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Saturday 18 Nov 2017

अंधेरे की सुनामी


धर्मेन्द्र कुसुम
जहाज घाट रोड, आदमपुर, काली स्थान के नजदीक, भागलपुर (बिहार)
मो. 099334891141
'आज फिर ब्लॉक ही चले क्या?Ó शांति ने जरा खीझे हुए स्वर में अपने पति से पूछा।
'हां, आज तो जाना ही पड़ेगा, टाइम दिया है उन्होंने। कहा है आज काम हो जाएगा।Ó रमेश ने जतन में धोयी हुई  लेकिन बिना कल की हुई कमीज पहनते हुए जवाब दिया।
'कल ही कहां बिना बुलाए गए थे आप। रोज तो यही कहकर जाते हैं कि आज काम हो जाएगा लेकिन काम होता कहां है। इस ब्लॉक के चक्कर में खेती-पानी का काम भी खराब हो रहा है। आज ब्लॉक जाना छोड़ ही देते तो ठीक रहता। शुक्कर है, सेन्टर में डॉक्टर बाबू आएंगे आज, सोनू को दिखा लाते। सरबतिया की मां कहती थी कि कालाजार है, इसलिए बुखार पीछा नहीं छोड़ रहा है। मुझे तो बहुत डर लगने लगा है कालाजार का नाम सुनकर।Ó बोलते-बोलते शांति नल पर बर्तन मांजना छोड़कर ओसारे के निकट चली आई, जहां रमेश ब्लॉक जाने के लिए तैयार खड़ा था। रमेश ने देखा शांति के राख तथा कालिख लगे हाथ में सूखे हुए झींगे का चूड़ा था और उसने अपना आंचल अपनी कमर में इस तरह लपेट रखा था, जैसे वह किसी से लडऩे की तैयारी में हो। कोई और अवसर होता तो वह उसे इस रूप में देखकर ठठाकर हंस पड़ता लेकिन शांति के चेहरे पर छाई कालाजार की डरावनी छाया ने उसे ही सहमा दिया था।
'सोनू को तुम्हीं सेंटर जाकर दिखा लेना। मैं आज ब्लॉक नहीं जाऊंगा तो सब किया-कराया गड़बड़ हो जाएगा।Ó कहते-कहते रमेश आंगन से बाहर निकल गया। उसके पलटते ही शांति की नजर रमेश के पतलून के पिछले हिस्से पर पड़ी, जिसके कटे हुए हिस्से को कल ही उसने बहुत बारीकी से रफू किया था। उसे यह देखकर बहुत दुख हुआ कि अत्यंत बारीकी से रफू किए जाने के बावजूद चिप्पी दूर से भी साफ-साफ दिखाई पड़ रही थी। काफी दुख एवं भारी मन से वह फिर बर्तन मांजने चली गई।
सुबह के करीब आठ बज रहे होंगे, जब रमेश अपने गांव की सीमा पार कर ब्लॉक जाने वाले रास्ते पर अकेला लेकिन अभ्यस्त चाल में चला जा रहा था। यह रास्ता अजाना है भी नहीं उसके लिए। बचपन से चल रहा है वह इस रास्ते पर। गांव की पाठशाला में तीसरी कक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए उसे प्रतिदिन इसी रास्ते पर वर्षों चलना पड़ा है। मध्य विद्यालय, हाईस्कूल उन दिनों कुछ भी तो नहीं था उसके गांव में। खेत-खलिहान की सीमा से आगे निकलकर नहर के पार बौना बिघिया जंगल आते ही उसे याद आया, उन दिनों कितने घने पेड़ और बंसवाड़ी थी यहां। दोपहर में भी घुप अंधेरा छाया रहता था। गांव से स्कूल तक जाने वाली पगडंडी जंगल के बीचों-बीच ही गुजरती थी। तब कितना डर लगता था उसे यहां से गुजरने में, भूत और राक्षस द्वारा पकड़े जाने का डर। इसी डर की वजह से जंगल में साथ-साथ चलने के बदले मनोजवा सनपापड़ी खाने के लिए रोज पांच पैसे वसूल लेता था उससे। यह बात अलग है कि मनोजवा के कारण ही स्कूल से घर वापसी के समय मनभर खाने के बावजूद उसकी सभी जेबें बेर, शहतूत, खजूर जलेबी, अमरूद, जामुन, सतालु आदि फलों से भरी रहती थीं। लेकिन, अब कहां रहा जंगल, सारे पेड़ तो कट गए, बस नाम रह गया है बौनबिघिया जंगल। पुरानी बातें याद कर उसे हंसी आ गई लेकिन पिछले डेढ़ माह से ब्लॉक के चक्कर और अब भी कार्य की सफलता में संशय की स्थिति ने उसे दुखी कर दिया...।
मास्टरी की ट्रेनिंग करते ही बड़े भैया बेसिक स्कूल के शिक्षक हो गए। वे अपनी पत्नी के साथ स्कूल से सटे गांव स्थित अपनी ससुराल में ही बस गए। बड़ी बहन सरस्वती की शादी का सपना लिए पिताजी गुजर गए। इन हालातों में कॉलेज की पढ़ाई कर पाना उसके लिए संभव नहीं रह गया। बाबूजी के नहीं रहने पर दो साल जी-जान लगाकर खेती कीा। उसके बाद भैया का गोड़-मोड़ पकड़कर भाभी की अनिच्छा के बावजूद कुछ पैसे उनसे लिये, तब जाकर किसी तरह सरस्वती की शादी हुई।
उसकी बिदाई के बाद बचपन से मातृहीना वह बिल्कुल अकेला हो गया। उस पर भाभी का कहर टूटा। सरस्वती की शादी में भैया से लिए पैसों ने भाभी को इतना विचलित कर दिया था उसने जमीन-जायदाद बंटवाकर ही दम लिया। भाभी के दबाव अथवा सहमति से भैया बंटी हुई सारी जमीन मुखिया के हाथों बेचकर सदा-सदा के लिए उनसे नाता तोड़ गए। उसके पास रह गई पूर्वजों की थाथी के रूप में उसका डीह और सवा दो बीघा जमीन, मैट्रिक की डिग्री और बेरोजगारी, स्वजनों की स्मृति और गंवई वातावरण में अंधकारमय भविष्य।
दिन किसी तरह बीत रहे थे। इसी बीच उसकी शादी तय हुई और एक दिन शांति उसकी पत्नी बनकर उसके घर आ गई। शांति 'यथा नाम तथा गुणÓ का मूर्तिमान स्वरूप थी, जीता-जागता उदाहरण। युगों-युगों से प्यार के लिए प्यासे और खेती-पत्ती से थके-हारे रमेश को शांति के आंचल पर सिर रखकर काफी सुख मिलता। दिन बड़े मजे में बीतने लगा। उसे शांति ने फूल-सा कोमल और प्यारा एक बेटा भी दिया, जिसे वह प्यार से सोनू कहता है।
वह, शांति और सोनू की त्रयी-सुखमय और संतोषजनक जीवन। लेकिन, दिन-प्रतिदिन बढ़ती महंगाई के साथ बढ़ती पारिवारिक आवश्यकता-खेती से गुजारा करना मुश्किल ही, नहीं असंभव होने लगा। ऐसे में उसे जानकारी मिली कि सरकार ने स्वनियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत अपनी इच्छानुसार कारोबार करने के लिए पच्चीस प्रतिशत अनुदान के साथ एक लाख रुपए तक का ऋण देने की घोषणा की है। यह योजना खासकर शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए ही लागू ही गई है। इस जानकारी से उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। उसने गांव में आटा चक्की लगाने की योजना बनाकर जिला उद्योग केन्द्र में आवेदन दे दिया। आवेदन देने के कुछ माह बाद उसे पता चला कि उसने वहां के बाबुओं को खुश नहीं किया, इसलिए उसका आवेदन बैंक नहीं पहुंचा।
अगले वित्तीय वर्ष में उसने अपने आवेदन के साथ पांच सौ का एक पत्ता भी नत्थी किया। उस बार उसका आवेदन जिला उद्योग केन्द्र से अनुशंसित होकर बैंक तो पहुंचा लेकिन फिर भी वह कर्ज पाने से वंचित रह गया। लोगों ने एक बार फिर उसे बेवकूफ कहकर दुत्कारा क्योंकि वह बैंक कर्मचारियों को खुश नहीं कर पाया था। उस वर्ष भी उसे खेती के सहारे ही अपनी गृहस्थी चलानी पड़ी थी। उस पर परेशानी यह हुई कि बैंक और जिला कार्यालयों के चक्कर में सारी संचित राशि समाप्त हो गई और खेती भी लडख़डा गई। परिणाम यह हुआ कि वह अगली फसल भी ठीक ढंग से नहीं उपजा सका और न पुन: ऋण के लिए ही प्रयास कर सका। उसकी हालत पहले से भी बदतर हो गई।
इसी दौरान उसे पता चला कि गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों का सर्वेक्षण कार्य चल रहा है। यदि इसमें उसका नाम दर्ज हो जाय तो उसे समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम के अंतर्गत कर्ज मिल सकता है, जिससे छोटा-मोटा रोजगार कर वह अपनी स्थिति बेहतर बना सकता है। निर्धन परिवारों की सूची में अपना नाम दर्ज कराने के प्रयास में उसके बचपन का मित्र हरचन्ना उसके काम आया। घर जाकर सूची में नाम दर्ज करने का काम कर्मचारी के बदले वही कुछ ले-देकर करता है। गांव में हरचन्ना को लोग नेताजी कहकर बुलाते हैं। हालांकि कुछ लोग पीठ पीछे का दलाल भी कहते हैं लेकिन उसे इससे क्या लेना-देना, हरचन्ना ने उसका काम बिना कोई अवैध राशि लिए मुफ्त में कर दिया, यही बहुत है।
सूची में नाम दर्ज होने के बाद उसे ब्लॉक के एक चपरासी से नि:शुल्क लिखा आवेदन पत्र दस रुपए में खरीदना पड़ा। जिसे भरकर उसने करीब डेढ़ माह पहले ही कार्यालय में जमा कर दिया था और तब से रोज ब्लॉक दौड़ रहा है। आवेदन पत्र जल्द से जल्द बैंक पहुंच जाए तो वह वहां से कर्ज प्राप्त कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार लेगा और सोनू तथा शांति का जीवन खुशियों से भर देगा। लेकिन, रोज कुछ न कुछ अड़चन लग जाती है और उसका काम पड़ा रह जाता है।
यह तो संयोग है कि दो दिन पहले उसे उसके पड़ोसी गांव के एक चलती वाले आदमी से मुलाकात हो गई, जिन्होंने उसे बताया कि पैसा खर्च नहीं करने के चलते ही उसे दौडऩा पड़ रहा है। वह पांच सौ रुपए का जुगाड़ बैठा ले तो वे उसका काम तुरंत करवा देंगे। महीनों से दौड़-दौड़कर परेशान हो चुके रमेश के पास इंकार का साहस नहीं था। पिछले दिन उसने अपने इकलौते बेटे सोनू के मुंह से दूध छीनने का अपराध कर अपनी एकमात्र बकरी बेच दी और पांच सौ रुपए उनके हवाले कर दिया। उसके बाद ही बड़ा बाबू ने उससे कहा था- 'कल आओ तो आवेदन तुम्हारे हाथ में ही दे देंगे और बैंक ले जाकर अपना काम करा लेना।Ó
इसी आश्वासन पर आज उसने सोनू की बीमारी की भी परवाह नहीं की और ब्लॉक चल पड़ा। एक बार कर्ज मिल गया तो फिर कोई दु:ख नहीं रहेगा। वह सुखमय भविष्य की कल्पना में डूबने उतराने लगा लेकिन तत्क्षण यादों और सपनों का महल पैर में लगी ठेस से रेत की तरह बिखर गया। वह ब्लॉक प्रांगण की पकड़ी सड़क पर पहुंच चुका था और हवाई चप्पल के बड़े छेद से अचानक फीता निकल जाने के कारण उसे ठेस लग गई थी। उसने थोड़ा रुककर अपनी चप्पल में फीता डाला और कार्यालय की ओर बढ़ गया।
कार्यालय में अभी बाबू लोग नहीं पहुंचे थे। वह उनकी प्रतीक्षा में कार्यालय के बाहर पीपल के नीचे चबूतरे पर बैठ गया। चार-पांच युवक और वृद्ध पहले से वहां बैठे थे। समय बिताने के लिए उसने अपना ध्यान उन लोगों की बातों की ओर ही लगा दिया। एक युवक बेरोजगारी भत्ता पाने के मार्ग में आई रुकावटों के संबंधों में बता रहा था। उसकी बात पूरी होने पर एक बूढ़े ने बताया का वृद्ध पेंशन पाने के लिए उसे क्या-करना करना पड़ा है। दोनों की बात सुनकर तीसरे वृद्ध सज्जन बोले- ''कलजुग है कलजुग कोई काम बिना खर्चा-पानी के होता ही नहीं है। गोसाई तुलसीदास जी ने गीता में ठीक ही लिखा है कि रामचंद्र कह गये सिया से, ऐसा कलयुग...।ÓÓ
''गीता में नहीं रामायण मेंÓÓ- चौथे युवक ने बात सुधारी
''हां-हां उसी में।ÓÓ वृद्ध सज्जन ने युवक की बात मान ली।
रमेश को हंसी आ गई लेकिन अफसोस भी हुआ कि लोग अपने धर्म, धार्मिक ग्रंथों और उसके नीति ज्ञान से कितने अनजाने धर्म की रक्षा के लिए लाठी-भाला लेकर सड़कों पर उतर जाते हैं जैसे ये भगवान के सहारे नहीं भगवान ही इनके भरोसे हों।
रमेश ने इन गंभीर विचारों को परे झटका और कार्यालय की ओर देखा, जहां बाबू लोग जुटने लगे थे। कार्यालय पहुंचने के बाद उसने पहले बड़ा बाबू को स्थिर से कुर्सी पर बैठते हुए देखा फिर काफी झुककर प्रणाम किया और चलतीवाले आदमी के आदमी के रूप में अपना परिचय देते हुए अपनी याद दिलाई। बड़ा बाबू के माथे पर भी याद करने जैसी शिकन खिंची फिर उन्होंने टेबुल के सबसे ऊपर रखा कागज झटके-से उसकी ओर बढ़ा दिया।
अनुशंसित आवेदन हाथ में लेते ही उसकी आंखें भर आई। उसके बाद तो लगा कि उसके पांवों में पंख लग गए हैं, उसका काम पहले ही करके रखे थे। बैंक जाने के रास्ते में ही उसे याद आया कि वापसी में उसने उनको प्रणाम भी नहीं किया था, उसे अपनी इस भूल पर काफी अफसोस हुआ। उसने मन ही मन उन्हें दुआ देते हुए उनकी तरक्की की कामना की। बैंक की सीढिय़ां चढ़ते-चढ़ते उसके मन से बकरी बिक जाने का दुख पूरी तरह निकल चुका था। बैंक के एक कर्मचारी ने उसके हाथ में आवेदन लेकर सरसरी निगाह से देखा और अगले दिन आने को कहकर दूसरे काम में व्यस्त हो गए।
अगला दिन मतलब कल। रोज-रोज का यह 'कलÓ  उसके लिए एक डरावनी काली रात की तरह भुतहा प्रतीत होने लगा। करीब पन्द्रह दिन दौडऩे के बाद उसे होश आया कि बैंक बाबू को खुश नहीं करने के कारण ही उसे स्वनियोजन योजना का कर्ज नहीं मिला था, कहीं इस बार भी चूक गया तो अनर्थ हो जाएगा। नहीं-नहीं, वह ऐसा नहीं होने देगा। जैसे भी हो कुछ पैसों की व्यवस्था कर वह अवश्य बैंक बाबू को खुश करेगा और यह कर्ज प्राप्त करेगा। वह घर लौट गया।
उसकी परेशानी देखकर शांति ने औरत की सबसे बड़ी कमजोरी और अपना एकमात्र चांदी का हार, रमेश जिसे चन्द्रहार कहकर अपनी गरीबी का मजाक स्वयं उड़ाता था, एक सोनार के हाथों बेच दिया।
रमेश दौड़ा-दौड़ा बैंक पहुंचा- 'लीजिए सर, दस हजार का दस परसेन्ट दस सौ रुपया।Ó
'लेकिन तुमने बहुत देर कर दी है।Ó मैनेजर ने अफसोस जाहिर करते हुए रुपया वापस कर दिया। वे आगे बोले- 'इस वर्ष के लिए बैंक को दिये गए लक्ष्य के अनुसार ऋण वितरित किया जा चुका है। अगले साल प्रयास करना, मैं तुम्हें कर्ज अवश्य दूंगा।Ó जवाब सुनकर रमेश चीखना चाहता था लेकिन चीखा नहीं। हालांकि उसकी आत्मा जरूर रो पड़ी थी।
टूटे और थके मन से घर लौटते समय वह सोचता जा रहा था कि एक बार कर्ज पाने के प्रयास में यह हाल है कि बकरी बिक गई, जेवर बिक गया, खेती मारी गई। इसी तरह अगले साल भी कर्ज लेने का चक्कर चला तो जमीन भी हाथ से निकल जाएगी। उसने इस बुरे खयाल से पीछा छुड़ाने के लिए अपनी चाल तेज कर दी। सूर्यास्त हो जाने के कारण उजाला सिमटने लगा था और रास्ता घने अंधेरे में डूबता जा रहा था। घर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा इतना गहरा हो चुका था कि लगा अंधेरे की सुनामी आ गई हो।