Monthly Magzine
Sunday 19 Nov 2017

किस्सा एक ब्रांड मजनूं का

 

 महेश्वर नारायण सिन्हा
 बी टाईप
ढ्ढ  आई वीएसपी क्वाटर्स
हॉस्पीटल सेक्टर
दल्ली राजहरा
जिला बालोद (छ.ग)
जिंदगी व्यंग्य है, विडम्बना है, टेढ़ी-मेढ़ी है। विचित्र है। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे छक्के लाल वल्द श्री चंदूलाल गुप्ता, सानिक मिर्जापुर, थाना मानपुर, जिला रहने दीजिए, उम्र तीन कम तीस साल यानी सत्ताइस साल, शिक्षा ग्रेजुएट कामर्स, चेहरे- मोहरे से स्मार्ट, कद पांच फुट सात इंच, गेहुंआ रंग, स्लिम, स्टाऊट, स्पोर्टसमैन फिगर, जुल्फें लटके- झटके खाती, कई-कई फिल्मी स्टारों से मेल-मिलाप करती जींस, स्पोटर््स शू, ऊपर टी-शर्ट, कमर में मोबाइल खोंसी, इन छबि वाले मिस्टर छक्के लाल गुप्ता जी को इस उम्र में अचानक और इस खस्ता हालत में वह सत्रय वर्षीया अमीर घर की मॉड, बल्कि अल्ट्रा मॉड कुमारी सिमरन नहीं मिलती। पर मिल गई। मिलना था तो मिल गई, वह भी ऊंचे घराने की पढ़ी-कान्वेंट की, पैसे वाली और खूब पैसे फेंकने वाली। अब मिल गई तो मिल गई अपन को क्या करना है अपनी-अपनी किस्मत।
जब से छक्केलाल जवान हुए हैं और लड़का-लड़की क्या होता है की जानकारी हुई है तब से लेकर आज तक इश्क की ताक में रहे। हर चौराहे की खाक छानी। मगर कोई न मिली। बेचारे सुन्दर और स्मार्ट होते हुए भी कोरे रहे। यहां आपकी किस्मत ही ऐसी हुआ करती थी कि आप वहां जाकर अपना भाग्य आजमाते थे जहां के भाग्य का फैसला हो गया होता था। मतलब कि, यानी कि, वो क्या कहते हैं कि, लड़की का चक्कर किसी से चल चुका होता था तब आप पहुंचते थे। आपकी गाड़ी लेट से आती और गलत प्लेटफार्म पर। रिंग लगाते, घंटी बजती और हमेशा रांग नम्बर पर। पर उस दिन एकदम से और अचानक में ही नम्बर मिल गया। जब आपकी सारे संसार से उम्मीद उठ गई थी तभी यह चमत्कार हो गया। इसीलिए इस दुनिया की चाल को या कहिए, जिंदगी की चाल ही टेढ़ी-मेढ़ी है, व्यंग्य और विडंबना है। खैर, मेरे यारों। जिंदगी की यह यू-फोल्ड वाली चाल ने हमारे छक्के लाल गुप्ता के दिन आबाद कर दिए और रातें गुलजार। उनकी तबियत खिल गई। स्मार्ट तो थे ही, अब स्मार्टर हो गए रंगीन तबियत अब मल्टी फेरियस कलर्ड की हो गई। उनकी जुल्फों का हाल सुनिए- वे सोमवार को सीधे उठी हुई, तनी, मंगलवार को मानो बजरंगबली का उपवास करते हुए एकदम सोई हुई सुस्त रहती, बुधवार को कहीं हाट-बाजार में निकली प्रतीत होती, झोला लेकर इधर-उधर लटें बिखरी, उखड़ी रहती, लहराती, वृहस्पतिवार को फिर उन्हें ख्याल आता यार बहुत हाट-बाजार घूम ली, आज आराम करो, और उस दिन आपके केश सजे-संवरे सज्जनुमा होते। दूसरे दिन यानी शुक्रवार को फिर शुकरिया बाजार आदिवासी इलाके वाला के माफिक हो जाता। दाएं की जगह बाएं से मांग खींच लेते, कभी दाएं-बाएं से तगड़ा मांग निकाल लिया और बीच की बाबरी नाक तक लटका दिया। शनिवार को फिर आपकी जुल्फों पर शनिदेव का कोप सवार रहता और रविवार को वे छुट्टी मनाती, यानी आज न मांग काढऩे की फुरसत न बाल संवारने की। वह जैसी है वैसी रहेगी। तैर रही है तो तैरने दीजिए, डूब रही है तो डूबने दीजिए। बह रही है, उड़ रही है, डरी-सहमी है, चिपकी सटी है, जगी है या सोई है, उसे यथास्थिति में रहने दीजिए। अंगरेजी में एज इट इज। अंडर स्टैंड ...।
और मूंछे। एकदम साफ। टायलेट की तरह। ऐसी साफ की देखने वाले कहें कि इसने क्या इसके बाप ने भी मूंछे नहीं देखी होंगी।
हमारी प्यारी सिमरन डार्लिंग। आप इस अदा पे तार-तार हैं। फिदा हैं। हैप्पी हैं। मजनूं हो तो ऐसा। अल्ट्रा टाइप। यह क्या वही घिसा पिटा, पिटा-पिटाया फार्मूला। वह कुछ अलग हो, अल्ट्रा हो, समथिंग डिफरेंट, कुछ स्पेशल, यानी कि क्या कहूं कि, अरे वही कि वह जरा स्पेशल हो, ना नमकीन, न मीठा, न तीखा, न खट्टा, न कड़वा, न सूखा, न गीला, न कोमल, न कठोर, न ही पूरा अरेंज्ड न ही नॉन अरेंज्ड, यानी वह फिफ्टी फिप्टी...। एकदम स्पेशल हो। समथिंग खास।
और छक्केलाल एकदम ही खास थे, ठीक से पकड़ में ही नहीं आते थे कि कौन से ब्रांड मेड हैं, मतलब, आमिर, अजय, अमिताभ, गोविंदा या फिर माधुरी या काजोल या दिलीप कुमार के सगीना, सगीना महतो। लिहाजा वे एक मल्टीफेरियस प्रोडक्ट हो गए थे। टाई-कोट हाइफेन के साथ बांसुरी बजाने वाले। धोती कुर्ता-लंगोट में बिलियर्ड खेलने वाले। शौक भी आप खूब फरमाते। आप जब अपनी महबूबा के साथ होते तो पचास वाली वह पुडिय़ा खाते, दोस्तों के बीच तम्बाकू, ठोंकते, शादी-ब्याह पार्टियों में पान, दारू पार्टी में सिगरेट। आप इन राहों के अकेले खिलाड़ी थे। एक हरफनमौला खिलाड़ी की तरह। यह सब तो ठीक था, पर एक समस्या थी, आपकी नौकरी पक्की नहीं थी। घर से भी ले-देकर  मांड़-भात ही थे। आलू-अचार से आगे बढ़ ही नहीं पाए। तीन भाई, सभी के सभी घेल। आप मंझले थे, एक बहन। शादी होना शेष था। पिताजी एक मिल से रिटायर हुए। दो-ढाई लाख बैंक में जमा होगा और यह श्रमिकों की बस्ती अपना दो कमरे वाला एक छोटा सा घर। हां, उसके बरामदे को बढ़ाकर आवश्यकतानुसार एक कमरा निकाल लिया है और एक छोटा सा छत पर तैयार कमरा है। आजीवन नौकरी में रहते पिता जी ने यही एक नेक काम किया। बाकी आप सब को लिखाया-पढ़ाया। और सबसे बढ़कर चार-चार मुसटंडों सहित खुद खाया-पिया। भले ही आलू भात खाया-खिलाया मगर खिलाया तो। अपनी-अपनी किस्मत।
आप एक लोकल कंपनी में सेल्समैन हैं। टूथब्रश, पेस्ट, साबुन, टिकिया, डिटरजेंट, ब्लेड, रेजर, शेविंग सेट, कंघी, लाइटर, चाकू, चम्मच, स्टिक एंड नॉन स्टिक प्लेट्स वगैरह झोली में लेकर बेचते हैं। घर-घर घूम-घूमकर। आठ सौ रुपए तनख्वाह, दस रुपए रोज का भत्ता, बाकी दस परसेंट कमीशन। जितना आप माल बेच लें। महीने भर रगड़कर मेहनत करने पर भी अपने पास हजार दो हजार से अधिक नहीं बचते हैं। पर, पहनाव-ओढ़ाव ऐसा है, ठाठ ऐसे हैं कि लगता है महीना में पन्द्रह हजार कमा रहे हों। मोबाइल, हालांकि वह कंपनी की तरफ से है, बाइक, वह भी उसी की। बाइक गांव-गांव, शहर-शहर घूमने के लिए, मोबाइल सेठ ने इसलिए दे रखा है कि आपकी जब-तब खबर ली जाए कि आप कहां हैं, दिन भर की प्रगति क्या है। मोबाइल का नंबर और कोड आपकी लोकल सिटी लोकेट कर देता है। सेठ बैठे-बैठे संतुष्ट हो जाता है कि आपका कर्मचारी काम पे है। घूम रहा है। माल बिक रहा है और फिर पैसा कमाना है तो आप स्वयं अधिक से अधिक कमीशन पाना चाहेंगे। यानी माल निकालना चाहेंगे। तो, इसी ठाठ में जब डार्लिंग सिमरन मिली, हाय हैलो, कुछ परिचय बढ़ा, प्रारंभिक सूचनाओं का आदान-प्रदान हुआ तो आपने तत्काल अपनी आय पन्द्रह हजार महीना बताया और पद बताया एरिया मैनेजर। हालांकि आप सेल्स एक्जीक्यूटिव थे। तब आप अपने को सेल्स डायरेक्टर कह लीजिए या और कुछ भी हो मोहतरमा के सामने आपकी चल गई। जम गई। बात बन गई। कहां मोहतरमा एक रिटायर्ड कर्नल की बेटी, उसके बड़े भाई एनआरआई, नॉन रेसिडेंसी इंडियन अमेरिका में, बड़े बिजनेस के साथ। मोहतरमा अपने मां-बाप के साथ अकेली इस शहर में पॉश कॉलोनी में रहती थी। हालांकि अपने मां-बाप भाई बहनों के बारे में सब कुछ बता दिया। कोई बात नहीं मोहतरमा खुले विचारों वाली, खिले चेहरे वाली, अध खुले वस्त्रों वाली नई मार्डन गर्ल थी। स्कूटी उसका प्रिय बाइक था। हालांकि नियमत: आप अभी गियर वाली गाड़ी या स्कूटर चला नहींसकती थी, अठारह पार नहींथी, बालिग नहीं हुई थी इसलिए बिना गियरवाली स्कूटी का ही लायसेंस आपका बनाता था, वरना अबकी बर्थ डे में डैडी से करार है इंडिका आपको गिफ्ट होगी। हैप्पी बर्थ डे टू यू सिमरन। आपके बड़े भैया वहां से, अमेरिका से डॉलर भेजेंगे, क्या कहते हैं, वह लाखों में कन्वर्ट होता है। वहीं से आपके लिए हर दो चार महीने में जेब खर्च भी होता है। डॉलर में। रुपए में क्या कहते हैं कि पचीस-पचास हजार से कम नहीं ंहोता है। आपका यह मंथली जेबखर्च है जी। मोहतरमा यह सब खुल के बताती हैं। सिटी हार्ट और शहर के बाहर थ्री स्टार होटलों में चाय काफी और सॉफ्ट ड्रिंक आपके साथ लेती है। मोहतरमा ने आपको एक अलग मोबाइल भेंट की है। वह आपके बगैर एक पल भी नहीं रह सकती। सबेरे गुड मार्निंग मोबाइल पे होती है, मोबाइल पे मोहतरमा का कॉल आया तो पौन आधा घंटे की छुट्टी समझिए। आप टट्टी खोली में बैठे होते हैं, इधर मोहतरमा नरम-नरम बिस्तर में लेटे-लेटे चाय के मजे उड़ाती है, हाय। रात कैसी रही, मुझे तो नींद ही नहीं आई, क्योंकि आंख खुले मैं तेरे ख्वाब देखते रही। तुम तो ख्वाबों में और भी अच्छे लगते हो और हां, ख्वाबों में तुमने मुझे बहुत बड़ा गिफ्ट किया है, इतना बड़ा, इतना अद्भुत कि सभी अचरज में हैं, क्या दिया था तुमने, क्या ऐसा ख्वाब है तुम्हारे दिल में, बताओ न वो क्या चीज थी, मैं उसे समझ नहीं पाई, ठीक से देख नहीं पाई अब तुम्हीं बताओ। मैं तो इतना जानती हूं कि मैं बहुत-बहुत और बहुत खुश हूं, बस मैं गर्व से भर गई हूं। मैं तुम्हें किस कर रही हूं, हमारी फ्रेंड्स मेरे से जेलस है, सुनो। छक्कू। तुम ऐसा कुछ गिफ्ट करो न कि लोग देखते रह जाए। लोग कहे कि वाऊ कितना लव करता है, तुम्हारा छक्कू। छक्कू। आई लव यू। किस यू। छक्कू, तुम कुछ बोलते नहीं, मुंह में पूड़ी उड़ेल ली है क्या, थूको न। ओ, शिट्, तुम बात भी नहीं करते। मैं तुम्हारी आवाज सुनने के लिए बेताब रहती हूं। और तुम हो, तुम तो मुझे याद भी नहीं ंकरते होंगे। छक्कू। एक बात बताऊं, मेरी जितनी भी सहेलियां हैं। और उनके ब्वाय फ्रेंड्स हैं, सब तुम्हारे सामने पानी भरते हैं। क्या बताऊं, कोई तुम्हारे सामने चपरासी दिखता है, कोई टपोरी, कोई विलेन। बस एक हीरो तुम ही नजर आते हो, आई एम प्रॉउड ऑफ यू डार्लिंग। सो हैंडसम। तुम इतने स्मार्ट हो। कसम से, बाइक पर तुम और अधिक यंग और हैंडसम लगते हो। आज मैं तुम्हें एक गिफ्ट करूंगी, बोलो क्या जानते हो, बाइक चलाते वक्त का एक खास किस्म का चश्मा। इसे पहनकर जरा मेरी सहेलियों को दिखा देना। वाऊ। सबके सब जल जाएंगी। छक्कू। तुम मेरे पहले और आखिरी लव हो। मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकती। अब बताओ आज कब और कहां मिल रहे हो।
छक्कू टट्टी खोली में बड़ी देर से बंद थे। बाहर से आपका भाई आवाज लगा रहा था, निकल बे। जोर की लगी है। आप अंदर मोबाइल पे रोमांस जी रहे थे और हल्का हो रहे थे, संक्षिप्त सा जवाब देकर लोटा उड़ेला। बाहर निकले। मोबाइल गले में हार की तरह लटकी पड़ी थी।
मतलब ये कि ये मोबाइल आपकी भौतिक दूरियों की दुश्मन थी। आप खाने में बैठे हैं, मोहतरमा को आज खाना बहुत पसंद आ रहा है। एक खास किस्म का अचार आया है, एक्सपोर्ट क्वालिटी, उसका स्वाद छक्कू चखे तो मजा आ जाए। खाने की चीज ऐसी होती है कि अकेले मजा नहीं आता। जो दो हो, चार हो तो क्या कहने, पर यहां छक्कू हजार के ऊपर भी भारी थे। प्रेमी थे। आज उनका स्पेशल आलू भरा पराठा बना है। मोबाइल पे काल किया, छक्कू शहर से साठ किलोमीटर दूर है, अभी वक्त खाने पर कैसे आ सकते हैं, आलू भरा पराठा फिर कभी। मेहबूबा बासी पराठा खिलाने से रही, पर उनके दिल में दर्द उठा, वे रो पड़ी, छक्कू। कैसे बताऊं। तुम्हारी कितनी याद आ रही है। काश तुम आ जाते। हमारे लिए इतना भी नहीं कर सकते।
मोबाइल लव सिर्फ इतने तक सीमित न था। वह सिर्फ बोलती ही न थी, खामोश भी होती थी। गुस्सा है, नजाकत है तो उनका फोन आया है, यहां गुस्से में मोबाइल ऑफ कर दिया। फिर ऑन किया। फिर वहां से घंटी बजी। फिर ऑफ। फिर ऑन फिर बजी, फिर ऑफ। मतलब किसी न किसी बात में नाराजगी है। रूठना है। अब मनाना होगा। मनाने के लिए प्रेमी बार-बार घंटी बजाएगा, बार-बार। जब प्रेमिका का गुस्सा उतर जाएगा तो मोबाइल पे बोलेंगी, हैलो। अब कहां से मोबाइल बंद होगा यानी वे गुस्से में। अब आप मनाना चालू करेंगे।
इसी तरह मोबाइल संकेतों की भाषा भी बोलती थी। रात को खासकर अकेले में, बीच रात को, नींद नहीं आ रही है, उनकी याद बड़ी जोर से आ रही है, करवटें बदली जा रही है, ख्वाब भी सता रहे हैं, यह नरम बिस्तर, तकिया, रजाई दुश्मन बन बैठे हैं, तब एक अलग बेचैनी है, आप अपनी बेचैनी मोबाइल में बताती हैं, नम्बर लगाया, उधर घंटी बजी यहां से ऑफ किया, फिर बार-बार उन्हें नंबर लगाया, बार-बार ऑफ किया उनके हैलो बोलने से पहले। अगर गलती से उन्होंने हैली कर भी दिया जो उनकी आवाज सुनते रहनी है, कहना कुछ नहीं है, यानी ऐसी बात ही है कि कहते नहीं बन पा रही है, बस एक खामोश संवाद है, उधर से हौले से आवाज आती है, बार-बार आती है- नींद नहीं आ रही है बड़ी बेकरारी है।
इधर मौन मोबाइल ऑन है पर जुबान ऑफ। बस थोड़ा दिल की धड़कनें तेज हैं, सांसे कुछ उछलकर चल रही हैं। वहां से आश्वासन मिलता है, बस एक साल और। आप अठारह की हो जाएं। और उधर छक्कू की जुबान फिसलते-फिसलते रुक जाती हैं कि कहीं से एक करोड़ रुपए इंतजाम हो जाए फिर एक फ्लैट कश्मीर में, इस शहर में और एक अमेरिका में बनाकर हम सुखी वैवाहिक जिंदगी जिएंगे। बस एक करोड़। पर छक्कू चुप रह जाता है। सिर्फ अठारह वाली बात कहकर रह जाता है।
उधर से रोने और हिचकने की आवाज मोबाइल में स्पष्ट हो जाती है।
सिर्फ ख्वाब देखने से कुछ नहीं होगा। करोड़पति बनने के लिए कुछ करना हेगा। करोड़पति। करोड़पति कैसे बना जाए? छक्कू रात-दिन उसी सोच-फिकर में रहने लगे हैं। उनके पास कम से कम साल भर और अधिक से अधिक दो-तीन साल है। ऐसी मोहतरमा से विवाह करने के लिए बैंक-बैलेंस कम से कम करोड़ में तो हो। आज की तारीख में एक झाड़ू बेचने वाला भी कार में घूमता है, बस दिमाग चाहिए, लगन चाहिए। हुनर चाहिए, कारीगरी चाहिए, जरूरत पडऩे पर कुछ जादूगरी भी।
छक्कू तो मात्र एक सेल्समैन है। तो क्या हुआ। बड़े-बड़े उद्योगपति, बड़े-बड़े पूंजीपति, रईस और सफल लोग चांदी का चम्मच लेकर पैदा होते नहीं, नीचे से लोग उठते हैं। मेहनत से उठते हैं। वह भी मेहनत करेगा। जी-तोड़ के मेहनत करेगा। खूब माल बेचेगा। अपना दस परसेंट कमीशन से पांच निकालकर बाजार में सस्ता माल खपाएगा। जितना ज्यादा माल बिकेगा उतना अधिक उसका कमीशन भले ही उसका परसेंटेज कम हो जाए, आधा हो जाए। बाजार में खड़ा होने के लिए कुछ त्याग तो करना ही होगा, सेठ को क्या चाहिए, उसका माल खूब बिके, सेठ को क्या, उसका दाम तो मिल रहा है, वह खूब माल बेचेगा और अधिक से अधिक जिले कवर करेगा। तरक्की का यह रास्ता सही है। प्राइवेट जॉब है, अच्छा करेगा रातों-रात तरक्की पाएगा। वह सचमुच का एरिया मैनेजर बनकर पन्द्रह हजार सेलरी पा सकता है।
इन भावनाओं से प्रेरित हो और प्रति उत्पाद अपना लाभ-हानि जोड़ घटाकर वह रिस्क उठाते हुए दूसरे दिन से ही शहर की गली-गली घूमने लगा। बैग में एक पूरा बाजार लिए वह घूमता। घूमते-घूमते तरह-तरह के ख्याल आते, सोचता कभी जमाना ऐसा था कि लोग बाजार में स्वयं पहुंचते थे, आज बाजार और दुकानें चलने फिरने लगी हैं। घर-घर जाकर दस्तक दे रही हैं। उनकी जरूरतें बताकर कि वह आपके लिए ही है, इससे आपका सुख बढ़ जाएगा। गोया लोगों को यह मालूम नहीं कि उन्हें क्या चाहिए, क्या नहीं, उनके घर टूथ-ब्रश है, उनके घर लाइटर है, उनके घर लैंप है, उनके घर घरेलू जरूरतों की सारी चीजें हैं, पर आपकी दुकान में जो इस वक्त भरा पड़ा माल है वह गृहणी के घर नहीं हैं। उनके पास टूथ-ब्रश से लेकर झाड़ू तक जो कुछ भी है, सब कुछ खास है। यह झाड़ू है मगर फोल्डिंग झाडू है, सिंथेटिक है, टिकाऊ है, सुन्दर है, सॉफ्ट है, वह पुराने मॉडल वाली देशी झाड़ू झड़ती है, यह झडऩे वाली नहीं है। ड्यूरेबल है। एक बार लीजिए और वर्षों निश्चिंत हो जाइए। इसके इस्तेमाल में आप झुकेंगे नहीं, आपकी कमर सीधी रहेगी। यह फायदे हैं। यह शेविंग सेट है, यहां नेलकटर है, रेजर है, चाकू भी लगी है, जब चाहा जैसा इस्तेमाल किया। ट्रेन में सफर कर रहे हों या बस से कहीं जा रहे हों, पॉकेट से इस सेट को निकाला और सेब काटकर खाने लगे। जहां आपके नख बड़े हो गए, पॉकेट से निकालकर इसे यों नेल कटर बना लिया। यह शेविंग क्रीम है, कहीं कट-फट गया तो एंटीसेप्टिक की तरह इस्तेमाल कीजिए। यह एक पूरा सेट मात्र सौ रुपए में। यह है नायाब चीज। आपके घर चाकू नहीं तलवार हो, नेलकटर हो, छुरा, चम्मच, उस्तरा कुछ भी हो, सब कुछ हो, पर यह नायाब चीज नहीं है। बस जरा दो मिनट अपना समय दे दें। अपना माल मुग्ध करेगा ही। कोई न कोई आइटम खरीदेगा ही। यह नहीं पसंद आई, घरेलू यूज की और भी चीजें हैं। यह बाथरूम से संबंधित चीजें हैं, यह सोप स्ट्रीप, यह नाली और गंदगी साफ करने वास्ते, यह टायलेट, प्रीपेशन। आप बच नहीं सकते। रसोई से लेकर ड्राइंग रूम तक की चीजें इस अदद थैले में भरी पड़ी हंै।
यह सब तो ठीक था, मगर एक बात सोचकर छक्केलाल आतंकित हो गए कि यार, कहीं अपनी मेहबूबा ने उन्हें इस हाल में देख लिया तो। कहीं सचमुच में ऐसा हो गया, मोहतरमा ने चोरी पकड़ ली, फिर।
फिर उनकी खोपड़ी ने अपना बचाव करना शुरू किया। कह दूंगा कि अपनी कंपनी के माल किसी होल सेलर को बतौर सैंपल दिखाने आया हंूं। ठीक, अगर घर घुसते या खुदा ना खास्ते कोई उनकी सहेली का ही घर निकल पड़े और भांडा फूट जाए तो। बचना मुश्किल है। क्या किया जाए। एक उपाय है। एक बार जब झूठ बोल ही दिया तो डरना क्या, दो चार और सही। चोरी पकड़ाने पर कह दूंगा कि अपना एक खास दोस्त है, उसकी प्रेमिका को उसके घरवालों ने जबरदस्ती कहीं छिपा दिया है, किसी रिश्तेदार के यहां भेज दिया है। इसी शहर में है, इसकी शादी की तैयारी हो रही है दोनों मिलकर कहीं भाग न जाएं, इसलिए घरवालों ने गुम कर दिया है। इसी शहर में है, घर-घर तलाश हो रही है, इससे बढिय़ा उपाय कहां कि एक सेल्स प्रतिनिधि बनकर घर-घर की तलाशी ली जाए। फिलहाल यह स्टोरी अच्छी है। बाद का बाद में देखा जाएगा। फिर ऐसा ही विचार कर कि किस परिस्थिति में उसे क्या कहने है और क्या नहीं, छक्केलाल रात-दिन अपने काम में जुट गए। पर कहीं आत्मग्लानि थी, कहीं एक कील थी जो उन्हें दुखाती थी। ये झूठ कब तक। किसी भी लड़कियों की जमात को देखते तो यही प्रतीत होता कि अपनी सिमरन है अथवा उसकी सहेलियां। कहीं पोल खुले न। अगर खुल ही गई और बहाने के बाद भी कहीं जानेमन रूठ गई तो। विश्वास न की तो। फिर छक्केलाल सिमरन को खोना भी नहीं चाहते थे। वे भयभीत से रहने लगे। एक आंतरिक बेचैनी में जीने लगे। पैसा हो, पैसे के लिए मेहनत वे कर रहे थे, पर रातों-रात पैसे आने वाले थे नहीं। और महीना दो महीना जी तोड़ मेहनत के बाद भी इस तरीके से कुछ बहुत अधिक आने वाला था नहीं। हां, इस तरकीब से छक्केलाल बहुत अच्छा धंधे करने लगे थे और मालिक की नजर में जल्द ही बड़े दायित्व के लायक हो रहे थे। पर यह जो घर घर झोला लटकाकर बाजार बने घूमने वाली बात थी वह उन्हें पिंच किए रहती। गोया सिमरन उन्हें अंदर से चेतावनी दे रही हो, उंगली दिखा रही हो। झूठे, फरेबी। चोर। तेरी चोरी पकड़ी गई। दगाबाज। हमने कितना निश्छल समझकर प्यार किया और तू एक झूठा।
बस, बस। अब और नहीं। एक दिन छक्केलाल ने बहुत जल्द उस कंपनी को छोड़ दिया और एक ट्रेक्टर डीलर के यहां ज्वाइन कर ली। तनख्वाह वही घिसी-पिटी। घूमने के लिए एक बाइक, मोबाइल, तीस रुपए रोज भत्ता और बाकी कमीशन। एक ट्रेक्टर और ट्राली के बिकने पर लगभग पांच हजार कमीशन बनता था। साल में दस-बारह ट्रैक्टर निकल गए तो चालीस पचास हजार रुपए बुरे नहीं थे। फिर उसे और काम मिलता ही क्या? सरकारी नौकरी है कहां, स्वरोजगार के लिए फंड कहां, उसकी पढ़ाई कोई हाई-फाई पढ़ाई है नहीं, एक साधारण ग्रेजुएट। अब और क्या चाहिए। कैसा काम मिलेगा। बहुत अच्छा नसीब हुआ और अच्छा काम हुआ तो इस ट्रैक्टर डीलिंग में दो चार साल में मात्र लखपति बना जा सकता है। एक खाली जेब वाली के लिए एक उपलब्धि भी एक ख्वाब से कम न थी, पर यहां तो सिमरन थी, सत्रह वर्षीय। यहां तो एक करोड़ का सपना था। उससे कम में गुंजाइश कहीं बनती थी। एक करोड़। एक न सही आधा सही, आधा यानी पचास लाख, पचास लाख भी नहीं तो दस लाख, दस भी नहीं तो पांच लाख से कम तो बिल्कुल नहीं। नहीं, पांच से नीचे नहीं। आजकल बैंक दर भी कम हो गई है, पांच लाख से नीचे में क्या होगा। एक किराए का फ्लैट भी नहीं ले पाएंगे।
फिलहाल। अपनी मंजिल एक ही है। एक करोड़, बहुत बुरा भाग्य हुआ तो आधे पर तो रुका ही जा सकता है।
छक्केलाल ट्रेक्टर डीलिंग के साथ-साथ पैसे पाने के तरह-तरह के उपाय सोचने लगे। दिन भर थके-हारे घर आते और रात को सोने से पहले ख्वाबों में करोड़ों रुपए पैदा करते। कभी सोचते यह सचिन तेंदुलकर है। साल में मात्र विज्ञापन से पन्द्रह करोड़ कमाता है। पन्द्रह करोड़। एक बड़ा उद्योग भी उतना लाभ नहीं दे पाता। सचिन एक अति लाभदायी कारखाना है। संस्था है। उद्योग है। पूंजीपति है। सचिन एक ब्रांड मैन। वाऊ।
उन्हें सचिन की बैटिंग से क्या लेना-देना। सचिन चाहे जितना भी क्रिकेट से पैसा कमाता हो, कितना भी मैन ऑफ द मैच हुआ हो, पर असल तो यह विज्ञापन है। और इस विज्ञापन में क्या रखा है, सचिन जैसा दिखना चाहिए। कोला पीते हुए, पेप्सी लेते हुए। अगर उनका लुक सचिन जैसा हो जाए तो चमत्कार हो जाए। अगर उनका डुप्लीकेट सचिन बनाकर सस्ते में विज्ञापन कर सकें। सचिन पन्द्रह करोड़ कमाते हैं, वे पांच करोड़ कमाएंगे, अरे पांच उनके लिए तो बहुत है, उन्हें तो सिर्फ एक से मतलब है। एक, एक करोड़? फिर वे अपनी सूरत आईने में निहारने लगे। उसका कद सचिन से लम्बा है। चेहरा कहीं से भी गोल-मटोल सचिन जैसा नहीं है, न ही बाल, न आंखें, नाक, कान, होंठ कुछ भी मेल नहीं खा रहा। बहुत इधर-उधर से त्वचा खींच-खांच कर देखते हैं कि कहीं से प्लास्टिक सर्जरी वगैरह करवाकर भी करीब ही जाएं तो कुछ बात बन जाए, अमीरों के नहीं तो गरीबों के सचिन बन जाएं, पर नहीं। यहां तो गुंजाइश ही नहीं दिख रही थी। फिर उसी सिलसिले में उनके भेजे में बिजली गरजी कि सचिन न सही, शाहरुख न सही, अब यह देखे कि उनका चेहरा किस ब्रांड से मिलता-जुलता है। कौन से हीरो, कौन से क्रिकेटर, कौन से स्टार, कलाकार कोई भी प्रचलित नाम चल जाएगा और यह एक नई चीज होगी। अपने देश में असल से ज्यादा नकल बिकता है। मेहनत से ज्यादा काहिली बिकती है, सदाचार से ज्यादा भ्रष्टाचार चलता है, इस तरह की खेती की यहां खूब गुंजाइश है। यह एक बड़ी खास बात होगी कि असल ब्रांड का नकल बाजार में चल पड़ेगा और यह कोई कानूनी या नैतिक अपराध भी नहीं होगा। सभी समझते हैं कि यह नकली है पर असर तो असली वाला होगा, बल्कि असल से भी ज्यादे। पता नहीं इस ओर विद्वानों का ध्यान क्यों नहींगया। यहां सिनेमा, गाने, सबके रिमिक्स निकल रहे हैं और हिट हो रहे हैं। लोग अमिताभ की आवाज निकालकर पैसा कमा रहे हैं। धंधा चला रहे हैं, अगर कोई अमिताभ बनकर विज्ञापन करे तो क्या बुराई है।
ऐसे-ऐसे ख्याल कर छक्के लाल जी अपनी सूरत चारों ओर से मिलाने लगे। सामने फ्रंट कट, साइट कट, राइट-लेफ्ट कट बहुत माथा पच्ची करने के बाद एक हिन्दी समानांतर सिनेमा के हीरो नसीरुद्दीन शाह से उनका हुलिया-हलवा मिलता सा प्रीतत हुआ। नाक लम्बी, ठोढ़ी थोड़ी तीखी, आंखें तेज और छोटी-छोटी और केश सज्जा तो यहां आल राउंडर थी, चाहे जैसा बैठा लीजिए। हां, नसीर साहब ठीक रहेंगे।
नसीर साहब। समानांतर सिनेमा, कला सिनेमा के हीरो, ऐंटी हीरो, मंजे हुए कलाकार, रंगकर्मी।
पर अफसोस। नसीर साहब विज्ञापन की दुनिया से लगभग गायब से हैं। ओफ्फ। शिट्।
करोड़पति बनने का यह आइडिया जाता रहा। बात नहीं जमी। नसीर साहब ने धोखा दे दिया। मंजे हुए कलाकार हैं, पर पापुलर और ब्रांड नेम नहीं हैं।
काश! उनका लुक अमिताभ जैसा होता।
खैर। आपने हिम्मत नहीं हारी। हिम्मते मर्दा मद्दे खुदा। आपने दुनिया के तमाम सफल लोगों की जीवनियां इकट्ठी पढऩी शुरू की। प्रेरणा हेतु। इसमें ंहीरो से लेकर एंटी हीरो तक सभी शरीर होते। खासकर नीचे से ऊपर उठने वाले शख्स। करोड़पति, अरबपति। चाहे वे नायक हो या प्रतिनायक। रिश्वत खाकर या घोटाला करके, चाहे जैसी भी हो, पैसे वाली शख्सियत हो। इसमें ऊंचे-ऊंचे कलाकार, गायक, नर्तक, चित्रकार, खिलाड़ी वगैरह तो थे ही हर्षद मेहता सरीखे लोग भी थे। चारा घोटाला, स्टाम्प घोटाला इत्यादि कई घोटालों से बटोरे सरकारी अफसर और नेता भी शामिल थे। आखिर दिमाग की वह कौन सी कड़ी थी कि उसने क्या और कैसे करोड़पति की योजना फलीभूत की।
कला, साहित्य, अभिनय, संगीत यह सब तो बहुत कुछ कुदरती बात थी और कोई अचानक कलाकार उठकर खड़ा नहीं हो जाता। वर्षों की साधना और तपस्या जुड़ी होती है। पर मन में एक टीस उभरी- काश कि उनका गला सुरीला होता और वे गाना गा सकते होते, दिलेर मेहंदी की तरह उछलकूद किए होते, कनाडा, अमेरिका में करोड़ों का व्यवसाय किए होते या फिर चित्रकार ही बने होते आज तो विदेशों में करोड़ों की एक पेंटिंग बिकती है। और इस खुलेपन के दौर में अवसर भी खूब हैं। काश! गला अच्छा होता तो झट-पट अपना एक वीडियो-ऑडियो निकाल दिए होते। एक लाख तो इसी शहर में बिक जाती। एक रुपए भी प्रति कैसेट लाभ कमाया होता तो लखपति रातों-रात, पर गाना और इस गले से आज की तारीख में। तौबा। फिर उनका दिमाग आज की पेंटिंग पर भी भटका। क्या देखकर लाखों की पेंटिंग बिकती हैं। घोड़ा, ऊंट, हाथी, गधा, पहाड़-पठार, मुर्गा-बकरा सब एक जगह। उन्हें आज तक ये बात नहीं समझ आई कि क्या समझकर और सोचकर ऐसी-ऐसी पेंटिंग्स कला दीर्घाओं में टंगी होती है और खरीदार इन्हें उछलकर खरीद ले जाते हैं। यह भी लाखों में। यह कौन सी कला है। न सीधी न उल्टी। ऐसी पेंटिंग तो कोई भी बना सकता है। एक बच्चा भी। फिर जैसे ही ऐसा नायाब ख्याब उनके जेहन में गुजरा तो झटपट आप एक पेंसिल, कागज इकट्ठा कर लाए और लगे रेखाओं से खेलने। देखे कि कैनवास में वे क्या कुछ अर्थ भरते हैं। उन्होंने कुछ सीधी, आड़ी, तिरछी रेखाएं खींची। कुछ-कुछ नजर आता सा प्रतीत हुआ पर वे स्वयं भ्रमित हो गए। क्या है इस पेंटिंग में। लोग पूछे तो आप क्या बताएंगे। विजन कहां है। कला कहां है। मर्म कहां है। रेखाएं क्या बोल रही है। और रंग हंै जो अभी इनमें भरे जाने हंै और कौन से रंग होंगे और उसकी कैफियत क्या होगी। यानी कि मतलब पेंटिंग का दर्शन क्या होगा। आखिर कम से कम उन्हें तो अपने दर्शकों को समझाने वास्ते इतना आना चाहिए। उन्होंने तो आज तक एक तोते की नाक भी नहीं खींची। फिर उन्हें खीझ हुई और अपने रेखाचित्र पर एक जोरदार नोंक दबाकर क्रॉस किया कि कागज के चिथड़े उड़ गए।
यह चित्रकला वाली बात भी गई।
इस बीच आप ट्रैक्टरों की डीलिंग करते रहे। हालांकि आपका पूरा ध्यान दुनिया के करोड़पतियों पर था और ट्रैक्टर पर था ही नहीं। दिनभर दौरे कर घर लौटते और टीवी में कौन बनेगा करोड़पति, जीतो छप्पर फाड़ के वगैरह-वगैरह ईनामी प्रोग्राम देखते तो मन में एक अद्भुत उम्मीद जगती थी कि इससे बेहतर क्या होगा, रातों-रात लखपति बनने का। जी होता दुनिया भर की सामान्य ज्ञान की पुस्तकें खरीद लाएं और घोंट जाएं। फिर इन इनामी योजनाओं में अपना नम्बर लगाने का प्रयास करते। बहुत ट्राई किया। एक बार भी आपका नम्बर नोट नहीं किया गया। जब-जब प्रोग्राम होता आप मोबाइल दबाकर बैठ जाते। पर यहां तो नम्बर ही नहीं लगता था, क्या किस्मत की बात थी या करोड़ों के बीच की मारा-मारी। क्या रहस्य था। लोग कैसे वहां पहुंच जाते हैं। यह सब एक स्वप्न की तरह था जो ऐसा स्वप्न कि अभी आपके साथ फलित हुआ ही हुआ। इस बार बस आपकी ही बारी है।
छक्केलाल अपनी बारी के इंतजार में लगे रहे।
इस बीच वक्त ने साथ दिया और दीवाली के अवसर पर आपने दो ट्रैक्टर बेच डाले। खर्च-यानी निकालकर आठ-दस हजार का कमीशन बनता था। आप उत्साहित हुए। एक नेक काम ये किया कि एसबीआई में अपना खाता खोलवाया और उसमें पांच हजार रुपए जमा किए। आप इतने में ही भरे-पूरे महसूस करने लगे। बाकी का अपनी सिमरन के साथ भाड़े की कार लेकर लांग ड्राइव में निकले। दूर के रेस्टारेंट में जाकर प्रकृति की खुली फिजां में कोल्डड्रिंक और बीयर के हल्के नशे का आनंद लिया।
उस दिन आपके ठाठ देखने लायक थे। बैरा को पांच-सौ का टीप दिया। ये रख, ऐश कर।
अच्छे-अच्छे होटलों में, बारों, रेस्टारेंट में खाने-पीने का यह पहला मौका नहीं था, पर इस तरह अपनी जेब से, अपनी कमाई से पैसा उड़ाने का यह पहला अवसर था। आपका दिल आबाद था। बाग-बाग।
पर यह दिल का बगीचा ज्यादा दिन और अधिक देर तक खिले रहने वाला था नहीं। भोर के सपने की तरह टूट गया। अब?
फिर वही दिमागी तिकड़मी सोच-विचार।
पैसा। करोड़। लाख।
अखबार आप खूब पढ़ते। खासकर वहां जहां पैसा और सफलता शब्द नजर आता था। आपने देखा कि आजकल यह वास्तु नामक कोई चीज आई है। ज्योतिष से तो वाकिफ थे यह वास्तु नई चीज लग रही थी वास्तु क्या है। खाली सफलता की बात तो करता है। यह वैज्ञानिक चीज लगती है। उत्तर दक्षिण, पूरब-पश्चिम की बात करता है। ऊर्जा और कोणों की बातें करता है। संतुलन और असंतुलन की बात करता है। दिव्य प्रकाश के आगमन की बात करता है। यह वैज्ञानिक पद्धति प्रतीत होती है।
आपने वास्तु का खूब अध्ययन किया। एक वास्तुशास्त्र पर लिखी मोटी किताब ही खरीद लाए। फेंग शुई, लाफिंग बुद्धा, चाइनंग क्वाइंस, ईशान और पता नहीं क्या-क्या।
आपने अपना हुलिया और घर का रखरखाव वास्तु के नियमों के अनुसार करना शुरू किया। एक अच्छे ज्योतिषी और वास्तुशास्त्री से भी भेंट आए। लाल-पीले-नीले रत्नों की चार अंगुठिया धारण करवा दी। भविष्य उज्जवल बताया। मनोरथ शीघ्र सिद्ध होने की बात कही।
मन में आशा जगी। उम्मीद से उत्साह होता है। आप उत्साह में जीने लगे। जब-जब आप बहुत खुश होते अपनी महबूबा से मोबाइल पर घंटों बातें करते। जब-जब दुखी होते महबूबा को मोबाइल टच देकर अपनी मोबाइल बंद कर देते। यानी मैं बहुत दुखी हूं। मुझे तंग मत करो। तनहा छोड़ दो। मतलब कि महबूबा आपको लेकर कहीं अकेले में इमोशनल सपोर्ट दें। आपके मरहम पट्टी बांधे।
खैर, आशा-निराशा तो जिंदगी का हिस्सा है ही। वे आपको मिलती। हालांकि निराशा अधिक लगती। पर उमंग जगती तो बम्पर फाड़ के। मतलब प्रतीत होता कल ही लखपति बन जाएं- एकदम कल। और तब फिर निराशाएं मिट जाती।
इन तमाम लटकों-झटकों के बाद भी आपकी गाड़ी जहां थी लगभग वहीं अटकी रही। ज्यादा से ज्यादा एकाध ट्रैक्टर और बिका होगा। बस। करोड़पति वाली बात तो दूर यहां लखपति भी कोसों दूर का ख्वाब ही था।
अब करें तो क्या करें। सब कुछ तो किया जा रहा है। दिमाग एक पर एक बातें सोच रहा है। अब सोचा क्या जाए। कहीं से कोई प्रेरणा नहीं मिल रही है। अखबारों में पत्र-पत्रिकाओं में क्लू ढूंढे जा रहे हैं। पर बात कुछ जम नहीं रही है। सारे किए-धिए वहीं के वहीं हैं। वास्तु का लाफिंग बुद्धा, हाथ में सवा किलोग्राम की बड़ी-बड़ी अंगुठियां, राहु-केतु, शनि-मंगल सबको धारण किए हुए हैं, पर यह जो धन की देवी हैं, रुष्ठ हैं। मौन हैं।
आपको टुल्लू मियां की याद आई। टुल्लू मियां आपके बचपन के दोस्त थे. उनका अपना एक खास धंधा है। सुना है खूब पैसा बनाता है। कभी-कभी मुलाकात होने पर हाय-हैलो जाया करती थी, पर जरूरत नहीं पड़ी तो कभी ज्यादा विस्तृत चर्चा नहीं की कि क्या करते हो, कैसे पैसा बनाते हो। पर उड़ते-उड़ते ही आप सुन चुके थे कि वह खास किस्म की स्मगलिंग किया करता है, जैसे- हाथी दांत, बाघ के नख, कौवे की जुबान, चील की आंखें, गरुड़ के चोंच और फिर कई तरह की  रहस्यमयी जड़ी-बूटियां जैसे ब्रम्ह जाल, इन्द्रजाल, यम फांस वगैरह-वगैरह। इन सब चीजों की भारत के संन्यासी, तांत्रिकों के बीच खूब मांगें थी और बड़े ऊंचे दामों में बिकती थी। तांत्रिक साधु लोग बड़े-बड़े पैसे वालों राजनेताओं, काला बाजारियों और दुनिया के तमाम तरह के पाप कर पैसा कमाने वालों की तरक्की वास्ते, उनकी आत्मिक शांति के लिए ये सब अस्त्र इस्तेमाल करते थे। चुनाव के समय अक्सर नेता अपने प्रतिपक्ष को भस्मीभूत करने के लिए इन तांत्रिकों के पास जाते, किसी घोटाले में फंस रहे हों तो बचने के लिए भी। चूंकि इनके पास पैसे की कमी नहीं रहती तो खूब पैसा देकर ये इस तरह के हवन-यज्ञ करवाते। कहते हैं जैसी समस्या वैसा समाधान होता था। समाधान भी विभाजित था, वर्गीकृत। हल्के-फुल्के पैसे पर हल्के-फुल्के यज्ञ हवन की रस्म पूरी होती, मोटी रकम पर वृहत् और शर्तियां समाधान किया जाता। समाधानकर्ताओं को इन चीजों की जरूरत पड़ती। कहते हैं ये बाघ के नख और ब्रम्ह जाल, माया-जाल वगैरह से भूत-प्रेतों को वश में करके संकट से उबार किया जाता था। इस तरह से तांत्रिक उपादानों, सामग्रियों के धंधे में एक फायदा ये था कि ये रेयर चीजें थी और एक सामान्य थैले में करके यहां से वहां माल पहुंचाया जा सकता था।
पर यह सुनी सुनाई बात थी, लिहाजा, टुल्लू मिया से भेंट मुलाकात के बाद ही इस बार से पर्दा उठ सकता था और देखा जा सकता था कि छक्केलाल इसमें क्या कुछ कर सकते थे। फिर यह भी डर था कि अगर टुल्लू मियां इस धंधे में लिप्त होंगे, तो उनका एक रैकेट होगा, विश्वसनीय लोग होंगे, क्यों और किस बात पर छक्केलाल को अपना पार्टनर बनाएं। फिलहाल व्यवहार का तकाजा तो ये कह रहा था कि अगर ऐसी बात हो और आपको इस लाइन में आकर पैसा बनाना है तो पहले टुल्लू मियां से दोस्ती, उठा- बैठी गांठी जाए। धीरे-धीरे उनकी गतिविधियों को जानने के उपरांत उनकी गोपनीय बातें निकाली जाएं, फिर आप भी अपना हाथ-पांव फैलाएं।
पर इतना समय कहां था, समय था तो धैर्य कहां। यहां तो रातों-रात दिनों-दिन की बात थी। जल्दी से जल्दी। साला कोई भी लाइन में जाओ, कहीं भी हाथ डालो रास्ता शार्ट नहीं है। कोई यों ही आपके लिए बांहें फैलाकर खड़ा नहीं है कि बच्चा आइए। आप कहां थे, आपका तो कब से इंतजार था, ये लीजिए एक खोखा और काम पे हाथ बंटाइए। ऐसी किस्मत न थी न ही आपके पास कौशल था।
हालांकि कुछ दिन बचपन की यारी का वास्ता देकर टुल्लू मियां के साथ उठा-बैठक की पर जैसी उम्मीद थी ऐसी बातें अपने पेट को भी नहीं बताई जाती है। छक्के लाल को कुछ भी हवा-पानी नहीं लगा। बस एक चीज नजर आई कि टुल्लू मियां अकसर जुआ और सट्टा खेलते हैं।
यह खेल बढिय़ा था पर आपने ताश के पत्ते तो दूर कभी शतरंज भी नहीं खेला था। जुआ खेलने और पैसा जीतने के लिए कम से कम ताश के पत्ते तो फेंटने आने चाहिए थे। जुआ न सही, आप सट्टा तो खेल सकते थे, पर वहां भी कुछ गुना-भाग था। ओपने-क्लोज। दस का पचास, पचास का पांच सौ। यह तो समझ में आता था। रुपए का गणित बड़ी जल्दी समझ में आ जाता है, पर इस गणित को ढंग से खेलना सभी को नहीं आता। महारथ हासिल करने में वर्षों लगते। खालिस यह किस्मत का खेल नहीं है। यहां तीन सौ पैंसठ दिन में तीन सौ छयासठ दिन ओपन और क्लोज करने वाले पानी भर रहे थे। फिर भी आपको लगा कि इसमें जो लक नामक तत्व है वह आपके लिए सुरक्षित है, कुछ दिन अंजापंजा, दुग्गी, छक्का, कुछ भी नम्बर लगाया कि सांझ को कुछ बम्पर निकल जाए। बम्पर तो नहीं कभी भी दो का दहाई आया तो कभी सैकड़ा। कुछ खास नहीं। आप वहां से निराश होकर लौटे। सभी जगह लम्बा खेल है, अनुभव की दरकार है। वक्त का इंतजार है।
पर लोग कैसे रातों-रात लखपति बन जाते हैं। कैसे किसी की लाटरी खुलती है। कैसे किसी घूरे का दिन फिरता है। कहते हैं बारह वर्षों में घूरे का दिन भी फिरता है। रामजी चौदह वर्षों के बाद गद्दी सम्भाले, पांडवों का बारह वर्षीय वनवास, यानी यह बारह-चौदह वर्षों का वनवास सबको भोगना पड़ता है। पर उनकी उम्र तो सत्ताइस, साढ़े सत्ताइस की हो रही है, बारही दूनी चौबीस, अगर चौदह भी माने तो दुनी अट्ठाईस। मतलब कि आपने डबल वनवास पूरा किया। आप कहें कि पैदाईशी घूरे थे। बचपन से वनवास की सजा भोग रहे हैं। आपने अपनी जिंदगी का आकलन इसी तरह किया। आपने डबल तपस्या की और खुदा है कि नाराज हैं। सुख मिल ही नहीं रहा है। सुख सपना देकर चला रहा है। कार, बंगले, हिलस्टेशनों में माशूका के साथ घूमना, खूब से पैसे यह सब राम राज्य, राजभोग एक ख्वाब ही था।
पर किस्मत खुलने और पैसे बरसने की उम्मीद नहीं मिटी। आए दिन अखबारों में ईनामी कूपन काटते, उनके आसान सवालों के जवाब टिक करते और लिफाफे में बंद कर प्रेषित करते। फिर कुछ दिन बाद अपना नाम ढूंढते। उम्मीद लगी रहती, इक्कीस लाख नहीं एक मारुति ही निकल जाए, मारुति न सही एक मोटर सायकल ही सही। पर ले देकर इतनी कूपन बाजी का नतीजा ये निकला कि एक बार एक मिनी प्रेशर कूकर और एक दफा हॉट-पाट निकला। खाना गरम रखने वाला डिब्बा।
इधर तीन-चार महीनों से ट्रेक्टर का एक भी मुर्गा नहीं फंसा। दिन खस्ता-हाल में गुजर रहे थे। महबूबा के साथ सिटी हार्ट में या रेस्तराओं में जाते आपकी बजने लगती थी। कब तक महबूबा के पैसे पर ऐश करते, भले ही उसके पास पैसों की कोई कीमत न थी। पर आप एक पुरुष थे, मर्द। एक कमाऊ मर्द, पन्द्रह हजार महीना।
आपके सेठ ने एक दिन तगड़ा सुनाया, ट्रैक्टरों के बेचने की यही दर रही तो जल्दी काम छोड़ दो, यहां भीड़ बढ़ाने के लिए एजेंट नहीं रखे जाते। बेचारे। छक्के। दिले से प्रतीत हुआ कि उनका यह सोडा-साबुन वाला कारोबार बढिय़ा था, बिकता तो था और फिर आपने वह काम तब छोड़ा जब आपकी योजना चल पड़ी थी, आप पीक पर थे। पर, सिर्फ थैला लटकाऊ काम ने आपको तौहीन कर दिया था। आज अगर वो बात न होती तो खराब से खराब हालत में दस हजार महीना कहीं नहीं गया था। पर क्या करें। यह लड़की का चक्कर। इश्क में एक मजनूं ही नहीं बरबाद हुए मियां, यहां लम्बी कतार लगी है। छक्के! लड़की के चक्कर में बरबाद हो चाहे आबाद, सब जायज है। और तुम? अभी बरबाद हुए कहां हो। तुम तो अभी संघर्षरत हो, फाइटिंग मैन। यू आर ए फाइटिंग मैन। अपनी किस्मत से, कुदरत से। और हां, सिमरन से।
सेठ ने जब से धमकी दी है कि काम से निकाल दिए जाओगे, जल्दी से रिजल्ट दो। उधर कोई ग्राहक फंसता नजर आ नहीं रहा था। अब क्या करें। काम पे पूरा मन लगता था नहीं। जहां भी सफल और दौलतमंदों को देखते तो उसके जैसा बनने और पैसा कमाने की तरकीब सोचने लग जाते। कुछ कदम चलते फिर बैठ जाते। आप थक गये थे। हार हुए से। उम्मीदें अभी भी मरी नहीं थी और बंद नहीं हुई थी। अपने चारों ओर एक विस्तृत फैला हुआ सपने का संसार देख रहे थे। इतनी कारें, इतने फ्लैट्स। इतने पैसे। यह जगमगाती दुनिया।
पर आपके पास? बैंक-बैलेंस मात्र पांच सौ रुपए का। वह भी न्यूनतम रकम वरना पास बुक खारिज हो जाती। पर्स में सवा सौ रुपए। बस, यही तो कमाई की बचत है।
रात के ठीक बारह बजे हैं। आज सोलह अगस्त है, रात बारह बजे के बाद उनकी सिमरन का हैप्पी बर्थ डे है, यानी सत्रह अगस्त को। कल वह अठारह की हो जाएगी। कानूनी रूप से बालिग। उसे बर्थडे बधाई दे देनी चाहिए। वह उसका प्रेमी है, फ्रेंड है, सबसे पहली मोबाइल रिंग उसी की होनी चाहिए वरना सिमरन रूठ जाएगी। उसके सर इल्जाम लग जाएगा कि उसका उसे कतई ख्याल नहीं रहता। सो, नम्बर लगाया। हाय। हैप्पी बर्थ डे टू यू।
थैंक यू। थैंक यू सो मच। मैं तुम्हें ही एक्सपेक्ट कर ही थी। कल कहां चल रही हो? जहां तुम ले चलो। इस फाइव स्टार होटल से बोर हो गए हैं, इस बार कहीं बाहर चलते हैं, लांग ड्राइव में, दो-चार दिन के लिए। वाऊ! अब मैं बच्ची नहीं रही। कल से, बल्कि अभी से बालिग होगई। कोई नहीं ंकह सकता कि किसी ने भगा लिया है। कहां ले चलोगे। कल देखते हैं। पर कार मेरी होगी, इंडिका, जानते हो, वादे के मुताबिक मेरे बड़े भैया ने मुझे बर्थ डे गिफ्ट किया है उसी पे चलेंगे तुम तो फोर व्हीलर भी चला लेते हो। मजा आ जाएगा। कार तुम्हारी पर रेस्टारेंट हमारा। मैं बिल दूंगा। तुम तो बस यही पेमेंट लेकर बैठ जाते हो।
क्या करूं, तुम मौका ही कहां देती हो कल हमारी ओर से।
कल देखेंगे। अब बताओ तुम मुझे क्या गिफ्ट कर रहे हो?
मैं। कल दूंगा। सरप्राइज। ओपन नहीं करता।
वाऊ। आई लव यू।
अब मुझे नींद आ रही है।
गुड नाइट।
बाई।
बाई।
छक्केलाल उधेड़बुन में फंस गए। कल बर्थ डे गिफ्ट, रेस्टारेंट। बाप। अब क्या करें। क्या गिफ्ट करें और कैसे क्या करें।
लॉटरी। लॉटरी। साली एक भी नहीं निकली। कोई ज्योतिषी भी ठीक नहीं बताता, साले। कहते थे हमारी तकदीर खुली हुई है, खाक खुली है। रात भर करवट बदलते रहे। क्या करें, क्या न करें। कहां भागे। भाग जाएं, सदा-सदा के लिए कहीं मर जाएं। एक्सीडेंट हो जाए और अपनी स्मृति लोप का बहाना बनाकर सारी जिंदगी उनकी सेवा और पैसे के मजे लेते रहें। क्या करूं। साला, कुछ सूझता नहीं। हां, सिमरन। सिमरन अठारह की हो गई। फिर भीतर से जैसे बेचैन हो गए। क्या सोचता है मर जा कहीं जाकर। कल रेस्टोरेंट के पैसे कहां से देगा। गिफ्ट क्या देगा। एक पीतल की चूड़ी देने की औकात है। होटल में बैठकर भजिया खिलाने का दम है। पांच तारा होटलों में डिनर लेंगे। अरे मियां कब तक झूठ बोलोगे, कब तक माशूका के पैसे उड़ाओगे।  तो क्या सच बोल दे। कह दे कि वह उसके लायक नहीं। नालायक है। फरेबी है। धोखेबाज है। दगाबाज। और उसके सामने अपनी गरदन झुका दे। काट डालो चाहे गले लगा लो। जो चाहे सजा दे दो। पर मैं एक झूठा ही हूं। और रहूंगा। बच्चा बहुत खूब। तब तो माशूका और इमोशनल हो जाएगी और आपके इस अंदाज को गले लगा लेगी। आप यही तो चाहते हो।  झूठ-झूठ। मैं जो चाहता हूं बता नहीं सकता, मैं तो करोड़पति बनकर एक सुखद भविष्य चाहता था, अब पैसा नहीं बना तो क्या करें। वह जो झूठ बोला वो एक झोंके की बात थी। मैं बुरा नहीं हूं। करोड़ों का सपना देखना क्या बुरा है, गर्लफ्रेंड के साथ ऐश करना क्या बुरा है। ठीक है। कुछ बुरा नहीं है। कल हैप्पी बर्थ डे है, उसी से पैसे लेकर उसे गिफ्ट करो न। क्या दोगे। हां, यार। मारे गये।
मर जा साले। कहीं जाकर गिर जा हाथ पैर तुड़वा ले। कल का दिन कट जाएगा। मरना ही है, गिरना ही है, चाहे जमीन पर, चाहे माशूका की नजरों से, तो अच्छा है गिरते-गिरते मरते हुए एक अंतिम दांव फेंक। भाग जा। भाग मुंबई। वहां अपनी किस्मत आजमाते हैं। क्या है तेरे पास। न लोटा न थरिया। यहां रहकर लॉटरी निकलने वाली है नहीं और माशूका की नजरों से गिरकर मरने से अच्छा है मुंबइया फिल्म उद्योग में डूबा जाए। डूब गए तो डूब गए तैर गए तो वाऊ। चल छक्के और खाली जेब चल। यह तेरा अंतिम प्रयास होगा। वरना वहीं झोला लटकाए बहुत काम मिल जाएगा। कहते हैं मुंबई किसी को निराश नहीं करती। बहुत बड़ा दिल है उसका। पर तेरी माशूका का क्या होगा। वह तो कल का इंतजार कर रही होगी कि तुम मिलो और लिपटकर वह कहे कि मैं बालिग हो गई, शादी कब कर रहे हो।  शादी। हां। अठारह की लड़की, लड़का इक्कीस का। नहीं सत्ताइस का। सत्ताइस भी नहीं अट्ठाइस।  कानूनी अड़चन नहीं। क्यों छक्के। शादी क्यों नहीं कर लेते, मुंबई में जाकर ढाबों, होटलों के जूठे बर्तन साफ करोगे। सिमरन को दौलत नहीं दिख रही। साले। अमेरिका चला जाना, आखिर दामाद बनोगे, उसके भाई का बड़ा कारोबार है, ऐश करना। अरे हां। शादी, लड़की, अमेरिका, डॉलर। सारी दौलत एक ही जगह।
और फिर छल्लेलाल गुप्ता वल्द श्री चंदूलाल गुप्ता, उम्र दो कम तीस यानी अट्ठाईस साल, साकिन मिर्जापुर, थाना मापुर, रंग गेहुंआ, कद पांच फुट सात इंच, स्लिम, स्मार्ट, लटकी जुल्फें अचानक उछल पड़े- भाड़ में गया मुंबई। कटे गिरे मरे, भागे छिपे दुबके सरके मेरा सिर।
मैं सिमरन का, सिमरन मेरी, कल मेरी बीवी हो जाएगी। गिफ्ट दूंगा। सरप्राइज। उसे अपने गले में हाथ डालकर यह कहने का मौका ही नहीं दूंगा कि डार्लिंग, शादी कब कर रहे हो। बस दो रुपए का सिंदूर और एक हार पन्द्रह रुपए का। कल सीधा गंधर्व विवाह।  कहते हैं सभी करोड़पति साहसी होते हैं।  तू भी साहसी है।  छक्केलाल ने पर्स खोलकर देखा। सवा सौ रुपए हैं। खर्चा मात्र सिन्दूर, माला और मिठाई का। हो जाएगा, काम बन जाएगा। इकतीस रुपए पुरोहित की पुजाई भी दे सकते हैं। रात अंधेरे में ही उसने रोशनी जलाई। घड़ी देखा ढाई बज रहे हैं वह आइने के समक्ष खड़े हुए। अपनी सूरत देखी। अच्छी है। फिर दोनों हाथों से अपने दोनों गाल पर जोर-जोर से दो-दो तमाचा जड़ा। मूर्ख। तुझे जितनी सजा दी जाए उतनी कम है। घर में लड़का और नगर में ढिंढोरा। अब क्या दुबारा लाटरी खुलेगी मात्र सत्रह रुपए मेें। उन्होंने अपने हेयर स्टाइल देखे अहा। किसी भी ब्रांड स्टाइल से बढ़कर। फिर उन्होंने तत्काल मोबाइल किया। सिमरन को। घंटी बजी। फिर ऑफ किया। फिर लगाया बजी, फिर ऑफ किया। फिर लगााया, फिर ऑफ किया फिर फिर। इसका मतलब साफ था। मतलब वही था कि, क्या कहते हैं कि, वही यानी कि,  डार्लिंग। मैं बहुत बेचैन हूं। डार्लिंग। मैं तेरे बिना जी नहीं सकता। डार्लिंग मुझे नींद नहीं आ रही है। डार्लिंग। मैं अब एक पल तेरे बिना रह नहीं सकता। डार्लिंग। आई लव यू डार्लिंग।