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Saturday 18 Nov 2017

शायद तुम उसे चाहने लगे थे..

रमेश शर्मा
गायत्री मंदिर के निकट, मालीपारा
बोईरदादर, रायगढ़ (छ.ग.)
फोन- 07762-223536
एक छोटा सा गांव... कुछ न होते भी सब कुछ होने का एहसास होता हो जहां! सुविधाओं का अभाव झेलते हुए भी खिलखिलाहटों से भरा हुआ। यहां आए छ: माह ही हुए थे मुझे, पर यहां की आबोहवा में जैसे मेरा सारा अतीत घुल चुका था... लगता ही नहीं कि मैंने अपना बचपन यहां नहीं बिताया। सब कुछ वैसा ही था मेरे गांव की तरह... लोग अपने से, यहां की संकरी-संकरी गलियां अपनी सी, चारों तरफ बहती नदियों को देखकर बचपन में साथ नहाये मित्र याद आने लगते थे जिनकी स्मृतियों पर धीरे-धीरे अब यह गांव पसरने लगा था। स्मृतियों में धुंधला चुका मेरे गांव का वह बूढ़ा पहाड़ भी यहां आने के बाद फिर से दिख पड़ा था हरेपन का लिबास ओढ़े, जिसके उस पार कस्बे की दुनिया से यह गांव जुड़ता था। इसी पहाड़ी से होकर ही कस्बे का एकमात्र रास्ता खुलता था जहां उस पार के हाट बाजारों से लोगों की जरूरतें पूरी होती थीं। यहीं से होकर ही गांव के लड़के-लड़कियां हाईस्कूल की शिक्षा ग्रहण करने पहाड़ी के उस पार तलहटी पर स्थित स्कूल को जाते थे। झुण्ड पर झुण्ड पहाड़ पर चढ़ती लड़कियों को देखकर मन नाचने लगता, रोज का यह दृश्य यहां आने के बाद जीवन का हिस्सा बन चुका था। मुझे एक मिशन के तहत यहां भेजा गया था और सख्त हिदायत दी गई थी कि मैं पूरी तरह गोपनीयता बरतते हुए अपना मिशन पूरा करूं। राज्य सरकार और हमारी कंपनी के मध्य एम.ओ.यू. पर जो हस्ताक्षर हुए थे उसकी सूचना किसी को नहीं दी गई थी। मैं कंपनी की ओर से यहां बनने वाले बांध का प्रोजेक्ट ऑफिसर नियुक्त हुआ था लोगों को अगर पता चल जाता कि मैं बांध के लिए परियोजना पर सर्वे रिपोर्ट तैयार करने आया हूं तो उन पर खून सवार हो सकता था। वे अर्से से ऐसी किसी आशंका से भयभीत तो थे ही, क्योंकि ऐसी अफवाहें पहले भी यहां अक्सर उड़कर आया करती थीं। मैं ग्रामीण परिवेश में पला बढ़ा था, ग्रामीणों के भीतर जगह बनाने में मुझे आसानी हुई, फिर भी सावधानी बरतनी थी। षड्यंत्र... षड्यंत्र की तरह न लगे इसलिए कंपनी की ओर से रंग बदलने के सभी तरीके मुझे सिखाए थे। मेरे सामने दो ही रास्ते थे, पहला वह था जहां लेम्प पोस्ट की तरह रंग-बिरंगे सपनों की तख्तियां लिए लुभाते खड़े कुछ कार्पोरेट वर्ग के लोग आकर्षित कर रहे थे। दूसरा रास्ता वह था जिस पर मैं चलकर आया था... सब लोग चलकर आ रहे थे।
''मि. सुधाकरण! किसी भी तरह तुम्हें इस प्रोजेक्ट रिपोर्ट को तैयार करना है। उन बेवकूफों को लगे कि उनकी किस्मत तुम्हारे हाथों गढ़ी जानी है, तुम्हारा हर झूठ उन तक सच की तरह पहुंचे।ÓÓ चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर की बातों से ज्यादा उसका चेहरा मुझे याद आ रहा था जहां से हमेशा एक किस्म की कमीनगी झरकर उसके चेहरे को और उजला कर जाती।
उसका चेहरा फिर मेरे सामने आ गया और एक क्रूर शिल्पकार की जगह लेते हुए मैंने पहले रास्ते पर चल पडऩे का दृढ़ निश्चय कर लिया।
एकाएक मन के भीतर उग आए विषैले पंखों से उड़ान भरकर आसमान छू लेने की कहानी अब मुझे ही लिखनी थी जिसका एक पात्र मैं स्वयं था। शब्द मेरे थे, लिखने वाला भी  मैं ही... कथापात्रों की तरह उन ग्रामीणों से खेलना भी मैं सीख गया। अब तक वे समझते रहे कि मुझे किसी एनजीओ द्वारा गांव तथा कस्बे को व्यवस्थित ढंग से जोडऩे के लिए पहाड़ी को काटकर किसी संभावित रास्ते के निर्माण पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने के लिए भेजा गया है। कुछ झूठे ग्राफ भी मैंने लोगों को दिखाए थे और उन्होंने बड़ी सहजता से इसे स्वीकार कर मेरी उड़ान तेज कर दी थी।
एक देश का जासूस जिस तरह दूसरे देश में जाकर अपने काम को अंजाम देता है, मेरी दिनचर्या भी ऐसी ही हो गई थी। मैं जहां था वहां गुलाबो और उसकी मां का एक छोटा परिवार भी था, कभी कभार मेरी जरूरतें मुझे उन तक ले जाया करती थीं, पर अचानक चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर की बातें मेलजोल बढ़ाने में दीवार की तरह आ खड़ी होती...
''प्रेम!.. मोहब्बत!...भाईचारा! ये बातें कार्पोरेट वर्ग की डिक्शनरी में कहीं नहीं है सुधाकरण!... दैट्स आर ह्यूमन वीकनेस! कभी यह बात मन को विचलित करे कि यह गांव भी हरसूद की तरह डूब जाएगा तो मेरी बातें याद कर लेना।ÓÓ
प्रशिक्षण में बताई गई सारी बातें मुझे अपनी हदों से निकलने की इजाजत नहीं देती थी... पर आज गुलाबों से बात करके पहली बार एहसास हो रहा था कि मिशन के बाहर भी एक दुनिया है जहां दुख-सुख का एक साझापन है। प्रेम, मोहब्बत, भाईचारे के दरवाजों से होकर जीवन के रास्ते खुलते हैं जहां!.... अचानक मुझे लगा जैसे इन रास्तों को बंद करने आया हंू मैं... आया हूं दगा देने उनको जिन्होंने सम्हलना भी अभी सीखा नहीं है। सामने गुलाबो का चेहरा बार-बार आता था, पर दुख-सुख के उस साझेपन से अपने को दूर रखना ही मैंने बेहतर समझा।
दशहरे का मेला पास था। पहाड़ी के उस पार लगने वाला मेले की चमक सबके चेहरे पर देखी जा सकती थी, पर गुलाबो...! उसे देखकर ऐसा लगता ही नहीं था कि उस पार की रौनक से उसे कुछ लेना-देना हो, देखो तो पहाड़ की तरह ही लगता था उसका चेहरा! उस पार क्या था मैं आज तक जान नहीं सका था।
उस दिन बहुत देर तक बैठी रही गुलाबो आइने के सामने! पीछे पहाड़ था जिसका चित्र आइने पर बन रहा था। लगता था जैसे दोनों आपस में बातें कर रहे हैं। खिड़की के उस पार मैं देखता रहा एकटक उसे!... लगा जैसे अपनी हदों से पहली बार आगे निकला हूं, कानों को कुछ सुनने की इच्छा हो रही थी पर उसने कुछ कहा ही नहीं... बुत बनी बैठी रही... वह बोलती ही कब है? कहीं कुछ अटक गया हो जैसे!
हंसने खेलने वाली आम लड़कियों से कहीं अलग ऽऽ... लगने लगी थी गुलाबो मुझे! मेरी भीतरी दुनिया में क्या इस तरह कोई देहाती लड़की भी जगह ढूंढ लेगी...? कुछ अजीब सा लगा और मुझे उस दिन की घटना याद आ गई जब यहां आने के पूर्व हम सभी शहर के मशहूर होटल के कैसिनो को बुक कराकर पार्टी का आनंद ले रहे थे। बार बालाओं का अंग्रेजी रैम्प पर झूमना सबको मदहोश कर रहा था। हमारी कम्पनी के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर मि.घोष, उनकी पत्नी शेफाली,जिले के कलेक्टर मि.मेहता, उनकी पत्नी काजल तथा पर्यावरण अधिकारी मि. कश्यप और उनकी युवा पत्नी लारा के आग्रह पर मैंने भी दो पैग चढ़ा लिए थे।... पहली बार लगा था कि संभ्रांत लोगों की दुनिया में कदम रखते ही मैं कितना आगे निकल सकता हूं। चढ़ती रात के साथ भीतर का नशा कुछ और चढ़ रहा था और देखते ही देखते मि. घोष, मिसेस मेहता की बांहों में बाहें डाले इस तरह झूमने लगे थे कि जैसे वे एक दूसरे के निकट आने के आदी रहे हों... उन्हें देखकर मिसेस लारा कश्यप भी मुझसे लिपट गई। ऊपर की सीढिय़ों पर अभी-अभी पांव रखे थे मैंने इसलिए थोड़ी देर के लिए झिझक गया पर मि. कश्यप को मिसेस शेफाली घोष के साथ सारी हदें पार करते देखा मैं निश्ंिचत हो गया। पोनीटेल की शक्ल में कटे बाल, चौबीस-पच्चीस की उम्र... संगमरमरी देह और गले में चमकता हीरों का हार! स्त्री देह से यह मेरा पहला साक्षात्कार था, उस पर तेज परफ्यूम मुझे अपनी हदें पार करने को मजबूर कर रहा था। उस रात देह ने देह की पहचान कर ली थी पर मन अचिन्हा रह गया था।
आज पहली बार लगा जैसे किसी देहाती लड़की ने मन के भीतर जगह ढूंढने की कोशिश की हो पर एकाएक मि. घोष की बातें हथौड़े की तरह मेरे मन मस्तिष्क को आघात पहुंचाने लगी थीं। मेरे भीतर का द्वंद्व मिशन की बात आते ही छंट चुका था। दिनभर फील्ड में जाकर मैंने जो जानकारियां इकट्ठी की थीं, उसे रिपोर्ट की शक्ल देने में मैं जुट गया।
मैं यहां जिस मिशन को लेकर आया था वह लगभग पूरा होने को था।
''अब कुछ दिनों बाद यह एक किताब की शक्ल में सामने होगा। कम्पनी की ओर से मुझे प्रमोशन भी मिल जाएगा, सारी सुविधाएं जो मन से ज्यादा देह को सुख पहुंचाती हैं... सहज ही हासिल हो जाएंगी।ÓÓ -बैठे-बैठे मैं यही सोचता रहा।
आज गुलाबो फिर सामने दिखी। उसे देखते ही न जाने क्यों उससे बात करने की इच्छा होने लगती है।
''बहुत अजीब लड़की है... जिस लड़के को चाहा उसे ही मुक्त कर दिया दूसरे की खुशी के लिए। सविता की बारात जब गांव से लौट गई तो उसकी इज्जत बचाने के लिए गुलाबो ने ही अपने मंगेतर को मजबूर कर उसी समय सविता से उसकी शादी करवा दी। बच गई डूबने से सविता... खुद गुलाबो ही डूब गई।ÓÓ गुलाबो की मां की बताई गई बातें याद आने लगी थीं।
''व्हाट अ सिली गर्ल?ÓÓ विचार उठा था उसके लिए मन में! जब पूरी दुनिया में अपने लिए ही जीने के नये-नये तरीके ढूंढे जा रहे हैं तब भी यह गुलाबो...! धीरे से सरककर मैं अपने भीतर ही आ गया। एक कोफ्त  सी हुई मन में... ये दूसरों के बारे में क्या सोचने लगा मैं?... मैं तो अपने लिए ही चलकर आया हूं यहां... कल को मेरी होने वाली पत्नी के गले में भी हीरों का हार होगा... कार्पाेरेट वर्ग में शामिल होने की संभावनाओं के द्वार खुलेंगे... धीरे-धीरे कैसिनो में बिताए खूबसूरत पलों को याद कर मैं रोमांटिक होता चला गया। बिन्दास लारा का चित्र आंखों में नजर आने लगता, पर गुलाबो का चित्र भी पूरी तरह आंखों से उतर नहीं पा रहा था, कभी-कभी लगता कि गुलाबो के कारण ही जीवन की रेस में मैं पीछे हो जाऊंगा यह सोचकर लारा के साथ बिताए लम्हों के पीछे ही मैं भागता... उन्हें पकडऩे की कोशिश करता।
कम्पनी को प्रोजेक्ट रिपोर्ट सौंपे मुझे महीनेभर हो गए थे, इस बीच राजधानी के नये फ्लैट में मैं शिफ्ट हो गया। कम्पनी द्वारा लगाई जा रही स्पंज आयरन फैक्ट्री तथा पावर प्लांट के प्रोजेक्ट पर अब मुझे काम मिल गया था। इस सिलसिले में कंपनी के हेड ऑफिस में आना-जाना लगा रहता। एक दिन मि. घोष ने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा-
''एक्सीलेंट यंग मैन! तुमने तो कमाल कर दिया! बांध पर ऐसी रिपोर्ट तैयार की तुमने कि कुछ दिनों में ही काम शुरू करना होगा हमें!ÓÓ
''वहां मुझे फिर तो जाना नहीं होगा सर!ÓÓ मैंने ऐसे ही पूछ लिया।
''क्यों? किसी देहाती छोरी से दिल तो लगा नहीं बैठे नौजवान?ÓÓ
प्रश्न के साथ-साथ मि. घोष की शरारती मुस्कान पर मैं चुप ही रहा, वहां से लौटते समय फिर न जाने क्यों मुझे गुलाबो का चेहरा याद आ गया।
''धोखेबाज!.. फरेबी! लगा जैसे चुप रहने वाली गुलाबो पीाछे से ताने दे रही हो।ÓÓ
''इंपोसिबल!ÓÓ सोचकर मैंने खुद को तसल्ली पहुंचाई और घर को आ गया।
सालभर बीत गए, इस बीच बांध बनाए जाने को लेकर मचे हंगामे की खबरों पर मेरा ध्यान लगा रहा। गांव वालों के सामूहिक विरोध के बावजूद कम्पनी और प्रशासन ने मिलकर ऐसे हथकंडे अपनाए कि गांव को खाली करवाने में कुछ ही दिन लगे। लगता मुझे कि कितना आसान है घोंसलों को उजाड़ देना। उजड़ते लोगों का चेहरा। मेरा ही चेहरा मेरी आंखों के सामने भयानक दिखाई देने लगा था, पर सारी बातों को फिजूल समझकर मैंने पान के पीक की तरह थूकदान में थूक देना ही ठीक समझा।
बांध पूरा हो गया था। ग्रामीणों के पुनर्वास को लेकर एक बार फिर कोहराम मचा, एनजीओ के नेताओं ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। उनसे बात करने का जिम्मा कम्पनी के जनसंपर्क अधिकारी मि. चौहान को सौंपा गया। वे पहले ही क्षेत्रीय विधायक और विपक्षी नेताओं को चांदी के सिक्कों से पटखनी दे चुके थे। उन्होंने अपना काम कर दिखाया.. सब कुछ शांत पड़ गया। ले-देकर कस्बे के बाहर बनी झोपडिय़ों में ग्रामीणों के पुनर्वास की व्यवस्था कर दी गई।
इस बीच मुझे कई प्रमोशन मिल चुके थे। रसूखजादों की दौड़ में मैं भी आगे निकल चुका था। गांव में बिताए दो साल पहले की बातों की अब याद भी कम रह गई थी पर बांध को देखने की इच्छा मन में शेष थी। मैंने मि. कश्यप के घर फोन किया, वे दिल्ली के टूर पर थे, उधर से उनकी पत्नी लारा ने मुझसे मिलने की इच्छा जताई, मैंने बांध के अवलोकन को लेकर आज के टूर पर साथ चलने की बात कही, वह सहर्ष तैयार हो गई।
हमारी कार सड़क पर दौड़ती रही। इस बीच लारा ने सवाल किया- ''क्या मिलने वाला है कम्पनी की ओर से इस साल हमें?ÓÓ
''जो तुम चाहो!ÓÓ मैंने जवाब दिया और जवाब सुनकर वह कितना मादक होने का स्वांग भर सकती है 'वाचÓ करने लगा।
हम पहाड़ी के ऊपर थे, नीचे जल की अथाह लहरों के संग हमारी नजरें दूर तक चली गई। अपनी सफलता पर गर्वित होकर लारा की ओर मैं देखने लगा... वह पास ही खड़ी अपनी ओर आने का इशारा कर रही थी... लगा जैसे अपने भीतर डूबने को बुला रही हो।
लौटते समय जिला कार्यालय में बांध से पुनर्वासित ग्रामीणों की सूची का मैंने अवलोकन किया। मेरी नजरें गुलाबो के नाम पर आकर टिक गई। कार्यालय के चपरासी को मैंने सौ का नोट थमाया और पुनर्वासित क्षेत्र में जाकर उसका पता ढूंढ लाने को कहा।
''वह बांध में डूब गई साहब! अंत तक गांव को डूबने से बचाने के लिए डटी रही!ÓÓ चपरासी ने लौटकर कहा मुझसे।
लगा जैसे विरोध का एक करारा तमाचा मेरे गाल पर जड़ दिया हो गुलाबो ने!
लौटते वक्त भी मेरे सीने से अपने उरोजों को सटाए रही लारा!... पर मेरी उंगलियां स्थिर हो गई थीं।
''क्या मैं गुलाबो को कभी भूला ही नहीं था?ÓÓ यह सवाल मुझे परेशान किये जा रहे था। पहली बार मन की अथाह गहराइयों से जवाब भी उठा-
''शायद तुम उसे चाहने लगे थे।ÓÓ