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Monday 20 Nov 2017

एक और अग्निकांड


वेदप्रकाश अमिताभ
डी-131, रमेश विहार,
अलीगढ़- 202001
बचे-खुचे ततैये बेहद हैरान थे। दुख तो हमेशा की तरह झुलसा देने वाला ही था लेकिन हैरानी ने उसे और दाहक बना दिया था। हम नहीं समझ पा रहे थे कि हमसे चूक आखिर कहां हुई। इस बार तो हमने बहुत सोच-विचार कर अपना बसेरा बनाया था।
कई साल पहले हम जिस पेड़ पर बसे हुए थे, वह एक खेत में था। हमारे बड़े-बूढ़े बताते थे कि पीपल के इस पेड़ पर हम तीन पीढिय़ों से बसे हुए थे। दूर-दूर तक घूम आते थे। जंगली फूलों से लेकर घर की फुलवारियों तक घूमने और रस चूसने में कोई बाधा नहीं थी। किशनपुर गाँव के मुहाने तक हमारा अपना साम्राज्य था। इंसानों से हमारा संपर्क नहीं के बराबर था। कभी-कभार किसान जरूर मिलते थे, कभी हल चलाते हुए, कभी खेतों में पानी लगाते हुए। कभी कुछ महिलाएं भी नजर आती थी- क्यारियों से सब्जी तोडऩे के लिए सरसों वगैरह का साग खोंटने के लिए। लेकिन मजबूरी में एक दिन वह पुश्तैनी ठिकाना छोड़ देना पड़ा था।
कुनबा बढऩे से हमारा छत्ता काफी बड़ा हो गया था। उधर से कोई आदमी शहद का छत्ता तलाशते हुए निकला तो उसे हमारा छत्ता दिखायी दे गया। था कोई नम्बरी बदमाश। जानता था कि यह छत्ता बर्र का छत्ता है फिर भी उसने शरारत करते हुए अपने हाथ के बांस को छत्ते में दे मारा। हमने भी तुरन्त उसे बदमाशी का मजा चखाया। हमारे कुछ नौजवान उसके पीछे भागे। जब तक वह मुँह, सिर, हाथ पूरी तरह ढँकता तब तक उसकी हालत बुरी हो चुकी थी। हम अपना टूटा हुआ छत्ता कई दिनों में रहने लायक बना पाये थे। एक दिन वह बदमाश फिर आ धमका। इस बार पूरी तैयारी से आया था। कंबल ओढ़ कर आया था और उसने वहाँ आकर मजे में एक लुकाठी बनाई थी और फिर हमारे बसेरे में आग लगा गया था। कुछ ततैये झुलस कर मर गये और कुछ घायल और अधमरे हो गये। हमारे डंक उसके कंबल का कवच नहीं भेद पाए। हमें पहली बार इंसान से डर लगा। इंसान तो क्या शैतान ही रहा होगा। बुजुर्गों की सलाह पर हमने यह ठिकाना छोड़ देना ही उचित समझा क्योंकि मौत ने घर देख लिया था।
उस समय तक इन खेतों में गेहूं की जगह मकानों की खेती शुरू हो गयी थी। इससे हमें खुशी हुई थी। हमें इंसान अच्छे लगते थे। उन्हीं के आसपास रहना हमें पसन्द था। उनके बच्चों की आवाजें सुनना अच्छा लगता था। उनके लगाए पेड़ पौधे हमें हर तरह का सुख देते थे। हम तरह-तरह के फूलों के पराग का स्वाद लेते थे। कहीं कोई भय नहीं लगता था, कोई परेशानी महसूस नहीं होती थी। हमने मान लिया था कि हमारा बसेरा उजाडऩे वाला कोई इंसान नहीं, शैतान रहा होगा।
हमने अपना नया बसेरा, रमेश विहार के एक बिल्कुल नए मकान की छत पर एक कोने में बनाया। मकान के बगल में ही एक छोटा सा पार्क था। वहाँ हम स्वच्छंद विचरण करते थे। थक जाने पर अपने घर लौट आते थे। उस मकान में बस बूढ़ा-बूढ़ी थे। उनके दोनों बच्चे विदेश में थे। वे बेचारे दिन में भी डरे-डरे रहते थे। उन्होंने एक कुत्ता पाल लिया था। वह भौंक-भौंक कर दिन-रात पहरेदारी करता था। बूढ़ा-बूढ़ी तो छत पर आते नहीं थे। बूढ़ी को सीढिय़ां चढऩे में परेशानी होती थी। कुत्ता भी छत पर कभी-कभार आता था। इस मकान में दो साल बहुत चैन से कटे। यहाँ यह डर नहीं था कि कोई बदमाश हमारा घर उजाड़ देगा। लेकिन हमें एक दिन यह ठिकाना छोड़ देना पड़ा था।
बूढ़ा-बूढ़ी का छोटा बेटा कुछ दिनों के लिए अमेरिका से सपरिवार आया था। पूरे घर में जैसे रौनक और खुशी बरसने लगी थी। बूढ़ी के तो जैसे पंख लग गये थे। वह अपने नाती को देखकर मगन हो उठी थी। सुबह-शाम उसी के आगे-पीछे दौड़ती-भागती। फिर जाने क्या हुआ कि बहू तो बेटे को लेकर अपने पीहर जा बैठी और बाप-बेटे की तकरार से घर की दीवारें-छतें काँपने लगी थी। हम लोगों को देर में यह बात समझ में आयी कि बेटे का मन अब हिन्दुस्तान के गंदे और पिछड़े माहौल में नहीं लगता था। उसने फैसला कर लिया था कि अब अमेरिका में ही सैटिल हो जाना है। उसे बूढ़े माँ-बाप की बहुत चिंता थी। इतने बड़े मकान में कैसे तो दो प्राणी रहेंगे? उन्हें कुछ हो गया तो कोई खबर करने वाला भी नहीं। उसे सारे पड़ोसी बेईमान लगे थे। लगा कि इंतजार कर रहे हैं कि कब उनकी आँखें बंद हो, कब वे मकान को हथिया लें? इसलिए बेटा जोर दे रहा था कि मकान बेच दिया जाए और माँ-बाप इसी शहर में अभी हाल में बने वृद्धाश्रम में शिफ्ट हो जाएँ। वहाँ नौकर-चाकर देखभाल कर होंगे और सुरक्षा तो वहां होगी भी। उसने बड़े भाई से पूछ लिया है। वे भी सहमत है। उन्हें अपने साले की कुछ आर्थिक मदद करना है। मकान बिकने से मिले रुपयों का आधा वहाँ काम आ जाएगा। रही उसकी बात तो आधे रुपये वह यहीं इनवेस्ट कर देगा। देश का रुपया देश में ही रहेगा। बाप ने पी.एफ. से लोन लेकर यह मकान बनवाया था। वह मरने से पहले घर छोडऩे को तैयार नहीं था और बूढ़ी इस मामले में उसका पूरा साथ दे रही थी। लेकिन सारे रिश्तेदार उगते सूरज का साथ देने लगे तो बूढ़ा-बूढ़ी एक दिन टूट गए थे। वे कहाँ गए, यह पड़ोसियों को भी नहीं पता चला था। मकान जिसने खरीदा था, उसने उसे नया रूप देने के लिए कुछ तोड़-फोड़ कराई, कुछ रंगाई-पुताई की। मजदूरों का ध्यान छत के एक कोने पर बने छत्ते पर गया तो पहला काम उन्होंने यही किया कि छत्ते पर टूट पड़े। एक बार फिर वही आग, झुलसते हुए ततैये और फिर बचे हुए हुओं के सामने नया घर बसाने की समस्या।
नया बसेरा हमने बहुत सोच विचार कर अशोक के ऊँचे छतनार पेड़ पर बनाया था। कालोनी में अशोक के कई ऐसे पेड़ थे। उन्हें कभी फूलते-फलते नहीं देखा। फूल और फल न हों तो किसी पेड़ पर न कोई पक्षी मंडराता था, न किसी बन्दर जैसे जानवर के आने का भय था। अब भय था तो सिर्फ इंसानों से। ज्यों-ज्यों हम इंसानों के संपर्क में आ रहे थे हमें लगने लगा था कि इंसान से ज्यादा बुरा जानवर शायद और कोई नहीं है। इसे बिना किसी वजह के किसी का घर उजाडऩे या जलाने में बड़ा मजा आता है। कभी-कभी तो लगता था कि इंसान हमें फालतू चीज समझते हैं। इसीलिए हमारा इतना निरादर इतनी अमानवीयता। डंक तो हमारी ही बिरादरी की मधुमक्खी के भी कम तीखे नहीं हैं, लेकिन उससे शहद मिलता है न, इसलिए उसे पाला भी जाता है। हालांकि शहद पाने के लिए ये इंसान बहुत सी मधुमक्खियों की भी बलि लेता है। हम भी परागण का काम करते हैं, प्रकृति का ही एक अंग हैं लेकिन हमें इंसान का प्यार-दुलार नाम को भी नहीं मिलता। जब हमें कोई नुकसान पहुंचाता है तभी हम उसे डंक मारते हैं, लेकिन इंसान तो बिना छेड़े ही डंक मारता रहता है। हमारे डंक से शायद ही कोई मरा हो लेकिन इंसान के डंक से.....
जब हम नया ठिकाना बनाने के लिए जगह खोज रहे थे। तभी हमें कॉलोनी में एक दिन बहुत चहल-पहल दिखायी दी थी। पता चला कोई प्रोफेसर साहब 'पर्यावरण रत्नÓ सम्मान से सम्मानित हुए थे। वहाँ जो नारे लग रहे थे, उन्होंने हमें प्रभावित और चकित किया था। इंसान भी पेड़ों को बचाने, जीव-जंतुओं की रक्षा करने, तालाब बचाने की बातें कर सकते हैं हमारी समझ से तो बाहर की बात थी। पता चला कि प्रोफेसर साहब को यह सम्मान इसलिए मिला है कि उन्होंने हजारों पेड़ लगवाये थे। सौ के आसपास पेड़ तो उनकी कोठी के आसपास ही उन्हीं की जमीन पर खड़े थे। कुछ निंदक भी वहाँ थे। वे फुसफसा रहे थे कि पेड़ लगाने के नाम पर कैसे प्रो.ने सरकारी जमीन हथिया ली थी। वहाँ एक संस्था का बोर्ड भी लगा दिया था। 'हरियालीÓ- यही नाम था उस संस्था का जिसके आजीवन अध्यक्ष प्रो.साहब ही थे। सचिव थीं उनकी मुटल्ली पत्नी जो दौड़-दौड़ कर इस समय चाय-पानी की व्यवस्था देख रही थी। प्रोफेसर साहब ने वहाँ जो कुछ कहा, उससे हमारे बहुत से भ्रम दूर हुए थे। उन्होंने कहा था- जल ही जीवन है, पेड़ हमारे जीवन की नींव है। हमें छोटे-छोटे से जीव-जन्तु की सुरक्षा करनी चाहिए, नहीं तो डायनासोर की तरह अनेक जीव लुप्त हो जायेंगे। सभी जीव पर्यावरण के चक्र में अपना योगदान करते हैं। साँप जैसे जंतु भी हमारे काम के हैं। सब पर दया करनी चाहिए। संतों ने कहा भी है- 'सांई के सब जीव हैं कीरी कुंजर दोय।Ó अब हम 'लोकÓ,  'पर्यावरणÓ, 'डायनासोरÓ, 'सर्किलÓ, 'सांईÓ, 'कीरीÓ, 'कुंजरÓ का मतलब तो क्या समझते, हां, सुनने वालों ने जोर से तालियाँ बजाई तो लगा कि अच्छी और बड़ी बात कही गयी है। एक बात जरूरी समझ में आयी कि जब प्रोफेसर साहब 'साँपÓ तक की सुरक्षा चाहते हैं तो ततैयों को तो उनकी दया, कृपा मिलेगी ही। लगा, सारे इंसान बदमाश और दुष्ट नहीं होते। हमने आपस में बातचीत करके निश्चित किया था कि प्रोफेसर साहब की वाटिका से अच्छी जगह हमें नहीं मिलेगी। उनकी कोठी के दरवाजे के सामने ही एक ऊँचा अशोक का पेड़ हमें अच्छा लगा था। वहीं बसने का फैसला हो गया था। लेकिन हमें क्या पता था कि एक दिन....
बड़े चैन में हमारे दिन बीत रहे थे कि एक दिन सुबह-शाम हरियाली के बीच घूमने वाली मुटल्ली प्रोफेसर की बीबी को उसकी महरी ने बताया 'आंटी जी! तुम्हाए काऊ पेड़ पे बर्र को छत्ता दीखे है। निरी बर्र इत-उत कूँ उड़ती फिरे हैं। काहूँ दिना बेबी को काट गयी तो....।Ó बेबी आठ-नौ साल का था। बहुत उत्पाती। कभी किसी पेड़ के फूल नोंच रहा है, कभी किसी पेड़ की डाली तोड़ रहा है, कभी गिलहरी को पत्थर मार रहा है। उससे तो हम लोग खुद दूर रहते थे। जाने कब हमारे छत्ते पर पत्थर फेंक दें। मुटल्ली ने महरी की बात गाँठ बाँध ली थी और एक दिन हमारा सब कुछ छीन लेने वाला अग्निकांड शुरू हो गया था। कोई बहेलिया बुलाया गया था। वह गंडासा बांध कर जलती लुकाठी लेकर पेड़ पर चढ़ गया था। उसने सीधे छत्ते में आग लगा दी थी। हम थोड़े से ततैये भाग छूटे थे। अभी सुबह भी नहीं हुई थी इसलिए ज्यादातर तो सोये ही हुए थे। वे चिरनिद्रा में विलीन हो गये। मुटल्ली को चैन नहीं था। वह जालीदार दरवाजे के भीतर से बराबर हुक्म चला रही थी- 'देखना पूरा छत्ता खत्म कर देना। कुछ रह न जाए....Ó पर्यावरण रत्न और जीव-जन्तुओं के हितैषी प्रोफेसर किसी बड़ी सी किताब को पढऩे में मगन थे। शायद वे उसमें लुप्त होती प्रजातियों के बारे में कुछ पढ़ रहे थे। हमारे छत्ते को जलाने में अशोक पेड़ की एक डाली भी जल गयी थी। पास-पड़ोस के मकानों के लोगों को भी अच्छा लग रहा था कि एक बला टली। अब कोई ततैया उन्हें और उनके परिवार वालों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा पायेगा। हमारे पास इधर-उधर के पेड़ों की डालियों से चिपके रहने के अलावा चारा क्या था? हम बचे खुचे ततैये हैरान थे कि इस बार तो बहुत सोच-विचार कर घर बसाया था फिर..... । क्षोभ, ग्लानि, गुस्से में भरे हम लोग सिर धुन रहे थे कि हम क्यों बच गये। काश हम भी जल मरे होते उसी आग में।
एक कल-परसों का ततैया-बच्चा अपनी माँ के पंखों में घुसा हुआ था। बार-बार कुछ पूछ रहा था और नम आँखों से माँ इस हालत में भी उसकी जिज्ञासा शांत कर रही थी। हमारा मन हुआ कि अपनी दुर्दशा को भूल माँ-बेटे की बातचीत ही सुनें....
'अब हम लोग कहाँ रहेंगे?Ó
'नये घर में। नया घर बसायेंगे।Ó
'उसमें कोई आग लगा देगा तो....Ó
'फिर नया घर बसायेंगे।Ó
'फिर उसमें भी कोई आग लगा देगा तोÓ
'फिर नया घर बसायेंगे।Ó जितनी बार आग लगेगी उतनी बार नया घर बसायेंगे। जब तक जान में जान है, घर बनाना नहीं छोड़ें। वे आग लगाना नहीं छोड़ते तो हम घर बनाना, घर बसाना क्यों छोड़ देंगे?