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Monday 20 Nov 2017

मेरे सामने वाला


शैलेन्द्र चौहान
34 /242, सैक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033 (राजस्थान)
मो. 07838897877
अवस्थी जी के मकान में जब से नया किराएदार आया है तब से न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि मेरे घर के लोगों की उत्सुकता थम नहीं पा रही है। सात दिन बीत चुके हैं पर सभी के मन में एक अबूझ जिज्ञासा का भाव तिर रहा है पता नहीं कैसा होगा वह व्यक्ति जो अवस्थी जी के मकान में किराए से रहने आया है। लेकिन आखिर सबके मन में आशंका क्यों है? क्या अपेक्षा कर रहे हैं सब, क्या करेगा वह किराएदार?
केतन को यह मकान खाली किए हुए कोई दो-तीन महीने बीत चुके हैं तब से न जाने कैसा एक अजीब सा खालीपन महसूस होने लगा है। लगता है पतझर के बाद सीधी गर्मी की ऋतु आ गई हो, बसंत आया ही न हो। अवस्थी जी के पड़ोसी सिन्धु जी भी तो मकान खाली कर गए हैं, कोई छ: महीने पहले। उनकी छोटी बेटी शुभा कितनी सुंदर और चंचल थी। कितना भरा-भरा लगता था उसके कारण सामने वाला मकान। अब तो उस मकान की रौनक ही सब खत्म हो गई। सिन्धु जी का ही कोई रिश्तेदार उसमें आकर रह रहा है, ईंट-भट्ठे का मालिक। शुभा की सूरत मेरी आंखों में घूम रही है। शायद मैंने ऐसी कोई दूसरी लड़की नहीं देखी जो इतनी सुंदर तो हो पर होशियार और सरल स्वभाव की भी हो। एक अच्छी लड़की, हां बहुत अच्छी लड़की थी शुभा। कोई दो वर्ष पहले इन्हीं दिनों केतन, अवस्थी जी के मकान में रहने आया था। उसके दो छोटे-छोटे बच्चे थे, बहुत ही प्यारे, भोले-भाले। इस नए किराएदार के प्रति तब भी हम लोगों के मन में उत्सुकता थी पर धीरे-धीरे वह उत्सुकता अपने आप मिट गई। केतन बहुत शांत और रिजर्व था और अपने आप में ही आनंदित रहने वाला, पूर्णत: सुखी। अवस्थी जी अपने नए किराएदार से बहुत प्रसन्न थे। उनकी नजर में वह एक आदर्श विवाह था। युवावस्था में इतने शांत, सौम्य और गंभीर कम ही लोग पाए जाते हैं।
सिंधु जी अपनी नौकरी के अंतिम दिनों में शिमला ट्रांसफर होकर चले गए थे। केतन के वहां आने से कोई छ: महीने पहले उनका ट्रांसफर हो गया था। तब तक ऐसी उम्मीद नहीं थी कि अपने इस अच्छे खासे बने बनाए मकान को छोड़-छाड़कर शिमला में ही रहने की सोच लेंगे। आखिर नौकरी करने वाला आदमी कितनी मेहनत और लम्बी योजना के बाद पैसा जोड़कर मकान बनवा पाता है। और अगर उन्हें मकान छोडऩा ही होता है तो अवस्थी जी से ऐसा खराब झगड़ा क्यों मोल लेते कि बातचीत ही बंद हो गई। आखिर अवस्थी जी ने केतन जिस पोर्शन में रहता था उस पोर्शन में एक छोटा सा बरामदा ही तो आगे निकलवा लिया था। उस पर सिन्धु जी को भारी आपत्ति हो गई और तू-तू मैं-मैं, गाली-गलौजी तक नौबत पहुंच गई। अगर अवस्थी जी के तीन-तीन जवान मुस्टण्डे बेटे न होते तो सिन्धु जी उनका जीना हराम कर देते। सिन्धु जी मिलिटरी के आदमी थे, उन्हें अपने बाहुबल पर खासा भरोसा था। यह घटना केतन के मकान में आने के डेढ़ दो साल पहले की है। सिन्धु जी जब शिमला गए तब शांति हुई। उनका बड़ा बेटा भी मिलिटरी में कमीशन पा गया था, बड़ी बेटी की शादी हो गई थी, बचे इस घर में उनकी पत्नी और छोटी बेटी शुभा जो तब बीएससी में पढ़ रही थी।
शाम को दुकान से लौटकर मैं कुछ हल्का नाश्ता कर रहा था कि पत्नी पास आकर खड़ी हो गई, बोली सामने वालों के बच्चे तो बड़े हैं। मैंने कोई उत्सुकता नहीं जाहिर की आगे जानने की तो वह फिर बोली बातचीत भी खूब करते हैं, केतन की तरह चुप्पे नहीं हैं। केतन से अधिकतर लोग इसलिए चिढ़ते थे कि वह बहुत काम बात करता था। उन्हें लगता कि वह घमंडी है, पर जब एक बार उसे अच्छी तरह जान लो तो लगता कि उससे अधिक भोला दूसरा कोई व्यक्ति नहीं है। मुझसे तो दुकान पर केतन की बात हो जाती थी इसलिए मैंने उसे समझ लिया था पर अपनी पत्नी को यह समझाने में पूरी तरह असफल रहा था। इसका एक और कारण था, केतन की पत्नी का स्वभाव भी केतन की ही तरह कम बोलने वाला था और सामान्य औरतों की तरह न गली में खड़़ी होकर आपस में बतियाती न बेमतलब बाहर निकलती थी। केतन के बच्चे भी उन्हीं दोनों की तरह सीधे और चुप्पे थे।
उन दिनों केतन शाम को अक्सर बरामदे में आकर बैठ जाता था। उन लोगों ने वहां बेंत की कुर्सियां डाल रखी थीं। कभी-कभी केतन की पत्नी भी वहां बैठती और बच्चे खेलते रहते। न कोई शोरगुल न झांय-झांय, न ज्यादा बातचीत एक तरफ उन लोगों के इस कदर शांत व्यवहार पर झुंझलाहट होती तो वहीं स्नेह भी उमड़ता। वे लोग न कहीं जाते, न कोई उनके यहां आता ही। कभी-कभी शाम को पास के बाजार और पार्क में टहलकर जल्दी ही वापस आ जाते। सिन्धु जी की पत्नी को अवस्थी जी से पहले ही चिढ़ थी ऊपर से उनके नए किराएदार कुछ इस ढब के थे कि उन्हें निरंतर उन पर गुस्सा आता। वह कहती पता नहीं कैसे-कैसे लोग दुनिया में पाए जाते हैं, लगता है जैसे चिडिय़ाघर से निकलकर आए हैं। न इंसानों की तरह बातचीत, न मेलमिलाप, न दुआ सलाम। हालांकि सिंधु जी की पत्नी स्वयं अत्यंत आत्मकेन्द्रित और शक्की किस्म की महिला थीं। उन्हें खुद अपने दो एक रिश्तेदारों को छोड़कर बाकी मोहल्ले पड़ोस के लोगों से न तो संबंध रखना ही पसंद था न उनके यहां आना-जाना। उन्हें अपने पति की कमीशन लेबल तक तरक्की का भी घमंड था और लड़के के मिलिटरी में कमीशन अफसर बन जाने का भी। दोनों लड़कियां भी अच्छी पढ़ लिख गई थीं, यह भी संतोष की बात थी। बड़ी लड़की का विवाह एक बड़े व्यापारी परिवार में हो गया था सो उन्हें अड़ोसी-पड़ोसी सब बौने नजर आते। केतन उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाता था, वह जवान था, शरीर भरापूरा और सुन्दर, सिंचाई विभाग में ऊंचे पद पर कार्यरत परंतु उसे साधारण रहन-सहन और गैर बनावटी जीवन ही पसंद था, शायद चिढ़ का एक कारण यह भी रहा हो। पर मुख्य कारण थी शुभा जो तब एमएससी फायनल में पहुंच चुकी थी। इन दिनों शुभा की शोखी बढ़ती जा रही थी और उसकी मां की चिंता भी। वह अक्सर कहतीं कि शुभा एमएससी कर ले तो अच्छा घर वर देखकर इसके हाथ पीले कर दें। बड़ी वाली तो एमएससी करके कॉलेज में लेक्चरर हो गई है और उसे घर भी अच्छा मिल गया है। शुभा की जिद थी कि वह एमएससी करके किसी अच्छे कम्पीटीशन में बैठेगी और नौकरी लगने के बाद ही शादी के बारे में सोचेंगी।
सिंधु जी महीने दो महीने में शिमला से घर आते और दो दिन रहकर वापस चले जाते। उन दिनों उनके घर में अच्छी खासी चहल-पहल रहती। यार दोस्त जुटते, पार्टी होती, ड्रिंक्स और अच्छा खाना पीना होता। शुभा भी इतराती घूमती। कभी अपने पिता से लाड़ में कहती क्या पापाजी आपने इतनी भीड़भाड़ और शोर कर रखा है कि मेरी पढ़ाई नहीं हो पाती। पिता कहते पुत्तर एक ही दिन की तो बात है, कल मैं चला जाऊंगा तब खूब पढऩा। यह सुनकर शुभा चुप हो जाती। सिंधु जी चूंकि प्रमोशन पाकर बड़े अफसर बन गए थे सो सिर्फ अपने बराबर के स्टेट्स वाले लोगों से ही दोस्ती रखते बाकी से बस हाय-हैलो कर लेते और इस बात को अपना बड़प्पन समझते। उन्होंने पैसे कमाने और बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं रखी थी। दो-तीन प्लाट खरीद रखे थे, ये मकान जो साढ़े चार हजार वर्ग फुट के प्लाट पर बनवाया था, करीब दस वर्ष पहले, इसका उन्हें काफी गर्व था। उसके बाद उन्होंने एक फिएट कार भी खरीद ली। इस तरह वह उच्च मध्य वर्ग के पायदान पर थे जहां से निम्न मध्य वर्ग से आवश्यक दूरी बनाए रखना अपने महत्व को प्रदर्शित करने के लिए जरूरी होता है। सो सिन्धु जी और उनका परिवार उस मुहल्ले में एक आइलैण्ड की तरह था इसलिए मुहल्ले वालों की भी बहुत अच्छी भावना उनके प्रति नहीं थी। शायद सिन्धु जी को न तो इसकी चिंता ही थी न ही उपेक्षा।
अक्सर शुभा मुहल्ले पड़ोस में किसी के घर नहीं जाती थी, कॉलेज भला और अपना घर भला। ज्यादा हुआ तो शाम को अपनी सहेलियों के यहां हो आई या कभी अपने मामा के यहां जो इसी शहर में रहते थे। पढऩा और शाम को लॉन में मां के साथ बैठना, आजकल यही उसके शौक थे। उस दिन शाम को जब वह किसी काम से हमारे घर आई तो पत्नी ने उसे बड़े प्रेम से बिठाया और गप्पे मारने लगी। बातों-बातों में अवस्थी जी के नए किराएदार के बारे में पत्नी पूछ बैठी कैसे हैं ये लोग? शुभा बोली वो तो पागल है, न किसी से बात करता है न हंसता है, गुमशुम मुंह फुलाए बैठा रहता है गुब्बारे की तरह। मेरी पत्नी को इन बातों में काफी रस आया। आखिर निन्दा रस से अधिक आनंददायी और क्या चीज हो सकती है। दोनों ने मिलकर केतन की निन्दा का भरपूर रसास्वादन किया। मुझे लगता था कि केतन के इस चुप-चुप व्यवहार के प्रति मेरी पत्नी ही कुछ अधिक द्वेष या ईष्र्या रखती थी परंतु तब मुझे लगा कि शुभा केतन के इस व्यवहार के प्रति कहीं अधिक आक्रामक है।
उन दिन शुभा का जन्मदिन था, वह बाइस वर्ष की हो गई थी। शाम को जन्मदिन मनाने के लिए उसने अपनी सहेलियों को बुलवाया था। मां बेटी ने मिलकर उनके खाने-पीने का अच्छा खासा इंतजाम किया था। शाम पांच बजे से ही उसकी सहेलियां आनी शुरू हो गई। शुभा खूब मस्ती में थी, बहुत दिनों बाद नए-नए लकदक कपड़े पहनकर वह चहकती फिर रही थी। आठ-दस सहेलियां जुटी थी। कभी कमरे में कभी बरामदे में और एकाध बार छत पर घेरा बनाकर वे बतियातीं, हंसती और मजे लेतीं। शाम सात बजे के लगभग एकमात्र मेहमान उसके मामा आकर चले गए थे कोई बड़ा सा तोहफा देकर गए थे वह शुभा को। दिल्ली से एक बढिय़ा कीमती सूट भी लाए थे। केक खाया, थोड़ा बहुत नाश्ता किया और शुभा की मां के साथ पन्द्रह बीस मिनट बातें करके वह चले गए। आखिर लड़कियों के साथ क्या बैठें? उनके जाने के बाद संगीत का दौर शुरू हुआ, दो एक लड़कियों ने जो गा सकती थीं, फिल्मी गाने गए फिर टू इन वन पर उन दिनों आए किसी पापुलर गानों का टेप लगा दिया।
केतन उस दिन साइट से थोड़ा लेट लौटा था। जीप अवस्थी जी के घर के सामने रुकी तो उसे पड़ोस के घर में चहल-पहल और गाने सुनाई दिए। उसने ड्रायवर को जाने की इजाजत दी और अपना ब्रीफकेस लेकर जीना चढ़ रहा था तभी लगा कि गाने की आवाज कुछ और तेज हो गई है। वह जीना चढ़कर घर के अंदर घुस गया। थोड़ी देर बाद हाथ-मुंह धोकर, कपड़े बदलकर केतन और उसकी पत्नी बाहर बरामदे में कुर्सियों में आकर बैठ गए। वे अक्सर शाम को बरामदे में बैठकर चाय बीते थे। केतन ने मीरा से पूछा आज पड़ोस में इतनी चहल-पहल और गाने बजाने किसलिए हैं? मीरा ने बताया शायद पड़ोस में जो लड़की है उसका जन्मदिन है। उस वक्त सभी लड़कियां बरामदे और लॉन में इकट्ठी होकर जोर-जोर से बातें कर रही थीं। तभी नौकरानी कोल्डड्रिंक लेकर आई और सभी को एक-एक गिलास थमा दिया। शुभा उन सब लड़कियों में एकदम अलग और बहुत खूबसूरत लग रही थी। केतन को इस बात का यकायक अहसास हुआ कि वह और उसकी पत्नी दोनों कितने अव्यवहारिक हैं कि पड़ोस में एक लड़की जन्मदिन मना रही है और वे उसे ंैहैप्पी बर्थ डे भी नहीं कह पा रहे हैं। उन दिनों की चर्चा तब इस विषय पर केन्द्रित हो गई कि इन लोगों ने भी किसी संबंधी, परिजन या आसपड़ोस के लोगों को नही ंबुलाया था हालांकि दोनों इस बात पर सहमत थे कि छोटे बच्चे तक अपना जन्मदिन अपने साथियों में ही मनाना चाहते हैं फिर यह तो जवान लड़की है और उस पर भी उसके पिता, भाई, बहन सभी बाहर हैं। मीरा ने बताया कि शायद उसके मामा आए थे और कुछ देर रुककर चले गए। पड़ोसियों से तो इनका कोई रफ्त-दफ्त ही नहीं है फिर बात जवान लड़की की है सो क्यों किसी आदमी को बुलाया जाए। मीरा हालांकि घर से बाहर कहीं जाती आती नहीं थी, न ही अड़ोस-पड़ोस या मकान मालिक के घर की महिलाओं से ही ज्यादा बातें करती थी। कभी कभार ही वह लोगों से बोलती बतियाती और स्त्री सुलभ सामान्य व्यवहारिक ज्ञान और जानकारी सिर्फ अंदाज से ही काफी सही हासिल कर लेती थी। केतन और उसके परिवार के बारे में कुछ लड़कियों की उत्सुकता पता चल रही थी शायद शुभा ने उन्हें बताया होगा कि केतन पागल है और थोड़ी उसकी पत्नी भी, या पत्नी घर घुस्सू है वगैरह। इसलिए जब लड़कियां बार-बार पड़ोस के बरामदे की तरफ देखने और इशारा करके हंसने-हंसाने लगीं तो केतन और मीरा वहां से उठ गए।
उस दिन इतवार था, अमूमन चाय-नाश्ता इतवार को दस बजे से पहले नही ंहोता था। केतन सुबह छ बजे ही उठ जाता पर मीरा और बच्चे सात आठ बजे तक उठते थे। उस दिन भी केतन जल्दी जाग गया और दैनिक क्रिया कर्म से निवृत्त होकर बाहर बरामदे में आकर बैठ गया। कुछ देर बाद मीरा भी जाग गई और सुबह की चाय बनाकर उसने केतन को दे दी। चाय पीने के बाद केतन शेव करने के लिए उठा, फिर सोचा क्यों न आज शेव बाहर बैठकर ही कर ली जाए सो उसने पानी, शीशा और शेविंग किट मीरा से बाहर ही मंगा लिए। मीरा घर के काम में लग गई, बच्चों के उठने के बाद नाश्ता बनाना था। केतन जब शेव कर रहा था तो उसने देखा कि शुभा छत पर टहल रही है। थोड़ी देर बाद वह सीधी केतन की सीध में अपने टीवी का अंटीना घुमा रही थी। उसने केतन की ओर देखा, केतन को लगा प्रत्युत्तर में अभिवादन स्वरूप थोड़ा मुस्करा देना चाहिए पर नहीं मुस्करा पाया सोचा कहीं इसका गलत अर्थ न निकाल लिया जाए और व्यर्थ में गलतफहमी पैदा हो जाए। शुभा की बड़ी-बड़ी सुन्दर आखें निश्चित ही बहुत मोहक हैं, केतन मन ही मन उसकी तारीफ किए बिना रह सका। शुभा नीचे चली गई, थोड़ी देर में एक फिल्मी गाने की दो लाइनें जोर से उभरीं दिल है कि मानता नहीं, मुश्किल बड़ी है रस्में मुहब्बत जानता ही नहीं। पुन: गाने को यहीं रोककर रिवाइंड करके वही लाइनें फिर बजी। यही गाना रात को भी बज रहा था। केतन को लगा यह गाना शुभा को ज्यादा प्रिय है पर सिर्फ दो लाइनें ही बजाने का अर्थ उसकी समझ में नहीं आया।
बरसात का मौसम आ गया था, शाम घिर आई थी, बादल छाए हुए थे, अचानक ठंडी-ठंडी हवा बहने लगी। केतन और मीरा बाहर बरामदे में निकल आए। सुहावनी हवा से प्रफुल्लित होकर वे अपनी छोटी बेटी द्वारा एक दिन ऐसी ही किसी सुबह कही गई बात को याद करके खुश होने लगे कि बहुत सुन्दर हवा चल रही है। जब तुतलाते हुए सुन्दर को उसने सुन्दल कहा था तो कितना अच्छा लगा था और इस बात को वे इस सुन्दर मौके पर याद करके आनंदित हो रहे थे। उसी समय एक बेसुरा सा स्वर उभरा जब चली ठंडी हवा, जब उठी काली घटा इसके बाद खेल खत्म। मीरा को मजा आ गया बोली गाना तो मौसम के अनुकूल है। केतन हंसा और बोला लगता है यहां दो ही लाइनें गाने और सुनाने की रवायत है। मीरा बोली इतने दिनों तक तो न कभी सुर फुटा न ताल, अचानक कैसे मौमस बदल गया। केतन ने अपनी रटी रटाई राय दोहराई उम्र का तकाजा है, वैसे अच्छी लड़की है। मीरा ने थोड़ा हंसते हुए भृकुटी चढ़ाई वैसे कैसे अच्छी लड़की है? केतन थोड़ा सहमा फिर बोला तुम भी क्या बात करती हो।
ठीक है तुम बैठो, मैं तो अब खाना बनाने की तैयारी करने चली, बच्चों को भूख लग रही है कहकर मीरा घर के अंदर चली गई।
केतन का मैं बेहद सम्मान करता था, शांत सौम्य और धीर-गंभीर व्यक्ति था वह। अनायास ही उसके प्रति सम्मान का भाव मन में जन्म ले लेता था। मैं जब भी उससे बात करता तो बहुत विनम्रता और नर्म लहजे में बात करता जैसे कि वह मुझसे वर्षों छोटा हो। दो-चार वर्ष छोटा रहा भी होगा परन्तु मैंने जब भी उसे किसी और से भी बात करते देखा तो उसी अंदाज में। उसके बात करने में जो भोलापन और मासूमियत थी वह उसके धीर गंभीर और चुपचुप रहने वाले गर्वीले स्वभाव से मेल नहीं खाती थी। आज फिर मेरी पत्नी ने केतन के लिए निन्दा राग छेड़ दिया। मुझे अचानक समझ में नहीं आया कि क्या हुआ पर जब पत्नी बोली कि शुभा आई थी तो मैं समझ गया कि पत्नी के दुराग्रह को शुभा से कुछ और बल मिला है। मैंने पूछा किस काम से आई थी वह? उस दिन ओवन ले गई थी, उसे लौटाने आई थी।
मैंने आगे पूछा क्या कह रही थी? नहीं कुछ खास नहीं, बस यूं ही घर द्वार की बातें, अपनी मम्मी और अपने बर्थ-डे के बारे में। हां वह बोल रही थी कि मम्मी ने ही कहा था कि तू अपनी सहेलियां भर बुला ले, बाकी लोगों को क्या बुलाना।
अच्छा और क्या कह रही थी मैंने उत्सुकता जताई। कह रही थी कि उनके अपने पड़ोसी अवस्थी जी से अच्छे संबंध हैं नहीं, और जो नए किराएदार आए हैं उनके तो भाव ही नहीं मिलते, बड़े घमंडी हैं। और शुभा की मम्मी कह रही थीं कि बदतमीज भी हैं, ऊपर बरामदे में बैठ जाते हैं। मुझे बहुत गुस्सा आया अपनी पत्नी पर, मैंने कहा इसमें बदतमीजी की क्या बात है? बरामदे में बैठते हैं तो अपने बरामदे में बैठते हैं किसी और के बरामदे में तो नहीं बैठते। और क्या बदतमीजी करते हैं यहां बैठकर? किसके साथ बदतमीजी की उन्होंने, शुभा की मम्मी के साथ या शुभा के साथ? पत्नी मेरे तेवर देकर सहम गई और बोली मैंने कहां कहा, वह तो शुभा ही कह रही थी कि उसकी मम्मी कहती है। उनकी तो किसी के भी बारे में कुछ भी कहने की आदत है। यह बात तो सारे मोहल्ले वाले जानते हैं। शुभा कह रही थी उसकी मम्मी को केतन का बाहर बैठना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता।
वो तो बोलती हैं, केतन शरीफ आदमी है, बीवी बच्चों वाला। क्या तुम्हें ऐसा लगता है या शुभा कुछ बता रही थी। मैंने पूछा।
वह बोली नहीं ऐसा नहीं लगता, शुभा तो उसके मजे ले रही थी, नकल उतार रही थी कि कैसे चलता है, कैसे देखता है, कैसे बोलता है और कह रही थी कि शायद अपनी बीवी से बहुत डरता है।
केतन उस दिन जब घर की बाउंड्री के अंदर दाखिल हुआ तो उसे शुभा ड्राइंगरूम से निकल कर बरामदे से आती हुई दिखाई दी। दिनभर की थकान और किचकिच के बाद उसे यह एक अच्छा चेंज लगा। केतन सीधा सीढिय़ां चढ़कर अपने घर में घुस गया और शुभा अपने लॉन में गार्डन चेयर पर बैठ गई, केतन के छज्जे की ओर मुंह रखे। आज उसकी मम्मी उसके पास नहीं थी, वह बस चुपचाप बैठी थी। केतन उस दिन काफी देर तक बाहर छज्जे में आकर नहीं बैठा और जब वह बाहर आया तो अंधेरा घिर गया था। शुभा उठकर घर के भीतर चली गई थी। तभी कैसेट प्लेयर पर जोर से गाने की वही दो लाइनें बजीं दिल है कि मानता ही नहीं, मुश्किल है बड़ी रस्में मुहब्बत जानता ही नहीं और फिर बंद हो गई।
यद्यपि एक लम्बे समय के दौरान शुभा हमारे घर दो बार ही आई थी। एक बार ओवन मांगने और दूसरी बार वापस करने, पर न जाने क्यों मेरी पत्नी उसमें कुछ सूंघ पा रही थी। वह शुभा की तो तारीफ करती थी और उसे अच्छी लड़की होने की सनद भी दे रही थी और केतन को अच्छा आदमी मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। मैंने पूछा कहीं यह तुम्हारी ईष्र्या तो नहीं है केतन के प्रति क्योंकि वह और लोगों जैसे एवरेज आदमी नहीं है, उसमें कुछ खास हैं, पत्नी चिढ़ी और बोली क्या खास है, कहीं का राजा नवाब है? देखने सुनने में भी कुछ खास नहीं, हां न$खरे जरूर स्टार वाले हैं। मैंने कहा तो यही तुम्हारी ईष्र्या का कारण है? वह बोली नहीं वह अच्छा आदमी नहीं है। मैंने पूछा उसने तुम्हारे साथ क्या कोई बदतमीजी की है। वह तैश में आकर बोली- क्या बात करते हो, मेरे साथ बदतमीजी करेगा तो उसका मुंह नहीं नोंच लूंगी। तो फिर तुम उससे क्यों चिढ़ती हो? क्या तुम्हें शुभा ने कुछ कहा? अब पत्नी ढीली पड़ गई, बोली नहीं शुभा ने तो कुछ नहीं कहा, पर मुझे ऐसा लगता है कि वह शुभा के प्रति आकर्षित है। ऐसा तुम कैसे कह सकती हो? वह जितनी देर बरामदे में बैठा रहता है और टहलता है, शुभा भी बगीचे में होती है तो केतन का क्या है? और फिर तुमने दुनिया भर का ठेका ले रखा है क्या? शुभा और उसकी मम्मी से ही तुम्हारा ऐसा क्या संबंध है। शुभा ऐसी भी नासमझ नहीं है, एमएससी फायनल में है। पत्नी चुप हो गई थी पर उसकी आंखों में संशय, किसी अप्रत्याशित घटना की आशंका भरी छाया नजर आ रही थी।
उसी दिन शाम को दुकान पर मुझे केतन मिल गया। वह अपने छोटे बेटे को घुमा रहा था और अपने चश्मे के फ्रेम में कील डलवाने दुकान पर आ गया था। मैंने पूछा केतन बाबू आजकल साइट पर कुछ ज्यादा काम है क्या, काफी देर से आते हैं।
वह बोला नहीं काम तो कुछ ज्यादा नहीं है, हां साइट थोड़ी दूर जरूर है। अचानक न जाने क्यों मेरे मुंह से निकला ये मकान आपको छोटा नहीं ंलगता? इसी मोहल्ले में मेरे दोस्त का एक अच्छा प्लैट है, आप चाहे तो देख लें। केतन थोड़ा असमंजस में पड़ गया, बोला अभी तो यहां आया हूं बार-बार शिफ्ट करने में दिक्कत होती है। मैं चुप हो गया पर  मुझे लगा जैसे मैं अपनी पत्नी के प्रभाव में आता जा रहा हूं। मैंने उसके चश्मे में कील लगा दी और वह पैसे देकर चला गया।
केतन की दिनचर्या में अब अनचाहे ही मेरी भी एक रहस्यमयी रुचि पैदा हो गई थी। यद्यपि इसका पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता था। अब सुबह शाम मेरी निगाहें अपने आप केतन के बरामदे पर टिकती जाती। अब उठ-उठकर टहलता भी है। मैं फिर सोचता कि यह मेरा भ्रम भी हो सकता है। मैं तो सुबह जल्दी दुकान के लिए निकल जाता हूं और शाम को भी देर से आता हूं, तब मैं कैसे यह कह सकता हूं। मेरे मन में धीरे-धीरे एक अंतद्र्वंद छिड़ा रहने लगा। कभी लगता, हां कुछ गड़बड़ तो है, कभी लगता अब बकवास है। कुछ तय कर पाना मुश्किल ही था। पत्नी ने अब थोड़ा संयम धारण कर लिया था और इस मामले में ज्यादा रुचि लेना बंद कर दिया था। हां अब वह केतन के प्रति उतनी आक्रामक तो नहीं रही थी पर शुभा के लिए उसके मन में जो सहजता थी वह धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। वह कहती शुभा लॉन में तभी पानी देती है जब केतन बरामदे में खड़ा होता है, या शुभा भी तब तक बाहर बैठी रहती है जब तक केतन बाहर रहता है। इन दिनों एक और गतिविधि ऐसी थी कि मैं और मेरी पत्नी गौर किए बिना नहीं रह पाते थे। सुबह कॉलेज जाने के समय शुभा और शुभा की मोपेड कुछ ज्यादा ही शोर करने लगे थे। अपनी मां से जोर-जोर से कुछ बतियाना, फिर मोपेड को देर तक स्टार्ट रखना, दो एक बार हार्न भी चेक करना, नियमित क्रिया हो गई थी। और मजेदार बात यह होती कि इसी वक्त केतन अपना शेविंग का सामान लेकर बाहर बरामदे में आ बैठता। शुभा मोपेड निकालती, बाहर वाला गेट बंद करती और एक बार बरामदे की तरफ निगाह फेंकती, केतन भी उस वक्त बाउंड्री गेट की ही तरफ देख रहा होता। हम पति-पत्नी ने इस बात को दो-तीन बार कुछ रस लेकर, कुछ अनमनी सी बहस की और अंतत: यह पाया कि इसमें कुछ भी विशेष बात नहीं है, इसे सहज ही लेना चाहिए क्योंकि ऐसी तमाम स्थितियों में केतन की पत्नी भी वहां अक्सर मौजूद होती थी।  मैं और मेरी पत्नी दोनों ने अनकहे ही, मन ही मन यह निर्णय लिया कि केतन और शुभा को लेकर अब अधिक उत्सुकता न पाली जाए। इस मामले की यथासंभव उपेक्षा की जाए क्योंकि और भी काम हैं दुनिया में मोहब्बत की जासूसी के सिवा। इस अनकहे निर्णय पर हम लोगों ने अमल करना शुरू कर दिया और बेवजह की परोक्ष दखलंदाजी से हमने अपने हाथ खींच लिए। अब हमें न केतन में कोई बुराई दिखाई देती, न शुभा में। बल्कि वे दोनों अपनी दुनिया में कहीं अधिक मस्त दिखते। केतन सुबह-सुबह घूमने जाता, लौटकर अपने पामेरियन कुत्ते को टहलाता, शेव करता, बाल्कनी में टहलता, फिर नहाता धोता, नाश्ता करके ऑफिस चला जाता। शुभा सबेरे सात साढ़े बजे तैयार होकर निकलती, चहकती, मोपेड स्टार्ट कर कुछ देर तक घर्र-घर्र करती, हार्न बजाती, गेट बंद करती, एक निगाह केतन की बाल्कनी में फेंकती, कॉलेज चली जाती। वह दोपहर में दो ढाई बजे कॉलेज से वापस लौटती, आराम करती, पढ़ती-लिखती और शाम को छह साढ़े बजे लॉन में आकर बैठ जाती, टहलती, पेड़-पौधों में पानी देती, अपनी मां से बातें करती। केतन की जीप अक्सर सात साढ़े सात के बीच आकर रुकती। वह ब्रीफकेस उठाता, ड्रायवर से जाने को कहता, एक नजर अपनी बाल्कनी पर फेंकता, फिर धीरे से पड़ोस के लॉन में, और धड़धड़ाता हुआ जीना चढ़ जाता। कुछ देर बात पति-पत्नी बरामदे में बैठकर चाय पीते दिखाई देते। इस बीच शुभा एक दिन किसी काम से फिर हमारे घर आई। पत्नी ने देर तक उससे बातें की, वह खुश थी। उसके जाने के बाद वह बोली कितनी सोहणी कुड़ी है। मुझे भी अच्छा लगा, दरअसल अब तक हम दोनों केतन और शुभा के बारे में उन्हें एक-दूसरे से जोड़कर कोई बात करने में झिझकने लगे थे। हमें लगता था कि शायद हम ही कहीं गलत थे। उस दिन अचानक मैंने पत्नी से पूछ लिया क्या केतन के बारे में कुछ नहीं कह रही थी शुभा, फिर धीरे से मैंने बात को संभाला, अब उसकी मम्मी क्या कहती हैं। पत्नी बहुत सहज थी जैसे उसे अंदाजा था कि यह सवाल पूछा ही जाएगा। वह बड़े फिलॉसफाना अंदाज में बोली पता नहीं हमारे समाज में क्या गड़बड़ है कि एक जवान लड़की और किसी जवान आदमी को आसपास भी देख लें तो शक करने लगेंगे। शुभा कॉलेज जाती हैं, लौटकर पढ़ाई करती है, सुबह शाम फ्रेश होने के लिए लॉन में टहलती है, मन बहलाती है। वह कह रही थी कि केतन तो चुप्पा और घमण्डी है पर उसकी पत्नी बहुत अच्छी है। केतन बीवी बच्चों वाला है, अब एकदम छड़ा तो है नहीं कि लफंगई पर उतर आए, फिर अच्छी नौकरी करता है। थोड़ी बहुत दिल्लगी करता होगा आखिर शुभा खूबसूरत तो है ही। पत्नी की बात सुनकर मुझे अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी हुआ कि यह वही औरत है जो कुछ दिनों पहले तक केतन को छटा हुआ बदमाश मान रही थी। खैर हमने यह स्वीकार कर लिया कि कहीं कुछ ऐसा वैसा नहीं है, वह महज हमारा संशयी स्वभाव था जिसके कारण हमें ऐसा भ्रम हुआ था।