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Wednesday 22 Nov 2017

कुल जमा दो


मनीषा श्रीवास्तव
बाली भवन, आरजेड-3बी/3, दाया छतरी वाला मार्ग राजनगर-1,
 पालम कॉलोनी
 नई दिल्ली-110045
वह संख्या में दो हैं, सिर्फ दो। आगे-पीछे बैठती हैं तब भी दो, और दाएं बाएं बैठती हैं तब भी दो। जमाना बीत गया, उनकी संख्या दो ही रही, कोई बदलाव नहीं हुआ। कहीं कोई जोड़ घटाव का प्रश्न ही नहीं उठा। सच तो यह है कि वह इस दो की संख्या की आदी हो चुकी हंै। उनके बीच एक प्रत्यक्ष रिश्ता है। मां बेटी का। लेकिन वह कई अप्रत्यक्ष रिश्तों से बंधी है। सहेली यानी सखी, बाप बेटा, मां बेटी, मां बेटा, मां बहनें यानी कई रिश्ते उनके बीच देखे जा सकते हैं। शत्रुता का भी। आपस में बांटे गए ये रिश्ते वे परिस्थितियों के अनुसार गढ़ लेती हैं।
अपनी छोटी-सी दुनिया में उन्हें तीसरे की जरूरत ही महसूस नहीं होती। कहा जा सकता है कि उनकी दुनिया में किसी तीसरे के लिए जगह नहीं है। हो भी नहीं सकती क्योंकि उनकी दुनिया में ईश्वर, संसार, स्त्री पुरुष, इराक, अमेरिका, कश्मीर, फैशन, सब्जियां, रिक्शा, मोमबत्ती सब कुछ है। अगर उनकी इस दुनिया को खंगालने की कोशिश की जाए तो पता चला है कि इसमें बड़ी भीड़ है। इस भीड़ में दोनों भटकती और सुकून पाते रहती हैं।
रिश्ते की डोर दिन पर दिन कसती गई। शायद इसमें कहीं कोई गांठ नहीं है। बिल्कुल सहजता से वे दोनों अपने आपको एक दूसरे से देखती महसूस करती और आश्वस्त हो जातीं। एक-दूसरे की मौजूदगी में सुरक्षा का अहसास आश्वस्ति को और बढ़ा देता है।
उनकी उम्र क्रमश: 72 और 42 बरस है। जाहिर है कि 72 साल वाली मां और 42 वाली बेटी है। लेकिन उम्र का यह फासला उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। व्यवहार में भले ही समानता हो लेकिन दैनिक जीवन में भिन्नता है। पहली जरूरत से ज्यादा सक्रिय और दूसरी जरूरत से ज्यादा निष्क्रिय है। पहली पेंशनयाफ्ता और दूसरी एक पब्लिक स्कूल में टीचर है। पहली की कोशिश होती है कि वह अपना हर काम खुद करे, दूसरी चाहती है कि उसे कोई काम न करना पड़े।
गर्मियों में वह रात को आंगन में और दिनभर कूलर के आगे जमी रहती है। बारिश में उनका काफी समय छत से पानी निकालने में बीतता है लेकिन छत पर गपियाने का मौका मिल ही जाता है। जाड़ा शुरू हो चुका है। अब उनकी बैठक आंगन की चटकीली धूप में या फिर अपने पलंग पर रजाई में लिपटे हुए होती है। सुबह दोनों अपनी दिनचर्या में रत होती हैं। पहली दूसरी के लिए तैयारियां करती है। दूसरी सुबह साढ़े छ: बजे स्कूल के लिए रवाना हो जाती है। पहली उसका टिफिन तैयार कर उसे रवाना करने के बाद पांच मिनट तक गेट पर खड़ी रहती है। फिर अंदर आकर काम में जुट जाती।
पहली का प्रमुख और पसंदीदा काम है घर के कोने-कोने की धूल झाडऩा और फिर पोंछा लगाना। करीब 300 मीटर में बने मकान का कोना-कोना पहली को चमचमाता चाहिए। 72 की उम्र ने उसे पराजित नहीं किया है यह बात उसके झाड़ू-पोंछा करते समय जाहिर हो जाती है। सफाई के नाम पर कोई समझौता न करने वाली पहली का गंदगी से रिश्ता है। वह एक ही कपड़े को दो-दो दिन तक पहने रहती है। बैठे-बैठे वह अपनी नाक साफ करती और उठकर उसी हाथ से पानी निकालती है। झाड़ू पोछा करते समय वह खास ध्यान रखती है कि रसोई का प्लेटफार्म कपड़े धोते समय बचाए गए साबुन वाले पानी से साफ हो, लेकिन वह यह भूल जाती है कि उस पानी में डुबाकर वह सारे कपड़े धो चुकी होती है।
दूसरी झाड़ू पोंछा में पहली को कभी मदद नहीं करती। छुट्टी के दिन जब वह घर पर होती है तब भी पहली की वह कोई मदद नहीं करती, उल्टे उसके झाड़ू पोंछा करते समय खुद टीवी देखती या बिस्तर पर लेटे रहती। पहली का झाड़ू पोंछा दो घंटे से कम समय में पूरा नहीं होता। ठंड हो, बरसात हो या गर्मी हो, उसे रोज पानी से गेट धोना ही है। पानी की किल्लत उसके लिए कोई समस्या नहीं।
सफाई पूरी करने के बाद पहली व्यायाम शुरू करती, नियमित दो से तीन घंटे। टीवी पर आने वाली फिल्म देखते हुए। कई बार थक कर बीच में बैठ भी जाती है। दोपहर डेढ़ दो बजे वह नहाने जाती। पति वायुसेना में एयरमेन थे और सालाना रिपोर्ट में चुस्त-दुरुस्त बने रहने के लिए नियमित व्यायाम करते थे। पहली ने उनसे व्यायाम सीखा और अब जरूरत से ज्यादा चुस्त रहना उसकी मजबूरी है वरना दूसरी के लिए काम कौन करेगा।
पहली के अपने नियम भी हैं जैसे मंगलवार, बृहस्पतिवार और शनिवार को सिर और कपड़े नहीं धोना। सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को वह कपड़े धोती हैं और बालों में मेहंदी भी लगाती हैं।
पहली का स्नान हो चुका है यह बात उसके हनुमान चालीसा पढ़ते हुए बाथरूम का पानी झाड़ू से निकालने पर पता चलती है। तौलिए से बाल सुखाते हुए वह बाहर आकर रामायण निकालती और सुंदरकांड पढ़ती। पांच मिनट बाद रामायण आलमारी में रखकर ताला लगाती और रसोई में जाकर दिया जलाती। एक अगरबत्ती सुलगाने के लिए वह गैस जलाती और फिर उस पर तवा रख देती। अगरबत्ती घुमाने के बाद आटा निकालकर अपने 'नाश्तेÓ की रोटी बनाती। तब तक दोपहर के तीन बज चुके होते हैं।
अब तक दूसरी घर आ जाती है और रसोई घर से ही बातें शुरू हो जाती है। 'मां आज तो गजब हो गया।Ó 'की होया पुत्तरÓ 'मेरी क्लास में एक बच्चा है दीपक। उसको कभी मैंने 70 से ऊपर आने नहीं दिया। इस बार मां, कापियां चावला ने चेक की और उसे 84 दे दिए।Ó 'चावला ने ऐ की कित्ता पुत्तरÓ 'देखा ना, पर मैं कुछ नहीं बोली। ट्वेल्थ में  तो मेरे हत्थे ही चढ़ेगा तब देखूंगी।Ó 'ओ पुत्तर होगा उनांदा कोई मामला, तैनू की लेना।Ó 'नई मां बात यह है कि दीपक का बड़ा भाई मेरी क्लास में था। एक दिन पता है, उसने मेरे साथ बड़ी बदतमीजी की। कहने लगा आप क्लास में आकर बैठ जाती हैं आपको ब्लैकबोर्ड में लिखकर पढ़ाना चाहिए। मां मैं क्लास में कुछ भी करूं उसे क्या लेना-देना। लेकिन उसने बहुत झंझट की और मैंने उसे 3-4 चांटे जड़ दिए, उसे क्लास में आने से मना कर दिया। वह प्रिंसिपल के पास चला गया। अब चोपड़ा को तो मौका चाहिए। पड़ गई मेरे पीछे। बड़ी मुश्किल से मामला टला। पिछले साल उसका भाई मेरी क्लास में आ गया। मैं क्या उसको छोड़ देती।Ó 'ना पुत्तर, दुश्मन दुश्मन होता है चाहे छोटा हो या बड़ा। उसे कम मत समझो।Ó 'अब छोटे मियां मैथ्स में प्राब्लम सही करते हैं पर मैं लगाम कस कर रखती हूं।Ó
दोपहर को 'नाश्ताÓ कर पलंग पर आने से पहले पहली ने दूसरी से पूछा 'अनार खाएगी।Ó 'नहीं।Ó पहली पलंग पर बैठ कर अनार छीलने लगी। दूसरी हाथ बढ़ाकर उठाने लगी। पहली कुछ देर चुप रही फिर बोल पड़ी 'आपूं छील, मेरे अनार न ले।Ó दूसरी खिलखिलाकर हंस पड़ी 'ले तेरा अनार, ओ दो चार दाने तो दे।Ó पहली ने अनारदानों की प्लेट उसकी ओर सरका दी और बोली 'जैन की बीवी बोल रही थी पेट्रोल महंगा होगा।Ó 'क्यों।Ó 'ओ पुत्तर अमेरिका ने इराक पर अटैक कर दित्ता सी।Ó 'हां माता, अमेरिका इराक पर कब्जा करना चाहते हैं।Ó 'नई ओय, उसनू ओदा तेल चाहिंदा। अमेरिका दे नाल तेल किदरों नई। इराक उसनू तेल नई देंदा। अमेरिका चाहदा सी अब उसकी बात मानें। ओ टैंकर लेकर इराक पर अटैक कर दित्ता।Ó 'छोड़ माता, ओ खाए खसमा नूं। अमेरिका एवी गल्ला बनांदा सी, ते इराक भी कम नहीं।Ó
दूसरी अनार खा चुकी थी। हाथों में लगे अनारदाने के रस को पलंग की चादर से पोंछने के बाद उसने खाली प्लेट पहली की ओर सरका दी। पलंग पर गिरे अनारदानों को साफ करना दोनों ने जरूरी नहीं समझा। कुछ देर वे उन पर बैठी बातें करती रहीं। फिर पहली ने कहा 'प्लेट रख आ न रसोई विच।Ó दूसरी ने अपनी आंखों को दबाते हुए कहा 'तुसी ले जाओ।Ó 'मैंनुं सोण दे, अक्खां सड़दी पई सी।Ó प्लेट वही पड़ी रही। दोनों ने कंबल ताने और लंबी हो गई।
कुछ देर में पहली की नाक बजने लगी। सोते समय उसका मुंह खुल जाता था और उसकी नकली बत्तीसी दिखने लगती थी। दूसरी कुछ देर लेटे -लेट अपने मोबाइल फोन से खेलती रही, फिर उसने रेडियो लगा लिया। कांटा लगा... के साथ सुर में सुर मिलाने की सफल कोशिश करने के बाद वह भी नींद के साए में चली गई। दुनिया की गतिविधियों से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। उनके अपने सरोकार अलग हैं। शाम करीब सवा सात बजे पहली उठी। जम्हाई लेते हुए अलसाए कदमों से बाथरूम गई फिर वापस आकर फ्रिज से संतरे निकाले और जूस निकालने रसोई में चली गई। दूसरी सोते रही। जूस पीने के बाद पहली ने टीवी चालू किया, कुछ देर तक एक धारावाहिक को देखने के बाद रसोई में चली गई। फिर आकर उसने दूसरी को आवाज देकर उठाया और उसे जूस दिया। दूसरी ने इस तरह जूस पिया मानो पहली पर अहसान कर रही हो।
पहली ने उससे पूछा 'दस की खाणा ए।Ó दूसरी ने कोई जवाब नहीं दिया। पहली ने सवाल फिर दोहराया। दूसरी ने पूछा 'क्या है तेरे पास।Ó पहली ने सब्जियों की सूची गिना दी। दूसरी ने कहा 'पकोड़े बना दे।Ó पहली ने कहा 'पुत्तर सब्जियों विच बड़ी ताकत होंदी ए। असी बीमारियों से बचे हैं तो इसलिए कि सब्जी खांदे ए। पकोड़े विच तो तेल होगा।Ó दूसरी के जिद करने पर पहली ने पकोड़े बनाए और रोटियां। दोनों टीवी देखते हुए खाने लगी। अचानक दूसरी उठी और चैनल बदलकर एएक्सएन पर आ रही एक एडल्ट फिल्म लगा दी। पहली ने पहले नाक मुंह सिकोड़ा और फिर चुपचाप देखने लगी। बीच-बीच में दूसरी फिल्म के अंग्रेजी डायलाग को हिन्दी में बताती जा रही थी।
खाना खत्म हो गया था। पहली बर्तन समेट कर साफ करने चली गई दूसरी फिल्म देखती रही। पहली ने रसोई समेटी और फिर अपने कपड़े बदले तथा बत्तीसी निकालकर पानी में डाली। दूसरी को सोने के लिए आवाज देकर वह बाहर गई। गेट पर ताला लगाने के बाद वह सोने आ गई। घड़ी साढ़े दस बजा रही थी। दूसरी ने पूरी फिल्म देखी उसके बाद टीवी बंद कर सोने आ गई। बिस्तर पर एक बार फिर बातों ने आकार लेना शुरू कर दिया।
दूसरी बोली 'तेरे पकोड़ों में आज मजा नहीं आया।Ó 'की कसर थी।Ó 'निमक शिमक तूने ज्यादा डाल दिया था। गोभी छोटी कर दी थी।Ó 'खाओ खसमा नू।Ó 'अरे गुस्सा क्यों करती है। सुन, तू मेरे लिए एक कड़ा बनवा दे सोने का।Ó पहली चुप रही। दूसरी ने फिर दोहराया 'मां, सो गई क्या मेरे लिए एक कड़ा बनवा दे ना सोने का। इतना मोटा। स्कूल में सब टीचरें पहनकर आती हैं। मेरे पास नहीं है।Ó 'तू बनावा ले ना आपूं।Ó 'मैं कहां से बनवाऊं, पैसे ही नहीं हैं मेरे पास। 15 हजार सेलरी है, 13 हजार मकान की किश्त पटाती हूं। तू बनवा दे ना।Ó 'ओ पुत्तर 15-20 हजार में मिलेगा कड़ा। अगले मीने बना दूंगी।Ó 'ठीक है। अच्छा कल मलाई मंदिर चलेगी। वहां से सरोजिनी नगर चलेंगे। कल तू तैयार रहना, मैं स्कूल से आऊंगी और दोनों निकल चलेंगे। ठीक है।Ó 'ठीक है। पर ओ गुप्ते नूं की करां।Ó 'ओ हां, कल तू उसको बोल दे संडे को आने के लिए।Ó
गुप्ता वह 'लड़काÓ था जो दूसरी को विवाह के लिए देखने आने वाला था। दूसरी को ज्योतिष का शौक इतना था कि अधिकतर लड़कों के ग्रह खराब से नजर आते, और जिसके ग्रह पसंद आते, वह लड़का उसे नापसंद कर देता। उम्र का 42वां बसंत इसी तरह आ गया था। हर महीने एक दो लड़के देखे जाते। लड़के क्या उनमें से कुछ तो 50 और उससे अधिक उम्र के भी होते। दूसरी कोई न कोई ऐब बताकर मना कर देती। इस रविवार को गुप्ते की बारी थी। कपड़ों का व्यवसाय करने वाला गुप्ता दो बेटियों का बाप था, पहली पत्नी तलाक ले चुकी थी। पुरानी कहानी रविवार को एक बार फिर दोहराई गई।
रविवार की रात गुप्ते का खाका कुछ इस तरह खींचा गया 'मां, उसकी पहली बीवी खुद नहीं गई, इसने उसे तलाक दिया है।Ó 'तैनु की पता।Ó 'मैंने पूछा तो उसने कहा कि वह तलाक लेकर चली गई। उसने झूठ बोला मां। ऐसे कैसे कोई तलाक लेकर चला जाएगा।Ó 'पुत्तर, ए खसमाखाना खुद उसनू तंग कित्ता होगा। अपनी गलती थोड़े बताएगा।Ó 'कैंदा ए, और बच्चे नहीं चाहिए। तू बता मां, मेरा कोई नहीं होगा, बस उसकी और उसकी बेटियों की गुलामी करती रहूंगी। मैंने तो तबियत से झाड़ दिया उसे।Ó 'ठीक कित्ता पुत्तर।Ó वो बैंक वाला अच्छा था तुझे पसंद नहीं आया। पर वो ठीक था।Ó 'कौन बैंक वाला।Ó 'वही जिसके घर हम गए थे। जिसकी बीवी की तस्वीर लगी थी। उसने बताया था कि जल कर मर गई थी।Ó 'मैनूं कब पसंद नहीं आया था। तू बोली थी कि उसने अपनी बीवी को जलाकर मारा है। मना तो तूने की थी।Ó 'नहीं, तूने कहा था कि लगता है वह शराब पीता है। याद कर तूने मना लिया था।Ó 'गल्लां न बना, मैंने कोई मना नहीं किया।Ó
दूसरी का सुर बदल गया था। 'अब तू न माने तो मैं क्या करूं। जो मैं पसंद करती हूं, तू ना कर देती है। तेरी ना-ना सुनते-सुनते मेरी शादी कोई नहीं होने वाली।Ó पहली भड़क उठी 'देख, मेरे उपरों आरोप न लगा। मैंने कोई मना नहीं कित्ता। जो मेरे बस में होंदा तो कबकी तेरी शादी हो गई होती। हर बार तू नां कैंदी हैं, मैं की करां। तू अज दस ते मैं कल तेरा व्या कर देना।Ó 'रै ने दे, तेरे को मेरी चिंता कोई नहीं। ये नई सोच दी कि तू मर जाएगी तो मेरा की होगा।Ó 'ओ रंडिए, झूठ न बोल, होर की करां मैं तेरे वास्ते दस मैंनुं।Ó दूसरी जोर-जोर से रोने लगी और पिता की याद करने लगी। पहली कुछ देर चीख-चीख उसके आरोपों का जवाब देती रही, फिर करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगी। कुछ देर बाद दूसरी भी सो गई।
अगले दो दिन घर में मौन पसरा रहा। तीसरे दिन दूसरी स्कूल से आकर पानी लेने जब रसोई में आई तो पहली बोली 'गुलाब जामुन खा ले।Ó दूसरी भी मौन से पीछा छुड़ाना चाहती है। बोल पड़ी 'किदरों लाए।Ó 'निमक लैण वास्ते गई थीं तो ताजे गुलाबजामुन दिखे। बस लैं आई।Ó 'मां, सुन वैष्णोदेवी चलें, कश्मीर घूमकर आएंगे।Ó 'चल, अभी तो मौसम अच्छा है।Ó बातें एक बार फिर आकार लेने लगी हैं।