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Sunday 20 May 2018

अक्षरपर्व का अक्टूबर अंक अपने कलेवर में बहुत खूबियां समेटे हुए है। मणिपुर, इम्फाल की धधकती एवं शर्मिला चानू की धरती से आईं विजयलक्ष्मी जी की रचनाओं में समसामयिक विद्रूपताएं जिस अंदाज में उकेरी गई हैं

    सुसंस्कृति परिहार
130,ग्राम सिंगपुर, नरसिंह, सीमेन्ट फैक्ट्री रोड  दमोह, मो. 09826379049 

अक्षरपर्व का अक्टूबर अंक अपने कलेवर में बहुत खूबियां समेटे हुए है। मणिपुर, इम्फाल की धधकती एवं शर्मिला चानू की धरती से आईं विजयलक्ष्मी जी की रचनाओं में समसामयिक विद्रूपताएं जिस अंदाज में उकेरी गई हैं वे सराहनीय हैं और ये कविताएं समकालीन लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। बधाई। सुबोध श्रीवास्तव की कहानी एक ठंडी  मौत खामोशी से चीत्कार करती है। मीरा लोक में बनती बिगड़ती है साक्षात्कार और कैकेयी के बहाने एक आधुनिक स्त्री विमर्श समीक्षा अनूठी है। सर्वमित्रा जी ने खामोश तस्वीर से उठी इंसानियत की पुकार लिखकर जरूरी समीचीन सवाल किया है। बेहतरीन अंक हेतु अक्षर पर्व टीम को धन्यवाद ।