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Monday 20 Nov 2017

हैप्पी बर्थ डे टू यू... शैली

विनोद साव
मुक्त नगर, दुर्ग
(छत्तीसगगढ़) 491001
विशाल ने एक नजर अपने परिवार पर डाली जो अब घोड़े पर सवार हो चुका था। बड़ा अजीब-सा लगा उसे। इस तरह अपने घर के लोगों को घोड़े पर चढ़ा देख। परिवार के चार सदस्य घोड़े पर चढ़ चुके थे। चंदा भी चढ़ चुकी थी, उसका चढऩा अभी बाकी था।
चारों सदस्यों को घोड़े पर सवार एक पंक्ति में खड़ा देख उसे लगा जैसे वह टी.वी. पर कोई पौराणिक धारावाहिक देख रहा हो, जिसमें थोड़ी देर में अब कहीं कोई जंग छिडऩे वाली हो और हिनहिनाते हुए घोड़ों पर सवार होकर उसकी पल्टन रवाना हो जाएगी। केवल उसके चढऩे भर की देर है। उसकी प्रतीक्षा की जा रही थी जैसे वह इस पल्टन का सेनानायक हो।
चंदा उसकी ओर हमेशा की तरह देखकर मुस्कराई। मुस्कराते समय उसकी आंखें बंद होती सी दिखाई देती हैं। तब उसकी छोटी-छोटी आंखों के नीचे दो छोटी लकीरें भी दीख पड़ती हैं।
जिस चंदा को सड़क पर चलते समय वह अक्सर टोका करता है कि तुम्हें ठीक से चलना नहीं आता उसे आज यकबयक घोड़े पर सवार देखकर वह थोड़ा अचंभित हुआ था। उसका भोलाभाला चेहरा कभी कभार चौंकाने वाला कोई काम कर बैठता है। उन्हीं में से एक था आज उसका घोड़े पर सवार हो जाना। उसके गालों में सुर्खी थी।
अपने दोनों बेटों के बीच चंदा घोड़े पर सवार थी। बेटों के बीच वह जब भी होती है उसका चेहरा प्रदीप्त हो उठता है। मानों वह केवल बेटों की मां हो। उनसे थोड़ी अलग थलग होकर शैली अक्सर विशाल को निहारती रहती है। उन बेटियों की तरह जो पापा की बेटियां कहलाती हैं।
'चढ़ जाओ पापा! क्या सोच रहे हो आप। यह शुन्नू की आवाज थी। छोटे बेटे की हुंकार, जिसे विशाल ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। वह घोड़े पर चढऩे के लिए अब उसका हौसला बढ़ा रहा था। शुन्नू के घोड़े के करीब आ गए थे अब पम्पी और शैली के घोड़े। उनके चेहरों पर प्रश्नवाचक मुस्कराहट थी जैसे सब लोग उसकी परीक्षा ले रहे हों कि 'देखें पापा जी घोड़े पर चढ़ पाते हैं या नहीं?Ó
'आप मेरे बिल्कुल करीब आ जाइए... साब।Ó घोड़े वाले ने कहा 'मेरा कंधा पकडि़ए। अपना बायां पैर रकाब में डालिए और थोड़ा जोर लगाइए।Ó यह कहना घोड़े वाले के लिए कितना आसान था पर इस पचास की उम्र में विशाल के लिए कितना कठिन था। यह विशाल ही सोच सकता था। अपने समय में स्कूल कॉलेज का एक शानदार व्हालीबाल खिलाड़ी विशाल जिसके फिंगर, अंडरहेंड और शॉट्स देखते ही बनते थे, वह आज थोड़ा भी उचक नहीं सकता था क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी मुडऩे लगती थी और तब उसे भारी दर्द होने लगता था।
उसने घोड़े वाले के कहे अनुसार रकाब में पैर डालकर जैसे-तैसे जोर लगाया और घोड़े की पीठ पर सवार हो गया। अब पहाड़ जो उसे बहुत ऊंचे लग रहे थे वह घोड़े पर चढऩे के बाद अपने समानांतर लग रहे थे।
उसने घोड़े की काठी पकड़ ली थी और अब घोड़े वाले का इशारा पाकर घोड़ा चलने लगा था। उसके घोड़े के चलने के साथ ही वहां खड़े चारों घोड़े चलने लगे थे। जैसे उसके चढ़ जाने के बाद उसका घोड़ा अपनी बिरादरी का मुखिया हो गया हो। 'मम्मी! पापाजी का घोड़ा सयाना लग रहा है।Ó पम्पी ने धीरे से कहा तो चंदा हंस पड़ी यह कहते हुए 'अच्छा है! बाकी घोड़े उनका कहना मानेंगे।Ó
'अरे... मम्मी तो पापाजी की तरह व्यंग्य करने लगी है।Ó शैली बोल पड़ी। उसने अपने गले में लटके कैमरे को ठीक किया और पम्पी को लैंडस्कोप के सामने किया। पम्मी जो याक की खाल से बने फर वाले कोट और हैट पहने घोड़े पर बैठा था। उसका स्नैप लेते हुए शैली बोल पड़ी 'अब फोटो ऐसे आएगा जैसे घोड़े के ऊपर याक बैठा हो।Ó
'तू भी पापा जी की तरह व्यंग्य करती है।Ó पम्पी को जल्दी गुस्से में आ जाता है।
'पापाजी का घोड़ा सामने से तो ठीक दिखता है लेकिन पीछे से बीमार।Ó शुन्नू ने बीच में मजाक किया।
'पीछे से बीमार दिखता है तो क्या हुआ... घोड़ा लात भी पीछे से लगाता है ख्याल रखना।Ó पम्पी ने शैली का गुस्सा शुन्नू पर उतारा।
'अरे वाह! पापा जी आगे से लात लगाते हैं और घोड़ा पीछे से।Ó शुन्नू को फिर मजाक सूझा। वह छोटा होने के कारण ज्यादा छूट ले लेता है। उसकी इस विनोदपूर्ण टिप्पणी पर अबकी बार विशाल के साथ सब लोग हंस पड़े। पम्पी गुस्से के बाद भी मुस्करा उठा। घोड़ा वाला भी हंस पड़ा।
शैली ने घोड़ेवाले से मासूमियत से पूछा कि 'घोड़े भी हंसते हैं?Ó
'नहीं! घोड़े वाले ने कहाÓ इंसान और घोड़े में यही एक फर्क है! जैसे विशाल के परिवार के साथ घोड़े वाला भी अभी मूड में आ गया हो।
विशाल ने घोड़े की काठी मजबूती से पकड़ ली थी। लगाम उसने नहीं बल्कि घोड़े वाले ने पकड़ रखी थी। चढऩे के थोड़ी देर बाद तक उसने सोचा कि घोड़े की रीड़ की हड्डी को उसके चढऩे से कोई नुकसान तो नहीं होगा।
'घोड़ा चाहे जितना भी मरियल हो उसकी पीठ मजबूत होती है साब।Ó घोड़े वाला जब जरूरत पड़ती बीच में शंका का समाधान कर देता जब घोड़ा सामने झुकता है आप पीछे हो जाइए। उसने ढलान पर कहा था जो चढ़ाव चढ़ते समय बैठने के ढंग से विपरीत था।
रास्ता बहुत पथरीला था। पहाड़ ऊंचे होते जा रहे थे, घाटियां गहरी होती जा रही थीं। सड़क पर पत्थर इस तरह उग आए थे जैसे पहाड़ों पर आलू उग आए हों। छोटे, बड़े, गोल मटोल, कुछ चिकने और कुछ खुरदुरे पत्थर।
इन्हें अलग-अलग रंगों में, आकारों में देखकर विशाल ने कहा कि कुदरत कुछ निर्जीव चीजों को भी ऐसे आकार देती है जैसे वे सजीव हों। मनुष्य अगर पत्थर दिल हो सकते हैं तो पत्थरों को भी पसीना आ सकता है। पत्थरों के चेहरे यहां दिख रहे हैं आदमियों की तरह। जिस तरह कुछ लोगों के चेहरे होते हैं पत्थरों की तरह।
'और नहीं तो क्या! कभी-कभी आप भी पत्थर दिल हो जाते हैं।Ó चंदा ने कहा। विशाल को लगा कि चंदा ने सामान्य ढंग से उसकी दार्शनिक व्याख्या का पटाक्षेप कर दिया है।
'जब इन घोड़ों की टांग टूट जाती है... तब क्या करते हो।Ó पम्पी ने घोड़े वाले से जानकारी चाही।
'इसकी नाल बदल देते हैं।Ó घोड़े वाले ने सिर झुकाए जवाब दिया 'छह सौ घोड़े हैं साब यहां। इसलिए इनके इलाज पानी का भी पूरा इंतजाम है।Ó वह जिससे भी बात करते साब लगाकर बोलता। जैसे बिना साब लगाए उसे अपना वाक्य अधूसार लगता हो।
वह अपेक्षाकृत लम्बा था। उसकी नाक, आंख और ठुड्डी वैसी ही नुकीली थी जैसे कि उसके गांव के पहाड़ों की चोटियां। रंग गोरा था जैसे चोटियों पर चमकती बर्फ हो। बदन छरहरा था जैसे चीड़ के पेड़ हों। उसके सिर के बाल लम्बे और मुलायम थे जैसे देवदार के नये पत्ते हों। उसके चेहरे पर हल्की झुर्रियां और झांई थी जैसे पाइन के बारीक पत्ते चेहरे पा छा गए हों।
उसने जीन्स पहन रखी थी और ऊपर गोल गले के टी-शर्ट के ऊपर जीन्स की ही एक जैकेट उसने डाल रखी थी। उसके पैरों में मोटे और खुरदुरे चमड़ों वाले जूते थे। जो कारखानों में काम करने वाले कर्मचारियों के सेफ्टीबूट की तरह थे। एकबारगी उसे देखने से लगता था मानों वह अंग्रेजों के जमाने का साईंस हो।
'हम यहीं के हैं साब.. पहाड़ के। हमारे बाप-दादे यहीं के थे।Ó घोड़े वाले ने जैसे उसके मन की थाह पा ली हो।
'और ये तुम्हारे सब साथी?Ó विशाल ने पूछा।
'इनमें जो ऊंचे-पूरे और चौड़े माथे वाले हैं, वे अफगानी हैं। उनके पूर्वज घोड़ों के साथ काबुल से आए थे।Ó उसने कुछ लोगों की ओर इशारा किया। विशाल ने देखा वे वैसे ही ताकती लोग थे जिस तरह शिमला स्टेशन में सामान उठाने वाले कुली थे।
कोई पालतू जानवर आदमी के साथ रहते हुए आदमी की तरह व्यवहार करने लग जाता है। वैसे ही आदमी पर भी अपने पालतू पशु के प्रभाव पड़ जाता है। घोड़ों के साथ रहते हुए उसके चेहरे पर घोड़े की तरह की खामोशी छा गई थी। सिर झुकाए वह चलता रहता एक लंबी खामोशी के साथ जो घोड़ों के लंबे चेहरे पर कहीं भी देखी जा सकती है। बोलते समय भी उसके चेहरे पर वह खामोशी बनी होती थी।
'रास्ता आदमी और घोड़े से भरा हुआ है।Ó चंदा ने कहा। ऐसे लगता जैसे वह जब भी कुछ कहना चाहती हो उसका घोड़ा विशाल के पास आ जाता है।
'कहते हैं आदमी और घोड़ा दोनों कभी बूढ़े नहीं होते।Ó विशाल ने कहा तब चंदा ने उसे ऐसे गोपनीय ढंग से देखा जैसे यह उनके दाम्पत्य जीवन के बीच का कोई रहस्य हो। फिर दोनों नजरें मिलते ही हंस पड़े थे।
'बहुत हो गया घोड़ा-घोड़ा... अब छोड़ो। इस सुंदर वादी में कोई और बात करो।Ó चंदा ने जैसे उकताते हुए कहा।
'अरे तुम तो ऐसे हुक्म फरमा रही हो जैसे घोड़े पर सवार रजिया अपने नौकर याकूत पर फरमाती थी।Ó विशाल ने कहा।
'याकूत केवल उसका नौकर नहीं ता वह कुछ और भी था।Ó चंदा ने उच्छावास छोड़ी। उसके मुंह से निकल गई भाप पहाड़ से उठे कोहरों में कहीं घुल गई थी।
कोहरा पहाड़ों को ढंकता जा रहा था। पहाड़ बच्चों की तरह लग रहे थे। जैसे मां अपने आंचल से बच्चों को ढंक जा रही है। कभी कोहरा 'ए सेल्फिश जायंटÓ के उस दैत्य की तरह पहाड़ों को आतंकित करता हुआ लगता जहां चमन में खेल रहे बच्चों को उस कहानी का चौकीदार डराया करता था। पहाड़ पूरी धरती की तरह विराट दिखाई देते तो कोहरा आसमान की तरह असीमित और अनंत लगता। कोहरा पुरुष के हृदय के समान विशाल दिखाई देता तो पहाड़ में स्त्री जैसा समर्पण दिखता। कोहरा किसी प्रेमी की तरह अपनी भुजाएं फैलाए खड़ा करता है। तो पहाड़ किसी प्रेयसी की तरह उसके आगोश में समाता लगता।
विशाल और चंदा को इस तरह के अनगिनत रंग और कितने ही खेल कोहरे और पहाड़ के बीच चल रहे लगते जिनमें वे अपने अक्स भी तलाश रहे होते थे।
'कोहरे और पहाड़ के मिलन से ही कोई नदी बहती होगी।Ó विशाल को चंदा की आवाज किसी गहरी घाटी से आती हुई लगी। तब उन दोनों ने एक साथ अपने बच्चों को देखा जो आगे बढ़ गए थे किसी बहती हुई चंचल नदी की तरह।
शुन्नू की आवाज आई 'पापा मम्मी... वो देखो!Ó
विशाल और चंदा ने देखा कि उस टेढ़े-मेढ़े पथरीले मार्ग पर घोड़े पर सवार और दूसरे खाली घोड़े की लगाम पकड़कर उसे दौड़ाता हुआ एक किशोर उनके किनारे से ढलान की ओर जा निकला। वे सब उसे पलटकर देखते रह गए। उसके ओझल हो जाने के बाद भी उसके घोड़ों की टाप कई गुना बढ़कर घाटियों में देर तक गूंजती रही। उन्होंने देखा और महसूस किया कि चुनौतियां किस तरह आदमी के कारनामों को हैरतअंगेज बना देती हैं।
कालिमायुक्त कोहरों का बवंडर धरती पर ऐसे छाता लगता जैसे किसी समुद्री तूफान का रेला हो और उसकी उफनती हुई विकराल लहरें हों, जो मीलों दूर बसे लोगों की ओर गर्जना करती हुई बढ़ रही हों। इन कोहरों के विराटपन में जैसे लहरों की गर्जना भी समाई हुई हो। ऊपर नीचे लहराते और बलखाते हुए से कोहरे ये आभास कराते जैसे धूमकेतु की दैत्याकार पूंछ हो जिसकी एक फटकार से ही कहां जाएंगे ये पहाड़? फट जाएगी यह धरती और समा जाएंगे इसमें समस्त चर अचर प्राणी। तब बचा रह जाएगा केवल कोहरा ही उस संभावित प्रलय के बाद भी जिसकी कल्पना मनुष्य डर डर के करता रहा। उसके इस अज्ञात भय से पनपती रही हैं उसके भीतर अनन्त आस्थाएं। यह सब कुछ उमड़ घुमड़ रहा था विशाल और चंदा के भीतर कोहरों की तरह। कभी उनके भीतर कोहरों की तरह कुछ घुमड़ता है। कभी झरनों की तरह कुछ फूटता है। उनके अंतस की गहराई में हैं न जाने कितनी घाटियां। पहाड़ों और शिखरों की तरह ऊंची कितनी आकांक्षाएं हैं उनकी अपनी-अपनी। हर पल उन्हें लगता है कि प्रकृति के साथ भी बंंधे हुए हैं वे लोग रिश्ते के किसी धागे से ठीक अपने परिजनों की तरह।
'बच्चे कहां गए।Ó चंदा की आवाज में थोड़ा संशय था।
'होंगे इसी कोहरे में कहीं।Ó विशाल ने ऐसे कहा जैसे इन कोहरों से उसका पुराना रिश्ता हो।
'अब हवा बहुत ठंडी हो गई है।Ó घोड़ेवाले ने कहा जो अक्सर विशाल और चंदा के घोड़ों के बीच रहता 'कोहरे छा गए हैं साब, हवा ठंडी हो गई है यानी अब बर्फ गिरने ही वाली है।Ó किसी मौसम विशेषज्ञ ने जैसे उद्घोषणा की हो। साबुदाने के समान सफेद कण बरसने लगे थे।
हो... हा... के अनेक उल्लासमय स्वर कोहरों के भीतर से आने लगे थे। इस धुंधलके में घोड़ों पर बैठी अनेक आकृतियां जैसे कोहरों के साथ उड़ रही हों। जमीन के ऊपर उठते पांव थे। पहाड़ी वस्त्रों, गहनों और फूलों की डालियों से सुसज्जित परियां थीं जिनकी सूरत चंदा और शैली से मिल रही थी। फर वाले कोट, टोपियों और गमबूटों को गहने उन परियों के पहरेदार थे जो विशाल, पम्पी और शुन्नू की तरह लग रहे थे। सबके वस्त्रों पर गिरती जा रही है बर्फ रुई के फाहों की माफिक। बनती जा रही हैं कई तहें उन फाहों से। बन गया है यह एक विशाल शयनकक्ष जिसमें सफेद भेड़ों की ऊन से बना हो बिछौना और लगी हों गुदगुदी मुलायम रजाइयां। जिसकी तहों में घुस जाने के लिए हों बेताब सबके सब।
इस धरती से अलग मानों कोई और ग्रह हो जिसमें दिख रहे हैं बुलबुले यहां से वहां तक छितरे हुए। चल रहे हैं इस नये ग्रह की जमीन पर कई अद्भुत मानव। रोबोट की तरह चलते हुए इनके पांव पड़ रहे हैं श्वेत कालीन पर। अब तो पूरी धरती पर खुलती जा रही है यह कालीन जिस पर नाचते थिरकते लोग हैं।
पूरी फिजां किसी संगीत सभा में तब्दील हो गई हो। छेड़ दी गई हो कोई मीठी और सुरीली तान प्रकृति और मनुष्य के भीतर कहीं, जहां से जीवन स्पंदित होता है तब फिर होता है मुखरित जीवन नये सिरे से, और आती है आवाजें अनेक सुरों में।
'यह साल की पहली बर्फ है साब... पिछले बरस भी दस अक्टूबर को गिरी थी इस बार भी! घोड़े वाले ने अचंभित होकर कहा।Ó
'हैप्पी बर्थ डे टू यू... शैली!Ó का एक सुर जाग उठा था। पम्पी, शुन्नू तब अपने घोड़ों से उतरकर दौड़ पड़े थे। चंदा और विशाल भी शैली को घेरकर खड़े हो गए थे। हजारों फुट की ऊंचाई पर भी आ गया था भारी ओलों और हिमतापों के बीच शैली का सोलहवां सावन। सफेद रंग के लड्डू बनाकर सबने अपने हाथ उठा लिए थे। पम्पी से कैमरा लेकर घोड़े वाले ने तब कहा था 'साब लोग... रेडी! स्माइल प्लीज।Ó