, अमरीका की तरह, पर स्वयं एसी, अपनी गाड़ी, बिजली, पानी खूब काम लेते हैं। मुक्तिबोध ने इन्हीं के लिए कहा था, ''जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध....ÓÓ।     
हे राजन् - सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामला- देश के जिस कोने में भी हों, प्रणम्य है, शायद वहीं के लोग ज्यादा आज़ाद हैं - उन्हें मैं फिर-फिर प्रणाम करता हूं।     
लाल किले की प्राचीर पर बेताल राजा के कंधों से न उतरा। राजा को बस बोलने की इजाज़त थी। बेताल ने कान बंद कर लिये थे, शाम को बोला, कब तक खड़ा रहेगा राजन्, चल आज चांदनी रात है, मुझे ले चल जहां शुभ्रज्योत्सनाम हो, पुलकित करने वाली रात-पुलकित यामिनीम् हो। चल। राजा यह सुन जड़ हो गया, कहाँ जाए, देश के किस कोने में यह मिल सकती है? लोधी रोड के पास गोल्फ कोर्स के घरों में लोगों के घर बंद थे। बाहर संतरी थे। बंद घरों में ही लोग पुलकित थे। स्वतंत्रता दिवस पर सभी मदिरालय बंद थे। वहाँ चांद की चांदनी न थी। चांदनी थी। चलते-चलते वो जे.जे. कॉलोनी पहुँचा। ये नई नवेली झुग्गी-झोपडिय़ाँ थीं। गाँव से अभी आए लोग आसरा बनाए थे। 15 अगस्त था, आज काम न मिला था। गाँव से लाया दाल-भात थोड़ा ही बचा था। चांदनी पसरी हुई थी, गीली और ठंडी। शोर नहीं था, हाँ कुछ लोग बुदबुदा रहे थे, शायद कराह रहे थे? पेट में जो कुछ था, पच चुका था। कल के लिए कुछ बचाकर रखा था। नींद आ जाए तो कल काम मिलने का सपना ही आ जाए। बस राजा पुलकित था कि कल आराम के बाद यह मजदूर ज्यादा अच्छा, मन लगा कर काम करेंगे। राजा मुस्कुरा रहा था। धवल चांदनी उसकी धवल दाढ़ी की शोभा दुगुनी कर रही थी। राजा आगे बढ़ा तो एक काली कटखनी कुतिया चाँदनी रात में बहुत देर तक पीछे चली। यह मजदूरों का नया कानून थी।
    राजा सोच रहा था कि बेताल उससे फुल्लकुसुमित, द्रुमदल शोभिनीम-फूल और लताएं दिखाने को कहेगा। चलो कश्मीर के मुगलगार्डेन चलता हूँ। पर जाने कैसे वो घने जंगल में पहुंच गया, वहाँ लताएँ भी थीं, जंगली फूल भी थे। चाँदनी झिर-झिर कर एक खाली सी जगह पर आ रही थी। शस्य श्यामला, पुलकित यामिनीम थी। आग जल रही थी। लोग हंस-बोल रहे थे। गा रहे थे। राजा खुश हुआ कि अब बेताल से उसे मुक्ति मिल जाएगी। डिजीटल युग में ट्वीट से बात कर ले, कंधे पर आ बैठ जाता है। अरे वाह, लोग अब नाचने लगे थे - बेफिक्र। न कल की चिन्ता; न परसों-तरसों की। आदमी भी थे और औरतें भी, सब जवान। राजा भी मगन होने लगा। नाचने का मन करने लगा। सोचने लगा इन्हीं से वर माँग लूँ सुखदां, वरदां। राजा वज्रासन में बैठा और फिर माथा धरती पर झुका दिया। ये क्या, तभी इन जवानों के हाथों में संगीने आ गर्इं। चाँदनी में चमक वे और व्यग्र लग रही थीं। सारे दण्डकारण्य में यहीं चांदनी और उत्सवी माहौल था। राजा बेताल को उठाए भागा। वैसे ही, जैसे योग दिवस में राजपथ पर बच्चों ने उसे ऑटोग्राफ के लिए घेर लिया था और फिर दौड़ा दिया था। आज तो ज़ेड प्लस भी साथ नहीं थी।
भागते-भागते राजा सोच रहा था कि सुंदर मुस्कान और सुंदर भाषा बोलने वाले लोग कहाँ मिलेंगे। सुहासिनीम् सुमधुरभाषनीम् का मंत्र पूरा हो और बेताल से मुक्ति मिले। बंकिमचंद्र आनन्द मठ को आज सुबह से ढो रहा था। क्यों कर वंदे मातरम् लिखा। वो न लिखता, न मैं गुनगुनाता, न ये बेताल मुझ पर सवार होता। मुश्किल तो यह है कि बेताल अदृश्य रहता है बस मुझे दिखता है, वरना अपनी वरिष्ठ सहयोगी मंत्री से मिला देता तो बेताल, कंधे से जरूर उतर जाता। वो  सुंदर मुस्कुराहट के साथ बेताल का हाथ पकड़ कर बस एक बार पूछ लें कि, 'बेताल तुम इतने गुस्से में क्यों हो, तुम्हारे तेवर राजा के लिए इतने कड़े क्यों हैं? तो मैं बेताल को जवाब दे दूंगा, बिना सिर झुकाए। या फिर राधे माँ अपनी सुंदर मुस्कान के साथ मिल जाएँ। बेताल मेरे कंधे छोड़ राधे माँ को गोद में उठा ले।
न जाने कैसे राजा (स्वयं सेवक) संघियों की एक सभा में पहुंच गया। आम तौर पर संघी 15 अगस्त पर बाहर नहीं आते। यहां सब पुलकित थे, सुबह राजा को सुना था। लोग भाईसाÓब-भाईसाÓब कर रहे थे। घर से परांठे-पूरी और मिठाइयां लाए थे। एक दूसरे को अपने हाथों से खिला रहे थे। वंदे मातरम् हो चुका था। जो इस गाने से परहेज़ करते हैं, उन्हें लानत-मलामत भेज चुके थे। संघ परंपरा का वाहक बना था। जो महान् परंपराओं को न निभाए उसे काले पानी भेजने पर विचार हो रहा था। राजा को और प्रभावशाली और ताकतवर बनाने का विचार चल रहा था। एक ही सूत्र में सभी प्राण, बुद्धि, ज्ञान और संस्कृति को बाँधने वाला जनेऊ ढूँढा जा रहा था। मुक्तिबोध ने इन्हीं के लिए लिखा था, ''इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि। इतना ज्ञान, संस्कृति और अंत: शुद्धिÓÓ।
सुखदाम्, वरदाम् वर माँगने और देने का समय आ गया था। वेताल ने राजा से पूछा बता तेरी क्या योजना है, लोगों को सुजलाम्, सुफलाम् मिलेगा? कैसे शुद्ध वायु, हरा भरा, धान से भरा कटोरा मिलेगा? कैसे हरेक के जीवन में पुलकित यामिनी मिलेगी? लोग प्रेम की भाषा बोलेंगे, हंसेंगे, हंसाएँगे? तभी तो तुझे सुखी होने का वर मिलेगा राजन्। अगर तूने जानबूझकर सवालों के जवाब न दिए, तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे।    राजा बोला, बेताल तेरे को पूरी बात तो मालूम ही नहीं, जो तू बोलता है उसमें अर्धसत्य होता है। पर तू आइडिया भी बहुत देता है। नीति आयोग न चलने देने की तूने जैसे कसम ही खा रखी है। आयोग कई कंपनियों से बात कर रहा है। ये कंपनियाँ मेट्रो, बड़े शहर, कस्बों, गाँवों और ढाणी तक मिनरल वाटर पहुँचाने की योजना बना रही है। पानी का व्यापार अभी रु. 6000 करोड़  का है। 2018 तक रु. 16,000 करोड़ का हो जाएगा। मैं चाहता हूं सब को निर्मल पवित्र जल मिले। इसे सुजलाम् नाम से जाना जाएगा।  नमामि गंगे कार्यक्रम के लिए जर्मनी के महान् आर्य आएँगे। (इजराइल से बात चल रही है, ऐसे शोध पर कि जैसे, बूँद-बूँद सिंचाई है, वैसे ही बूँद-बूँद से प्यास बुझ जाए तो अच्छा हो।) सीधे फल खाने का क्या फायदा। देश के सभी फलों का रस निकले तो कोई सड़े-गले नहीं, पैकिटबंद हो, कितने लोगों को रोजग़ार मिलेगा। इसे सुफलाम् नाम से जाना जाएगा। अमरीका में रस सस्ता और फल महँगा मिलता है। मिड डे मील में बच्चों को ये सुफलाम् मिलेगा।
वायु अशुद्ध है पर सरकारी संस्था नीरी के अनुसार दिल्ली में प्रदूषण एल.पी.जी. से ज्यादा होता है और डीज़ल से कम। ये सुनीता नारायण जैसे लोगों की साजि़श है, जो डीज़ल लॉबी के विरुद्ध झूठे-सच्चे साक्ष्य गढ़ती हैं। प्रगति की कुछ तो कीमत चुकानी पड़ती है। बाबा रामदेव शोध कर रहे हैं। ऐसे प्राणायाम पर शोध हो रहा है, कि दूषित वायु अंदर आए और शीतल स्वच्छ बाहर। इस प्राण वायु को मलयज नाम से जाना जाएगा। इक्कीसवीं शताब्दी ब्रैडिंग और इनोवेशन का युग है। सुजलाम् सुफलाम् और मलयज अब भारत के नए बै्रण्ड होंगे। अमरीका वगैरह की कई कंपनियाँ हमारे जल फल और मलयज में निवेश करने को तैयार हैं। निर्यात करेंगे। उससे पैसा आएगा। भारत महान बनेगा। वंदे मातरम्।
अरे बेताल, वन कट रहे हैं, तो उगा भी तो रहे हैं। किसानों के हित में ज़मीन का कानून आ रहा है। मैं मजदूरों का बड़ा भाई हूँ। उनके लिए नए कानून, नई-नई इंश्योरैन्स पॉलिसी उतारूँगा। उनको बहुत फायदा होगा और इंश्योरैन्स कम्पनियों को ज्यादा। सबके लिए न्यूट्रिशनल सप्लीमैण्ट का इंतजाम करूंगा। मेरे संघी-साथी वो जनेऊ तैयार कर रहे हैं, जिसमें समस्त प्रतिरोधी और समस्त संघी होंगे। मुक्तिबोध की आत्मा भी और बेताल तू भी।
राजा का मौन टूटते ही, बेताल फिर पेड़ पर जा कर लटक गया। चाँदनी रात थी। पुलकित यामिनीम्। राजा तो जाकर सो गया। मीठी और गहरी बेफिक्र नींद। पतंग के माँझे को तेज़ करने के लिए उस पर पिसा कांच चढ़ाया जाता है। संघ उससे भी मजबूत जनेऊ सूत रहा है। जल, जंगल, जमीन की। राजा और कारपोरेट मालिक जनेऊ धारण करेंगे। सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम् अब जिसका होगा उसकी वंदना करनी होगी। अब लोगों के पास मात्र श्रम की पूंजी रहेगी। मजदूरों में कितना दाल-भात और संघ की बुद्धि डालनी है, राजा तय करेगा। ऐसी होगी नई आज़ादी।
मुक्तिबोध को रेशमी और अंध शब्द संस्कृति से घृणा होती थी, दुर्गंध आती थी और क्रोध आता था - खूब जलता क्रोध। राजा के रक्त में सत्य का अवरोध पाता था जिससे मितली उमड़ आती थी। व्यग्र और क्रुद्ध होते मुक्तिबोध ने स्वयं की ज्वाला और उष्णता से अपने अविवेक को धो चला और कहा ''तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ, तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।ÓÓ (पूँजीवादी समाज के प्रति)
पता नहीं यह युग किसका है और होने वाला है? राजा भी है, बेताल भी और बीड़ी पीता मुक्तिबोध भी। गहरी नींद में समय बोला 'राम भरोसे बैठ के, जग का मुजरा लेयÓ।  
(यह कहानी जैसी कि अवधूत ने प्रोफेसर प्रदीप भार्गव, निदेशक गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान  को सुनाई।)