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Friday 16 Nov 2018

अम्बेडकर को हल्के में समझना नादानी होगी

अम्बेडकर! बंधुत्व के बंधनकत्र्ता; अम्बेडकर! समता के समन्वयकार; अम्बेडकर! न्याय के न्यायाधीश, इस त्रिआयामी सामाजिक समरसता के सेनानी को इतिहास ने न्याय तो दिया, परंतु हिकाऱत की निगाह से! नतीजतन आज के बदलते परिदृश्य में मुख्यधारा में होते हुए भी नजरों की निगाह़ से ओझल हैं। इसका कारण है - एक तो सामंती नजऱ और दूसरा अम्बेडकरवादियों का अम्बेडकर की विचारधारा से विलग प्रतिरोध नहीं, प्रतिशोध की निगाह! यह वही कारण है कि जिस कारण कोई महान विचारधारा या कोई महान व्यक्तित्व समाज की सम्पूर्ण इकाई से कट जाता है और सिर्फ एकल इकाई का प्रतिमान बनकर एक खास घेरे में या एक खास बंधन में बंधकर सिमट जाता है, ऐसी स्थिति बाकी के समाज से उसे विलग कर देती है, फिर वहां वह समाज हिक़ारत में प्रतिशोधी बन जाता है जो मानवता के लिए हितकारी नहीं होता.......!

बहरहाल, ऐसी और इस स्थिति ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर जैसे प्रबुध्द विचारक, समरस समाज के पुरोधा और मानवीय कल्याण के कारक को बहुआयामी भारतीय समाज में तन्हा कर दिया। सुशासन के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर के सम्पूर्ण सामाजिक विकास के सरोकारी प्रावधानों से भारतीय बहुआयामी समाज वंचित रह गया। अभी हाल के वर्षों में डॉ. भीमराव की 125 वीं जयंती वर्ष में भी कोई परिवत्र्तनकारी लक्ष्य नहीं दिखा। ध्यातव्य हो कि कोई भी विचारधारा एकांगी होकर सम्पूर्ण समाज में पल्लवित नहीं होती। ऐसे संक्रमण काल में दिल्ली से प्रकाशित युवा संवाद मासिक पत्रिका का दिसम्बर 2017 का अम्बेडकर विशेषांक इस माने में सफल है क्योंकि इस अंक के संयोजन में अम्बेडकर के सर्वांग को समेटने की पुरजोर कोशिश की गई है जिसमें उनके सामाजिक संघर्ष, पत्रकारिता, स्त्रीअधिकारिता, पुरजोर जातिगत अस्तित्व का संघर्ष एवं राष्ट्र-निर्माण की समस्या पर विमर्शित विचार उल्लेखनीय हैं।

एमबीबीएस चिकित्सक डॉ. निखिल डोरले का दीक्षाभूमि, नागपुर से चैत्यभूमि, मुंबई का उनका बाइक से सफर दिलचस्प है जिसमें मूकनायक से महानायक, बहिष्कृत भारत से प्रबुध्द भारत तथा विधि-लेखन से संविधान लेखन तक को रचनेवाले महामानव की उत्कर्ष भूमि की परिवर्तनयात्रा का बोध सहज हो जाता है, और पाठक को भी इस यात्रा का यात्री बनाने का उत्साह परिबोधित करता है। वहीं जीवनी लेखन के कुहासा में प्राध्यापक संदीप मधुकर सपकाले ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रथम जीवनी लेखक बाबा साहेब के समकालीन तानाजी बालाजी खरावतेकर की चर्चा की है। 'डॉ. अम्बेडकर' शीर्षक से उस 26 वर्षीय युवालेखक खरावतेकर द्वारा 1943 में लिखी जीवनी 29 फरवरी 1946 में प्रकाशित होती है। श्री संदीप सपकाले ने इस प्रकरण की संदर्भित सूचना के साथ पुस्तक के उन प्रकरणों को भी स्पष्ट किया है जो आज के समय में भी वैसे ही प्रासंगिक लगते हैं। यह ऐतिहासिक जानकारी इस विशेषांक की उपलब्धि मानी जायेगी।

'युवा संवाद' ने इस महत्वपूर्ण विशेषांक में दो वरिष्ठ पत्रकारों को भी समाहित किया है जिसमें पत्रकार प्रोफेसर अरुण कुमार त्रिपाठी का एक लम्बा वैचारिक आलेख पूरे मंथन का काम करता है जिसमें डॉ. अम्बेडकर और गांधी के बीच हुए वैचारिक मतभेद का बड़ा ही तथ्यपूर्ण ढंग से सत्य का साक्षात्कार हुआ है। विवाद, संवाद और समन्वय के त्रिआयामी तत्व से जो यौगिक बना वह पूना-पैक्ट का परिणाम ही कहा जायेगा। अर्थात् गांधी और अम्बेडकर के मध्य के मर्म को समझने के लिए प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी का तर्कपूर्ण विवेचन विमर्श के एक बिन्दू पर लाकर भ्रमविहीन चिंतन की दिशा देता है। एक मजेदार प्रसंग प्रो. त्रिपाठी ने उद्धृत किया है- गांधी की हत्या के दो माह बाद जब अम्बेडकर ने एक ब्राह्मण डॉ. महिला से विवाह किया तो पटेल ने उनको लिखा कि ''मुझे यकीन है कि बापू अगर जिंदा होते तो वे आपको अपना आशीर्वाद देते।ÓÓ जवाब में डॉ. अम्बेडकर ने लिखा, ''मैं आपकी बात से सहमत हंूॅ कि अगर बापू जीवित होते तो वे हमें जरुर आशीर्वाद देते।'' यह एक ऐसा प्रसंग है जिसे चिंतन के चैतन्य में लाया जाय तो जातिसूचक ज़हर का कोई असर मानवीय जेहन में जाने का प्रयास ही नहीं करेगा। अस्तु, अम्बेडकर को हल्के में समझना नादानी होगी। पूना-पैक्ट को भी हल्के में समझना नादानी होगी, अम्बेडकरवादियों द्वारा अम्बेडकर को हल्के में समझना नादानी होगी, क्योंकि यह दो युगपुरुषों का समकालीन संवाद था विवाद नहीं ...। दलित साहित्य और बहुजन समाज की अवधारणा जिस त्रिलंगी व्यवस्था (विरोध, प्रतिरोध और प्रतिशोध) में जकड़ गई है इसे समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार और प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे का सुगठित आलेख 'पत्रकारिता और बहुजन की अवधारणा' स्वागत योग्य है। जिस तल्ख़ और तर्कपूर्ण सत्य से अम्बेडकर अपनी पत्रकारिता की भाषा में बोल रहे थे, उसे समझने और विवेचने की बात है। सिर्फ  'मूकनायक' और बहिष्कृत भारत' जैसे प्रतीकार्थ से ही काम नहीं चलेगा, 'प्रबुध्द भारत' का प्रतीकार्थ भी समझना होगा। अम्बेडकर की मानवीय चेतना यहां आकर मुखर होती है। इसी क्रम में पत्रकारिता की शोधार्थी नेहा नेमा ने अम्बेडकर की पत्रकारिता की प्रासंगिकता पर बात की है तो शोधार्थी विकास चन्द्र ने अम्बेडकर की पत्रकारिता के योगदान को सहेजा है।

       स्त्री खण्ड का विमर्श मीना, चित्रलेखा अंशु, रजनीश अम्बेडकर और अस्मिता राजुरकर के आलेख, स्त्री चिंतन के अम्बेडकर दृष्टिकोण के संदर्भ में व्याख्यायित हैं, तो प्राध्यापक धूपनाथ प्रसाद इतिहास चिंतन से नारी अस्मिता पर प्रश्न करते हैं, ''मनु से पूर्व नारी स्वतंत्र थी और पुरुष की समान भागीदार थी, मनु ने उसे पदावनत क्यों किया?'' ऐसा नहीं होता तो शायद आज स्त्री विमर्श की आवश्यकता नहीं पड़ती। 1955 में अम्बेडकर द्वारा संसद में पेश किया गया 'हिंदू कोड बिल' समस्त नारी-सशक्तिकरण का कारक था न कि केवल एक जातिविषयक बोधक था। यहां भी अम्बेडकर की मानवीय चेतना को समझना होगा और जब प्रोफेसर प्रीति सागर अपने आलेख में उद्घोष करती हैं 'दलित स्त्री के मनुष्य बनने की छटपटाहट' तो यह उद्घोष बहुजन का है न कि किसी जाति विशेष की स्त्री का ; क्योंकि 'दलित' का अर्थ कोई जाति विशेष नहीं है। कमोबेश सभी समाज में स्त्रियां दबी-दबायी रहती हैं। दलित का अर्थ गरीबी भी नहीं है, यहां अर्थ है अपनी अस्मिता से वंचित! मनु ने भी नारी को 'पदावनत'  किया है, किसी खास जाति की नारी को नहीं, तो यहां मनुष्य बनने की छटपटाहट में वे सभी दबी-दबायी नारी का संकेत है जहां सम्पूर्ण मनुष्यता उद्गमित होती है।

       जाति विषयक खण्ड विकास सिंह मौर्य और संजय गजभिए के विश्लेषण से पुष्ट हंै तो आदिवासी खण्ड गोविंद कुमार मीना, भगत नारायण महतो, विजेंद्र मीना के आलेख आदिवासी समस्या, संस्कार और परिवेश की बात करते हैं, जिसमें विजेन्द्र मीना का ही आलेख अनुकूल है। ध्यातव्य हो कि आदिवासी और दलित (आज के परिप्रेक्ष्य में एक खास जाति समुदाय) दोनों दो समुदाय हैं, दोनों की दो संस्कृति है, दो संस्कार हैं, भाषा एवं लिपि भी अलग है, उनके जीवन-यापन, रीति-रिवाज़ और परिवेश अलग है, अत: दलित के साथ आदिवासी अध्ययन अनुचित है। यहां यह ठीक है कि अम्बेडकर ने समाज के दबे-कुचले वंचित वर्ग की बात की है, पर यह भी है कि आदिवासी अपनी संस्कृति एवं संस्कार में सहज मन के पाखी हैं, वे अपने लोक में लोकराग से सम्पूर्ण हैं, हमने उन्हें शोषित किया है, उन्हें दलित किया है; अत: दलित और आदिवासी का विमर्श अलग-अलग हो तो बेहतर मानवीय बोध होगा। दोनों को एक साथ सांगोपांग करना मनबोध मानवीयता के हेतु यथोचित नहीं है।

 गोविंद कुमार मीना के आलेख में तुलसीदास' की काव्यपंक्तियां उल्लिखित हैं। 'तारणा को 'ताडऩा' का अर्थ प्रताडि़त करना समझा जाता है, जबकि वह 'तारणा/'तारना' है अर्थात् पार लगाना, उनका उद्धार करना, कल्याण करना। अपभ्रंशित भाषा में 'तारणा/ताडऩा यथा 'तारना' ही है परंतु नकारात्मक चिंतन के प्रतिरोधियों ने उसे प्रताडऩा समझ कर उल्लेख किया है, यह भ्रमात्मक प्रचार है। यथा

ढोर गंवार शूद्र पशु नारी

सकल तारना के अधिकारी

       दूसरी पंक्ति में ही 'तारणा' के बाद 'अधिकारी शब्द पर ध्यान दीजिए-'अधिकारीÓ का अर्थ विधि-सम्मत अधिकार का न्यासी। दूसरा यह कि कोई अपने लिए प्रताडि़त होने का अधिकार पालेगा? असम्भव! यह मनुष्य या किसी भी जैविक का स्वभाव नहीं है। ऐसे में अनर्गल अर्थ सदियों से गढऩा मूर्खता ही है। कोई भी संत प्रकृति का मानव किसी भी जीव को प्रताडि़त करने की बात नहीं करेगा। तुलसी का निहितार्थ है ढोर, गंवार, शूद्र, पशु एवं नारी ये सभी 'तारणा' 'तारना' के अधिकारी हैं अर्थात् तर जाने के अधिकारी, उद्धार के अधिकारी, कल्याणार्थ अधिकारी हैं। ये वंचित हैं, इनका कल्याण होना चाहिए, यहां तक कि अनबोलता पशु भी और नारी भी, केवल दलित नहीं, सभी नारी। ये सभी दबी-दबायी मानवता की पुकार हैं, इनका उत्थान, कल्याण होना चाहिए। अस्तु, शब्द-अर्थ समझे बिना व्याख्या भी निरीह हो जाती है।

       राष्ट्र-निर्माण में डॉ. अम्बेडकर का अपूर्व योगदान रहा है जिसे प्रफुल्ल भगवान मेश्राम ने विस्तार से विवेचित किया है तथा विशिष्ट चिंतक सुभाष गाताडे ने 'महाड़ सत्याग्रह के 90 साल' की विस्तृत तथा तर्कपूर्ण सार्थक व्याख्या की है। ज्ञातव्य हो कि यही 'महाड़' शब्द अपभ्रंशित स्वरुप में 'महार' रुप लिया यथा ताऱणा/तारना का अभिप्राय। अपने लम्बे विश्लेषणात्मक निबंध में 'महाड़ सत्याग्रह' जैसी ऐतिहासिक परिघटना का क्रमिक विश्लेषण श्री सुभाष गाताडे की सफलता है। इनके विश्लेषण में एक मजेदार बात यह है कि 20 मार्च 1927 की तपती दुपहरी में महाड़ सत्याग्रह के लिए करीब चार हजार लोग कूच कर रहे थे। उसमें जो नारा लग रहा था, वह इतिहास का सत्य घोषित कर रहा था- 'महात्मा गांधी की जय', 'शिवाजी महाराज की जय', 'समानता की जय'। इससे गांधी और अम्बेडकर के मर्म को समझा जा सकता है। इसी कारण पत्रकार प्रोफेसर अरुण कुमार त्रिपाठी अम्बेडकर बनाम गांधी में विवाद, संवाद और समन्वय की बात करते हैं।

विशेषांक में अम्बेडकर की 125 वीं जयंती को लेकर शोधार्थी शिल्पा भगत तथा आरती कुमारी ने अपनी-अपनी वैचारिकी को व्यक्त किया है। संघर्ष खण्ड में शुभांगी शंभरकर, प्रेम कुमार तथा दिलीप लक्ष्मण गिरहे ने अम्बेडकर के जीवन-संघर्ष तथा आंदोलनों की रुपरेखा में उनका सामाजिक शिल्पकार न्याय का वास्तु कैसे निर्मित करता है, इस चिंतन की सफल चर्चा की है।

बौध्द विचारधारा को लेकर 'युवा संवाद' के इस विशेषांक में प्राध्यापक रमेश कुमार, डॉ.सुरजीत कुमार सिंह के आलेख संचयित हैं। 'अम्बेडकर ने जगाई जीवन जीने की ललकÓ सुरजीत कुमार सिंह का अम्बेडकर के प्रति बौध्दिक चिंतन का फलक उजागर करता है। सम्पादकीय में सुरजीत सिंह ने थामस पिकेट जैसे अर्थशास्त्री के वक्तव्य को ले कर चेतावनी का संदेश दिया है। यथा-''भारत में गैर बराबरी बहुत बढ़ गई है। इसके जिम्मेदार राजनीतिक दल हैं।' बिल्कुल सत्य है, आज की गंदी राजनीति ने हमारे भाई-चारे के संबंध को ज़ार-ज़ार कर दिया है, ये हमारे-आपके बीच गैर बराबरी की संकीर्ण गली निर्माण कर अपना राजपथ सुरक्षित रखते हैं। इस दिशा में मानवता के भविष्य के बारे में बौध्दिक-विवेक से हमें सोचना होगा।

'युवा संवाद' के इस विशेषांक के सुन्दर सम्पादन के लिए सुरजीत कुमार सिंह, अरुण कुमार त्रिपाठी तथा सम्पादक ए. के. अरुण  बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने अम्बेडकर की वैचारिकी को एक जगह इक_ा कर पाठकों, अध्येताओं, शोधार्थियों के लिए उपलब्ध कराया है। विशेषांक में समाहित तीन लघु कथाएं अपने-अपने प्रसंगवश मर्मस्पर्शी हैं, परंतु ज्ञान चन्द्र पाल की 'अपमानÓ शीर्षक लघुकथा चिंतन का एक अजीबोगऱीब फलक देती है। बहुत खूब है कथा-विन्यास! अंकित साहिर की कविता 'हम अपवित्र हैं' दलित बोध का मानवीय घोष है, बहुत ही बेहतरीन। सम्पादक के चयन-दृष्टि की परिपाक हैं ये रचनाएं! विशेषांक में अम्बेडकर संदर्भित छायाचित्र अतीत की अनुपम याद दिलाते हैं जिससे संवेदना संवेदित हो जाती है।

कुल मिलाकर 'युवा संवाद' का दिसम्बर 2017 'अम्बेडकर विशेषांक' एक उपलब्धि है।

'युवा संवाद' अम्बेडकर विशेषांक, दिसम्बर 2017 पृ. 150, मूल्य रु 100 -/ सम्पादक ए. के. अरुण, विशेषांक सम्पादन: सुरजीत कुमार सिंह, 167 ए/ जी. एच. 2, पश्चिम विहार, नई दिल्ली - 110063

 पाद टिप्पणी

ध्यातव्य हो कि जिस समय संत कवि तुलसीदास रामचरितमानस लिख रहे थे, वह परिष्कृत हिन्दी का काल नहीं था। वह अवधी, ब्रज, बुंदेली आदि मिश्रित क्षेत्रीय बोलियों की लोक में बोली जाने वाली हिंदी थी। अस्तु, इस परिप्रेक्ष्य में काव्यभाषा के रुप में सकल तारना के अधिकारी में ताडऩा या तारणा शब्द प्रयोग सहज बोलचाल की भाषाबोली में उच्चरित नहीं था, कारण कि लोक में व्यवहृत ड़ का र तथा ण का न सामान्य प्रचलन में था। आज भी बोलचाल की भाषा में ड़ के लिए र तथा ण के लिए न सामान्य है । यह तद्भवी शब्द प्रयोग अनर्थ के लिए नहीं है। काव्यभाषा में उच्चारण के हेतु मुखसुख के  लिए प्रयोगित है, ध्वनि सिद्धांत भी यही कहता है। तुलसी, उस काल परिप्रेक्ष्य में रामचरितमानसष् की रचना लोक की भाषा में कर रहे थे, आज मानस की लोकप्रियता अक्षुण्ण है। 

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