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Saturday 25 Nov 2017

दिल का तलघर

दिल का तलघर

 

अतल गहराई में

एक अतल खोह

जिसमें छुपा हुआ कोई

पकाता रहता न जाने क्या-क्या

खुशबुएं उड़ती रहतीं दिल-दिमाग तक

 

अचानक बुलाता मुझे तेज आवाज में

और सुनते ही उसकी पुकार

पैरों के नीचे खुलता

एक रहस्यमय द्वार

मैं गिरने लगता

किसी अतल गह्वर में

 

इस फिसलन, इस गिरन

को रोकने के लिए

अंधकार के उस गह्वर को

भरना अनिवार्य

डालकर कुछ उस खोखल में

 

कपड़े घडिय़ां कलमें

चश्मे किताबें और गाडिय़ां

डालने लगता मैं उसमें

स्त्रियों-पुरुषों तथा अन्य पशुओं के

लजीज अंग-प्रत्यंग

जूते बर्तन शब्द हंसी और व्यंग्य

बड़े-बड़े आलीशान मकान

सोना चांदी जमीन

अहंकार ईष्र्या प्यार और नफरत

दफ़्तर और दुकान...

रुक कर गर्व के साथ देखता

भरा-पूरा लगता जीवन का पारावार

 

फिर कुछ ही समय बाद

उस अतल गहराई से

उठती एक दर्द की लहर

कांपती पैरों तले की धरती

डगमगाने लगता संसार

नीचे झांकने पर

मुंहबाए दिखता फिर वही काला सुराख

खालीपन भयावह

और उसे भरने की अनिवार्यता दुर्निवार

शून्य को भरना

और भरने के बाद शून्य होते जाना

 

रिक्तता से रिक्तता तक का

दुष्चक्र यह रुकता नहीं

घूमता रहता लगातार... लगातार

न मोक्ष, न संधि, न शांति इस चक्र में

सिर्फ अल्पविराम और हाहाकार... हाहाकार

शून्य की अनंतता का

नहीं मिलता कोई छोर

कोई अंत

उसे भरने का-

 

क्षण-भंगुर इस जीवन में।

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छूटते हुए

 

जिन्हें हर गाड़ी

छोड़ जाती है पीछे

 

जाने एक दिन कहां खो जाते हैं

किसी छोटे से रेलवे स्टेशन के बाजू की

परती जमीन पर बसे परिवार

 

अपनी रंग-बिरंगी पोशाकों

चूल्हों पर उबलती दालों

खदबदाते भात

धूप में सूखते और बारिश में भीगते कपड़ों

खेलते कूदते बच्चों के साथ

पीछे छोड़ कर

अपने बुझे-अधबुझे चूल्हे

कुछ फटी-टूटी चप्पले, कील-कांटे

अधमरा-सा धुआं

अपनी खुशबुएं और बदबुएं

 

परिवार ही नहीं

मेला भी छोड़ जाता है

वीरान मैदान के अंधेरे किसी कोने

में सोये हुए

खोए हुए बच्चे को

जंगल जाने कहां चले जाते हैं

अपने खूबसूरत हिरणों

रौबदौर शेरों

शोख सुरीले परिंदों को पीछे छोड़

 

तपते सेहरा में

छोटी सी प्यारी बस्ती को

छोड़ जाती है बारिशें

 

खुशी से उछलते, हाथ हिलाते बच्चे

नदियां, पहाड़

जंगल और गांव छोड़ती

चलती रहती हैं यात्राएं अनंत

अनजान गंतव्यों की ओर

 

प्यार के लिए बेचैन

प्रेम का कोई पात्र

छूट ही जाता है

 

पिछले ठिकाने पर किसी

या कहीं धुंधले भविष्य में

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आमने-सामने

 

मैं जानता हूं

तुम्हारे बाल धूप में सफेद नहीं हुए

पर मेरी मूंछों का काला रंग भी

किसी बाजारू खिजाब का नहीं

 

अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठे

तुम जो चक्रव्यूह रचते हो

 

उन्हें तोडऩा

मैंने अपनी मां के पेट में सीखा था

 

तुम्हारी अक्षौहिणी सेनाओं के

चमचमाते, धारदार हथियारों को मुंह चिढ़ाने के लिए

मेरे हाथों में

रथ का एक टूटा हुआ पहिया ही बहुत है

छल-बल से तुम

मुझे मार तो सकते हो

मगर इतिहास युगों तक

तुम्हारे चेहरों पर

कालिख मलता रहेगा

और मेरी एक छूटी हुई चिन्गारी से,

ये तुम्हारी राजधानी का शहर

सदियों तक जलता रहेगा।

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पिता की वायलिन

 

एक वायलिन,

उसे बजाने के शौक

और हुनर के अलावा कुछ नहीं था

पिता के पास

 

बहुत पहले, बहुत कुछ बेचकर

शायद बहुत महंगी

खरीदी थी उन्होंने

 

उनकी मृत्यु के बाद इस समय

मेरे दो बड़े भाई झगड़ रहे हैं

उस वायलिन के लिए

जिसे वे बजाना नहीं जानते

 

चुपचाप पड़ा सोच रहा हूं, मिल भी गई

तो वे करेंगे क्या उसका?

 

बजाना मैं भी नहीं जानता

 

सबसे छोटा जानता है

पर वह अलग है इस झगड़े से

शायद इसलिए कि सिर्फ वह

संसार की किसी भी वायलिन में

पा लेगा पिता को।