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Tuesday 21 Nov 2017

बुर्जेखामोशां


योगेश भटनागर
शहर तंग और बेचैन था। शहर का दम घुट रहा था। छटपटा रहा था। सांस थी कि न आते बनती थी न जाते बनती थी। उसकी परेशानी पसीने से तरबतर थी। सर्द हवाएं तक पसीना सुखा नहीं पा रही थीं। दिसंबर की सर्द रात वैसे भी जरा लंबी होती है। शाम से ही दाएं हाथ से घंटियों की आवाजें बाएं हाथ से अजान। शहर को लग रहा था कि ये आवाजेंउसकी जान ही लेंगी। कम क्यों नहीं होती ये। शहर का कोतवाल और कमिश्नर सभी दाएं और बाएं ऐसे देख रहे थे मानो कह रहे थे कल आने वाले जुलूस को रोकने के लिए हफ्ता कम मिला है। दोनों ही असंतुष्ट और गुस्से में थे। समझते क्या हैं अपने आपको? जब जी चाहे जुलूस निकालते हैं और हर बार नराने और हफ्ते कम होते जा रहे हैं। हुकुमरान कहते हैं कुछ ऐसा वैसा मत होने दो। आंखें फिरा लो और आंखें फिरी नहीं कि हफ्ता मार खाता है। कोतवाल कमिश्नर को सफाई दे रहा था- ''सबके हिस्सों पर असर पड़ता है सबको कम मिलता है और महंगाई है कि और बढ़ती ही जा रही है।ÓÓ कमिश्नर भी बीच-बीच में मुस्कुराता और सिर हिलाता। वो अभी भी अपने आपको गोरों का खालिस वारिस मानता था इसीलिए बीच-बीच में अंगरेजी में मिनिस्टरों और दिल्ली के साहबों की तरफ से कुछ तो कह रहा था। शहर सबको जानता था नाम से और काम से पर आज वो यह नहीं जान पाया कि कल आने वाले को शहर में घुसने की मनाही कर दी गई है या इजात दे दी गई है। सारे छोटे-बड़े दुकानदार यही बात कर रहे थे। बड़ों ने फोन करके पूछताछ करनी चाही तो एक ही जवाब ''हुकुम का इंतजार है।ÓÓ इस परेशानी में वो अपने रोजमर्रा के ग्राहकों को भूल गये थे और दुकानों को रामभरोसे छोड़ चौक में कोतवाल और कमिश्नर के इर्द-गिर्द खड़े उनकी बातें सुनने की कोशिश कर रहे थे। साथ-साथ शक भरी निगाहों से उन्हें देख रहे थे, कहीं बड़े साहब कुछ और हफ्ता तो नहीं मांग रहे थे। वो जानते थे कि उनकी दुकानें और जानें तभी तक महफूज रह पाएंगी जब तक नीचे से ऊपर तक हफ्ता मन मुताबिक मिलता रहेगा। जब भी हफ्ता कम हुआ था नतीजा भुगतना पड़ा था। ''आखिर महंगाई भी बढ़ रही है और इसके साथ-साथ तुम सबका नफा भीÓÓ, कोतवाल हर दो महीने बाद कहा करता। ''पर कल का जुलूस तो हमारे सहर का नहीं है। अपने गुण्डों, मवालियों, भगतों और काजियों को हम जानते हैं। कल आने वालों का तो कोई अता-पता नहीं है। फिर हमारे साथ बाहर के कोतवाल और साहेब भी हैं। सी.आर.पी., रेलवे पुलिस और जाने कौन-कौन सी अद्र्धसैनिक पुलिस। सबकी आवभगत देखभाल हमें ही तो करनी है। समझदार को इशारा ही काफी है।ÓÓ कमिश्नर साहेब ने फिर गोरे अंगरेज की तरह हां में गर्दन हिलाते हुए कुछ कहा।
सारा शहर कई दिनों से नए-नए चेहरों से भर गया था। सबके सिरों पर भगवा पट्टी, टोपी, मफलर या अंगोछा था, और तो और कुछ के तो धोती-कुर्ते और कमीजें तक उसी भगवा रंग की थीं। हाल यह था कि शहर की जमीन भगवा रंग से रंग गई थी और आसमान में कहीं-कहीं नजर आने वाला हरा रंग अपने को बहुत ही एकाकी और अकेला पा रहा था। उसे आज अपनी तादाद कम होने का अहसास बड़ी शिद्दत से हो रहा था और महसूस हो रही थी इससे जुड़ी लाचारी, मजबूरी और घुटन।
वो आज समझ गया था खुद अपनी जायज आवाज को दबा देने का मतलब खुदकुशी से कम नहीं होता। भगवा और हरा रंग अपने-अपने खेमों में अपने-अपने हिसाब से बहस कर रहे थे। कुछ अपनी मेहंदी दाढ़ी में हाथ फिरा फिरा कह रहे थे ''येÓÓ कैसे और कब से हमारी है उधर कुछ मूंछों पर ताव देकर बता रहे थे ''वोÓÓ कैसे और कब से हमारा है। कभी-कभी तो ये बहसें इतनी तेज हो जाया करती थीं कि शहर को लगता कि अभी गोलीबारी हो जाएगी, कफ्र्यू लग जाएगा, भगदड़ मचेगी, औरतें और बच्चे अपने आपको अपने-अपने घरों में बंद करके रोटी पानी के लिए रोएंगे, बिलखेंगे और कुछ अपने अल्ला को तो कुछ अपने राम को प्यारे हो जाएंगे। यही सब तो हुआ था अभी दो महीने पहले। शहर का सीना चप्पलों, दुपट्टों, पत्थरों, सलाखों और काले खून से अट गया था। इस बार भी शहर के रईस अपने परिवारों और सामान को मोटर गाडिय़ों में डालकर कहीं दूसरे शहर चले गए थे और जब भी कोई मोटर धूल उड़ाती शहर के बाहर भागती तो दोनों रंग मन में कहते : ''छोड़ गए हमें मरने को।ÓÓ कुछ तो यही सब कहते पर वजनदार गालियों के साथ जिनमें अपने-अपने रंग का असर होता। शहर इन सबको समझाता था। वो जानता था कि ये सब शहर से नफा कमाने के अलावा किसी  किस्म का सरोकार नहीं रखते। शहर का आखिरी रईसे आजम भी आज दोपहर को अपनी दुकान में भारी-भरकम ताला लगाकर चला गया था। जाते-जाते उसने भी औरों की तरह एक नजर कोतवाल को देखा और दूसरी नजर से दुकान को। और फिर अपनी जेब पर हाथ फिराते हुए एक नजर और कोतवाल को देखा।
कोतवाल की नजर साफ कह रही थी- ''हुजूर, हम तो आपके गुलाम हैं हमारी मजबूरी समझिए जो आ गए हैं और जो आ रहे हैं उनमें से हम किसी को नहीं जानते। आज तक कभी नमकहरामी की है?ÓÓ कमिश्नर की आंखें मुस्कुराते हुए कह रही थी , ''हुजूर, इत्मीनान रखें आपकी दुकानों को ना तो आग लगने दी जाएगी न ही उनका ताला तोडऩे दिया जाएगा। आखिर आपने तो हमें सूद तक दिया है हमारे हफ्ते पर।ÓÓ शहर के रईस ने फिर कोतवाल को देखा। उसकी आंखें जवाब में बड़े अदब से झुक गई।
कमाल है। शहर के सारे रईस शहर छोड़ गए हैं। और हमने इनके माल-असबाब की हिफाजत का वादा किया है। हफ्ता भी क्या चीज है और वो भी अगर सूद समेत मिले। कोतवाल सोचते सोचते कमिश्नर साहेब को देख रहा था और कमिश्नर साहेब वैसे ही मुस्कुरा रहे थे और वही सब खामोशी से कह रहे थे जो कोतवाल सोच रहा था।
हालांकि शाम ढलनी शुुरू ही हुई थी पर दूकानें बंद होने लगी थीं। शटर्स को खींचने की आवाजें उनके बड़े-बड़े काले मुंह में ताले ठूंसने का शोर और चाबियों को घुमाकर निकालने की आवाजें। कुछ ही मिनटों में शहर की सड़कों की रंग-बिरंगी दीवारें काले रंग की लम्बी ऊंची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी दीवारों में तब्दील हो गईं। कुछ दीवारों के साथ रंग-बिरंगे चबूतरे भी निकल आए। शहर ने एक साथ कई सांसों को महसूस किया और डरे सहमे घरों को जाते हुए कदमों की आवाजें को सुना। और फिर उसी तंग बेचैनी, घुटन और हांफ की गिरफ्त में आ गया जो एक पल पहले पुरजोर बहसों, घंटियों और अजा न की आवाजो से हो रही थी। मछली और तरकारी बेचने वाली बूढ़ी औरतें भी आहें भरतीं, कोसती हुई टोकरियां उठाए अपने को घसीटती हुई अपने-अपने ठिकानों की तरफ रेंग रही थीं। घबराए और सहमे लोग आज मंडी के चौड़े रास्ते की बजाय तंग गलियों के रास्ते अपने घर जा रहे थे। जाने क्या होगा? वो कल आ रहा है। यही सोच रहा था शहर का दिमाग। देखते ही देखते शहर की सड़कों पर कब्रिस्तान-सी सपाट खामोशी और मरघट-सी एकाकी नीरवता पसर गई। किसी अर्थी या जनाजे को उठाते ही औरतों और बच्चों के रोने और सिसकने की आवाजें आती है वैसी ही आवाजें बीच-बीच में भारी और दहशत भरी खामोशी को तोड़ रही थीं।
शाम के घने लम्बे साए शहर के ऊपर पसरने लगे थे। पश्चिमी छोर पर ढलता सूरज सुर्ख था बहरहाल खौफजदा सूरज भी अपनी पीली कमजोर उदास किरणों से शहर की काली दीवारों, सफेद चबूतरों, घरों की छोटी-बड़ी बंद खुली ढली खिड़कियों को सहलाते हुए दिलासा देते हुए पल भर में यकायक गायब हो गया। शहर कांप उठा। क्या सच में कल वो आ रहा हैा? सूरज के गायब होते ही रात की स्याही ने शहर पर कालिख पोत दी। कहीं-कहीं बंद खिड़कियों की झिर्रियों में से रोशनी की मद्धम किरण बाहर कांपती दिखाई पड़ती थी वरना शहर स्याह काला स्याह हो गया था।
शहर के दायें छोर पर पीली सफेद रोशनी के नीचे सड़क पर एक सभा चल रही थी। महामहिम आचार्य, पुजारी और शहर के ठेकेदार जो र-जो र से बता रहे थे : ''ये हमारा है। कई सालों पहले जबर्दस्ती उन्होंने यहां पर अपनी बनाई। हमें हमारा वापिस लेना है। आखिर ये देश हमारा है। ये हमारे आराध्य का जन्मस्थल है। हम यहां बनाकर ही दम लेंगे। आ जाने दो कल और हाथों को। देख लेंगे...ÓÓ और इसके बाद वही भगवा नारों का पुरजोर उद्घोष।
शहर के बाएं छोर पर जमात इकट्ठी थी। शहर की सफेद मेहंदी और काली दाढिय़ां बैठी थीं। जर्द और खौफजदा चेहरे दाढिय़ों में हाथ फिराते हुए एक साथ बोल रहे थे। कुछ कह रहे थे कोतवाल को कुछ और हफ्ता जमा करके दे दो, कुछ इमाम से फतवे की $गुजारिश कर रहे थे, कुछ जिहाद ऐलान करने की कह रहे थे, कुछ चुपचाप शहर छोडऩे की सलाह दे रहे थे और कुछ के मुताबिक सभी को आज रात में ही उसके अंदर चले जाना चाहिए और रात भर नमाजें खैरियत अदा करनी चाहिए। अल्ला ही रकीब से निजात दिलाएगा। सभी अपनी-अपनी जगह ठीक थे। किसी भी तरह एक राय नहीं बन पा रही थी। और बनती भी कैसे बात आकर रुकती तो सिर्फ एक मुद्दे पर ''हम उनसे तादाद में शहर में ही नहीं मुल्क में भी कहीं ज्यादा कम हैं। हमारा एक कदम हमारे अजीजों के लिए आजाब हो जाएगा। निहायत ही संगीन असरात होंगे। बेकसूर, निहत्थे, लाचार और मजबूर मारे जाएंगे। औरतों, जवान लड़कियों पर जबर्दस्ती होगी, बच्चे बख्शे नहीं जाएंगे।ÓÓ तभी एक जवान आवाज गरजी ''ये बुजदिली है। बेबुनियाद लाचारगी है। तादाद कम है तो क्या सिर्फ रूंदने को तैयार रहें। नहीं बर्दाश्त करेंगे। ताकत का इस्तेमाल करेंगे हम भी। ईंट का जवाब पत्थर से देंगे- उल्फा, नक्सली और पी.डब्ल्यू.जी. की तरह। दिखा देंगे। हमें कमतर ना समझें।ÓÓ इतना सुनते ही सफेद और मेहंदी दाढिय़ां सूखी पतली छातियों से जा सटीं। तजुरबा कुछ कहने से डरता था हालांकि जानता था हश्र वही होगा जो अब तक हुआ है पर इस बार जवाब बड़ा ही बेदर्द, बेरहम और कहरिया होगा। तभी इमाम शौकत चिल्लाया ''क्या बकवास कर रहे हो? हुकुमरान, कोतवाल और कमिश्नर यही तो चाहते हैं। हफ्ता तो उन्हें मिल ही चुका है। खून-खराबा करो फिर जवाबी खून खराबा हो, नसीम, उल्फत, मुमताज, खुर्शीद, इंतजार और नसीबन के दुपट्टे फिर चिर जाएं। पागल हो गए हो। अपने माजी से सबक लो, बेवकूफों।ÓÓ
शौकत के साथ कई और पोपले मुंह, तजुरबे की झुर्रियां, सफेद मेहंदी दाढिय़ां यही दोहरा रहे थे। उनकी सांसें फूल गई थीं। वो गुस्से और डर से कांप रहे थे। सभी आवा•ों एक साथ अपनी-अपनी बातें कह रही थीं। ऐेसा लग रहा था मानो चिल्लाने से उन्हें राहत मिल रही थी।
चिल्लाना चीखना बंद हो गया था। गुस्सा भी कम हो गया था फिर एक बार वही सवाल, ''क्या करना चाहिए वो कल आ रहा हैÓÓ सामने मुंह बाएं खड़ा था। हर गुजरता पल सवाल को भारी बनाए जा रहा था। अब कोई भी कोई राय नहीं दे रहा था। वो सब थक गए थे और धीरे-धीरे खामोशी यह साफ बता रही थी कि इसका कोई हल नहीं है। कल से अगर कोई बचा सकता है तो सिर्फ करिश्मा-ए-अल्लाह या कोई चमत्कार। शहर के सारे रईस जा चुके हैं और वो सब भी जिनको पास के शहर में कोई ठौर था।
हो सकता है कोतवाल ही कुछ करे, आखिर उसका हफ्ता तो उसके पास पहुंच चुका है और ज्यादा का वादा भी कर दिया गया है। हुकुमरानो से रहम की भीख भी कई-कई बार मांगी जा चुकी है। हो सकता है कुछ भी न हो कल? सब यही सोच रहे थे।
घंटियों और अजानों की आवाजें अभी तक आ रही थीं। शहर जाग रहा था। शहर चाहता था कि उसकी सरहद की सड़क फट जाए। भूचाल आ जाए और उसके चारों तरफ एक गहरी खाई हो जाए, भूचाल आ जाए और उसके चारों तरफ एक गहरी खाई हो जाए जिससे कल आने वाले अंदर न आ पाए। शहर हुकुमरानों और कोतवाल से नाउम्मीद था। अच्छी तरह वाकिफ था उनकी फितरत से। कुएं जैसा पेट था उनका। अहसान फरामोश और बेहया होने के साथ-साथ बेखौफ भी थे। क्या हुआ अगर इंतजार मारा गया था या खुर्शीद का दुपट्टा फाड़ दिया गया। शहर सोच कर डर रहा था जाने कितने इंसानी पैर कल उसकी छाती रौदेंगे और कितनी बेकसूर लाशें उसकी छाती से लिपट जाएंगी। वो खुद भी करिश्मे की दुआ कर रहा था।
तभी कहीं से एक आवाज आई ''क्यों ना उस पगली नजूमी शांति को बुलाएं और उससे पूछें कल क्या होने जाता है? किसी को वो मटका जिताती है, किसी को औलाद से नवाजती है, किसी की शादी करवाती है, किसी को रोजगार दिलाती है। वो जरूर बता देगी कल क्या होने वाला है।ÓÓ सारे पोपले मुंह, झुर्रियों और सफेद और मेहंदी दाढिय़ों ने राहत की सांस ली। सच है कोई नहीं जानता उसका असली नाम क्या है या ये नाम किसने दिया। पागलपन के दौरे के बाद जब वो शांत बैठी होती तो शहर के लोग कहते ''आज तो शांति है चौराहे परÓÓ शायद तभी से उसका नाम शांति पड़ गया था। बरसों से शहर के चौक पर बैठी है। रात-दिन, सर्दी-गर्मी, बरसात बारह महीने वही चौक उसका घर ठिकाना था, कभी पटरी पर आ बैठती तो कभी चौक के बीचोंबीच लेटती। हो सकती है शांति ही कुछ अकल की बात सुझाए।
दो जवान शांति को लाने के लिए भेज दिए गए। दोनों जब चौक के बीचोंबीच खुले बाल, अधनंगी उकड़ू लेटी शांति के पास पहुंचे तो वो एक बच्चे की रोती आवाज में कुछ अपने आपसे बड़बड़ा रही थी। उसकी रोती आवाज और आंसुओं ने उन्हें पस्त कर दिया। कुछ कहने या पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। फिर भी एक ने कहा- ''दादी अम्मा, चलो, शौकत भाई ने बुलाया है।ÓÓ
शांति अपने आप से बड़बड़ाती रही, रोती रही और अधनंगे शरीर को फटे कपड़े से ढंकने की कोशिश करती रही। जब उसकी समझ में आया तो उसने हाथ उठाकर उसको सहारा देकर उठाने का इशारा किया। दोनों ने उसे दोनों तरफ से पकड़कर उठाया। उसके कपड़े ठीक किए और चलना शुरू किया। जब भी वो घरों के पास गुजरते तो सभी कहते इस पगली ने जिसने अपने दोनों बेटों की आने वाली मौत को कई दिन पहले देखा था ये बताएगी कल क्या होगी?! शौकत को क्या हो गया है?! कहीं वो भी तो शांति नहीं हो गया?!
शांति के पीछे-पीछे एक बड़ा हुजूम चले आ रहा था। शांति का बड़बड़ाना जारी था और आंसुओं का बहना भी। शांति अंदर चली गई। हुजूम बाहर बड़ी बेचैनी से खड़ा इंतजार कर रहा था। रात और स्याह होती जा रही थी। शांति क्या कहेगी?
''शांति, वो कल आ रहा है।ÓÓ शौकत ने चिल्लाकर कहा।
बेखबर शांति वहीं बैठी कुछ बड़बड़ाती रही। बार-बार अधनंगे शरीर को कभी एक तरफ से ढंकती तो कभी दूसरी तरफ से। फिर उसने कहना शुरू किया कैसे उसके जवान बेटे लड़ाई में मारे गए कितना मना किया था, फौज में मत जाओ, एक न सुनी। उसने बड़ी तफसील से बताया कैसे उसके बेटों को राइफल के हत्थों से मारा गया और कैसे उनकी लाशों को सरहद के इस पार फेंक दिया गया था। उनके मरने के कई दिन पहले उसने ये सब अपनी आंखों से देखा था। ये सब बताते हुए उसकी आंखें लाल हो गईं, उसकी आवाज ऊंची होती गई। मुंह से झाग आने लगे, नथूने फूल गए और हिचकियां बंध गई। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। तभी उसने दहाड़कर कहा- ''मुझे सब तरफ भूख भेडिय़े और इंसान का खून लगे शेरों के मुंह दिख रहे हैं... सबकी आंखों में आग है। हाथों में हथियार है, आवाजें बुलंद है और इरादे पुख्ता। दूर-दूर तक कोतवाल नहीं दिख रहा है।ÓÓ
इतना सुनते ही आसपास खड़ी छातियों में से एक सर्द आह और लाचारी भरी आवाजें निकलीं।
''मुझे मेरे पैरों के तले स्याह हुआ इंसानी खून ही खून नजर आ रहा है, मर्दानी, जनानी लाशें नजर आ रही हैं और नजर आ रही हैं पथराई आंखें जो अपने अजीजों, औलादों, शौहरों, मां-बहनों और बेटियों को ढूंढ रही हैं। मुझे नजर आ रही है बेकसूर बेसहारा बच्चे-बच्चियों की लाशें जिनको हुकुमरान और कोतवाल बड़ी बेदर्दी से कुचलते हुए आगे बढ़ रहे हैं। मारो, मारो, कोई बचने न पाए। तोड़ो, तोड़ो, पुण्य का काम है- यही सब सुनाई पड़ रहा है।ÓÓ
सिसकियों की आवाजें। आसपास के घरों की खिड़कियां खुल गई थीं। सभी आंखें बुजुर्गों और तजुरबों की तरफ मुखातिब थीं। और कह रही थीं, ''कुछ तो करो।ÓÓ पोपले मुंह, झुर्रियां, काली, सफेद और मेहंदी दाढिय़ां सकते में आ गई थीं, न कुछ सोच पा रही थीं और न ही कुछ कर पा रही थी।
''चारों तरफ शोले और मौत देख रही हूं मैं। रहम के लिए उठते हाथ, जान की दुहाई मांगती आवाजें , घरों का गिराना, दरवाजों को तोडऩा यही सब दिखाई पड़ रहा है। कोई बचने ना पाए, पुण्य का काम है। यही सुन रही हूं मैं।ÓÓ
सिसकियों की आवाजें घंटियों और अजानों की आवाजो में डूबी जा रही थी।
''या खुदा खैर कर। इन बंदों को अक्ल बख्शÓÓ, पोपले मुंह बुदबुदा रहे थे।
''कयामत खड़ी है सामने। कहर टूट रहा है। नरक के खौलते हुए कड़ाहे और जोर से खदक रहे हैं। हैवानियत से वास्ता है कल इंसान काÓÓ, पगली नजूमी शांति कहे जा रही थी। लगता था वो अब बिलकुल ठीक हो गई थी। उसकी आंखों से आंसू बहे जा रहे थे पर आवाज में यकीन था। सबने उसकी सारी बातें सुनीं और दुखी हो गए, ये एक पागल की आवाजें नहीं थी ये आवाज उस आसमान की थी जो पूरब से सुर्ख हो रहा था। सबको यकीन हो गया था कि जो नन्हें-नन्हें बच्चे इस वक्त अपनी मांओं की छातियों से लिपटकर चैन से सो रहे हैं उनमें से बहुत से अनाथ हो जाएंगे, जो नई नवेली दुल्हनें अपने प्यार की आगोश में अठखेलियां कर रही हैं बहुत सी बेवा हो जाएंगी, अनगिनत लड़कियां गर्क में धकेल दी जाएंगी, जवान लड़कों को ढूंढ-ढूंढकर मारा जाएगा। ये सोच कर शहर कांप उठा।
पगली नजूमी जब सब कह चुकी तो उन्हीं दो जवानों ने उसे सहारा देकर उठाया, दोनों उसके दोनों तरफ होकर उसे चलाने लगे। चलते-चलते वो अपना अधनंगा शरीर कभी एक तरफ से तो कभी दूसरी तरफ से ढंकती रही, दहाड़ मारकर रोती रही और बार-बार अपने बेटों का नाम दोहराती रही। जवान उसे वहीं उसके चौराहे पर बैठा आए। बैठते ही शांति की आंखें सूख गई, ''नरक, हैवानियत, बच्चे, औरतें, लड़कियां जवानÓÓ यही सब उसके होंठ दोहरा रहे थे।
शौकत और सभी लाचार, मजबूर, उदास, बेचैन और खौफजदा चेहरे अपने-अपने घर चले गए। शहर रात भर बेचैनी में करवटें बदलता रहा। कभी सर्द आहें भरता तो कभी दुआ करता। उसे आने वालों के पैरों की आवाजें साफ-साफ सुनाई पड़ रही थीं और सुनाई पड़ रही थीं वो आवाजें जो अब तक नारों में तब्दील हो चुकी थीं। वहशीपन और पागलपन था पर इसमें भी वो सब गर्व कर रहे थे। उन्हें यकीन था कि वो एक पुण्य का काम करने आए थे और जो जितना ज्यादा करेगा उतना ही ज्य़ादा पुण्य का भागीदार होगा। परलोक सुधारने का इससे अच्छा अवसर कभी नहीं आएगा- आखिर अपने 'स्थानÓ की रक्षा करने से अच्छा भी कोई काम हो सकता है?! सुबह होने तक शहर के हर घड़ी में बत्ती जलती रही। हर तरफ सर्द आहें और डर से भरी सिसकियां सुनाई पड़ रही थीं।
आज जब सुबह सूरज उगा तो कोई अंगड़ाई लेकर, उबासी भरते हुए या किलकारी मारते हुए नहीं उठा। डर और खौफ से सबके पैर सहम गए थे। सब अपने ही घरों में चोरी की तरह चल रहे थे। बच्चों को खामोश रहने के इशारे किए जा रहे थे, लड़कियों को अंदर के कमरों में बंद किया जा रहा था और घर के मर्द खिड़कियों से पर्दों की ओट से झांक रहे थे। धड़कते दिलों की आवाजें घंटियों की आवाजो में गुम हो गई थीं। अजान की आवाज आज एक बार ही आई थी। आज भी 'वो हमेशा की तरह खाली थी। कोतवाल, कमिश्नर और फौज एक तरफ खड़े थे। उनका रेला चला आ रहा था। इतना बड़ा हुजूम शहर ने कभी नहीं देखा था। चारों तरफ भगवा रंग से ढंके सिर, नाम से पुते भगवा कुर्ते, अंगोछे, कमीजें और हाथों में हथौड़े, छैनी, बल्लम और लाठियां और मुंह में जयकारा।
कहीं दूर से एक घंटी की आवाज आई, उस घंटी के बाद शहर की सब घंटियां बजने लगीं। ''वो आ गया, वो आ गया, शहर में पहुंच चुका हैÓÓ- यही सब सुनाई पड़ रहा था। वो धीरे-धीरे धान शान से आगे बढ़ रहा था उसमें खड़े भगवे कुर्तों के हाथ हिल रहे थे, होंठ जयकारा कर रहे थे जो लोग अभी उसके दोनों तरफ थे वो पीछे हो गए और इस तरह वो सबसे आगे और उसके पीछे पुण्य कमाने वालों का हुजूम, बड़ा जयकारा और जोश में उठते हुए हाथ- यही सब नजर आ रहा था।
इमाम शौकत कांप रहा था, उसके जबड़े बज रहे थे। पैरों में जान नहीं थी। वो भी सबकी तरह सोच रहा था 'उसेÓ कैसे महफूज रखा जाए? बरसों पुरानी है। शहंशाह का नाम जुड़ा है उससे। उसने अपने चारों तरफ देखा, हर खिड़की में से सहमी-सहमी दो-चार आंखें। आवाजें बढ़ती ही जा रही थीं, 'वोÓ और हुजूम करीब आ रहा था। अब तक किसी को पता नहीं था कि उसे कहां रोकना है, रोकना है भी या नहीं, कोतवाल और कमिश्नर हुकुमरानों के हुकुम का इंतजार कर रहे थे। उनके चेहरे पर कभी खुशी तो कभी बेचैनी नजर आ रही थी। जयकारा जोर पकड़ रहा था और जयकारे के साथ-साथ हथौड़े, छैनी, बल्लम और लाठियां भी हवा में उठ रही थीं। हुजूम 'उसकीÓ तरफ बढ़े चले आ रहा था। शौकत ने सोचा वो इमाम है उसे ही कुछ करना चाहिए। पहले वो अंदर गया लाउडस्पीकर पर सबको शांत रहने की अपील की, 'उसकाÓ इतिहास बताया, 'उसकेÓ नाम की अहमियत बताई और उसे महफूज रखने की दुहाई मांगी। हुजूम था कि जयकारों के साथ आगे बढ़ा चला आ रहा था। शौकत ने फिर वही एक बार और दोहराया, पर हुजूम जयकारों को और जोर से करता हुआ बढ़ता ही रहा। फिर उसने हिम्मत जुटाई और पीछे की गली से भागता-भागता सड़क पर आ गया। उसने एक बार चारों तरफ देखा पर्दों के पीछे वही सहमी-डरी आंखें। कुछ ने खिड़कियां बंद कर लीं। वो अब हुजूम के सामने खड़ा था। एक बार फिर उसने घरों की तरफ देखा वो हममजहबियों को बुला रहा और साथ-साथ खड़ा होने को कह रहा था।    

उसने कई बार अपनी भर्राई आवाज में उन्हें पुकारा पर सब आंखें खिड़कियों के पीछे छुप गईं और कानों ने कुछ नहीं सुना। उसे लगा उसकी आवाज खो गई है। वो गूंगा हो गया है। शौकत भाग कर कोतवाल और कमिश्नर के पास गया और हुजूम को रोकने की गुजारिश करने लगा। उन्होंने ऐसे देखा मानों बहरे हों और कई बार 'क्या?Ó दोहराया। कोतवाल की सफेद वर्दी चकाचक चमक रही थी और कमिश्नर की लाल-नीली सिल्क की टाई उसके नीले कोट के नीचे उसकी सेब जैसी तोंद पर हिल रही थी। साफ दिख रहा था वो अंदर ही अंदर खिलखिलाकर हंस रहा था।
उसने एक बार फिर अपने हममजबियों को पुकारा। कुछ डरे-सहमे लोग बाहर आ गए और सबने एक आवाज में कहा ''खामोश हो जाओ इमाम शौकत। हम तादाद में कहीं कम है। कोतवाल और कमिश्नर को इस बार हफ्ता कम लग रहा है और इससे ज्यादा देने की कुव्वत हमारी नहीं है। वजीरे आजम देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। शहर के हुकुमरान खामोश हैं। हम अकेले इस हुजूम को नहीं रोक पाएंगे। बहू-बेटियों की जिन्दगी और इज्जत को खतरे में मत डालो। हमें इस आग में मत झोंको। खामोश हो जाओ इमाम शौकत।ÓÓ
घंटियों की आवाज तेज होती जा रही थी। जयकारों का उद्घोष बढ़ता जा रहा था। हुजूम 'उसकीÓ तरफ बढ़ता चला जा रहा था कितने सारे थे पुण्य कमाने वाले। तभी कोतवाल ने शौकत को एक तरफ धक्का दिया। शौकत गिर गया। इससे पहले कि वो उठता कई पैर उसे कुचलते हुए उस पर से गुजर गए। एक बार वो बड़ी मुश्किल से उठा और उसने भर्राई आवाज में फिर वही दोहराया पर हुजूम ने एक बार फिर उसे गिरा दिया।
सारा हुजूम वहां पहुंच गया था। उसकी आंखें देख रही थीं कैसे हजारों लोग उसके गुम्बद पर और गुम्बद के चारों तरफ खड़े जयकारा कर रहे थे और कई सारे हथौड़े, छैनी, बल्लम और लाठियां गुम्बद का सीना चीर रही थीं। कहीं से एक आवाज आई ''एक हथौड़ा और जोर सेÓÓ दूसरी ने कहा ''ले और जोर सेÓÓ, और तीसरी ने कहा ''जय हो।ÓÓ फिर शौकत ने सुना एक लम्बा जयकारा और लाखों घंटियों की आवाजें इन सबने उसे बहरा बना दिया था। कुछ ही पल में दायीं तरफ का शहर खुशी में नाच उठा और बायीं तरफ का सिसकियां भर-भर कर रोने लगा। कोतवाल और कमिश्नर जा चुके थे। शौकत बड़ी मुश्किल से उठा और गुम्बद की तरफ भागने की कोशिश करने लगा। आज उसे गुम्बद बहुत दूर लग रहा था। जितने भी जोर से भागने की कोशिश करता उतना ही ज्यादा लडख़ड़ा कर गिर जाता। इसी तरह गिरते-उठते उसने अपने आपको पगल नजूमी शांति के सामने पाया। वो साफ-साफ देख रहा था कि शांति के होंठ वही कल वाली बातें दोहराए जा रहे हैं, वैसे ही आंसू बहे जा रहे हैं। शौकत के होंठ हिले ''तुमने... सच... नरक... भेडि़ए... शेर... हैवानियत... इंसान का खून...।ÓÓ
शौकत की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। वो सड़क पर गिर गया। जब उसकी आंखें खुली तो आसमान घूम रहा था और देखते ही देखते शौकत की आंखें पथरा गई।
पागल नजूमी अभी तक वही दोहराए जा रही थी, रोए जा रही थी और अपने अधनंगे शरीर को कभी एक तरफ से तो कभी दूसरी तरफ से ढंक रही थी। अचानक वो उठी। उसने अपने बालों को जोर से नोचा, अपनी चोली उतारी, उसका एक किनारा चर्र से फाड़ा और शौकत की आंखों पर रख दिया।
शहर की पेशानी पसीने से तर-बतर हो गई। उसके सीने के बीचोंबीच जोर का दर्द उठा। दर्द से तिलमिलाते हुए उसने देखा कि गिद्धों और कौवों का रंग भगवा हो गया है और वो खुद एक बुर्जे $खामोशां में तब्दील हो गया है।