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Tuesday 21 Nov 2017

मुझे बाहर निकालो


गोविंद मिश्र
एच.एक्स 94, ई-7, अरेरा कॉलोनी, भोपाल, (म.प्र.)-462 016
वह भक्क से एकाएक सामने थी, जैसे पहले होती थी, जब बस से यहां आते थे। सड़क इत्मीनान से पहले की तरह बड़े-बड़े पेड़ों के साथ-साथ चली जा रही है, सामने कुछ नहीं सिवा एक रेलिंग के, रेलिंग के ठीक पहले सड़क दोनों तरफ मुड़ती है, लगता सिर्फ रास्ता होगा वहां, पर रेलिंग के पार... थोड़ा दायीं तरफ, वह कोठी। सामने ताल, जिसका नाम कोठी पर ही था- कोठीताल। पीछे बस्ती जो कोठी पर ऊंघती हुई टिकी थी। बस्ती को अपने पीछे किए, लंबे फैले तालाब पर नजर गड़ाए वह कोठी कभी रियासत की भव्य इमारत थी। तब लाल रंग से पुती, हमेशा तरोताजा पर चिटखियां छोड़ती थी- सौंदर्य, भव्यता, रहस्य और आतंक की मिली-जुली। आकार से वह अब भी उस परिदृश्य पर छायी हुई थी... पर अपने बड़े-बड़े बदरंग किवाड़ों, जहां-तहां फूट उठी घास और पलस्तर की जगह उभर आए मटमैले गड्ढों की वजह से उखड़ी-उखड़ी, चस्पा दिखती। पहले कोठी में दीवान साहब का दफ्तर था, वहां महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते थे। अब वहां सरकारी दफ्तर थे। बस्ती के लोगों के भाग्य का फैसला अब भी होता था वहां। तब कोठी बस्ती से एकदम अलग, ताल में सा$फ आगे की तरफ निकली हुई दिखती थी, जैसे नुकीली नाक चेहरे पर। अब उससे सटे-सटे बस्ती बाहर की इस सड़क की तरफ भी फैल आई थी। ताल का पानी-तब हमेशा थलथलाता हरा पानी-अब मटमैला था, काफी नीचे उतर गया था। सटर-सटर करते दांतों की तरह घाटों की सीढिय़ां जिधर देखो उधर टूटी थीं। पुरानी कोठी, नई बस्ती, मटमैला, गंदा पानी और टूटी सीढिय़ों वाले काले गेरुए घाट... सभी के रंग आपस में घुलकर एक सपाट बासीपन की सृष्टि करते थे।
केशव यहां अब आ पाया था, बचपन में यहां से जाने के बाद अब, जब जीवन उतार पर आ गया... पूरे पचास साल बाद। वह बायीं तरफ के छोटे पुल की तरफ चला गया। यहां नीचे कोठी ताल का पानी दूसरे ताल के पानी में मिलता था। पुल के पार ढलान में उतरता रास्ता बस्ती के बाहर उस बड़े मैदान की ओर निकलता था जहां मेला लगता था। मेले में आसपास के देवी-देवता विमानों पर आते, वृंदावन से रासमंडली आती। व्यापारी अपना सामान बेचने आते... तरह-तरह के बाजार लगते। मेला दो चीजों के लिए $खास मशहूर था- बाहर से आए व्यापारियों का सामान जो मेले में न बिक पाता था उसे राजा की तरफ से खरीद लिया जाता था और एक बड़ी पक्की इमारत जिसे कम्पनी कहते थे और जिसमें नाटक होते थे- कभी नल दमयंती, कभी सीता वनवास। नाटकों में वेशभूषा, प्रस्तुति भव्य होते थे। दोनों ही ची•ों अब खत्म हो गई थीं। मेले की ओर पुल पर से जाते हुए केशव अक्सर दायीं तरफ की रेलिंग पर हथेली घसीटता हुआ चलता था। पुल के बीचों बीच पहुंचकर रुकता और नीचे हरे पानी में किसी लहर से पहचान बनाने की कोशिश करता। फिर पुल के दूसरी तरफ आकर नीचे को झांकता- वह लहर इधर पहुंची क्या... इंतजार करते हुए नीचे पानी में देखता रहता। लहर खो जाती थी... सिर्फ पानी-कोठी ताल से स्वजन ताल में, स्वजन ताल से कोठी ताल में एक होता पानी! लहर की पहचान बनाने के लिए केशव इस तर$फ कागज का टुकड़़ा डाल देता पर अकसर वह टुकड़ा भी गायब हो जाता- पुल के नीचे ही कोठी ताल की लहर से उधर, स्वजन ताल की लहर से इधर होता हुआ पुल की भीतरी दीवार पर कहीं लगकर रह जाता, धीरे-धीरे गलकर पानी के नीचे चला जाता।
रेलिंग पर टिककर केशव ने मेले वाले मैदान की तरफ देखा। ढलान की दायीं तरफ गांवों से आए किसानों की बैलगाडिय़ां पर बैलगाडिय़ां ढिली होती थीं। किसानों के मोटे-मोटे पुराने कपड़े, ईख से लदी बैलगाडिय़ां, सानी खाते बैल, कंडों से उठता धुआं... मिली-जुली सोंधी-सोधी गंध केशव के नथुनों को छरछरा गई। कंपनी की लाल ईंटों वाली बड़ी इमारत, ऊपर सफेद टीन की छत-वैसी ही खड़ी थी, लेकिन अब उसमें नाटक नहीं होते थे, उसे गोदाम बना दिया गया था।
कोठी ताल के किनारे-किनारे चलकर एक पीला फाटक मिलता था जो बस्ती का मुख्य द्वार था। फाटक अब भी वहां था, जहां-तहां दीवारें टूटी, ईटें बाहर निकलती हुई। उसके नीचे से गुजर कर बस्ती के केन्द्रीय स्थल ड्यौढ़ी पहुंचते थे, ड्यौढ़ी पत्थर का डिजाइनदार एक विशाल द्वार, ऊपर कलाकृतियां, नीचे कीलें ठुके लोहे के बड़े-बड़े किवाड़। किले का सबसे बाहरी द्वार था वह। ड्यौढ़ी के भीतर रजवाड़ों के अब जिला सरकार के कार्यालय थे। वहीं से रास्ता किले में ंजाता था, जहां राजा लोगों के महल थे। ड्यौढ़ी के बाहर मुख्य सड़क पर बाजार था। दोनों तरफ जयपुर शैली में एक-सी दुकानें।
बायीं तरफ थी वह सड़क जो कोई सौ गज दूर कम्पनी बाग पर मुड़ती थी। जहां से फिर बस्ती के बाहर निकल जाती। इसी सड़क पर एक दिन कम्पनी बाग से ड्यौढ़ी तक बिछे बैठे थे संग्राम सिंह हाईस्कूल के लड़के, ड्यौढ़ी को चुनौती देते हुए। सामने ड्यौढ़ी से बाजार वाली सड़क की तरफ एक लाइन में खिंची थी गोरों की पल्टन, लोहे के कनटोप और हाथ में संगीनें लड़कों की तर$फ तनी हुई। लड़कों के जुलूस की अगली कतार पर खड़े थे राजन और उसके दो-तीन साथी... दसवीं दर्जे के छात्र। उधर से आवाजा उठती- इंकलाब, सड़क पर बैठे लड़के जवाब देते- जिंदाबाद। दरजा एक से दसवें दर्जे तक के लड़के। बड़े क्लास के लड़कों का एक हाथ नारे बोलते समय मुट्ठी बांधे ऊपर उठता था, छोटे दर्जे के लड़के... कोई... कोई ही हाथ उठा पाते; बाकी, नीचे जमीन को देखते हुए बोलते थे। इनमें केशव भी था। संगीनें ताने सिपाहियों की तर$फ देखते रहो तो हिम्मत बंधती थी। अशरफ, अब्दुल हाई, माथुर, मुल्तन... वे जो स्कूल में आपस में लड़ते रहते थे... सब वहीं थे, आसपास और नारे लगा रहे थे। जुलूस का नेता राजन था- लम्बा, छरहरा, घने बालों वाला... संगीनों के एकदम पास। किस चहक के साथ उसका शरीर इंकलाब कहते हुए मुड़ता, घूमता, तनता... तिरछा हो जाता। चेहरा आक्रोश से लाल हो जाता, बाल लहर-लहर, विद्रोह छात्रों की तरफ फेंकते होते। उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ रही थी।
तभी सिपाहियों के पीछे दो लारियां आकर रुकीं, सिपाहियों की पंक्ति एक किनारे से टूटी और उस रास्ते पहले राजन फिर दूसरे लड़कों को भेड़-बकरियों की तरह लारियों में ठूंस लिया गया और जाकर एक खाली पड़ी प्राइमरी स्कूल की इमारत में उड़ेल बाहर से ताला ठोंक दिया गया। स्कूल में सिर्फ पानी से भरी नांदें थीं और एक किनारे मूत्रालय। राजन ने लड़कों को उकसाया तो लड़के खिड़कियां खोलकर सड़क से गुजरते, हर आदमी को देखकर भीतर से मुट्ठी बांधकर चिल्लाने लगे- इंकलाब जिंदाबाद। चिल्लाते रहे। चिल्लाते-चिल्लाते राजन और उसके साथियों के गले बैठ गए थे।
शाम को केशव और दूसरे छोटे लड़कों को वहीं छोड़ दिया गया था। बड़े लड़कों को एक लारी में ले जाकर बस्ती से बाहर छोड़ा गया, जहां उन्होंने फिर एक जुलूस बना लिया- राजन आगे-आगे, बाकी लड़के पीछे-पीछे... मस्ती में चलते 'सरफरोशी की तमन्नाÓ गाते हुए वे बस्ती लौटे, बीच-बीच में तनी मुट्ठियां ऊपर उठतीं-वंदे... मातरम, इंकलाब जिंदाबाद... जैसे गोरी पल्टन को ललकारते थे- आओ फिर पकड़कर ले जाओ, हम तैयार हैं। सब अपने घर देर रात पहुंचे थे। अगले कितने दिनों तक उनके चर्चे स्कूल में चले थे।
राजन के बड़े भाई ने गांधी जी के आह्वान पर पढ़ाई छोड़ दी थी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद गए थे। राजन के पिता नहीं थे, इसलिए बड़े भाई का सीधा प्रभाव उस पर पड़ा था। वैसे भी उन दिनों हर घर में एक-दो सुराजी होते ही थे। राजन के भाई की उसे सलाह थी कि जो जहां है वहां से स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा ले सकता है... इसलिए राजन स्कूल की छात्र शक्ति को संगठित करे। राजन दूसरे छात्रों की अपेक्षा परिपक्व और उम्र में भी बड़ा था। लेकिन कभी उसके खिलाफ लड़कियों की छेड़छाड़, गुंडागर्दी जैसी टुच्ची शिकायतें नहीं सुनी गई। बिना शक वह बस्ती का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित छात्र नेता था। उसकी एक ललकार पर स्कूल खाली हो जाता था। राजन कभी छोटी-मोटी बात के लिए आंदोलन की आवाज नहीं देता था, हमेसा आजादी के संघर्ष के लिए ही, देश के लिए। राजन पढऩे में तेज हो सकता था पर नहीं हुआ, विवाह और नौकरी कर घर बसा सकता था पर उससे वह भी नहीं हुआ। स्वतंत्रता के बाद उसने शरणार्थियों की मदद की, उन्हें जमाने बसाने का काम हाथ में ले लिया... फिर वहीं से ऐसे ही जो काम सामने आया- उस तरफ सरक गया। वह लोगों के ह$क के लिए लडऩे को सदा तत्पर रहता था। उसके अनुसार जीवन में इतने काम थे कि रोजी-रोटी का जुगाड़ करने वाले काम के लिए समय ही नहीं था। उसकी जरूरतें इतनी कम थीं कि कमाई के लिए किसी काम को लेने की जरूरत नहीं थी। दो-जून का सादा खाना, जिसे आगे चलकर उसने एक जून का कर दिया और दो जोड़ा खादी के कपड़े। नहाते समय एक जोड़ी धोकर सूखने को डाल दिया अगले रोज के लिए। नहाने-धोने, सोने के लिए पिता का दिया हुआ मकान था ही, बाहर की कोठरी उसके लिए थी, जो उसका घर-दफ्तर दोनों थी। वह बराबर दूसरों के कामों को निपटाने में लगा रहता।
ड्यौढ़ी के दाहिनी तरफ का वह मैदान जहां केशव अपनी गाय छोडऩे आया करता था, मवेशियों के मालिक अपने मवेशियों को वहां छोड़ जाते थे, जहां से बरेदी फिर उन्हें हांककर बस्ती के बाहर चराने को ले जाता। उस मैदान में केशव को एक रोज एकाएक अजनबी आदमी-औरतों के झुंड बिखरे हुए दिखाई दिए। औरतें धोती की जगह सलवारें पहने थीं, आदमियों के लम्बे-बाल थे। अक्सर वे अपनी जनानियों को कूटते दिखाई देते... भीतर इतनी कर्कशता जो उनकी जीभों से पल-पल बाहर निकलती थी, रुक-रुककर आती उल्टियों की तरह। अधबंधे सामान उनके चारों तरफ फैले हुए थे। पता चला कि वे जैसे-तैसे जो सामान हाथ आया उसे बांध भाग निकले थे, जिस जमीन पर वे पीढिय़ों से जमे बैठे थे वहां से उन्हें उखाड़कर यहां फेंक दिया गया था... मवेशियों के मैदान में, कुछ दिनों वे वैसे ही रहे, आसमान के नीचे। फिर उन्हें तम्बू दिए गए थे। अब वहां खासे अनियोजित ढंग से जहां-तहां घर उठ आए थे। गौर से देखने पर अब भी पुराने चौकोर मैदान की पहचान उगती थी।
ड्यौढ़ी के सामने सीधा चलो, पहला बायां मोड़ लो तो सीधा संग्राम सिंह हाईस्कूल पहुंच जाओगे। केशव आंखें बंद करके पहुंच सकता है आज भी अपने स्कूल। स्कूल वाली सड़क और जुलूस वाली सड़क के बीच दफ्तरों की कुछ इमारतें थीं मेहंदी की बाड़ और छोटे बगीचों से छिंकी हुई।
इमारतें आज भी थीं, मेहंदी की बाढ़े और छोटे-छोटे बगीचे अलबत्ता गायब थे। उनकी जगह कई और इमारतें आ गई थीं, दफ्तरों में बढ़ोतरी हुई थी।
स्कूल के गेट की जगह लकड़ी के टेढ़े-मेढ़े लट्ठों के दो ढीले-ढाले बड़े किवाड़ से थे जो एक-दूसरे  से रस्सी के एक टुकड़े से बांध दिए गए थे। केशव को भीतर आने देने के लिए रस्सी खोली गई तो दोपहर में यों ही घूमती एक गाय ने स्कूल के भीतर घुसने की कोशिश की। एक अध्यापक हाथ में लठिया लिए था। पढ़ाना छोड़ वह लठिया चलाता हुआ गाय के पीछे कुछ दूर तक भागता गया, शायद वह इसीलिए लठिया लिए रहता था। केशव को अंदर लेकर- किवाड़ों को रस्सी से फिर बांध दिया गया। पहले आवारा घूमते मवेशयों को कांजी हाउस में बंद कर दिया जाता था, अब ज्यादातर मवेशी दिन भर छुट्टा इधर-उधर घूमते थे। कांजी हाउस नहीं था, स्वतंत्रता थी। अधिकांश मवेशी मालिकों की हैसियत भी गाय-भैंस रखने की नहीं रह गई थी।
जाड़ा खत्म हो रहा था, दोपहरें गर्म होने लगी थीं... पर कक्षाएं स्कूल के अहाते में, खुले में लगी हुई थीं। स्कूल की मुख्य सफेद इमारत अपनी जगह थी, पर बीचों-बीच वह धसक गई थी, इसलिए खतरनाक थी। उसमें स्कूल नहीं अंटते थे। जब तक दूसरी तरफ की विंग बनकर तैयार नहीं होती, छोटे दर्जे की कक्षाएं अधिकतर समय ऐसे ही बाहर लगती थीं। नई विंग जल्दी उठवाने, पुरानी इमारत का मलबा हटाकर बीच में खेल का मैदान निकालने के लिए पैसा सरकार के पास नहीं था।
स्कूल के मैदान में फासले-फासले पर बिछे बच्चों में केशव...?
केशव इस स्कूल में आठ साल तक पढ़ा था उसे याद नहीं कि कभी कोई कक्षा इस तरह नंगी जमीन पर लगी हो। उस समय सभी छात्रों के लिए बेंचे और लंबी डेस्कें थीं, वे पीछे की कतार वाली डेस्कों पर टिक भी सकते थे। स्कूल लगे दो-तीन घंटे ही हुए होंगे, पर लड़कों के चेहरे मुरझाए हुए थे। इसी स्कूल से बनकर एक दिन वह जुलूस ड्यौढ़ी के सामने पहुंचा था... इंकलाब जिंदाबाद! क्या करेंगे ये लड़के?
बाजा र के दूसरे छोर पर लड़कियों का स्कूल था जहां केशव की मां पढ़ाती थीं। स्कूल के अहाते में ही एक कमरों वाले चमकते क्वार्टर्स थे जिनमें से एक में केशव, उसकी बहिन और मां शुरू-शुरू में रहे थे। क्वार्टर्स की फेंस मेहंदी की झाड़ों से बनी थी, बीच में एक सामूहिक बगीचा था।
स्कूल का भीमकाय पक्का गेट गेरुए रंग का पुराना वाला था... साबुत.. पुख्ता... सालों से पुता नहीं था फिर भी पुराना रंग वहां था। गेट पर लगे लकड़ी के बड़े किवाड़ लूटे जा चुके थे। गेट पार करते ही बायीं तरफ क्वार्टर्सके सामने स्कूल का खासा लम्बा-चौड़ा मैदान और पार इस तरफ देखती हाईस्कूल की आयताकार इमारत-खिंची हुई लंबी लाइन में कमरे ही कमरे, कमरों के इधर लम्बा बरामदा, बरामदे से मैदान में उतरती सीढिय़ां। बाएं-दाएं चार-चार कमरों वाली शाखाएं... जैसे इमारत अपने दोनों हाथ केशव की तरफ फैला रही हो। भव्य.. सब कुछ क्लासिकल शैली में बनी किसी पुराने पुस्तकालय की बड़ी इमारत जैसा। पुराना पीला रंग इतना पक्का था कि इतने सालों बाद अब भी चिपका हुआ था। लड़कियों के आ जाने के बाद मुख्य गेट के फाटक बंद हो जाते, भीतर चहकती लड़कियों की आवाजें... जैसे किसी बड़े वृक्ष पर चिडिय़ा ही चिडिय़ा हों और उनकी चिकचिक कभी अलग-अलग कभी सामूहिक होकर उठ रही हो। तब यह इमारत एक खूबसूरत खिलखिलाती नवयौवना-सी दिखती थी। आज भी खूबसूरत थी, मजबूत भी... पर बुझता रंग, खाली कमरे और दीवारों के बाहर की तरफ जहां-तहां उग आई घास, सूखी घास... वह रो रही थी।
लड़कियों का स्कूल अब कहीं और लगता है!
क्यों भाई क्यों। स्कूल की इमारत, कम्पाउंड, गेट यहां तक कि क्वार्टर्स... सभी कुछ तो ठीक-ठाक थे। समुचित रखरखाव किया गया होता, अब भी किया जाए तो कैसी चमकने लगे यह जगह... जैसा कि खिलखिलाती लड़कियों के लिए होना चाहिए। क्यों कोई नहीं लड़ा कि लड़कियों का स्कूल यहीं इसी इमारत में रहेगा- क्यों जरूरत पड़ी एक नई जगह स्कूल खोलने की जबकि इससे बेहतर कोई जगह हो ही नहीं सकती।
जरूरत थी, सरकार को जरूरत थी। स्टेट गल्र्स स्कूल रियासत का था, तो बाद में सरकार का हुआ। इतना बड़ा कम्पाउंड, इतनी सारी जमीन शहर के बीचों-बीच, बाजार के पास! बड़े आसामियों की लार चू रही थी, जिसे लपकने के लिए लालायित थे सरकारी अफसर। स्कूल की इमारत और कम्पाउंड को एक साथ या टुकड़ों में बेच आसामियों को उपकृत किया जा सकता था, अपनी जेबें भरी जा सकती थी, सरकार को मुनाफा दिखाया जा सकता था- एक चाल में तीन-तीन खेल!
यह कत्ल है, कत्ल... केशव के अंदर कोई चीखा। चीख उसके भीतर ही खाली गड्ढे में उतरती चली गई, जैसे गहरे कुएं से गूंज की आवाज उठती है और फिर उसी में समाती चली जाती है।
कुछ दिनों गल्र्स स्कूल के क्वार्टर में रहने के बाद केशव का परिवार किले के नीचे वाले मोहल्ले में आ गया था। ड्यौढ़ी से ऊपर उस मोहल्ले तक का रास्ता किले वाले पहाड़ की तराई से होता हुआ जाता था जहां रास्ते में छोटे-बड़े पत्थर जड़े हुए थे। इस रास्ते में घर या तो ड्यौढ़ी के पास थे या फिर ऊपर जहां वह मोहल्ला शुरू होता था, बीच में सुनसान था। ड्यौढ़ी से वहां तक चढ़ाई थी।  
चढ़ाई के बीच बायीं तरफ कहीं खिन्नी का पेड़ होना चाहिए। गर्मियों में उसके नीचे पीली पकी हुई खिन्नियां पड़ी मिलती थीं.. बहुत मीठी। जब केशव संग्राम सिंह स्कूल से लौटता तो पेड़ की छाया में सुस्ताने, खिन्नियां बीनने और पेड़ की जड़ में बैठकर खाने के लिए यहां रुकता था।
खिन्नी का वह बड़ा पेड़ अब भी था। सालों से आदमियों, पीढिय़ों को गुजरता हुआ देख रहा है, केशव को भी। केशव के बाद भी कितने और बच्चे वह सुख इससे पा चुके होंगे। पहाड़ के नीचे और इतना बड़ा, फिर भी केशव को तब आतंकित नहीं करता था, उल्टे बुलाता था- 'आओ, बैठो... जो मेरे पास है, उसे मैंने तुम्हारे लिए नीचे परोस दिया है... खाओ।Ó पेड़ देते हैं, इसलिए उनकी आयु बड़ी होती है.. बशर्ते उन्हें काट न डाला जाए।
खिन्नी का पेड़ बस्ती से बाहर पड़ता था, इसलिए बच गया, लेकिन जेलर साहब के घर का नीम का पेड़ न बच सका। घर के बीचों-बीच था नीम का यह पेड़, तब यह विशाल था। उसकी एक डंगाल में झूला पड़ता जो पेंग लेने पर इधर उस घर के दरवा•ो के ऊपर आता और उधर नीम की दूसरी डंगाल की घनी पत्तियों में घुस जाता था। उन पत्तियों को लाने की होड़ लगा करती लड़के-लड़कियों में। बाहर गली में चलते लोग देखते-नया जीवन जो नीम की डंगालों में चहचहाता होता। हालांकि पूरा घर कच्चा था, जैसे तब होते थे पर वहां कितनी रौनक थी। भीतर रहने वाले आठ-दस लोग, चार-पांच कच्चे कमरों में। बाहर गोबर से लिपे-चबूतरे पर चौपड़ जमती थी, दीवाली में कौड़ी पड़ती जिसमें केशव जैसे बच्चे भी पीछे से दांव लगाते।
वह घर अब ढह चुका था- चबूतरा, बाहर की दीवारें, भीतर के कमरे सब नदारद थे। सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा था... जैसे  यहां कभी कुछ रहा ही न हो। वह भूखंड झगड़े में था इसलिए लावारिस पड़ा था। जमीन किसी की नहीं तो नीम का पेड़ भी किसी का नहीं...जो चाहे जब इधर-उधर से डंगालों को नोंचकर ले जाए। वह डंगाल जिस पर झूला टंगता था अब भी थी, दायीं तरफ खिंची... कंधे की बराबरी पर फैले दिखते हड्डियों वाले किसी हाथ की तरह। ऊपर वाली वह पतली डंगाल जहां पत्तियों के घने गुच्छे में झूला घुस जाता था, वह नदारद थी। वहां अब सिर्फ आसमान था, चौंधियाता आसमान।
केशव सोच रहा था- मकान जो कभी जानलेवा यत्नों/प्रयत्नों से बनाए जाते हैं, जिनको लेकर गाली-गलौच, मारपीट यहां तक कि खून-खराबा भी हो जाता है... उनके दो ही हश्र  होते हैं- या वे खंडहर हो जाते हैं, जेलर साहब के मकान की तरह, या बिक जाते हैं केशव के मकान की तरह, जो सामने था।
आगे का छोटा कमरा जहां वह पढ़ता था, उसके बगल वाला कमरा-सा जिससे रास्ता भीतर को जाता था- दोनों को मिलाकर अब एक बड़ा कमरा निकाल लिया गया था। उसमें बाहर के चबूतरे को भी अंगोट लिया गया था। केशव ने गौर किया कि बगल वाले घर का चबूतरा भी गायब था, वहां उस घर का बाहर कमरा बन गया था। चबूतरा जिस पर रास्ते चलते लोग बैठते, सुस्ताते एक-दूसरे के दु:ख-सुख की सुनते थे... वह संस्कृति से गायब हो रहा था। चबूतरे को भी अपने घर में खींच लो, आपके चबूतरे पर बैठकर लोग उसे क्यों घिसे आखिर?
बाहर का वह बड़ा कमरा भर पक्का था, लाल ईंटों पर कलई पुती थी। इतना भर बाहर दिखाने के लिए। मकान के भीतर का हुलिया वैसा ही था। एकदम पीछे के दो कच्चे कमरे ढह गए थे, उन तक आंगन को खींचकर पीछे छोटी चाहरदीवारी वाली एक छोटी कच्ची दीवार उठा दी गई थी। दीवार के पीछे बेर के पेड़ों की एक घनी बगिया थी, एक बेरी की डंगाल केशव के घर के इस हिस्से पर झुकी थी, उसके मंझोले गोल-गोल, खटमिट्ठे बेर नीचे झरे मिलते थे... लाल-पीले-हरे। वह बेरी तो नहीं ही थी, पूरी बगिया ही बौनी हो गई थी, उधर झांकने पर सिर्फ दो सूखे पेड़ों के ढांचे नजर आए।
केशव के घर में भी आंगन के बीचों-बीच नीम का एक मंझोला पेड़ था। वह अब नहीं था। जिस जगह वह होता था वहां जाकर केशव नेजामीन को थथोला। वह जगह समतल नहीं हो सकी थी। गोबर की लिपाई के नीचे मिट्टी, उसकी भी तहों के नीचे से पेड़ की जड़ें उंगलियों को छूती थीं, सिहरन पैदा करती थीं... जैसे वे जड़ें नहीं नसें थीं, किसी जीवित व्यक्ति की जो वहां दबा पड़ा था।
'मुझे बाहर निकालोÓ... जैसे नीचे से कोई कराहता था।
क्या था वहां? समय का पिछला टुकड़ा, एक व्यक्ति, एक बस्ती का अतीत... मात्र वह नहीं... अस्पष्ट पर अमूल्य वह जो अगली पीढ़ी से संभाला नहीं जा सका, उंगलियों से झर गया... जिसे केशव टुकड़ों-टुकड़ों में महसूस तो करता था पर पूरी तरह परिभाषित नहीं कर पाता था। उसके जैसे एक मामूली और छोटे से जीवन में इतना कीमती-कीमती खो गया।
केशव और जेलर साहब के बीच पूरब की तर$फ एक इमारत थी जिसे जखीरा कहते थे, जिसमें प्राइमरी स्कूल लगता था। यहां केशव ने संग्राम सिंह हाईस्कूल जाने के पहले दर्जा 'अÓ और 'बÓ में पढ़ा था। पाटी-बोकरावाली पढ़ाई। स्कूल अभी भी था, सरकारी स्कूल। यह क्या! यहां भी बच्चों की कक्षाएं बाहर लगी हुई थीं... छोटे-छोटे बच्चे, धूप में कुम्हलाते फूल! भीतर इमारत जगह-जगह धसक रही थी, जहां कक्षा 'बÓ लगती थी, उस बरामदे में तो पूरा खपरैल नीचे आकर पड़ गया था। स्कूल खंडहर होने की तर$फ खिसक रहा था और यह देख रहे थे बच्चे! जखीरा के बाद स्कूल कहां लगेगा, स्कूल चलेगा भी... कोई नहीं जानता था। स्कूल के लिए नई इमारत क्या, अध्यापकों की तनख्वाह देने तक को पैसे नहीं थे सरकार के पास!
जखीरा के बाहर निकल ही रहा था केशव कि दुबली-पतली काया वाला एक लंबा-सा बूढ़ा आदमी बाहर के मैदान में प्रकट हो गया। उसके बाल धुर सफेद और खड़े-खड़े थे। वह पागल-सा इधर-उधर सूंघता रहता था। उसके चेहरे की बदहवासी से जाहिर था कि जैसे वह कुछ सूंघता हुआ दिन भर इधर से उधर, उधर से इधर डोलता रहता है, सूंघता हुआ ही उधर को आ गया था। हर पल, फडफ़ड़ाती शरीर-विहीन कोई बेचैन आत्मा! वह केशव को गौर से देखता, फिर केशव के घर को ऊपर से नीचे तक... फिर जखीरा की तरफ जहां से उसकी खौखियाती निगाहें ऊपर टंगे किले के बुर्ज की तरफ उठ जातीं।
कितने साल पुराना किला! उसके पत्थर अब भी उसी जगह थे, और भी काले। वे ऊपर से तमाशा देखते रहते, नीचे मकान-मनुष्य जिस तरह उगते और ढहते थे। बुर्ज के नीचे का वह दागी पत्थर-जैसे कोई पागल आदमी झाड़े फिरने बैठा हो- उसी जगह था। उसे देखकर केशव बहुत डर जाया करता था... अब डर तो नहीं लग रहा था लेकिन जब-जब केशव की निगाहें उससे जा अटकतीं, वह बड़ी विद्रूप सी हंसी केशव की तरफ फेंकता था...
सहसा सफेद बालों वाले आदमी के चेहरे की रेखाएं ऊपर आने लगीं, जैसे बादलों के छंट जाने पर कोई बूढ़ी पहाड़ी के नाक-नक्श उभर रहे हों। उसकी उदासी पहचानी हुई लगती थी। गांधी जी के बलिदान के दिन संग्राम सिंह हाईस्कूल के छात्रों का एक मौन जुलूस स्कूल से कम्पनी बाग, वहां से ड्यौढ़ी होता हुआ बाजार की मुख्य सड़क से गुजारा था। उसमें सबसे आगे था यह ऐसे ही बिखरे बाल मगर तब काला चेहरा लटका हुआ, शरीर किसी लट्ठे पर लटके लत्ते-सा, उदासी वही थी, उसमें जुड़ी बदहवासी नई थी...
राजन... केशव पहचान गया। वही जिसका शरीर उस दिन संगीनें ताने सिपाहियों के सामने आसमान में रह-रहकर चमकती बिजली की तरह चिलक-चिलक उठता था- इंकलाब-जिंदाबाद!
केशव का गला रुंधने लगा, सांस अटकने को हो आई। दौड़कर राजन के गोड़ लग जाए और बाद की पीढ़ी की तरफ से कुबूल करे- ''हमने तुम्हारे साथ दगा किया।ÓÓ