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Wednesday 22 Nov 2017

लड़की पहाड़ पर

 

 शुक्ला चौधरी
जे.पी. विहार, म.नं. 88, मंगला
बिलासपुर (छ.ग.)
मो. 9589718317
गीले पहाड़ पर से उतर रही थी एक भीगी हुई सी लड़की। फिसलन भरे पत्थर पर भी उसके पांव सधे हुए थे, उसके बाल और कपड़े इतने भीगे हुए थे कि जब वह चल रही होती तो बदन से चिपके कपड़े से शप-शप की आवाजें आने लगतीं। अभी भी बारिश थमी नहीं थी पूरी तरह से, पर उसका वेग कुछ कम जरूर था। पानी टिपिर-टिपिर की लय के साथ बरस रहा था, लड़की की बायीं तरफ के टीले के पीछे से सूरज डूब रहा था जिसकी हल्की रोशनी झीनी चादर की तरह पहाड़ पर बिछी हुई थी। बायीं तरफ से ही एक औरत अपनी बकरियों के साथ और एक आदमी अपने सिर पर एक पूरा कटा हुआ पेड़ लिए उतर रहे थे, लड़की जरा देर ठिठकी, फिर जल्दी-जल्दी प्राय: दौड़ती हुई आई और कटा पेड़ ले जाते हुए आदमी को छेंककर खड़ी हो गई...
-''का बात है नोनी, रास्ता काहे रोके!ÓÓ
-''पेड़ क्यों काटे?ÓÓ
-''जलावन खातिर।ÓÓ
-''कच्चा पेड़ जलाओगे?ÓÓ
-''नहीं नहीं नोनी पहले काटब, फिर सुखावब, तब जाके जलावन के काम लायक यह लकड़ी बनी हँ।ÓÓ
-''क्या ऐसा रोज ले जाते हो?ÓÓ
-''हां... नोनी- रोऽऽज...ÓÓ
''फिर तो सारे के सारे पेड़ कट जाएंगे, तब यह पहाड़ कैसा दिखेगा, जानवर कहां जाएंगे, चिडिय़ा जब उड़ते-उड़ते थक जाएगी तब पेड़ नहीं होगा तो कहां बैठेंगी?ÓÓ लड़की एक ही सांस में कहकर चुप हो गई, लड़की उदास हो गई। ''अरे बिटिया हम बचपन से पेड़ काटत आ रहे हैं... ये काहे को खतम होही, चलो चलो बेरा डूबन को है, घर जावो बिटिया, महतारी राह ताकत रही होही...।ÓÓ लड़की कुछ देर आदमी और औरत को जाते हुए देखती, आज मिंटू साथ नहीं था, वह अकेली ही पहाड़ पर आई थी, घर पर रोज की तरह आज भी मार पड़ेगी, कोई नई बात तो नहीं, लड़की ने कंधे उचकाये। वह नीचे उतर चुकी थी, नीचे पत्थर के छोटे-बड़े कई टीले थे। लड़की एक पर बैठ गई। उसके गीले कपड़े हवा में सूख चुके थे, उसने अपने दोनों पैर आगे तानकर फैलाए और पीछे पत्थर पर दोनों हाथों को टिकाकर खुद को मेहराब की तरह बना लिया फिर पैरों को जोर-जोर से हिलाने लगी। लगातार पानी में चलने से पांवों के गुलाबी तलुए सफेद हो गए थे जो बगुले के पंखों की तरह लग रहे थे। लड़की की चंचल हिरनी जैसी आंखें कौतुक से इधर-उधर दौड़ रही थीं कि अचानक आकर उसके खुद की देह पर टिक गई। जहां देखने-महसूसने के लिए बहुत कुछ था, लड़की शरमा गई। वह हड़बड़ाकर उठी और कूदते-फांदते अपने घर की तरफ भागी। पहाड़ पर शाम उतरने लगी थी। घर पर चिल्ल-पों मची हुई थी। मां सप्तम सुर में चिल्ला रही थी। छोटे मामा रोज की तरह चाय पीने आज भी आए हुए थे, वे चाय पीते हुए अपनी प्यारी दीदी से बच्चों की शिकायतें सुन रहे थे। मंझली यानी दोलन आटा सान रही थी, उसके घुंघराले बाल चेहरे को ढांपे हुए थे। रूपाली किसी बात को लेकर भाई से लड़ रही थी कि उसकी नजर दरवाजे पर खड़ी लड़की पर पड़ी...।
-''मां-मां, देखो दीदी आ गई...ÓÓ
-''आ गई कुलच्छनी धिंगी लड़की, आ झाड़ू से तेरी पूजा करूं!ÓÓ
मां लड़की को बालों से पकड़कर अन्दर ले आई। मामा अपनी बड़ी बहन के हाथों से लड़की को छुड़ाते हुए बोले- ''तुम रहने दो दीदी, इसे मैं देखता हूं, तुम्हारी ऐसी हालत में उत्तेजना ठीक नहीं...ÓÓ छोटे मामा लड़की को कब्जे में लेकर स्टूल पर बैठ गये।
''भाई एक छड़ी तो लाना..।ÓÓ -''अभी लाया मामाÓÓ, भाई रूपाली से लडऩा छोड़ मुस्तैदी से दौड़ गया छड़ी लाने...। ''ये लो मामा...ÓÓ मामा ने पहले तो घुमा-घुमाकर छड़ी को जांचा-परखा, फिर लड़की की तरफ रुख कर बोले-
-''कहां गई थी?ÓÓ -''पहाड़।ÓÓ
-''क्यों?ÓÓ -''...ÓÓ (चुप्पी)
-''क्यों चुप है, जवाब दे,... पहाड़ क्यों गई थी?ÓÓ -''अच्छा लगता है मामा, ... आप भी चलोगे कभी मेरे साथ...ÓÓ
-''चुप्प... हिम्मत तो देखो लड़की की... बता आज। स्कूल गई थी?ÓÓ ''नहीं।ÓÓ
-''नहीं गई थी, क्यों?ÓÓ -''स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता मामा...ÓÓ
-''क्यों नहीं अच्छा लगता?ÓÓ
-''वन्दना मैम खूब मारती हैं मुझे, जब-तब मुर्गा बनने को कहती है और जानते हो मामा, जब मैं मुर्गा बनती हूं तो पूरी क्लास मुझ पर खूब हंसने लगती है... अब मैं कभी स्कूल नहीं जाऊंगी, घर का काम करुंगी...ÓÓ लड़की थोड़ी हंसी... और तभी मामा के हाथ की छड़ी हवा में लहराई और... ''सटाक, सटाक, सटाक... स्कूल नहीं जाएगी...ÓÓ मां कोयले की आंच से रोटी सेंकती हुई बोली- ''छोटे, इससे पूछ क्या अच्छा लगता है, पेड़ पर चढऩा? दिन में दस बार टंकी में कूद कर नहाना? छोटे भाई-बहनों के हिस्से की चीजें चोरी करके खाना? पहाड़ तो छोड़ ही दे छोटे, एक दिन मैं इसे वहीं पत्थर के नीचे गाड़कर आऊंगी, देखना, न जाने वहां कौन सा शहद टपकता मिलता है इसे!ÓÓ सटाक् एक छड़ी और लगाते हुए मामा बोले- ''जा भाग, हाथ-मुंह धो और पढऩे बैठ ढीट कहीं की।ÓÓ लड़की पढऩे बैठती है पर अक्षर उसे कहां दिखते, उसे तो पहाड़ ही पहाड़ दिखते। न जाने वहां कितना कुछ बिखरा हुआ पड़ा था। उसका मन फिर उडऩे लगता। पहाड़ में भी तो रात उतर आई होगी। इस अंधेरे में तोते क्या करते होंगे। क्या रात को भी चिडिय़ा एक डाल से दूसरी डाल पर  उड़कर जाती होगी, क्या कल भी वह आदमी एक और पेड़ काटकर ले जाता हुआ दिखेगा, लड़की की आंखों में आंसू भर आए जिसमें किताब के सारे अक्षर धुंधले नजर आने लगे थे।
लड़की का घर का नाम बड़की है, स्कूल में दमयंती लिखाया गया है। लड़के की उम्मीद संजोए बैठे घर वालों को लड़की का पैदा होना जरा भी रास नहीं आया था। दादी मुंह बिचकाकर बोली थी, ''लो बहू, संभालो... जनी भी तो लड़की न!...ÓÓ और मां को सोहरी में अकेली छोड़ बाहर निकल आई थी। फिर तो लड़कियों की लाइन लग गई। दोलन-रूपाली के बाद घर में पहला लड़का पैदा हुआ था भाई। बड़ी हेला-फेला के बीच गुजरते थे तीनों बहनों के दिन और रातें, तीनों बहनों के हिस्से में बंटे थे घर के सारे कामकाज। भाई तो जैसे चांद का टुकड़ा हो, सबकी आंखों का नूर। भाई को जरा सी चोट तीनों बहनों की जान पर बन आती है, ज्यादा कान खिंचाई बड़की को झेलनी पड़ती।
तभी तो फाँकी मारती है बड़की, काम में भी, पढ़ाई में भी। स्कूल भी जैसे चारदीवारों से बनी जेल हो, जहां मन लायक कुछ भी नहीं, खिड़की के पार न•ार गई नहीं कि टीचर ने लगाया पीछे से एक चांटा... ''ऐ दमयंती, क्या देख रही है?...ÓÓ ''चल खड़ी हो जा... बोल तो 'मैं जाती हूंÓ का अंग्रेजी में क्या होगा?ÓÓ दमयंती डरते-डरते खड़ी हो गई और हकलाने लगी वैसे उसे पता तो है पर अगर गलत हो गया तो... टीचर उसे मुर्गा बनने को कहेंगे। आज भी फटी चड्डी पहनकर स्कूल आई है। मां को तो समय ही नहीं मिला कि जरा उसे सिल दे, दमयंती सोचने लगी।  -''नालायक कहीं की चल मुर्गा बनÓÓ दमयंती रोने लगती है। लड़की नींद में कुनमुनाती है, सपने में फिर पहाड़ जहां पीली तितलियां हैं, मखमली छोटे-छोटे लाल कीड़े हैं जिन्हें पकड़ो उंगलियों से छुओ, फिर छोड़ दो, ''पिंटू ऊ... ऊ, पतली डाल पर पैर मत रख, गिर पड़ेगा...ÓÓ ''टी... ली... ली... ली, ये देख मैं कहां गिर रहा हूंÓÓ पिंटू ठेंगा दिखाता है। लड़की नींद में हंसती है। लड़की की हंसी में चकमक कर उठता है जंगल का जादू।  ''एई दीदी, उठ-उठ... क्या बड़बड़ा रही है। देख, मां को क्या हुआ है...ÓÓ मंझली दोलन हड़बड़ाई हुई थी। ''भाई हुआ है भाईÓÓ नानी इठला रही थी। मामा के हाथ पे एक बड़ा झोला झूल रहा था। लड़की आंखें मलते हुए तड़ाक से खाट के नीचे कूदी।
-''ए बड़की, इधर आÓÓ-''क्या है मामा?ÓÓ
-''मैं बाजार जा रहा हूं, मेरे आते तक सारे बर्तन साफ हो जाने चाहिए। पहाड़ नहीं जाना है आज, कहे देता हूं, फाँकीबाज कहीं की।ÓÓ -''अच्छा मामाÓÓ। लड़की ने देखा नल के नीचे बर्तनों का ढेर लगा है उसने सोचा कैसे मांजेगी वो इतने सारे बर्तन। लड़की ने जरा देर इधर-उधर देखा, फिर फ्रॉक के निचले घेरे को समेटकर जांघों के बीच दबाया और बैठ गई बर्तन मांजने। आज बाबूजी बहुत खुश दिख रहे थे, दादी भी। हमेशा बैठी रहने वाली दादी नानी के साथ मिलकर पूरियां सेंक रही थीं गोल-गोल और फूली-फूली। शुद्ध घी की महक से मह-मह करता पूरा घर। आज इन पूरियों में से दो-चार उड़ायेगी जरूर पिंटू के लिए। लड़की बर्तन मांजने लगी- पहले गिलास, फिर कटोरी-थाली-चम्मच... खन-खन... झन-झन...
''एई छोरी, बर्तन क्या मांज रही है, आसमान सर पे उठा रखा है एँ? काम-धाम करने में मन नहीं लगता है, क्यों...ÓÓ बाबू पीछे से टोकते हुए बोले। दोलन बगल में खड़ी थी।
''दीदी...ÓÓ ''भाई का क्या नाम रखेगी रे!...Ó''.... (चुप्पी...)ÓÓ ''बोल न... मैं तो छोटू बुलाऊंगी... और तू?...ÓÓ
''छाई (राख)ÓÓ लड़की धीरे से बोली। हूं... भाई हुआ है, अभी तो एक काम बहनों के हिस्से और बढऩे वाला है- भाई को टांगे-टांगे घूमना, लड़की जल्दी-जल्दी बर्तन धोने लगी। बर्तन धोने के बाद वह अपने गुलाबी टखनों को नल की धार के नीचे रगड़ते हुए कनखियों से आसमान तकने लगी, न, पानी नहीं बरसेगा। एक बार नानी ने बताया था जल भरे बादल कैसे होते हैं- घने और काले-काले, लड़की फिर चंचल होने लगी, उसका मन फिर पहाड़ पर भागने लगा। पहाड़ जैसे उसका साथी, सहेली, कितने पेड़। छोटे-बड़े गझिन। एक-दूसरे से बतियाते-गलबांही करते। कैसा तो निष्ठुर है वह आदमी, रोज एक पेड़ काटता है। चिडिय़ों का घर बरबाद करता है। पता नहीं चिडिय़ों का वह झुंड कहां गया होगा, फिर से किस पेड़ पर अपना घर बनाया होगा। लड़की चिडिय़ों के उड़ान में खो सी गई। लड़की का दिल मचलने लगा। एक आह, एक हूक सी उठने लगी- कैसे बचाएगी वह इन ठूंठ होते हुए पेड़ों को, वीरान में बदलते हुए इस पहाड़ को। क्या पिंटू भी कुछ कर नहीं पाएगा? लड़की भूलने लगी सुबह मामा की दी हुई हिदायतें, कल की खाई हुई छड़ी की बेतहाशा मार, एक-दो-तीन लड़की हिरनी की तरह कुलाचें भरने लगी और पलभर में लड़की पहाड़ पर थी।