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Saturday 18 Nov 2017

जनशताब्दी एक्सप्रेस


हर्ष सिंह
स्वामी विवेकानंद स्कूल, रेलवे बंगलापारा
रायगढ़ (छ.ग.)
 मो. 9827942882
रायपुर रेलवे स्टेशन, प्लेटफार्म नंबर 5 पर रोज की तरह भीड़ थी। स्टेशन का वही दृश्य जिसे हम देखने के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि कोई भी घटना दिल को नहीं छूती। लोगों का आना-जाना, ट्रेन आने पर वही धक्का-मुक्की, खोमचे वालों की आवाजें और गाडिय़ों की गडग़ड़ाहट, एक न चुभने वाला शोर।
दीवाली की लम्बी छुट्टी लगने के कारण अपने-अपने घर जाने वालों की भीड़ ज्यादा थी। कॉलेज से छूटे लड़के-लड़कियां, हंसी ठिठोली करते हुए एक-दूसरे से इतना उन्मुक्त व्यवहार कर रहे थे कि सुभाष ने अपनी पत्नी नीना से कहा- आजकल के नौजवान कितने फ्रैंक और खुशमिजाज हैं। कभी-कभी कोई पागल या भिखारी आकर वातावरण को क्षण भर बेमजा कर जाता। सबको इंतजार था, शाम पौने 6 बजे आने वाली जनशताब्दी का, जो लोगों को लेकर भाटापारा, बिलासपुर और रायगढ़ उनके गंतव्य की ओर जाएगी। तभी घोषणा हुई। ट्रेन के प्लेटफार्म में धीरे-धीरे आते और रुकते ही उतरने और चढऩे वालों के बीच मामूली भिड़ंत हुई। उतरने वाले की भीड़ चिल्ला रही थी, अरे बाबा! पहले उतरने दो, पूरी बोगी खाली है। पर चढऩे वाले कहां सुनते हैं उनकी बातों को नजरअंदाज करते हुए धक्का देते हुए घुसते चले गए। बाहर प्लेटफार्म पर खिड़की के करीब खड़े लोग बाहर से रुमाल, गमछा, बैग, बोतल फेंक-फेंककर सीटों पर अपना कब्जा करने में लगे थे और आलम यह था कि किसी-किसी सीट पर दो-दो रूमाल पड़े थे। सबके अंदर घुसते ही एक बार फिर जगह के लिए तू-तू, मैं-मैं और मामूली हाथापाई हुई और फिर धीरे-धीरे शोर मद्धम पड़ता हुआ लयबद्ध हो गया। कुछ लोग खड़े थे, अधिकांश लोगों ने बैठने की सीट पा ली थी। जो बैठ गए थे उनके चेहरों पर विजयी मुद्रा थी। जो खड़े थे उन्हें उम्मीद थी कि अगले स्टेशन पर कुछ लोग उतरेंगे तो वे उस सीट पर काबिज हो जाएंगे। एक बोगी में सुभाष ने भी बीवी बच्चों के साथ अपने और परिवार के लिए जगह बना ली।
समय से पहले अधेड़ लगने वाले एक देहाती परिवार जिसमें औरत-आदमी और उनके तीन बच्चे जिसमें बड़ा लगभग 15 वर्ष का होगा और बीमार, कमजोर जैसे अभी-अभी बिस्तर से उठा हो और दो छोटे बच्चे जिनकी उम्र प्रायमरी कक्षाओं के लायक होगी, बोगी में सुभाष के सीट से लगकर खड़े हो गए और अपना सामान बोरी, बिस्तर, बाल्टी, स्टोव सीटों के नीचे जहां जगह बनती थी, घुसेड़ दिया। सुभाष ने अपनी पत्नी को बताया कि इनकी बोली से लगता है ये पत्थलगांव के पास के गांव के आदिवासी हैं और मैं इनकी बोली थोड़ी-थोड़ी बोल समझ लेता हूं। पत्नी व्यंग्यात्मक तरीके से मुस्कराई मानो कह रही हो आपको जहां मौका मिलता है पाण्डित्य प्रदर्शन में नहीं चुकते। आदिवासियों के हक की लड़ाई की किताबें जो दिन-रात पढ़ते हैं।
भाटापारा स्टेशन आने पर कुछ सीटें खाली हुई और उस आदिवासी परिवार को भी बैठने की जगह मिल गई। सुभाष ने देखा कि परिवार के मुखिया के हाथ में गोदना गुदा हुआ दो फूलों के बीच उसका नाम दिलहरण रखा था। उसकी बीवी दोनों नाक में चांदी के फूल पहने हुई थी, जो काले पड़ गए थे। गरीबी और कुपोषण की कहानी परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर अंकित थी। बगल की सीट पर एक प्रेमी-प्रेमिका का जोड़ा इस तरह व्यवहार कर रहा था मानो उसे जमाने की कोई परवाह नहीं है। यदि उसे बेशर्मी कहें तो यह कहने वाले का पिछड़ापन होगा। इस ग्रामीण परिवार के आ बैठने से उनके आनंद में खलल पैदा हो रहा था, प्रेमिका की नाक-भौंहे बता रही थी। सुभाष दोनों दृश्यों को इस तरह देख रहे थे मानो कभी वे गांव में बसने वाले भारत को देख रहे हैं, कभी इंडिया शाइनिंग को कनखियों से महसूस कर रहे हों।
भाटापारा से गाड़ी आगे बढ़ी और कुछ रफ्तार तेज हुई थी तभी पुलिस वालों की एक टीम जिसमें चार-पांच जवान और एक छोटा अफसर था, दूसरे डिब्बे से आ गए और तलाशी करने लगे। उनकी आंखों से लगता था मानो वो नाक का काम कर रही हैं। वे आंखों से सूंघ रहे थे और उनकी नजर देहातियों के बोरों पर पड़ी। ये किसका है? हटाओ इसे, और बोरा हटाते ही उन्होंने स्टोव देख लिए। ये स्टोव किसका है? उनकी नजर एक काले पुराने स्टोव पर पड़ी। एक सिपाही जोर से चिल्लाया। सब यात्री एक-दूसरे को देखने लगे। कानाफूसी शुरू हो गई। किसका है, किसका है भाई? पर कोई न उठा। स्टोव के स्वामी का पता न लगने पर वे उसे लेकर जाने लगे। स्टोव ले जाते देख आदिवासी महिला जिसने दोनों नाक में चांदी के फूल पहन रखे थे, उसी तरफ जाते हुए जोर से आवाज दी। हमर हे बाबू, हमर स्टोव है (हमारा है बाबू हमारा स्टोव है)। महिला के पीछे दिलहरण भी पहुंच गया और अपना स्टोव मांगने लगा। पुलिस वाले कहने लगे- चलो केस बनेगा। गाड़ी में विस्फोटक सामान ले जाना मना है। इसमें तेल है, मिट्टी तेल। आग लग सकती है, चलो सब लोग।
सुभाष की पत्नी परेशान हुई। पति से कहा आप पुलिस को समझाइए, ये बेचारे मुसीबत के मारे लगते हैं, गरीब लोग हैं, इन्हें क्या मालूम स्टोव ले जाना मना है। सुभाष बोले- स्टोव नहीं मिट्टी तेल ले जाना मना है और हो सकता है उसमें मिट्टी तेल हो, होगा भी तो क्या, ये उससे बोगी को जला देंगे। नीना बोली। सुभाष इसी कश्मकश में थे कि कुछ बोलें कि न बोले। वे कोई निर्णय न ले सके और पुलिस वाले दिलहरण को अपने साथ ले गए। सुभाष ने महसूस किया कि बंद कमरों की बैठक में आदिवासी के शोषण के खिलाफ बोलना आसान है और जब कोई अवसर आता है तो उनके जैसे बुद्धिजीवी अक्सर चूक जाते हैं। आदिवासी की पत्नी रोने लगी और सबसे अपने पति को छुड़ाने की गुहार करने लगी। उसके बच्चे भी रो रहे थे। सामने की सीट पर बैठे एक शहरी, जो सरकारी कर्मचारी की तरह लगते थे और बहुत देर से अपनी बगल बैठी महिला को प्रभावित करने के लिए कुछ न कुछ हरकतें कर रहे थे, उनकी संवेदना अचानक जाग उठी और वे कहने लगे- अरे। पुलिस वाले कुछ नहीं करेंगे। ले-देकर छोड़ देंगे, बिलासपुर में बड़े साहब से मिलकर शिकायत करना। सब ठीक हो जाएगा। हमन का शिकायत करबो बाबू, नियम कानून ल नइ जानन। यात्रियों में चर्चा छिड़ गई, पता नहीं गिरफ्तार करेंगे कि कुछ ले देकर छोड़ देंगे। एक सज्जन कहने लगे अरे, कहना ही नहीं था हमारा स्टोव है। दूसरे बोले- ये आदिवासी बहुत भोले होते हैं। इनसे कुछ छिपाते नहीं बनता। इन सबसे बेखबर वो प्रेमी जोड़ा अपने प्रेमालाप में लिप्त था। आधा घंटा तक वह वापस नहीं लौटा, उसके बच्चे रो-रोकर बेहाल थे। करीब एक घंटे बाद वह आया। वह इतना दु:खी था कि उसकी आंखें ंडबडबाई हुई थी। लोगों ने पूछना शुरू कर दिया। क्या हुआ, क्या किये, कितना लिया? वह बोला- छोडि़ए साहब जाने दीजिए। ऐसा लगा ज्यादा पूछा जाएगा तो वह रोने लगेगा। उसकी आंखें भरकर छलक आई थी। जो उसके दर्द और बेबसी दोनों का बयान कर रहे थे।
आंसू पोंछते हुए कहने लगा- हम लोग कई दिन से रायपुर में लड़के के कैंसर का इलाज करवा रहे थे। गरीब को सब ठगते हैं। डॉक्टर ठगता रहा। जमीन बेचकर अस्सी हजार ले गए थे। सब खर्चा हो गया। डॉक्टर अब बोलता है ले जाओ घर पर रखो और पैसा होगा तो आना। पूरा परिवार वहीं पड़ा था। पकाता, खाता था इसलिए स्टोव रखे थे। हमें क्या पता था स्टोव ले जाना मना है। पुलिस वालों ने क्या किया? सुभाष ने पूछा। आखिरी डिब्बे में ले गए वहां एक पुलिस का साहब बैठा है वो बोला केस बनाकर अंदर कर दो। खूब हाथ-पैर जोड़े तो कहता है दो हजार दो नहीं तो अंदर हो जाओगे। बड़ी मुश्किल से एक हजार में माना और वो स्टोव कहां गया? सुभाष की बीवी ने दुखी होकर पूछा, उसको वो लोग रख लिए अब उसे लेने का हमारा मन भी नहीं है। फिर कोई पकड़ लेगा। गरीब की कोई सुनवाई नहीं है। पूरे डिब्बे में सन्नाटा छाया था। सुभाष की पत्नी नीना चिढ़कर पति से बोली जब तक तुम जैसे पढ़े-लिखे लोग केवल किताबों में शोषण के बीज तलाश करोगे तब तक ये सरकार के नुमाइंदे अहिंसक हिंसा करते रहेंगे।  प्रेमी जोड़े ने कोल्डड्रिंक के लिए जोर से आवाज दी, अब सभी का ध्यान उनकी तरफ था।