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Saturday 18 Nov 2017

हम गुजरात चल रहे हैं

मुशर्रफ आलम जैकी
टी-101, ताज एंक्लेव, लिंक रोड,
गीता कॉलोनी,
दिल्ली-110031
''हां
''हां! हम गुजरात जा रहे हैंÓÓ
अब्बा ने कहा तो ऐसा लगा, जैसे किसी ने जिस्म का सारा खून निचोड़ लिया हो। ये टीचर्स स्ट्राइक, आतंकवादियों के प्रतिदिन के कारनामे... तन्हाई के किसी रहस्यमय गोशे में फिक्र की लम्बी दूरी के बाद अब्बा ये अचानक कैसे फैसले पर पहुंचे थे। चेहरा पढ़ा तो वहां वो पुराने अब्बा थे ही नहीं जो चुनाव में गुजरात भेजे जाने की खबर सुनकर कैसे बौखलाए और डरे-डरे हमारे सामने खड़े थे... फिर अम्मा थीं, जिनका सपाट चेहरा कुछ इतना डरावना दिखने लगा था ..कि लगता था, जिंदगी में कभी भी इस चेहरे ने मुस्कुराहट और खुशी की कोई झलक न देखी होगी और भागलपुर वाला भाई आमिर था... सब एक-दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे किसी भयानक हादसे के बाद देखते हैं और गुजरात भेजे जाने से ज्य़ादा भयानक हादसा क्या होगा?
''मेरे विचार से...ÓÓ
कफ्र्यू वाले माहौल में आमिर की आवा ऐसे उभरी जैसे सन्नाटी सड़क पर गश्त करती हुई पुलिस के जूते बजे हों। सबने आमिर की तरफ चौंक कर देखा जिसके चेहरे पर भागलपुर का खून उतर आया था...
''मेरे विचार में पिताजी को वहां नहीं जाना चाहिएÓÓ
गश्ती पुलिस ने जैसे फ्लैग मार्च किया हो-
टन... टन...
अम्मा की आंखों में $खबरें सुनते-सुनते, 'कलाशनिको$फÓ लिए बैठे आतंकवादी ने जैसे अपना मोर्चा संभाल लिया... मूई नौकरी गई भाड़ में...
''खाओगी क्या ऐं...ÓÓ
अब्बा के आगे जैसे बस यही समस्या थी जो मृत्यु से ज्य़ादा भयानक थी। तभी तो मृत्यु का निवाला बनने से पहले भी अब्बा को यही $िफक्र थी घर का क्या होगा। अम्मा का, उसका, वो तो अभी पढ़ रहा है। रुकैया का, उसकी शादी भी तो होनी है, यदि समय ने उन्हें मौत की गोद में जाने के लिए ही चुना है तो वो इंकार कैसे कर सकते हैं।
हमने •िांदगी के किसी भी इम्तेहान में, इससे पहले अब्बा का इतना सपाट और भयभीत चेहरा कभी नहीं देखा था। वो तो जैसे आती हुई मौत को देख रहे थे। गुमसुम।
अम्मा पहले तो चुप रहीं। परंतु माहौल में पसरी $खामोशी और बोझिलपन के बाद उनकी बड़बड़ाहट स्वयं ही शुरू हो गई।
''ये हुकूमत किसी को अच्छा भला, $खुश देख ही नहीं सकती- क्या प्रतिदिन मरने वाले कम पड़ रहे हैं जो अच्छे भलों को मौत के मुंह झोंक दो। निगोड़े टीचर... ले-दे के यही गरीब रह गए हैं। चुनाव में गुजरात जाने के लिए। बच्चों का भविष्य सुधारते हैं ना, सो हुकूमत ने सोचा, चलो अब चुनाव को उनके पल्ले बांध दो। सरकारी अफसर तो न कह देंगे लेकिन ये निगोड़े जानवर... ये ना तो जानते ही नहीं...।ÓÓ
उसने धीरे से कहना चाहा- ''मां दूसरे और भी स्ट्राइक पर जा रहे हैं।ÓÓ
अब्बा ने फिर कहा- ''त$कदीर में जहां मौत लिखी होगी वहीं होगी।ÓÓ
आमिर ने गुस्सा दिखाया- ''तो $िफर गुजरात जाकर क्यों मरे। एक वही जगह रह गई है मरने को। मुल्क सुलग रहा है। चारों तर$फ आग लगी है और उनको चुनाव की पड़ी है। गुजरात में चुनाव कराकर क्या तीर मार लेंगे ये। आतंकवादियों को समझाते हुए कितने वर्ष बीत गए। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब गुजरात से नरसंहार की खबर न आती हो... हां, चुनाव कराएंगे।ÓÓ
''चुनाव तो होगा हीÓÓ उसने डरते-डरते वहां बैठे हुए लोगों की आंखों में झांका ''चुनाव तो होगा ही इसलिए कि चुनाव कोई रास्ता न सही, एक रास्ता तो है अपने अधिकारों को समझने का एक सिलसिला तो है... यानी जिस दिन ये अपने अधिकारों को समझने लगेंगे उस दिन बहुत कुछ $खत्म हो जाएगा। दिलों का खौ$फ भी और...ÓÓ
''यानी किसी न किसी को पहल करनी होगी...ÓÓ आमिर फिर गुस्से से दहाड़ा... ''मोहरा बनाया गया चाचा जी को।ÓÓ
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गुजरात जाना जिंदगी और मौत से जुड़ा हुआ मामला न होता तो वो भी इस बहस में जरूर हिस्सा लेता कि कहने को उसके पास बहुत कुछ था... ये देश कहां जा रहा है? इतनी अशांति लोगों के दिलों में क्यों बसती है? लगता था, हम केवल मोहरे बन गए हैं, एक जर्जर-सी शतरंज पर वर्षों से इस्तेमाल हुए मोहरे, चालें तो कोई और चल रहा है और ये मोहरे घिस-पिट रहे हैं, वर्षों से मिलने वाली मौत के बाद और लगातार तोडफ़ोड़ की प्रक्रिया से गुजरते हुए कभी-कभी लगता, कोई दोगला बसता है अंदर, जो तुरंत अपनी बात छुपा लेता है। सच पर झूठ का पर्दा डाल देता है। हम 'कुछÓ चाहते हैं और किए 'कुछ चले जाते हैं... फिर ये 'कहनाÓ, अपनी सफाई देना, बन जाता है... कि सुनो हम मुसलमान हैं तो क्या। हमें गलत मत समझो। बाबरी मस्जिद का मामला उठता है तो क्या। हमें $गलत मत समझो। पाकिस्तानी शासक दोगली पॉलिसी अपनाते हैं तो क्या, हमारी व$फादारी को $गलत आंखों से मत देखो। हर पल, हर क्षण नपुंसक और कायरतापूर्ण रवैया से अपनी सफाई पेश करते हुए लगता है, अपने पास अपना कहने को कुछ भी नहीं बचा, न गुस्सा, न विरोध, न शब्द... सब देशी समस्याओं की भेंट चढ़ गए या अपनी जात को हिन्दू दोस्तों के सामने चमचम- चमकाने के काम आ गए। अब्बा हमें इन्टेलेक्चुअल कहते हुए हंसते हैं- ''बहुत देखे हैं तुम जैसे बातें बनाने वाले। जान रखो, ये सब बस शब्द हैं...ÓÓ
हमने आजा दी नहीं देखी, किताबों में पढ़ी है। अब्बा बार-बार इस लुटी-पिटी आजा दी को किताबों से खींच लाते हैं कि देखो बाबरी मस्जिद उस समय भी थी। लेकिन आंखों में शहतीर ढूंढने वाली नजरें उस समय इस तरह मंदिर-मस्जिद कहां देखती थीं।
''मंदिर-मस्जिद नहीं देखती थीं। इसलिए कि उन्हें तो एक-दूसरे को काटने-मारने का भूत सवार था। बात तो एक ही है अब्बा या तो काटने-मारने के लिए $फर्क़ तलाश करो। रास्ता पैदा करो, कल उन लोगों के पास भारत से अलग देश, पाकिस्तान का मामला तो था ही... और आज की पीढ़ी के पास...।ÓÓ
वो कहता तो अब्बा गंभीर मुद्रा में हो जाते...
''तुम क्या जानो आजा दी का मतलब है हां, तुम आजा दी का मजा क उड़ा सकते हो। देखी नहीं ना... मिल गई। इसलिए दूर का जख्म क्या जानो...ÓÓ आंखें गीली होती हैं। घटनाओं के पुल से $गुजरकर, तेजी से चक्कर लगाती हुई नम हो जाती है- ''न$फरत की शुरूआत कब से हुई? शायद सच कहते हो... इतिहास के खोह में जाता हूं तो वहां भी नरसंहार के ही छींटे हैं। हर जगह, हर अध्याय, हर हाशिए पर... $गदर की बात करो या जंगे-आजादी के बाद बदलते हुए हालात का आईना देखो। हालात ज्य़ादा या कम नहीं, हमेशा $खराब रहे हैं। बस, इतना कहना ज्य़ादा ठीक है।ÓÓ
उसने अब्बा की आंखों में झांका... ''इस 'क्योंÓ का जवाब आपको नहीं लगता। ऐसा क्यों है? ये क्यों तो हमेशा से है... यदि उसे धर्म के खानों में देखिए, तो अलग-अलग गिरोह शुरू से ही तमाम सुलह-सफाई और दोस्ती के बावजूद अलग-अलग राष्ट्रीयता की आंखों को एक जरा $फासले से देखती आई हैं।ÓÓ
वो अचानक ठहर गया। उसने अब्बा को बड़े $गौर से देखा। उसे लगा, दुनिया एकदम से ठहर गई। अब्बा के कुर्ते पायजामे और मासूमियत, सादगी से जकड़े भोले-भाले 'वजूदÓ में जुनून कहां रखा था। मां की कलाम पाक चूमती आंखों में, मेहनत, लगन से 'मलीदाÓ बनाते हाथों में वो इस्लाम का झंडा कहां छिपा था जो एकदम अचानक बहुत सारे लोगों का जुनून बन जाता है जो गली-गली सड़कों-सड़कों मासूम खून की बारिश करता फिरता है। फिर वो ढेर सारे लोग अचानक माता-पिता का लिबास पहने झुंड के झुंड कहां से आ जाते हैं। धर्म और मजहब के ठेकेदार बनकर चीखते-चिल्लाते, घर जलाते, मारकाट करते... लगा, तब यही चेहरे मासूमियत और सादगी के पुतले अचानक खूंखार बन जाते होंगे... दरिन्दे... एक-दूसरे को लूटते, घर जलाते हुए... गुजरात में दरिन्दगी की ये पहल कैसे हुई होगी। ये आतंकवादी कैसे होते होंगे... इंसानी जानों की ताक में बैठे। रेलगाड़ी में घुसे, मुसा$िफरों के झुंड में छिपे। अच्छी भली जाती हुई ट्रेन रोक दी। मुसाफिरों के इंतजार में...। 'आजादीÓ... तब भी यही $खून में लथपथ आजादी होती थी, पिताजी जिसे किताबों के फटे-पुराने पन्नों से पपड़ी जमे होंठों तक लाते हुए सर्द आह भरते थे।
अब्बा शिक्षक थे- सरकारी स्कूल में- कभी-कभी मूड में होते तो हंसकर कहते-
''हमें तो टीचरी मिल गई। अपनी ख़बर लो। हिन्दू मुल्क में कोई सी भी नौकरी नहीं मिलने वाली।ÓÓ
अब्बा की बात पर गुस्सा आता। ''हिन्दू मुल्क? किसके जा हन की पैदावार है अब्बा? इसीलिए तो लोग हमें गद्दार और पाकिस्तानी तक कहते हैं।ÓÓ
अब्बा बिगड़ते नहीं, मुस्कुराते हैं। पढ़ाने का ये तो $फायदा हुआ, पक्का 'पोलिटिशनÓ बन गए हैं। मन ही मन मुस्कुराते हैं फिर एक शोशा छोड़ते हैं।
''भगवा शिक्षा और गुजरात में हिन्दुत्व के प्रयोग ने सारे समीकरण बदल दिए हैं मियां। वे अब मुसलमान रहित एक नये भारत का ख्वाब देख रहे हैं।ÓÓ
''ये सब भ्रम है आपका। जहनी गंदगी।ÓÓ
'नहीं मियांÓ, पिता गंभीर हो जाते हैं ''उन्होंने महसूस कर लिया है कि हिन्दुस्तान की बागडोर अपनी तरह और अपने तौर-तरीकों में उनके हाथों में होनी चाहिए और जब वो अपने तौर-तरीकों का इस्तेमाल करेंगे तो वहां तुम जैसे मुसलमानों का गु•ार नहीं होगा मियां। तुम वहां ऊंचे पदों पर भी नहीं होगे। कुत्तों से बदतर होंगे।ÓÓ
''जैसे पाकिस्तान में हिन्दू हैंÓÓ
अब्बा की गरजती आंखों ने घूर कर देखा- ''तुम ही लोगों ने... तुम ही लोगों ने उन जैसों को बढ़ावा दिया है। उन्हें अपने इरादों में म•ाबूत बनाया है। हां, हम... अब कहां रह गए।ÓÓ
लगा था, अब्बा अपनी पहचान भूल रहे हैं या भूल गए हैं। अब्बा को अपनी पहचान कराने की जरूरत है। हम तो हर जगह हैं। सियासत से लेकर क्रिकेट, हर जगह...। हां हम वैसे नहीं हैं और हो भी नहीं सकते लेकिन हम हर जगह हैं- हम हैसियत भर जंग भी लड़ते हैं हारते भी हैं। बहाल भी होते हैं।
बाबरी मस्जिद की बात चलती तो देखता, अब्बा पुरानी किताबों, ऐतिहासिक ची•ों इकट्ठी करते फिर रहे हैं। फिर बड़े गर्व से बताते, ''आज स्कूल में रमा बाबू इतिहास के टीचर से बहस छिड़ गई। बस फलां किताब सामने रख दो। ऐरे-गैरे की किताब से भला क्या पता चलता। रमा बाबू चुप बोले.. हां ये बात तो है...ÓÓ हंसते हैं- ''राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का फैसला करने के लिए तो आप जैसे लोगों को बुलाना चाहिए। अरे, हमें बुलाया जाए तो एक मिनट में दूध का दूध और पानी का पानी कर दें।ÓÓ
कश्मीर हुर्रियत कांफ्रेंस वालों पर अब्बा नाराज होते 'इन्हीं लोगों ने हिन्दुस्तान में मुसलमानों की साख गिराई है। मियां स्कूल में टीचर दोस्तों से, जोर देकर अपनी वकालत करनी पड़ती है कि ऐसे लोग पाकिस्तानी सरकार की कठपुतलियां बने हुए हैं- ''सिर्फ इसलिए कि अपनी साख बनी रहे। अपना डंका बजता रहे। अपनी व$फादारी का डंका।ÓÓ
''इसी व$फादारी का डंका बजाते-बजाते आप शक के दायरे में आ गए हैं अब्बा। आप कौम, मजहब और भाई बिरादरी जैसी बातों पर म$गजमारी क्यों कर रहे हैं। छोटी-सी बात है। दूसरा मुल्क यदि हमारा भला नहीं चाहता तो हमारा दुश्मन हुआ। यहां परन्तु-वरंतु या वकालत की जरूरत ही क्या है।ÓÓ
''जरूरत पड़ती है मियां,ÓÓ अब्बा को अपनी बात साबित करने की जल्दी होती है। शक की सुइयां जब तुम्हारी ओर बुलंद होती हैं तो सफाई नहीं दोगे। कश्मीर हो या पाकिस्तान की समस्या, हम ज्य़ादा से ज्य़ादा अपने बचाव और अपनी सफाई देने में लगे रहते हैं।ÓÓ
''मतलब ये हुआ कि हिन्दुस्तान से हमारा जहनी, जिस्मानी और रुहानी लगाव नहीं है। इसलिए यदि लगाव होता तो हिन्दुस्तान को नुकसान पहुंचाने वाला हर गिरोह और हर मुल्क हमारा दुश्मन होता।ÓÓ
'कहना आसान है... आसान है...Ó
अब्बा दो-चार बार इस शब्द को दोहराते हैं। $खामोश हो जाते हैं।
मैं देखता हूं। अब्बा चुप हैं। आंखों में अंधेरी परछाइयां उतर रही हैं। नजारों में कहीं अपने ही लिए ब$गावत की खींचतान चलती है। दो-चार साल पहले इस सदाबहार चेहरे पर झुर्रियों का ऐसा जाल नहीं फैला था। जैसा अभी, इसी क्षण, जहन पर लगातार गश्त करती घटनाओं का चक्र, अपनी व$फादारी-गद्दारी की गुत्थम-गुत्थी में। झुर्रियां कम होती हैं... आंखें उठाकर गौर से मेरी ओर देखा है।
''सच कहते हो। बुजदिल था तो पाकिस्तान क्यों नहीं चला गया। यहां क्यों रह गया। अपने-आपको तकली$फ देने के लिएÓÓ बर्फ जैसा लहजा... ''इन वर्षों में कितनी बार स्वयं से जंग करनी पड़ी है... समझ रहे हो मेरी बात को। अपनी व$फादारी साबित करने के लिए। हां!  कि जो गलत हो रहा है मुल्क के नक्शे पर, वो हम नहीं हैं। वो हम नहीं कर रहे। घंटों तन्हाई के गोशे में बीमार शब्दों के सहारे अपनी तसल्ली कराई है कि वो... हम नहीं हैं मुन्ना। इधर चंद वर्षों में अपनी ओर शक से उठी हुई कितनी ही उंगलियां देखी हैं मुन्ना। पहले नहीं लेकिन अब... लगता है, रमा जैसों की आंखों में भी अपने लिए सवालों की परछाइयां देखता हूं कि मौलवी रथ-यात्राओं की भीड़ में कब तक अपनी वफादारी साबित करते रहोगे तुम? ये यात्राएं तो निकलती रहेंगी। एक बाबरी मस्जिद का मामला हल होगा तो ये आतंकवादी दूसरी बाबरी मस्जिद का मामला खड़ा कर देंगे। एक पाकिस्तान से काम नहीं चलेगा तो हजारों कश्मीरी टाइगर्स को शक का लिबास पहनाकर तुम्हारे सामने ले आएंगे... कि अब बताओ... जवाब दो...।ÓÓ
अब्बा के होंठ थरथराए। 'बुरा मत मानना... हमसे अच्छे तो वो कानूनी मुजरिम हैं, कम-से-कम जिसे रोज थाने आकर ये साबित तो नहीं करना पड़ता कि उसने जुर्म नहीं किया और हम... घटनाओं के रथ हर क्षण इस देश में हमें अजनबी बनाते जा रहे हैं। और हर क्षण गणितीय आंकड़ा निकालना पड़ता है कि... कि हम इस देश के लिए कितने ईमानदार हैं... ऐसे हर कठिन क्षण में, हमें अपनी ही अदालत में सफाई देने के लिए हा•िार होना पड़ता है...।Ó
उसे लगता है, वो अचानक बह गया है। अब्बा के शब्दों के बहाव में... वो, जिसने कभी $खुद को असुरक्षा के एहसास से दो-चार नहीं पाया। असुरक्षा की भावना, जिसे हमेशा बीमार जहन की पैदावार लगती आई है परंतु ये... अपनी अदालत में बार-बार सिर झुकाए इस 'एलान-पत्रÓ पर हस्ताक्षर करना... कि जो भी हो रहा है, वो हम नहीं हैं... बार-बार $खुद के कटघरे में खुद ही मुंसि$फ बनना... खुद ही गवाही देना... ये सब...?
आमिर चुपके से कंधे पर हाथ रखते हैं... ''तुम्हारी तरह कभी भी मैं सोचता था कि ये अलग-अलग धार्मिक खानों में जुनून के बारूद क्यों रखे हैं। परंतु अब... शायद मैं ही नहीं... मुझसे पहले भी, मेरी तरह ही बहुत से लोग ऐसा सोचते थे... परंतु अब धीरे-धीरे...।ÓÓ
उसकी आवाज कमजोर पड़ रही थी... ''बरसों पहले भागलपुर की आग ने सब कुछ जला दिया... उसकी आंखों में लावे की चिंगारियां थीं। जल तो सब कुछ बहुत पहले ही गया था... परंतु जलने से पहले तक तसल्लियों के बोल तो थे ही हमारे पास... वो भी सुलग गए तो...? केवल एक ही सवाल रह जाता है असुरक्षा का... क्या हम यहां सुरक्षित हैं?ÓÓ
तब्दीलियों ने कैसे-कैसे घाट का पानी पिया। उसके पास इन बातों का क्या जवाब है। सरकारी स्कूल में काम करने वाले अब्बा के दिलो-दिमाग में उपजे $खौफ और बागियाना सोच का जिम्मेदार कौन है...? मजाक करने की आदत... चुटकी लेना... बात-बात में हंसाना... लती$फे सुनाना... कॉलेज के लड़के-लड़कियों की दिलचस्प बातों को मजे ले-लेकर सुनाना... भारी गप्पी...। लेकिन सब एक भागलपुर के जलते ही $खत्म हो गए। साफ-साफ बोलते होंठों को चुप की दीमक चाट गई। हर समय मुस्कुराती आंखों में जैसे कोई आतंकवादी 'कलाशनिकोफÓ लेकर बैठ गया। चटकती आवाज में सांप का फुंकार शामिल हो गई।
अब्बा कहते थे- ''कहीं जाओ, मौत मुसलमानों का पीछा कर रही है। हज्जन भाई पाकिस्तान चले गए तो वहां कौन से बख्श दिए गए। सारा खानदान शहीद हो गया। दंगाइयों और हमलावरों ने सिर्फ यादें छोड़ी हैं। कितनी $खुशी-$खुशी पाकिस्तान गए थे भैया... कहते थे अपना देश और संतोष की सांस लेते थे। मुझसे भी कहते थे... तुम भी चले आओ। अपना देश जो ठहरा।ÓÓ
'अपना देश... अब्बा हंसते नहीं... आंखों से टप-टप आंसुओं के $कतरे गिरते हैं... वो दंगाई कौन थे... अपने सगे-जिन्होंने हज्जन के पूरे खानदान को काट डाला था... कौन थे?Ó
अब्बा सच ही तो कहते थे- ''मौत मुसलमानों का पीछा कर रही है... कहीं जाओ... बख़्शे नहीं जाओगे... चुन-चुनकर हर जगह मारे जाओगे...ÓÓ तीन ही भाइयों का खानदान तो था अब्बा का। सब किस्मत की बात... एक भाई पाकिस्तान चले गए। अब्बा दिल्ली आ गए तो नसीब में सरकारी स्कूल की नौकरी लिखी थी। रशीद चचा भागलपुर रह गए। कहते थे वहीं कारोबार करेंगे। अपनी मेहनत और लगन से कितनी तरक्की की थी। चन्द वर्षों में ही कारोबार को कितना आगे बढ़ा लिया... याद है, गर्मियों की छुट्टियों में दो साल पहले ही तो अब्बा उसे भागलपुर लेकर गए थे। फिर एक बड़ी सी किराना की दुकान दिखाई थी, जहां रशीद चचा और आमिर के बड़े भाई बैठते थे। रशीद चचा की आंखों में कैसे 'इन्द्रधनुषी कुमकुमे रौशन थे- ''जब कारोबार शुरू किया था, तब यहां बस थोड़े बहुत साबुन, बच्चों की कापियां, पेंसिल और कुछ खाने-पीने की ची•ों थीं... और आज।ÓÓ
रौशन आंखें तरक्की की दो मंजिला इमारत की ओर उठ जाती हैं- ''आज अल्लाह का दिया सब कुछ है मियां।
अब्बा रशीद चचा के कंधे पर हाथ रखते हैं...फायदा तो तिजारत में ही है भाई। अल्लाह तुम्हें $खुश रखे। आबाद रखे...।ÓÓ
समय गुजर गया। लेकिन उस रात खाने पर उसे रशीद चचा का भयभीत चेहरा अब तक याद है...''हां.. दुआ... करो... भाई... कि... हम... लोग... खुश रहें... आ... बा...दा...रहें...ÓÓ शब्द बर्फ की तरह टूट रहे थे-
''मुसलमानों की तरक्की किससे देखी जाती है भाई। आग लगाने वाले मुसलमानों की आंखें अब इस शहर पर है। कितनी ही बार शहर में हादसा होते-होते रह गया... दुआ करो। यहां कुछ भी नहीं हो... सब चैन-सुकून से रहें...।ÓÓ
और अब्बा सच कहते हैं, मौत मुसलमानों का पीछा कर रही है। उस दिन आसमान से $खून की बारिश हुई थी... शायद... सब कुछ तो $खत्म हो गया... गहरे सन्नाटे से जन्मा $खौफ और आमिर का रक्तरंजित बुत चेहरा, रुकैया की सावन झड़ती आंखें, अम्मां का अलाप, आमिर के शब्द... ''सब कुछ $खत्म हो गया चचा अब्बा...।ÓÓ
''शायद अल्लाह की यही मर्जी थी। तुम्हें अलीगढ़ में दाखिला दिलवा दिया। खानदान का कोई वारिस...।ÓÓ
''अलीगढ़ कौन-सा सुरक्षित है चचा अब्बा...।ÓÓ
उसे आमिर के शब्दों में सांप की वही फुंकार महसूस हुई। और.... अब्बा सच कहते हैं... ''मौत मुसलमानों का पीछा कर रही है...।ÓÓ
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गुजरात की $खबर का अब्बा पर असर होना वाजिब था... कमरे में उमड़ी हुई दहशत से लगा, वो सारे दृश्य फिर से •िांदा हो गए हों।
आमिर के होंठों के सांप ने फिर फन फैलाया... ''चचा अब्बा नहीं जाएंगे...ÓÓ
रुकैया बोली- ''हम आपको जाने नहीं देंगे। कोई बचकर नहीं आता वहां से।ÓÓ
उसने अम्मां की तरफ देखा, रुकैया के आखिरी शब्द से जिनके चेहरे पर खौ$फ की परतें जाहिर हो गई थीं।
''लेकिन सब जाएंगे तो भला मैं कैसे नहीं जाऊंगा।ÓÓ
''आप नहीं जाएंगे बला से। ज्य़ादा यही होगा ना नौकरी से निकाल दिए जाएंगे। निकाल दें। मेरी जूती...ÓÓ
ये अम्मां का विरोध था। ''जान तो बची रहेगी। जान है तो जहान है।ÓÓ
''शाम में रमा भाई और दो-एक टीचर आएंगे।ÓÓ
अब्बा के शब्द नपे-तुले पड़ रहे थे। ''उनसे बातचीत के बाद ही कोई फैसला होगा?ÓÓ
उसने निगाह उठाई। बौखलाई हुई आंखों में झांकने की कोशिश की। कमरे के बोझल से माहौल को देखा। लगा, जैसे किसी श्मशान या कब्रिस्तान में आ गया है... सबकी आंखों में $खौ$फ के सांप कुंडली मारे बैठे हैं। सबकी आंखों में जैसे मौत सुलग रही है... अब्बा रमा चचा को बहुत मानते थे। रमा चचा यानी रमाकांत.. वो भी बिहार के एक गांव से थे। इतिहास के टीचर, अब तो गांव की जमीन बेचकर यहीं मकान बनवा लिया था। जब भी अब्बा के सामने कोई समस्या खड़ी होती, रमा चाचा किसी छायादार बरगद की तरह पेश आते... अब्बा उनकी हर बात मानते थे... कहते थे। पुराने लोगों में यही तो अपनापन है। ये अपनापन अब खोजने पर भी नहीं मिलेगा।
शाम में... घर में ही छोटी-सी बैठक जम गई वो चाय लेकर कमरे में दाखिल हुआ तो अब्बा सहित रमा चचा और बाकी तीनों टीचरों के चेहरे भी लटके थे... क्या होगा? के $खौफ से।
रमा चचा ने धीमे सुर में कहा- ''बड़े अफसरों ने जाने से इंकार कर दिया। अब तलवार टीचरों के सर पर है... कल तक कोई फैसला ले लेना है।ÓÓ
''हममें से कोई नहीं जाएगा...ÓÓ रघुनाथ बाबू जल कर बोले।
रमा चचा की आंखों में भी $खौफ था। ''ये तो वही बात हुई कि ओखली में सर डाल दो। हुकूमत आ$िखर कहां तक सुरक्षा देगी। पोलिंग बूथ तक। बचकर आ गए तब भी क्या ठिकाना कि तुम्हारा नाम आतंकवादियों की हिट लिस्ट में शामिल न हो।ÓÓ
रघुनाथ बाबू चौंक गए। ''हम तो पहले ही कहते थे- हम नहीं जाएंगे।ÓÓ
रमा चचा ने घूरकर रघुनाथ को देखा... सवाल सिर्फ अकेले इनके जाने का तो नहीं है। रघुनाथ, समस्याओं का हल ढूंढना है। सब यही कह रहे हैं। गुजरात जाने का मतलब है कोई मुसलमान बचकर नहीं आएगा।
अब्बा ने धीमे सुर में विरोध किया.. जो अच्छा लगे वही करो भाई। हां एक बात है। कौन कहां सुरक्षित है। आग तो सब जगह लगी हुई है मेरे भाई। सड़क पर, बस में, गाड़ी में..., अब तो हर आंख में आतंकवादी नजर आता है। हर आदमी लगता है बंदूक ताने सामने खड़ा है।
हर क्षण जी घबराता है... गोधरा से नरोदा पटिया तक... जिंदा जलाने की एक से बढ़कर एक कहानियां... सोते जागते हम इस $खौफ से अलग नहीं हो पाते। रमा चचा आगे बढ़े। धीरे से अब्बा के कंधे थपथपाए- ''डरो मत। सब ठीक हो जाएगा।ÓÓ
परंतु उसे मालूम था। सब एक-दूसरे की तसल्लियों के लिए शब्द उछाल रहे हैं बस। सब ठीक नहीं होगा। उम्मीद की जोत बुझती जा रही है एक-एक करके-भगवे झंडों की संख्या बढ़ती जा रही है... फैलती जा रही है... और कलाशनिको$फ लिए आतंकवादी सबकी आंखों बस गया है...।
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उस दिन उसने देखा- अब्बा देर तक घर में टहलते रहे। नींद नहीं थी। सारे घर की नींद उचटी हुई थी। आमिर बाल्कनी पर जींस के पैंट और जर्सी पहने कुर्सी पर अधलेटा पुरानी यादों से शायद भागलपुर चुरा रहा था। वो चुपके से आया। आमिर ने नजर तक नहीं उठाई। मौसम में सर्दी तेज थी। उसने धीरे से आमिर का कंधा थपथपाया... अंदर जाकर सो जाओ। ठंडी पड़ रही है।
कमरे में रुकैया बुत बनी किताब के एक ही पृष्ठ को घंटों से तके जा रही थी। वो उठकर बाहर आया तो अब्बा टैरिस पर गहरी सोच में डूबे टहल रहे थे। और आमिर, वैसे ही जर्सी और जींस की पैंट में कुर्सी पर अधलेटा पड़ा था।
पता नहीं क्यों.. अंजाने $खौफ से उसका दिल धड़क रहा था। जैसे घर पर किसी की मैयत पड़ी हो और सबके सब उदासी से लिपटी उससे जुड़ी यादों को ओढ़े गहरे अंधेरे को घूर रहे हों। एक टक...।
बिजली-सी चमकी। आसमान से कोई तारा टूटा और दूर तक एक लकीर-सी आसमान की पाटती हुई चली गई। और उस दिन सचमुच एक हादसा हो गया... आधी रात में रमा चचा के यहां से एक आदमी भागता हुआ आया। उसने बताया कि रमा चचा जब घर लौट रहे थे तो किसी ने उन्हें चाकू मार दिया। बिजली जोरों से चमकी और जैसे उसके वजूद में घुसती चली गई। जैसे उसके गोश्त के पोर-पोर में समा गई।
उसे लगा। अब्बा कह रहे हों... ''पुराने लोगों में यही तो अपनापन है। ये अपनापन अब खोजने पर भी नहीं मिलेगाÓÓ और... रमा चचा धीरे से अब्बा के कंधों पर हाथ रख रहे हों... ÓÓ डरो मत। सब ठीक हो जाएगा।ÓÓ
उसने देखा, रमा चचा के मरने की $खबर लाने वाले को अब्बा ने •ाोर से जकड़ लिया है। अब्बा वहशत से चीख पड़े हैं।
''किसने मारा। बोलते क्यों नहीं। किसने मारा।ÓÓ अब्बा का पूरा बदन कांप रहा है। ''किसने मारा?ÓÓ
''पता नहीं। मास्टर जी का तो कोई दुश्मन भी नहीं था।ÓÓ
इसे लगा, अब्बा के रुखड़े हाथ $खबर लाने वाले के कंधों में पैवस्त हो गए हैं। उसे अब्बा की दिल दहलाने वाली चीख सुनाई दी।
उसे केवल इतना लगा, मौत केवल मुसलमानों की खोज में नहीं निकली है। मौत तो सबके पीछे निकल पड़ी है... उसे लगा, सब बदलती हुई बेरहम $िफजा के हाथों की कठपुतलियां बन गए हैं... सब अपने अपने मौत के ठिकानों की तलाश में दौड़ लगा रहे हैं... और मौत मुस्कुराती हुई कह रही है- ''भागोगे कहां? जाओगे कहां? मुरादाबाद... मऊ.. भागलपुर... फैजाबाद फैज़ाबाद... बनारस... अलीगढ़... अहमदाबाद... गोधरा... कहां जाओगे...। कहां भागोगे... गुजरात, कश्मीर। मैं तो सब जगह हूं... सबकी आंखों में बसता हूं... मैं ही आतंकवादी हूं... और मैं ही $खौफ बनकर सबकी आंखों में सुलग रही हूं... कहां-कहां भागोगे।ÓÓ
उसे लगा, $फरार कहीं नहीं है। अब्बा किसी लाइलाज मरीज की तरह हाथ झटककर बिस्तर पर लेट गए हों... आंखों में गहरे 'खड्डेÓ पड़ गए। रोते-रोते आंखें सूज गई हैं...
आमिर खिड़की से दूसरी ओर देख रहा है... ठहर-ठहर कर कमरे के बोझल माहौल में अम्मा की सिसकियां गूंज जाती हैं। अब्बा के अंदर जैसे कश्मकश चल रही हैं... अभी-अभी तो रमा चचा के 'दाह संस्कारÓ से लौटे हैं। तब से बुत बने हुए हैं। अम्मा ने सर में तेल डाला। अब्बा कुछ नहीं कहते, कुछ नहीं बोलते। सिर्फ पत्थर बन गए हैं... आंखों में जैसे यादें सुलग रही हैं। अब्बा ने एक ठंडी सांस भरी। और बोझिल कमरा अचानक भूकंप से डोल गया। ''सुनो! हम गुजरात जा रहे हैं।ÓÓ
उन्होंने पहले अम्मा की ओर देखा। फिर मेरी ओर। खिड़की से बाहर झांकते हुए आमिर ने झुर्झुरी ली।
''यदि हमारा जाना रद्द नहीं होता है... तो...ÓÓ अब्बा की आंखें कमरे की उजाड़ दीवारें को घूर रही थीं... ''कोई जाए न जाए, मैं जाऊंगा... मुझे कोई $खौ$फ नहीं... हां सुना... मुझे कोई $खौ$फ नहीं है।ÓÓ
अब्बा के मुंह से कांपती हुई सांस फूट रही थी। ''इसलिए कि मैं जान गया हूं... गोली तो कहीं से भी आ सकती है... कहीं से भी... किसी को भी मार सकती है। क्या पता, यहीं कोई आतंकवादी छिपा हो... मैंने फैसला कर लिया है।ÓÓ
सर्दी बढ़ गई थी...
अब्बा के होंठों से गर्म-गर्म सांस उठ रही थी और आवा•ा की बर्फ़ पिघल-पिघलकर टूट रही थी...