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Tuesday 21 Nov 2017

गृहस्थी


राजेंद्र परदेसी
बी-1118, इंदिरा नगर
लखनऊ-226015 (उ.प्र.)
कितनी भी जल्दी की जाय, आफिस पहुंचने में देर हो ही जाती है। घर से यदि जल्दी निकला जाए तो बस की प्रतीक्षा में समय बीत जाता है। ऑफिस नजदीक होता तो यह परेशानी न होती। पैदल ही चला जाता। लेकिन रोज-रोज दस किलोमीटर की पैदल यात्रा की जहमत उठाई भी तो नहीं जा सकती। पांच किलोमीटर इधर से तो पांच किलोमीटर उधर से। एक पुरानी साइकिल है। वह भी दो महीने से खराब पड़ी है। ढाई-तीन सौ रुपए हों तो कहीं जाकर दोनों टायर-ट्यूब बदले जाएं। बड़ी मुश्किल से तो घर का खर्चा चलता है। कितना भी करो किसी न किसी का उधार चढ़ा रहता है। साल में जब एक बार बोनस मिलता है तो सोचता हूं कोई ची•ा ले लूं। लेकिन पुराने कर्जे सिर पर चढ़े मिलते हैं। अब तो सोचना ही छोड़ दिया है। सोचने से तो कुछ बनता है नहीं, दिमाग अलग खराब होता है।
इस बार बोनस मिला तो सोचा था कि गरम सूट नहीं तो कम से कम एक कोट ही सिलवा लूं। रहा पैंट तो सूती से ही काम चला लूंगा। ससुराल से साले-सालियां जीजाजी से मिलने चले आए। मन मसोस के स्वागत करना ही पड़ा। कोट सिलवाने का विचार भी स्थगित करना पड़ा। अब तो पता नहीं क्यों, रिश्तेदार के आ धमकने पर मुझे बुखार आ जाता है।
लगता है, आज भी देरी हो जाएगी। साढ़े नौ तो घर पर ही बज गए। श्रीमती जी हैं कि जब भी कहीं चलने की तैयारी करो, कोई-न-कोई समस्या लेकर प्रस्तुत हो जाती हैं।
'ऑफिस जा रहे हो क्या?Ó तैयार होते देखकर पत्नी ने पूछा।
'क्यों क्या बात है?Ó
'शाम के लिए कुछ नहीं है।Ó
'तो क्या? इस समय बताना था। पहले नहीं बता सकती थी।Ó पत्नी पर गुस्सा आ रहा था। इसलिए गुस्से के लहजे में कहा, 'तुम्हारी तो आदत हो गई है, जब चलने लगो तो अपनी रोनी सूरत लेकर खड़ी हो जाती हो।Ó
स्वाभाविक था,  पत्नी को भी गुस्सा आ गया। बोली, 'तो महीने भर का सामान इकट्ठे ला क्यों नहीं देते। झगड़ा खत्म हो जाए।Ó
'झगड़ा तो जिंदगी भर नहीं खत्म हो सकता। कितना भी ला दूं तुम्हें पूरा ही नहीं पड़ता।Ó अपनी असमर्थता को छुपाने के लिए मैं बोला।
मैं तो समस्या से मुंह मोड़ सकता था। लेकिन पत्नी कैसे मोड़ती। समस्या से उसे ही जूझना ही था। बोली, 'तो क्या मैं खा जाती हूं।Ó
'खा नहीं जाती हो। मेरा मतलब हिसाब से खर्च करना चाहिए।Ó
'हिसाब से कैसे खर्च किया करूं? पहले कवि मित्रों से पूरा पड़े ना। फिर बाकी का सोचूं।Ó अपनी खीझ उतारते हुए पत्नी ने जवाब दिया।
'तुम्हारे भाई-बहन आते हैं तो कुछ नहीं। मेरे दो-चार मित्र आ जाते हैं, तो सारा खर्चा हो जाता है।Ó
'एक बार खुद ही खर्च कर क्यों नहीं देख लेते? मैं हूं जो तुम्हारी गृहस्थी घसीट रही हूं। दूसरी होती तो पता चलता।Ó कहकर वह रोने लगी।
पराजित होते देखकर मैं बोला, 'अच्छा देखो, कहीं से प्रबंध करूंगा।Ó
'कहां से करोगे, अभी तो तनख़्वाह मिलने में चार दिन बाकी हैं।Ó
'तो लाला के यहां से उधार सामान मंगा क्यों नही ंलेतीं?Ó
'पप्पू को भेजा नहीं था क्या?Ó
'तो क्या कहा उसने?Ó
'कहा कि आटा नहीं है। शायद शाम तक आ जाए।Ó
'तो शाम तक उसके यहां आ ही जाएगा। फिर भेजकर मंगा लेना।Ó
'वह उधार नहीं देगा।Ó
'क्यों?Ó
'पप्पू कह रहा था कि उसके सामने दूसरे ग्राहक को आटा दिया मगर जब उसने मांगा तो कह दिया कि खत्म हो गया।Ó 'पिछले महीने का पैसा बाकी है न! इसलिए ऐसा कहा होगा। साला! बहुत काइयां है। सोचता होगा कि और ले जाएंगे तो पता नहीं कब देंगे।Ó
'उसका आज तक कभी बाकी रहा भी है कि इस बार रहेगा। अधिक-से-अधिक यही तो होता है कि इस महीने का उस महीने अदा कर दिया जाता है। इसी महीने नहीं दिया गया है।Ó कुछ क्षण रुककर पुन: बोली, 'अगर बहन गुडिय़ा और पप्पू दोनों न आते तो इस महीने भी दे दिया जाता। वे बेचारे पहले-पहले आए थे। कुछ न देती तो क्या सोचते!Ó
ऑफिस जाने को देरी हो रही थी। इसलिए बोला, 'छोड़ो इन बातों को ऑफिस में ही किसी से मांग लूंगा।Ó
'किससे मांगोगे?Ó
'वर्मा से कहूंगा, अभी अकेला है। खर्च भी उसके कम हैं। अपने पास कुछ-न-कुछ रखता जरूर है।Ó
'उससे भी तो पिछले महीने पचास रुपए लिए थे। अभी दिया कि नहीं।Ó अपनी जानकारी देते हुए पत्नी बोली।
'दिया होता तो क्या तुम्हें मालूम न होता।Ó
'न हो तो तुम्हीं किसी पड़ोसन से मांग लो। पहली को दे देना।Ó
'किससे मांगू। सभी के यहां तो यही हाल है। एक मिसेज श्रीवास्तव हैं। उनके पास जाओ तो पहले घंटो बैठाएंगी। फिर कहेंगी कि क्या बताऊं मिसेज पांडेय, आपने कल बताया होता तो जरूर व्यवस्था कर देती। हमें क्या मालूम था कि आपको पैसे की जरूरत है। नहीं तो साड़ी अगले महीने खरीदती। कल मार्केट गई थी तो एक साड़ी पसंद आ गई पास में पैसे थे, खरीद लिया।Ó कुछ पलों की खामोशी के बाद पत्नी बोली, 'कहो तो एक बार फिर जाकर उनका भाषण सुन जाऊं।Ó 'रहने दो। रतनलाल से मांग लूंगा।Ó
'वह भी तो कौन मिसेज श्रीवास्तव से कम हैं।Ó
'तुम्हें कैसे मालूम।Ó
'तुम्हीं तो कहते हो कि जब भी उससे कोई चीज मांगो, कोई-न-कोई बहाना बना देता है। खुद बताते हो खुद ही भूल जाते हो। मैं तो कभी नहीं भूलती।Ó अपनी याददाश्त की प्रशंसा करते हुए पत्नी ने कहा।  'एक चिन्ता हो तो बात भी है। यहां तो ऑफिस से लेकर घर तक चिन्ताओं का सिलसिला लगा रहता है।Ó
'तो क्या समझते हो कि तुम्हें ही सारी चिंता रहती है। मुझे नहीं रहती। दिनभर काम करते-करते पस्त हो जाती हूं। रात को लेटती हूं तो सारा बदन टूटता है।Ó
'महरिन क्यों नहीं लगा लेगी। कुछ तो बोझ हल्का होगा। बिना मतलब के ही तो परेशान होती हो।Ó सहानुभूति जताने के लिए मैं बोला। लेकिन पत्नी ने दूसरा ही अर्थ लगा लिया। बोली, 'लगा क्यों नहीं देते। कौन मना करता है।Ó फिर अपने मन की पीड़ा को उड़ेला, ''इतने साल हो गये। अपने मन से कभी कोई सामान लाकर दिया? कब से कह रही हूं कि एक पिक्चर दिखा दो। बस यही जवाब सुनती हूं कि सैकड़ों रुपए खर्च हो जाएंगे।... तुम्हें तो पत्नी नहीं, नौकरानी की जरूरत थी।ÓÓ
वातावरण काफी विषाक्त होता जा रहा था और घड़ी की सुईयां बढ़ती जा रही थी। इस कारण मैंने समय से समझौता करते हुए कहा, 'ऑफिस से लौट आने दो। कोई न कोई प्रबंध करूंगा।Ó दिनभर ऑफिस के काम में मन नहीं लगा। सामने टेबुल पर सिर्फ फाइल खोलकर बैठा रहा जिससे कोई देखे तो समझे कि काम कर रहा हूं। ऐसी ही मन:स्थितियां दूसरों की भी होती होंगी। काम हो तो कैसे हो।
आज ऑफिस से पैदल ही चल पड़ा। सोचा, एक ओर का बस-किराया ही बचेगा। गृहस्थी के किसी काम आएगा।  लौटने में देर होनी थी, हुई। इसीलिए जब घर पहुंचा तो देखा कि पत्नी दरवाजे पर ही खड़ी है। देखते ही पूछा- 'आज देर क्यों लगा दी?Ó
'पैदल आया हूं।Ó
'क्यों? बस के लिए पैसे नहीं थे क्या? फिर सोचकर बोलीं, ''आपके पैंट की जेब में पांच का एक सिक्का रख तो दिया था। नहीं मिला क्या?Ó मैंने सच्चाई छिपाते हुए कहा, 'ऑफिस से सुंदरलाल जी से बातचीत करते हुए उनके घर तक आ गया था तो सोचा आधा फासला तय हो ही गया है, क्यों न पैदल ही चलूं। बस पैदल चला आया।Ó
'इतनी दूर तो कभी पैदल चले नहीं। थक गए होंगे। चलिए मुंह हाथ धोकर फ्रेश हो लीजिए तब तक मैं चाय लाती हूं।Ó\ गांव छोड़े तीस बरस हो गए। तब से आज तक वास्तव में कभी इतनी दूर पैदल नहीं चला था। वह भी इस उम्र में। पहले की बात दूसरी थी। गांव से शहर तक पैदल ही चला जाता था। अब तो दस कदम भी चलना पड़ता है तो थकावट आ जाती है। ...ता$कत भी कहां से आये?... यहां गांव की तरह न तो दूध न घी। ले-देकर मक्खन निकाले दूध की चाय यों कहिए गरम पानी। ...उसके सहारे अपना शरीर ढोता रहूं, यही बहुत है।
थकावट के कारण आज की चाय कुछ ज्यादा ही अच्छी लगी। साथ में पकौड़ी भी लजीज लगी।
आदमी को जब आराम मिलता है तो इधर-उधर की सोचने लगता है। अन्यथा अपने में ही इतना मशगूल रहता है कि दूसरों के बारे में सोचने की उसे फुरसत ही नहीं रहती।  कुछ आराम मिला तो पत्नी को आवाज दी, 'गोपाल की मां! जरा सुनो तो।Ó
'क्या है?... और चाय लीजिएगा क्या?Ó पत्नी ने चौके में बैठे ही बैठे सवाल उछाल दिया।
'नहीं, एक बात पूछनी है।Ó
'अभी आई।Ó
वह आई तो पूछा, 'पैसे कहां से लाई?Ó
'मिसेज वर्मा से मांगा था। उन्होंने मना कर दिया तो फिर किसी से नहीं मांगा। सोचा, किसी से मांगना क्या है। इसीलिए तुम्हारी जो पुरानी पत्रिकाएं और कागज थे उन्हें बेच दिया। बीस किलो थे। पांच रुपए हिसाब से सौ रुपए मिले।Ó इस दास्तान को सुनकर सिर पर हाथ रखकर बैठ गया। वर्षों की मेहनत से एकत्र सामग्री सौ रुपए में बिक गई थी। मैं चिंता में गहरे समा रहा था कि पत्नी बोल पड़ी, 'सोच क्या रहे हो। उसे कोई पूछता भी था? कितनों को तुम दिखा चुके थे। कोई उसे छापने को तैयार नहीं, अच्छा हुआ कि रद्दीवाले ने उसे सौ रुपए दे दिया इस महीने कोई कर्ज नहीं चढ़ा। नहीं तो पता नहीं...।Ó एक उच्छवास भरकर मैंने कहा- क्या अच्छा हुआ।... इतने दिनों की मेहनत ने इस कर्ज को बढऩे से बचा लिया।