Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

पहाड़


इंदिरा दांगी
162, दाता कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड,
भोपाल (म.प्र.)
मो. 8109352499
और मैंने तय कर ही लिया कि क्या करना है। गर्मियों की सूनी, सांय-सांय दोपहर और अम्मा की गहरी नींद, बाबूजी घर पे हैं नहीं। भईया का पता नहीं। आज तो मौका ही मौका है। तो मैं दबे पांव खिसका। दरवाजे तक तो दम साधे, पांव-पांव गिनता आया फिर वो दौड़ लगाई कि सीधा गिन्नी के बरामदे में रुका। वो अकेली बैठी गुडिय़ा का ब्याह रचा रही थी। फूलती सांसों को काबू करते हुए फुसफुसाया, ''पहाड़ पर चलेगी?ÓÓ
''हां!ÓÓ बड़ी-बड़ी आंखों वाला उसका चेहरा पल भर को खिला, पर अगले ही पल कुम्हला-सा गया, ''पर दादी?ÓÓ वो अपनी दादी से बड़ा डरती थी और वो ही क्या सारे के सारे बच्चे डरते थे। (चिढ़ते भी थे)। धनुष जैसी कमर, लटकती खाल, नुची भुजरियों से बाल, पोपला-कांपता मुंह और वो छड़ी जिससे वे सहारे का काम भी लेती थी और उठा-उठाकर बच्चों को डराने का भी... ये थीं गिन्नी की दादी जिनकी कूबड़ी और दौड़ की हद से बाहर खड़ा हर बच्चा उन्हें अपने प्रिय शिकार मानता। कभी हमारी गेंद उछलकर उनकी पूजा की थाली को धूल चटा चुकी थी, कभी हम उनकी छड़ी चुराकर गौशाला में छिपा आए थे और कभी हम उनके कमरे में खुजैला पिल्ला घुसाकर बाहर से कुंडी चढ़ा देते थे। वे हम पर खूब बड़बड़ातीं, कोसती, चिल्लातीं; पर हमारे बाबूजियों से हमारी शिकायतें कभी न लगाती। वे बुरी भी थीं, भली भी।
मैंने गिन्नी को बहलाया-फुसलाया और हम दोनों बच्चे बेआवाज, बड़ी ही सतर्कता से इधर-उधर ताकते पहाड़ की ओर चल दिये। रास्ते में किसी बड़े ने पूछा, ''किधर को?ÓÓ और हम, याद नहीं क्या ऊलजलूल बहाना गढ़कर भागे थे (जिस पर बाद में बहुत इतराये भी थे।) और हमने पहाड़ के ठीक सामने पहुंचकर ही दम भरा।
उसे सब पहाड़ ही करते थे, सब बड़े ही गोकि वो एक बड़ा पत्थर-भर था। इतना भर बड़ा कि मुझसे छोटे बच्चे अपने-आप उस पर नहीं चढ़ पाते थे। पहाड़ मुहल्ले के छोर पर बने संतोषी माता के मंदिर की सड़क के इस पार था। आसपास नीम, बेरी, बबूल, झाडिय़ां और गाजर घास से भरा, जमीन का एक टुकड़ा था जिसे हम बच्चे जंगल कहते थे। जंगल से थोड़ा चलकर नाला था और उसके पार दूसरा मोहल्ला लग जाता था। इस नन्हें से जंगल और इस छोटे-से पहाड़ पर खेलकर ही इस गांवनुमा मोहल्ले के बच्चे बड़े होते रहे हैं।
पहाड़ यहां कब से है, ठीक-ठीक किसी को नहीं  पता। छोटू कहता है कि जब भगवान ने संसार की रचना की थी तभी ये पहाड़ यहां रख दिया था ताकि पृथ्वी उड़ न जाए। छोटू ब्राम्हण है और वो ये भी कहता है कि ब्राम्हण जो कहते हैं वही सच होता है। उन्हें देवताओं की बातें पता रहती हंै। मेरे बाबूजी बताते हैं कि जब वे मेरी उमर के थे तब भी पहाड़ यहीं था और गिन्नी की दादी सुनाती हैं कि जब वे ब्याहकर आई थीं तब भी ये पहाड़ ऐसा ही था, पर हां, तब पहाड़ और मंदिर के बीच पक्की सड़क नहीं थी। मंदिर के नाम पर संतोषी माता की छोटी-सी मड़ैया भर थी, न हनुमान जी का मंदिर बना था, न पीपल के इर्द-गिर्द पक्का चबूतरा था, न बाउन्ड्री, सीढिय़ां बनी थीं और न ही पुजारी काका का पक्का कमरा। तब मंदिर के बाहर रुई के पेड़ भी नहीं हुआ करते थे। पहाड़ के पीछे वाले जंगल में बबूल के बहुत पेड़ थे जिन्हें बाद में बकरियां चराने वाले काट ले गए। वे सुनातीं हैं, पहाड़ तब भी ठीक इसी जगह था, न एक रत्ती भर इधर न एक तिनका उधर, पर हां तब वो इतना चिकना नहीं था। बच्चों के नर्म शरीरों से घिस-घिसकर ही ये मोम-सा चिकना हु है। वरना ये तो निरा पत्थर ही था, बच्चों के प्यार भरे खेलों ने इसे खिलौना बना दिया, अब तो ये इतना चिकना है कि ऊपर से जरा कमर सरकाओ और सर्र से फिसलते हुए नीचे रेत में। सुना, कभी यहां रेत नहीं थी तब ऊपर से फिसलकर आ रहे बच्चों को कंकड़-पत्थर चुभ जाते थे, फिर मुहल्ले के बड़ों ने यहां बजरी डाल दी। वे जब-तब डालते ही रहते हैं क्योंकि वे कहते हैं, उन्हें पता है कि फिसलपट्टी से नीचे पहुंचने पर रेत न हो तो कंकड़-कांटे कैसे छील देते हैं। मोहन के दादाजी तो हर सुबह यहां आते रहे हैं और रेत से बड़े-बड़े कंकड़-कांटे पत्थर चुन-चुनकर फेंका किए हैं। मोहन इधर तो कभी नहीं आता। उसके दोनों पैर खराब हैं और उसके पापा नहीं है। मोहन के दादा जी को जो भी बच्चा सबेरे-सबेरे इधर को दिख जाता है और वे उससे यही दोहराते हैं कि उनका बेटा जब छोटा था, पहाड़ की फिसलपट्टी पे खेलने जरूर आता था और तब भी वे इस तरह रेत में कंकड़ और बेरी के झड़े कांटे चुनते थे ताकि उनके बेटे को कोई पत्थर या कांटा न चुभ जाय।
मैं बाबूजी का-सा स्टेचू चेहरा बनाए, हाथ-पीछे किए पहाड़ का मुआयना करने लगा हूं। पहाड़ पर अकेले चढ़ पाने का मतलब होता है, बड़ा हो जाना। अब जबकि थोड़ी ही देर में मुझे बड़े होने का खिताब मिल जाने वाला है तो बड़ों-सा दिखूं भी तो। कुछ अकड़कर सीधा खड़ा हुआ हूं। देख, गिन्नी मैं... अरे! ये गिन्नी कहां चली गई?... वो रही बेरी के नीचे! झड़े बेर उठा-उठाकर अपनी फ्रॉक की झोली में भर रही है। मुझे भी बेर खाने हैं, मीठे-खट्टे, रसीले बेर! नहीं! नहीं! अभी तो मुझे पहाड़ पर चढऩा है, बेर तो बाद में भी जुटा लूंगा, गिन्नी को पुटिया-धमकाकर। अगर बड़े भईया आ टपके तो सब सत्यानाश हो जाएगा। खुद तो डांटेंगे ही, और क्या पता शाम को बाबूजी से ही शिकायत लगा दें। बाबूजी के गुस्से को याद करते ही मेरा मुंह सूखने लगा है। क्या फायदा, पहाड़ भी नहीं चढ़ पाऊंगा और डांट भी खाऊंगा। हूं हअ, ये बड़े भईया भी ना! समझते हैं कि बस, वे और उनके दोस्त ही पहाड़ पर चढ़ सकते हैं और मैं बिना उनके इस पर कभी चढ़ ही नहीं पाऊंगा। कैसा रौब झाड़ते हैं कि जब तक मैं नौ साल का नहीं हो जाता, पहाड़ पर अकेले नहीं चढ़ सकता क्योंकि वे भी पहाड़ के ऊपर नौ साल के होकर ही पहुंच पाए थे और गिन्नी कहती है कि मैं कुछ-कुछ नौ साल का ही दिखता हूं क्योंकि मैं उससे आधी उंगली ऊंचा हूं जबकि वह सात साल की है और अम्मा की एड़ी वाली सैंडिल पहनकर मैं बिल्कुल बड़े भईया-सा ही लम्बा दिखता हूं। वे नौ से कुछ ज्यादा के हैं। अम्मा कहती हैं, बड़े भईया छोटे ही थे जब मैं पैदा हुआ तो इस पूरे हिसाब से तो मैं नौ साल का ही हुआ ना, पता नहीं अम्मा क्यों मेरी उम्र का हिसाब लगाने में एक-दो साल भूल ही जाती हैं, हमेशा! मैं नौ साल का ही हूं और आज इस पहाड़ पर अकेले चढ़कर दिखाऊंगा जिस पर नौ साल के बच्चे ही अकेले चढ़ पाते हैं।
मैंने पहाड़ के दो चक्कर लगाए हैं और सोच रहा हूं, कहां से चढ़ूं। सामने से ये पहाड़ अजगर-सा लंबोतरा है। इतना चिकना कि चढऩे के लिए कुछ किया ही नहीं जा सकता। मैंने बहुत-बहुत बार इधर से चढऩे की कोशिश की है, और हर बार उलटकर रेत पर आ गिरा हूं। ऐसे में सड़क से अगर कोई बड़ा गुजर रहा होता तो हंस देता, ''हम भी छोटे में इस पर इधर से  ही चढऩा चाहते थे।ÓÓ
तो फिसलन भरी फट्टी पर नीचे से ऊपर को चला नहीं जा सकता और इस चिकनेपन के अगल-बगल में पत्थर की ऐसी उभरी गोलाई है कि कुछ पकड़ में आता ही नहीं। हाथ रखते ही रिरकन महसूस होती है और पकड़ बन नहीं पाती। तो मैं निर्णय पर पहुंचा हूं कि सामने से तो पहाड़ पर चढ़ा नहीं जा सकता।
अब पहाड़ के इस बगल में आ खड़ा हुआ हूं। यहां से चढ़ जाऊं तो? जब कोई बहुत बड़ा लड़का ऊपर बैठने जाता है तो इसी तरफ से लपककर चढ़ जाता है। पहाड़ के ऊपरी हिस्से पर बैठने को बैंच जितनी चौड़ी पट्टी है जिस पर हम बच्चे बंदरों की तरह बैठ अपनी बारी का इंतजार किया करते हैं और जो बच्चा जिस दूसरे का हाथ पकड़कर ऊपर आया होता है उसे उसका हुक्म मानना होता है। कभी-कभी बहुत बड़े लड़के भी यहां आ बैठते हैं गोकि वे फिसलने का खेल खेलने नहीं आते। वे आपस में नई और अजीब बातें करते हैं- क्रिकेट, फिल्मों और सुंदर लड़कियों की बातें और हम छोटे बच्चों को सुनने भी नहीं देते। हूं, हअ, फिसलपट्टी पर नहीं खेलना है तो ये बड़े लड़के इधर आते ही क्यों है? पूरी जगह घेरकर बैठ जाते हैं सो अलग! ये पहाड़! ये बहुत सुन्दर पहाड़! भगवान ने इसे बनाया ही इसलिए है कि बच्चे इसकी खूब लम्बी फिसलपट्टी पर डर और खुशी से भरे-भरे, फिसल-फिसलकर रेत में पहुंचे और हर एक बच्चे की इस खुशी में सब खुश हो-होकर तालियां पीटें... सबके सब, हर एक के लिए, हर एक बार!
तो मैंने तय किया है कि मैं इधर से चढ़ूंगा। मैं बिलकुल बहुत बड़े लड़कों की तरह उछला हूं... एक... दो... तीन... आठ... दस... नहीं यार! वे नुकीला किनारा मेरे हाथ से ज्यादा ही ऊपर है जिसे बड़़े लड़के जरा में पकड़ लेते हैं। हांफने लगा हूं; पर पहाड़ पर चढ़ूंगा तो जरूर! इधर-उधर को ताक रहा हूं। धूल के छोटे-छोटे भंवर बनाती लू के सिवाय कुछ भी चलता-फिरता नहीं दीख पड़ता। धूल भरी लू को मेरा चेहरा छूना मुझे पसंद है। मैं आंखें मींचकर लू के भंवरों में घुसता रहा हूं और उसकी गुनगुनी थपकियों को अपनी पीठ, मुंह और बालों में पाता रहा हूं। जब मेरी दादी जिन्दा थीं, मैं हर रात उनकी गोद में बैठकर कहानियां सुनता था। मैं आंखें मींचे कहानी सुनता रहता था और वे मुझे थपकियां देती रहती थीं। लू के भंवर में आंखें मींचना भी दादी की गोद-सा ही लगता है। अम्मा कहती हैं कि दादी दूर आसमान में तारा बनकर रोज रात हम सबको देखती हूं और मैं किसी को बताता नहीं हूं कि दादी गुनगुनी लू बन गई है। लू की लड़ती धूल में दादी की खुशबू है।
लू तो मेरी अपनी दादी है पर धूप? वो मुझे नहीं पसंद! चुभती है। पहाड़ पर धूप नहीं आ पाती, लू आ जाती है। मैं सोचता हूं कि संतोषी माता कितना प्यार करती है बच्चों से जो उन्होंने ऐन पहाड़ के ऊपर घने नीम की छाया कर दी है, पर ये निम्बौरियां भी टांकना जरूरी था क्या? ये पच-पच करके कपड़ों से लग जाती हैं और फिर नेकर-बुशर्ट धोते अम्मा खूब बड़बड़ाती हैं। आज ध्यान रखूंगा। ऊपर पहुंचकर पहले जगह साफ करूंगा तब बैठूंगा; पर ऊपर पहुंचूंगा कैसे?
मैं पहाड़ की दूसरी बगल में आ पहुंचा हूं। यहां बेरी है जिसके तले गिन्नी बड़ी अक्ल से बेर चुन-चुनकर फ्रॉक की झोली में भरती जा रही है और मैंने उसे पुकारा है।
''ऐ गिन्नी सुन!ÓÓ
''क्या है?ÓÓ
''सुन तो!ÓÓ
''नहीं, पहले मैं बेर इकट्ठे कर घर रख आऊं। शाम हो जाएगी तो सब बच्चे आ जाएंगे और एक-एक, दो-दो कर मेरे सब बेर मांग-मूंग कर खा जाएंगे।ÓÓ वो हाथ मटकाकर बोल रही हैं और अपनी दादी-सी दिख रही है।
''अरे! शाम होने में अभी बड़ी देर है। तू आ तो इधर।ÓÓ
''क्या है?ÓÓ वो आ गई।
''मैं इधर से चढ़ूं पहाड़ पर?ÓÓ
''इधर से! पर इधर से तो कोई नहीं चढ़ता।ÓÓ
बात सही थी। सपाट पत्थर पर वाकई नहीं चढ़ा जा सकता था।
''तू पीछे से चढ़ ना जिधर से सब चढ़ते हैं।ÓÓ उसने सुझाया।
और हम पहाड़ के पीछे गए। झाड़-झकूरों के बीच बनी पतली-सी पगडंडी से चढ़ाई का रास्ता बना है। पास में एक  बड़ा बिल है। कोई कहता है, इसमें एक छोटा मोटा चूहा रहता है तो कोई बताता है कि इसमें काला चमकदार सांप रहता है, जिसके पास इच्छाधारी मणि है और उसके सौ बच्चे हैं जो पाताल में रहते हैं। पतले, काले और बहुत जहरीले हैं और मणि से जो मांगों जरूर मिल जाता है। अगर कभी सांप की नजर मुझ पर पड़ गई और खुश होकर उसने मणि दे दी तो? मैं क्या-क्या मांगूंगा... केक.. चॉकलेट... आइस्क्रीम... नया कम्पास... और हां, ये भी कि ये पहाड़ कुछ नीचा हो जाए ताकि मैं झट से इस पर चढ़ जाया करूं। पर मणि तो है नहीं और पहाड़ भी नीचा नहीं हो पाया है। बिल की तरफ देख रहा हूं और डर-सा लग रहा है। मैं सांप से नहीं डरता। क्योंकि उसे कभी देखा नहीं है; पर इस बिल से मैं डरता हूं। बड़े भईया कहते हैं कि जब छोटे बच्चे बड़े बच्चों के साथ आते हैं तो ही सांप बिल से बाहर नहीं आता। अगर कोई छोटा बच्चा जो नौ साल का नहीं हुआ है, इधर को अकेला आएगा तो सांप या मोटा चूहा या नाले वाला नेवला उसे निगल जाएगा और फिर वो उसके पेट में से कभी भी बाहर नहीं निकल पाएगा। मैं नौ साल का तो हूं ना? मैं अकेला रह गया हूं। गिन्नी अभी-अभी घर को भाग गई है, उसकी झोली बेरों से भर गई थी। मुझे उस पर गुस्सा आ रहा है। ये लड़कियां भी ना! बड़ी चंट होती हैं, पर अम्मा कहती हैं कि लड़कियों को मारना नहीं चाहिए। पैर छुल जाए तो झट से उनके पैर पड़ लेने चाहिए। वो कन्याएं होती हैं ना! और उन्हें रुलाने से पाप पड़ता है। चलो माफ किया गिन्नी को वरना फालतू में पाप पड़ जाता।
पर अब मैं अकेला करूं क्या? कैसे चढ़ूं? हमेशा तो होता ऐसा है कि बड़े भईया पहले चढ़ जाते हैं फिर मेरा हाथ पकड़कर ऊपर खींच लेते हैं या यहां नीचे खड़े होकर मुझे ऊंचा उठाते हैं और मैं उस किनारे को कसकर पकड़ लेता हूं फिर कोई भी हाथ के सहारे मुझे ऊपर कर लेता है।
पर आज मुझे अकेले ही यह रास्ता तय करना है। पीछे की ओर देख रहा हूं। सूने जंगल को देख भय-सा लगा है। बिल से तो मैं डरता हूं ही। अब जल्दी से चढ़ ही जाऊं। मैंने उछलकर नापा है और ... नहीं इस तरह तो नहीं चढ़ पाऊंगा!
पांच-सात बड़े पत्थर इकट्ठे रख रहा हूं, एक के ऊपर एक। चेहरे से पसीना टप-टप गिर रहा है। हाथ गीले हो गए हैं। पलभर को दम लेकर मैं पत्थरों पर चढ़ा हूं... आऽहऽऽ, मैं गिर गया। कुहनी छिल गई। घुटने में बड़ी जोर से लगी। आंसू आ गए। कितना तेज दर्द हुआ है और मैं रोता-संभलता देख रहा हूं। कहीं बुशर्ट या नेकर फट तो नहीं गया। अम्मा मारेंगी और बड़े भईया खूब हंसेंगे, ''बड़ा चला था पहाड़ पर अकेला चढऩे। मजा चख लिया बच्चू!ÓÓ
मैं हाथ-पांव झाड़ता उठ खड़ा हुआ हूं। अच्छा हुआ आसपास कोई नहीं है। सड़क सूनी है, संतोषी माता के मंदिर में परदा है और गिन्नी घर गई हुई है। मुझे गिरते किसी ने नहीं देखा।
अब दूर पड़े एक बड़े खण्डे को देख रहा हूं। इसे सरकाकर यहां तक लाना मुश्किल है क्या? बस, एक बार अगर मैं इसे यहां तक ला सकूं तो इस पर खड़े होकर आराम से पहाड़ पर चढ़ जाऊंगा, पर ये सरकेगा कैसे? काश! मदद को गिन्नी होती। इसके नीचे से कुछ निकल आया तो? बदला लेने वाली इच्छाधारी नागिन, मोटा चूहा या सफेद बिच्छू! अगर मुझे काट लिया तो क्या मैं मर जाऊंगा? मैं डरा तो नहीं हूं, पर सुना है, डर के आगे जीत होती है। कब से चाहता हूं कि एक दिन इस पहाड़ पर अकेले चढू़ंगा। मैंने पूरी ताकत लगा दी, खण्डा थोड़ा-सा सरका। मैं खुश हुआ, हिम्मत बंधी और फिर, याद नहीं कितनी देर तक मैं उस खण्डे पर अपना पूरा दमखम लगाता रहा। खण्डा पहाड़ तक आ गया। मैं पसीने, धूल और मिट्टी से लथपथ बुरी तरह हांफ रहा था। हथेलियां लाल हो गई थीं और कंधों, कलाईयों और छाती में दर्द हो रहा था। सांस लेने में ताकत लगानी पड़ रही थी, पर मैं खुश था। आखिर ये पल आ ही गया। मैं कांपते पैरों से खण्डे पर खड़ा हुआ, डगमगाया। दिल बड़ी जोर-जोर से धड़कने लगा। मैंने पहाड़ पर उभरी नोंक पकड़ी। हथेली गीली थी, रिरकन-सी हुई। मैंने छोड़ दी और खण्डे पर ऊंकड़ू बैठ गया। उस पल में, मैं कुछ भी नहीं सोच रहा था। बस सांसों और धड़कन को काबू कर रहा था।  फिर खड़ा हुआ। हाथ नेकर से खूब अच्छी तरह पोंछे, सुखाए। पहाड़ के नुकीले किनारे को पूरी ताकत से पकड़ा और पहला... दूसरा... तीसरा... ये चौथा कदम जमाते ही मैं पहाड़ पर चढ़ आया हूं।
अरे! ये गिन्नी कब लौट आई। सामने खड़ी ताली पीट रही है।
''मुन्ना पहाड़ पर खुद चढ़ा! मुन्ना पहाड़ पर खुद चढ़ा!ÓÓ
मैं खुश हुआ हूं। कांप रहा हूं। हंस रहा हूं और सोच रहा हूं कि गिन्नी को भी पहाड़ पर चढ़ा लूं फिर हम साथ-साथ खेलेंगे। खूब मजा आएगा। आज दोपहर भर को यह पहाड़ मेरा हैा... मैंने इसे जीत लिया है।