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Wednesday 22 Nov 2017

कम्बल बेचने वाला


निदा नवाज
निकट नुरानी नर्सिंग कालेज, एक्सचेंज कालोनी,
पुलवामा .192301
मो. 9797831595
जाड़े का मौसम था। ठंड जैसे हड्डियों में प्रवेश कर रही थी। अधिकतर लोग खिड़कियाँ, दरवाज़े बंद करके, कांगडिय़ां तापते हुए कमरों में दुबक गये थे। यद्यापि सर्दी के इस मौसम में सूर्य भी काले बादलों की ओट से निकल आया था किन्तु ठंड के आगे उस ने भी अपने घुटने टेक दिए थे और स्वयं भी जैसे ठंड से ठिठुर रहा था। सर्दी भरी इसी चुप्पी को चीरते हुए अचानक बाहर से एक आवाज़ गूंजी, कम्बल वाला ...गर्म कम्बल...सस्ते कम्बल...कम्बल खऱीद लीजिए। यह फेरी वाले की आवाज़ थी जो कम्बल बेच रहा था। उसने हमारे आंगन में खड़े अखऱोट के पेड़ के नीचे कम्बलों भरी चादर खोल रखी थी। मैंने खिड़की का पूरा पट खोला और कम्बल वाले को देखने लगा। चालीस पैंतालिस वर्ष का लम्बा सा आदमी, दाढ़ी और सिर के बाल सफेद, चेहरे पर छोटी-छोटी झुर्रियां और आँखें जैसे एक पूरे मरुथल को प्रतिबिम्बित कर रही हों। पहले तो मैंने उसकी ओर अधिक ध्यान नहीं दिया लेकिन जब मैंने उसको पड़ोस के मकान की छत की तरफ़ टकटकी बांधे देखा मेरे मन से अद्भुत प्रश्न उठने लगे। उस छत पर एक पड़ोसी लड़की गोबर सुखाने के लिए फैला रही थी। सर्दी का मौसम होने के कारण गोबर से रिसता पानी छत से नीचे खिड़कियों के शीशों पर फैल रहा था। गोबर के रिसते पानी से भीगे शीशों को देखते ही मैं अतीत में पहुंच गया। मैं सातवीं कक्षा में पढ़ रहा था। इस मकान की जगह कच्ची ईंटों के घर में एक छोटा हिन्दू परिवार रहता था। उसमें मास्टर राम काक, उसकी बूढ़ी माँ दन्वती, उसकी पत्नी पार्वती और उसका इकलौता बेटा दलीप रहता था। दलीप मेरा सहपाठी था। जब आधी छुट्टी की घंटी बजती थी हम दोनों दौड़ कर मास्टर रामकाक के चौके में घुसते थे। दादी दन्वती जो मिट्टी से लिपे चौखट के एक तरफ  बैठी होती थी एक लम्बी छड़ी के सहारे हमारे पीछे आकर हमें टोकती थी, अरे तुम कहाँ भागे जा रहे हो। तुम ने चौका जूठा किया। पार्वती माँ जो चौके में बैठी होती थी, उसे कहती थी, छोड़ो अम्मां बच्चे भगवान का रूप होते हैं इन से भला चौका जूठा कैसे हो सकता है। पार्वती माँ हमारे सामने एक बड़े से पीतल के थाल में चावल की खीर रखती थी और हम दोनों उसको बड़े मज़े से खाते थे। पाठशाला जाने से पहले और वहां से आने के बाद हम दोनों मास्टर रामकाक से ही शिक्षा लेते थे। उसी के फलस्वरुप हम दोनों ने अच्छे अंक लेकर मेट्रिक पास किया था। हम ने ग्रेज्युएशन भी एक साथ ही पास की। फिर मास्टर रामकाक सेवानिवृत्त हो गये थे और जीपी फंड और ग्रेच्युटी के पैसों से यह छोटा सा घर बना लिया था। बस कुछ महीने ही इस में रह पाए थे कि अचानक कश्मीर के हालात खऱाब होने लगे थे। मास्टर रामकाक ये सब सहन न करके चल बसे थे। दादी दन्वती का दो वर्ष पहले ही देहांत हुआ था। दलीप और पार्वती माँ अब मास्टर रामकाक के फैमिली पेंशन पर ही गुज़ारा कर रहे थे और एक रात घर छोड़ कर चले गये। फिर एक बार मैंने सुना कि दलीप जम्मू के रेलवे स्टेशन पर समाचार पत्र बेचता है। केवल कुछ ही महीने इस मकान में रह पाए थे। कितने चाव से पार्वती माँ खिड़कियों के इन शीशों को हर दिन साफ़ करती थी। मैं अतीत का दर्पण देख ही रहा था कि बाहर का शोर मुझे वर्तमान में वापस लाया। छत पर गोबर सुखाती लड़की कम्बल बेचने वाले को बुरा-भला कह रही थी-क्या तुम्हारी माँ-बहन नहीं है जो मुझे इस तरह से घूर रहे हो, अंधी हो जाएं तुम्हारी आँखें, तुम फेरी वाले उचक्के और बदमाश होते हो। कम्बल बेचने वाले को श्राप सा लग गया था। उसकी आँखों में जैसे रेगिस्तानी तूफान उठ रहा था। उसकी चुप्पी से पड़ोसी औरतों को और भी संदेह हुआ। उनमें से तो कुछ ने कम्बल भी बिखेरने शुरु कर दिए थे लेकिन कम्बल बेचने वाला एक नजऱ गोबर से रिसते पानी से भीगे शीशों को देख रहा था और एक नजऱ मुझे। उस की तरफ़  देख कर मुझे अजीब सा लग रहा था। मुझे लगने लगा कि मैंने उस व्यक्ति को कहीं देखा है। मैं अपनी स्मृति के बक्से को खोल ही रहा था कि अचानक मेरी नजऱ उसकी गरदन के सफेद दाग़ पर पड़ी। मैं याद करने लगा यह तो दलीप से मिलता है। उसकी गरदन पर भी तो ऐसा ही सफेद दाग़ था और जब पाठशाला में हम उसको इस दाग़ का कारण पूछते थे वह झट से कहता था, जब माँ पेट से थी तब एक बार चाँद ग्रहण की रात मेरी माँ ने चूल्हे को सफेद मिट्टी से पोता था, दादी माँ कहती हैं उसी कारण से यह दाग हुआ है। मेरा संदेह सच्चाई में बदलने लगा। मैं कम्बल बेचने वाले के निकट गया और उसके कान में कहा, तुम कहाँ रहते हो, मुझे लग रहा है कि मैं तुम्हें जानता हूँ, उसने कोई उत्तर न दिया बल्कि उसकी आँखों से पूरा सावन उमड़ आया। मुझे अपने प्रश्न का उतर मिला। मेरा दिल चाह रहा था कि मैं उसको वहाँ ही गले से लगा लूं। किन्तु हालात खऱाब होने के कारण मैं उसको अपने कमरे में ले आया और मैंने उस से पूछा, तुम दलीप ही हो ना? तुम इन परिस्थितियों में ऐसे क्यों घूम रहे हो? उसने रोते बिलखते उत्तर दिया, यह गोबर भरा पानी यदि केवल उन खिड़कियों के शीशों पर ही फैल गया होता तो बात और थी लेकिन मार्मिक और जटिल परिस्थितियों का यह गोबर भरा पानी तो हर दिशा में फैल चुका है। मैं एक बार इन गलियों में घूमना चाहता था जिन में मैंने बचपन बिताया है। इस कुबड़े अखऱोट के पेड़ के साथ बस एक बार टेक लगाकर बैठना चाहता था जिस में हम झूला झूलते थे। अपने उस आंगन को एक बार देखना चाहता था जिस में हम लुकाछुपी का खेल खेलते थे। नदी वाले उस चिनार की छांव में बस एक पल बैठना चाहता था जिसकी हरियाली को देखने के लिए मेरी आँखें तरस गई थीं। आज कम्बल बेचने के बहाने मैंने एक-एक चीज़ देखी। एक-एक याद को ताज़ा किया। अब उसकी आवाज़ सिसकियों में पूरी तरह डूब चुकी थी और उधर सर्दी से ठिठुरता सूर्य एक बार फिर प्यार और भाईचारे की धीमी आंच को महसूस कर रहा था।